Saturday, 15 March 2025

अपनी ठुड्डी -- भूमि के समानान्तर रखें

 एक बहुत महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहता हूँ, कृपया इसे गंभीरता से लें ---

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उठते-बैठते, चलते-फिरते हर समय, विशेषकर पूजा-पाठ, ध्यान-साधना के समय प्रयासपूर्वक अपनी ठुड्डी -- भूमि के समानान्तर रखें। इससे आपकी गर्दन सीधी रहेगी। गर्दन सीधी रहेगी तो मेरुदण्ड भी उन्नत रहेगा। इसका असर जादू का सा होगा। जो आध्यात्मिक साधना करते हैं, उनको इस मुद्रा में प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान में बड़ी सुगमता होगी। जो श्रीविद्या, और क्रियायोग की साधना करते हैं, वे इसे अपनी साधना में बड़ा सहायक पायेंगे।
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आप कर के देखिये। पद्मासन या सिद्धासन में खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा (शांभवी मुद्रा) में बैठिए और भ्रूमध्य में ध्यान कीजिये। ठुड्डी हर समय भूमि के समानान्तर रहे। आगे आपकी गुरु-परंपरा निश्चित रूप से आपकी सहायता करेगी। किसी गुरु-परंपरा से जुड़ना भी अति आवश्यक है।
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अधिक लिखने में असमर्थ हूँ। भौतिक स्वास्थ साथ नहीं दे रहा है। आत्मबल से ही यह दीपक प्रज्ज्वलित है। यह शरीर बड़ा धोखेबाज मित्र है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ मार्च २०२४

Friday, 14 March 2025

पञ्चमकार साधन रहस्य ......

पञ्चमकार साधन रहस्य ......

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तंत्र साधना में पञ्च मकारों का बड़ा महत्व है| पर जितना अर्थ का अनर्थ इन शब्दों का किया गया है उतना अन्य किसी का भी नहीं| इनका तात्विक अर्थ कुछ और है व शाब्दिक कुछ और| इनके गहन अर्थ को अल्प शब्दों में व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया गया उनको लेकर दुर्भावनावश कुतर्कियों ने सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया है| मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये पञ्च मकार हैं|
कुलार्णव तन्त्र के अनुसार --
"मद्यपानेन मनुजो यदि सिद्धिं लभेत वै| मद्यपानरता: सर्वे सिद्धिं गच्छन्तु पामरा:||
मांसभक्षेणमात्रेण यदि पुण्या गतिर्भवेत| लोके मांसाशिन: सर्वे पुन्यभाजौ भवन्तु ह||
स्त्री संभोगेन देवेशि यदि मोक्षं लभेत वै| सर्वेsपि जन्तवो लोके मुक्ता:स्यु:स्त्रीनिषेवात||"
मद्यपान द्वारा यदि मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर ले तो फिर मद्यपायी पामर व्यक्ति भी सिद्धि प्राप्त कर ले| मांसभक्षण से ही यदि पुण्यगति हो तो सभी मांसाहारी ही पुण्य प्राप्त कर लें| हे देवेशि! स्त्री-सम्भोग द्वारा यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर सभी स्त्री-सेवा द्वारा मुक्त हो जाएँ|
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(1) आगमसार के अनुसार मद्यपान किसे कहते हैं ----
"सोमधारा क्षरेद या तु ब्रह्मरंध्राद वरानने| पीत्वानंदमयास्तां य: स एव मद्यसाधक:||
हे वरानने! ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है उसका पान करने से जो आनंदित होते हैं उन्हें ही मद्यसाधक कहते हैं|
ब्रह्मा का कमण्डलु तालुरंध्र है और हरि का चरण सहस्त्रार है| सहस्त्रार से जो अमृत की धारा तालुरन्ध्र में जिव्हाग्र पर (ऊर्ध्वजिव्हा) आकर गिरती है वही मद्यपान है|
इसीलिए ध्यान साधना हