Monday, 12 May 2025

सिर्फ प्रेम, प्रेम, और प्रेम, अन्य कुछ भी नहीं .....

 सिर्फ प्रेम, प्रेम, और प्रेम, अन्य कुछ भी नहीं .....

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भगवान से उनके प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी मांगना उनका अपमान है| जब हम भगवान के प्रेममय रूप का ध्यान करते हैं तब जिस आनंद की अनुभूति होती है वह आनंद अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता| वह आनंद अनुपम और अतुल्य है| यह बात करने का नहीं, अनुभव का विषय है| अपने सम्पूर्ण हृदय से प्रभु को प्रेम करो, और उनसे उनके प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी मत चाहो| जो आनंद, संतुष्टि और तृप्ति उनको प्रेम करने और उनकी उपस्थिति के आभास से मिलती है, वह इस सृष्टि में अन्य कहीं भी नहीं मिल सकती| उसके आगे अन्य सब कुछ गौण है| जब उनका प्रेम मिल गया तो सब कुछ मिल गया| अन्य कोई अपेक्षा मत रखिये|
हम सब के ह्रदय में वह प्रेम जागृत हो, सभी को शुभ मंगल कामनाएँ|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ मई २०१८ पुनश्च: --- भगवान एक रस हैं जिसे चखते रहो और आनंद लो. वे एक प्रवाह हैं जिन्हें स्वयं के माध्यम से निरंतर प्रवाहित होने दो. उनके सिवा कोई अन्य है ही नहीं. वे अनिर्वचनीय परमप्रेम हैं, जिनके प्रेम में स्वयं को विसर्जित कर दो.
!! ॐ ॐ ॐ !!

यशस्वी और शूरवीर महाराज छत्रसाल ---

 यशस्वी और शूरवीर महाराज छत्रसाल

-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज


चाटुकार दरबारियों, घटिया चापलूसों और बौद्धिक गुलामों के द्वारा औरंगजेब के नाम से मशहूर किया गया लफंगा मुइउद्दीन मुहम्मद 1618 ईस्वी में पैदा हुआ। तब तक शराबी और लफंगे सलीम ने, जिसे दरबारियों और बौद्धिक गुलामों ने जहांगीर प्रचारित किया है और जो राजपूतानी की कोख से जन्म लेने के बाद भी न तो वीर था और ना ही विद्यापरायण, ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत मंे तंबाकू के व्यापार की इजाजत दे दी थी और कंगलों की इस कंपनी ने, जिसे विश्व में व्यापार का कोई अनुभव तब तक प्राप्त नहीं था, व्यापार के नाम पर लूटपाट और डकैती शुरू कर दी। उधर पुर्तगाली राजकुमारी से इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स द्वितीय का विवाह हुआ तो उन्होंने मुंबई टापू दहेज में राजकुमार को दे दिया। यह टापू सकरी खाड़ियों, दलदल और पहाड़ियों के कारण भारत के आंतरिक भूभाग से अलग-थलग था। पुर्तगाली कंपनी के एक अधिकारी अलफांसो अलबुकर्क ने भारतीय व्यापारियों से रिश्ते बनाकर और गोवा तथा मुंबई के बीच के कई जागीरदारों से दोस्ती कर छल और विश्वासघात के द्वारा कई जगह छोटी-छोटी सफलतायें पा ली थीं। यूरोपीय ईसाई एक कृतघ्न जाति रही है और उन्होंने सदा अपने को सहायता देने वालों के साथ कृतघ्नता और विश्वासघात किया।

दक्षिण पश्चिमी भारत की एक महत्वपूर्ण जागीर कोझीकोड (जो अब कालिकट के नाम से प्रसिद्ध है) का मुख्यालय भी कोझीकोड था जो दक्षिणी पश्चिमी समुद्र तट का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था। जहाँ से चीन और पश्चिम एशिया दोनों ही दिशाओं में हिन्दू-व्यापारी नियमित जाते थे और बहुत बड़ी मात्रा में व्यापार होता था। वास्कोडिगामा भी वस्तुतः उन हिन्दू व्यापारियों की सहायता से ही 1498 ईस्वी में यहाँ पहुंचा था। कोझीकोड के राजा का नाम समुद्री था। जिसे मलयालम में समुत्री कहते थे और चीनी लोग जिसे शमितीसी कहते थे। अरब लोग उन्हें सामुरी कहते थे। यूरोपीय ईसाई भाषा संबंधी अपनी असमर्थता के कारण और नाम बिगाड़ने की अपनी असंस्कृत और विकृत आदत के कारण जामोरिन कहने लगे। जामोरिन ने वास्कोडिगामा को और बाद में अलबुकर्क को संरक्षण दिया। परंतु इन कृतघ्न दुष्टों ने उनके साथ दगाबाजी की और गुप्त रीति से विष देकर उनकी हत्या कर दी। इसके लिये उसने एक हिन्दू स्त्री से प्रेम का नाटक किया और उसके द्वारा ही जहर दिलवाया। अलबुकर्क ने शुरू में इस्लाम से अपनी घृणा के कारण मुसलमानों को बड़ी संख्या में मारा और मरवाया तथा इसके लिये हिन्दू राजाओं से सहयोग और प्रशंसा पाने का प्रयास करता रहा जिसमें अधिक सफल नहीं हुआ। अलबुकर्क की नीति पर चलते हुये पुर्तगालियों ने छत्रपति शिवाजी महाराज के समय भी उनसे छलपूर्ण मैत्री का प्रयास किया परंतु शिवाजी महाराज उनके झांसे में नहीं आये। इस अलबुकर्क ने जमोरिन की हत्या के बाद कई छोटे-छोटे इलाकों पर कब्जा किया। उनमें से मुंबई का उजाड़ टापू भी एक था। जो पुर्तगाल के राजा ने इंग्लैंड के राजकुमार के साथ अपनी बेटी की शादी करते समय दहेज में दे दिया जिसे चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को दस पौंड वार्षिक किराये पर दे दिया। यह दयनीय स्थिति थी उस समय इंग्लैंड की।

मुइउद्दीन मुहम्म्द के जन्म के समय सलीम का बेटा खुर्रम (जो मुइउद्दीन का पिता था) ऐश में डूबा हुआ था। मुइउद्दीन खुर्रम का तीसरा बेटा था और छठवीं संतान था (बीच मंे तीन बेटियां हुईं)। सलीम ने मुइउद्दीन और उसके भाई को विद्रोह के कारण लाहौर की जेल में बद कर रखा था। सलीम की मृत्यु के बाद उन्हें छोड़ा गया और वे जाकर आगरा में खुर्रम से मिले।
भाग्यवश मुइउद्दीन हाथी से कुचले जाने से बचा और इस कुशलता के लिये उसकी दरबार में प्रशंसा हुई। परंतु अपनी तारीफ से उसका गुमान बढ़ता चला गया और वह एक अत्याचारी जागीरदार बन गया। उसने अपने पिता को जेल में डालने के बाद तथा भाइयों की हत्या करने के बाद आगरे की जागीर पर कब्जा किया और अपने प्रपितामह जलालुद्दीन (नकली नाम अकबर) के समय से राजपूतों से चली आ रही दोस्ती का लाभ उठाकर राजपूतों के नेतृत्व में ओरछा के बुन्देलों पर आक्रमण कर दिया। 1635 ईस्वी में यह आक्रमण हुआ। खुर्रम और मुइउद्दीन दोनों ही राजपूतानियों की संतति थे और वस्तुतः जलालुद्दीन के समय से ही इनका कोई मजहब नहीं था परंतु युद्धोन्माद के अभ्यस्त मोमिनो का सहारा लेने के लिये वे प्रायः मौलवियों को भी महत्व देते थे और मुसलमानों के बीच खुद को मुसलमान तथा राजपूतों के बीच खुद को राजपूत प्रचारित करते रहते थे। मुइउद्दीन भी ऐसा ही दोगला था। राजपूत सेनापति के साथ उसने ओरछा को जीता और फिर ओरछा नरेश से संधि कर ली। नरेश ने इस संधि के बाद रामराजा मंदिर के बगल में ही बनाये गये महल का नाम जहांगीर महल कर दिया जो वस्तुतः खुर्रम के मशहूर नाम जहांगीर के आधार पर रखा गया था।

उधर गोड़ो और चंदेलों में आपसी युद्ध का लाभ उठाकर मुइउद्दीन ने चंदेलों को अपने साथ लिया और कई लड़ाइयों में गोड़ों के विरूद्ध चंदेलों की सहायता ली। इसी बीच पन्ना पर बुंदेलों का शासन हो गया। उसी समय महामति प्राणनाथ ने पन्ना में डेरा डाला और बंुदेला महाराज छत्रसाल की मुइउद्दीन से दोस्ती कराई। छत्रसाल ने कई लड़ाइयों में मुइउद्दीन का साथ दिया। परंतु फिर मुइउद्दीन पर मौलाओं का बढ़ता प्रभाव देखकर उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज से हाथ मिलाया और मुइउद्दीन के विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया। मुइउद्दीन छत्रसाल से थर-थर कांपता था। ऐसे वीर थे हमारे महाराज छत्रसाल।

महाराज छत्रसाल ने अनेक लड़ाइयों में मुइउद्दीन और उसके सहयोगी राजपूतों की सेनाओं को हराया। 1671 ईस्वी तक उन्होंने पूर्वी मालवा को एक स्वतंत्र राज्य बनाया और फिर 40 वर्षों तक पन्ना को राजधानी बनाकर चंबल और बेतवा तथा यमुना और तमसा नदी के बीच के बहुत बड़े क्षेत्र पर राज्य करते रहे। यह क्षेत्र तत्कालीन इंग्लैंड से बड़ा था। इस प्रकार महाराज छत्रसाल ही महाराणा प्रताप के सच्चे उत्तराधिकारी हैं। महाराज छत्रसाल और छत्रपति शिवाजी महाराज ही 17वीं शताब्दी ईस्वी के भारत के प्रतापी सम्राट हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज तत्कालीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट हैं और महाराज छत्रसाल उनके सहयोगी सम्राट हैं। जिनकी स्वयं में बड़ी महिमा और गरिमा है। इन महान राजाओं को केन्द्र में रखे बिना 17वीं शताब्दी ईस्वी के भारत के विषय में विशेषकर उत्तरी भारत से महाराष्ट्र और गोवा तक फैले क्षेत्र के विषय में कुछ भी लिखना इतिहास नहीं है, कूड़ा कबाड़ा है। इतिहास तो वही है जो महाराणा प्रताप, महाराज छत्रसाल और छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता, भव्यता, महिमा और साम्राज्य का वर्णन करे।
-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

हम अपने स्वधर्म की रक्षा करें ---

 हम अपने स्वधर्म की रक्षा करें ---

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हम शाश्वत आत्मा हैं। आत्मा की अभीप्सा (Aspiration) और स्वधर्म -- परमात्मा की प्राप्ति है। बाकी सब इसी का विस्तार है। यह विचार ही राष्ट्र-निर्माण करता है।
आसुरी शक्तियों से संघर्ष में स्वधर्म ही हमारी रक्षा कर सकता है, राज्य-सत्ता नहीं। हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा। "धर्मो रक्षति रक्षितः" --यह वाक्य मनुस्मृति और महाभारत में आता है।
गीता में भगवान का आश्वासन है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥
अर्थात् -- इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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मुझे ऐसा आभास होता है कि अगले कुछ वर्षों में विश्व की अधिकांश जनसंख्या नष्ट हो जाएगी। बहुत कम मनुष्य इस पृथ्वी पर बचेंगे। रक्षा उन्हीं की होगी जो ईश्वर की चेतना में रहेंगे। धर्म की पुनःप्रतिष्ठा होगी।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
१३ मई २०२३

सब का साथ, सब का विकास --- .

 सब का साथ, सब का विकास ---

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किसी भी देश की वास्तविक संपदा उसके चरित्रवान, कार्यकुशल और सत्यनिष्ठ नागरिक होते हैं। अंधकार और प्रकाश साथ-साथ नहीं रह सकते। अमृत में थोड़ा सा विष मिला दिया जाये तो पूरा अमृत ही विष हो जाएगा।
अमृत का भी साथ, और विष का भी साथ --- किसी का विकास नहीं कर सकता। उसका परिणाम - मृत्यु है।
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समान नागरिक संहिता, हिंदुओं को धर्मशिक्षा का अधिकार, हिन्दू मंदिरों से सरकारी लूट की समाप्ति, आदि कई ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हिंदुओं को बड़ी पीड़ा होती है। हिंदुओं के साथ भी समानता का व्यवहार हो। ये भी विकास-पुरुष से हमारी अपेक्षाएं हैं।
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जिनके कारण आप सत्ता में हैं, उन्हें नाराज न करें। जिन्हें आप प्रसन्न करने का प्रयास कर रहे हैं, वे कभी भी आपको अपना मत (Vote) नहीं देंगे।
शुभ कामनाएं !!
१३ मई २०२३

"अद्वैतानुभूती" के रचेता आचार्य गोविन्दपाद ---

 प्रिय मान्यवर, सप्रेम नमस्ते! ॐ नमः शिवाय|

आपने मुझसे "अद्वैतानुभूती" के रचेता आचार्य गोविन्दपाद के बारे में कुछ लिखने को कहा था, जिनकी आध्यात्ममणि का स्पर्श पाकर आदि शंकराचार्य के जीवन में आध्यात्म की स्वर्णज्योति प्रकाशित हुई थी| मैं जो कुछ भी लिखने जा रहा हूँ उसका श्रेय संतों से प्राप्त सत्संग के आशीर्वाद का फल है| इसमें मेरी ओर से कुछ भी नहीं है|
सिद्ध योगियों ने अपनी दिव्य दृष्टी से देखा था कि आचार्य गोबिन्दपाद ही अपने पूर्व जन्म में भगवान पतंजलि थे| ये अनंतदेव यानि शेषनाग के अवतार थे| इसलिए इनके महाभाष्य का दूसरा नाम फणीभाष्य भी है| कलियुगी प्राणियों पर करुणा कर के भगवान अनंतदेव शेषनाग ने इस कलिकाल में तीन बार पृथ्वी पर अवतार लिया| पहले अवतार थे भगवान पतंजलि, दूसरे आचार्य गोबिन्दपाद और तीसरे वैद्यराज चरक| इस बात की पुष्टि सौलहवीं शताब्दी में महायोगी विज्ञानभिक्षु ने भी की है|
आचार्य शंकर बाल्यावस्था में गुरु की खोज में सुदूर केरल के एक गाँव से पैदल चलते चलते आचार्य गोबिन्दपाद के आकषर्ण से आकर्षित होकर ओंकारेश्वर के पास के वन की एक गुफा तक चले आये| आचार्य शंकर गुफा के द्वार पर खड़े होकर स्तुति करने लगे कि हे भगवन, आप ही अनंतदेव (शेषनाग) थे, अनन्तर आप ही इस धरा पर भगवान् पतंजलि के रूप में अवतरित हुए थे, और अब आप भगवान् गोबिन्दपाद के रूप में अवतरित हुए हैं| आप मुझ पर कृपा करें|
आचार्य गोबिन्दपाद ने संतुष्ट होकर पूछा --- कौन हो तुम?
इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य शंकर ने दस श्लोकों में परमात्मा अर्थात परम मैं का क्या स्वरुप है यह सुनाया| अद्वैतवाद की परम तात्विक व्याख्या बालक शंकर के मुख से सुनकर आचार्य गोबिन्दपाद ने शंकर को परमहंस संन्यास धर्म में दीक्षित किया|
इस अद्वैतवाद के सिद्धांत की पहिचान आचार्य शंकर के परम गुरु ऋषि गौड़पाद ने अपने अमर ग्रन्थ "मान्डुक्यकारिका" से कराई थी| यह अद्वैतवाद का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ है| अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदित करने हेतु आचार्य शंकर ने सवसे पहिले मांडूक्यकारिका पर ही भाष्य लिखा था| आचार्य गौड़पाद श्रीविद्या के उपासक थे|
सार की बात जो मुझे ज्ञात थी वह मैंने आप को कम से कम शब्दों में बता दी| आगे आप स्वयं अपनी साधना से जानिये|
धन्यवाद| ॐ शिव ! ॐ ||
१२ मई २०१५

मैंने तो तुम्हारे चरणों में आश्रय माँगा था, पर तुम ने तो अपने ह्रदय में ही मुझे बसा दिया ---

 हे, प्रियतम प्रभु ,

मैंने तो तुम्हारे चरणों में आश्रय माँगा था, पर तुम ने तो अपने ह्रदय में ही मुझे बसा दिया|
यह सृष्टि तुम्हारे मन का एक स्वप्न मात्र है| तुम्हारे इस स्वप्न में मेरा अब और कोई पृथक अस्तित्व न हो|
मैं, अपनी पृथकता यानि मेरापन, सारे संचित कर्मफल, सारी कमियाँ, अच्छाइयाँ, बुराईयाँ, अवगुण, गुण, पाप व पुण्य तुम्हें ही बापस अर्पित कर रहा हूँ|
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मुझ में इतनी क्षमता नहीं है कि अब और कोई साधना कर सकूँ|
कुछ करना है तो वह अब तुम्हीं करोगे| मेरे सारे अधूरे कार्य भी अब तुम्हें ही पूरे करने होंगे|
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तुम्हारे इस दिव्य परम प्रेम के अतिरिक्त मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए|
मैं स्वयं ही तुम्हारा परम प्रेम हूँ और सदा रहूँ|
"ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव॥" ॐ ॐ ॐ ||
१२ मई २०१६

परमात्मा को समर्पण !!! ....

 परमात्मा को समर्पण !!! ....

अब इतनी शारीरिक और मानसिक क्षमता, उत्साह व ऊर्जा नहीं बची है कि मैं भगवान का ध्यान कर सकूँ | भक्तिभाव में भी संदेह होने लगा है कि कहीं यह आत्म-संतुष्टि के लिए हो रही भावुकता मात्र ही तो नहीं है | यह सोच विचार कर सब कुछ अपनी विवशता में भगवान को ही समर्पित कर दिया कि हे प्रभु, आप जानो और आपका काम जाने, मेरे वश की यह बात नहीं है | अगर साधना ही करानी थी तो उसकी सामर्थ्य भी देते ! अब तो कुछ नहीं चाहिए आपसे |
पर घोर आश्चर्य !!!!!!
सहसा मैंने यह पाया है कि मेरा कुछ करने का भाव तो एक भ्रम मात्र था | सब कुछ तो परम ब्रह्म परम शिव ही कर रहे हैं | वे अपना ध्यान स्वयं ही कर रहे हैं | मैं तो मात्र एक उपकरण था जिसका कोई अस्तित्व अब नहीं रहा है | मैनें तो उनके श्रीचरणों में आश्रय माँगा था, पर उन्होंने तो अपने ह्रदय में ही मुझे बसा लिया है |
हे प्रभु, यह सृष्टि आपके मन का एक विचार या स्वप्न मात्र है | आपके इस विचार या स्वप्न में मेरा आपसे अब कोई पृथक अस्तित्व नहीं है | मेरी अपनी पृथकता यानि मेरापन, सारे संचित कर्मफल, सारी कमियाँ, अच्छाइयाँ, बुराईयाँ, अवगुण, गुण, पाप व पुण्य सब आपको ही बापस अर्पित है | मुझ में इतनी क्षमता नहीं है कि अब और कोई साधना कर सकूँ | आप और मैं एक हैं, और सदा एक ही रहेंगे | जो आप हैं वह ही मैं हूँ, और जो मैं हूँ वह ही आप हैं |
ॐ ॐ ॐ ||
१२ मई २०१७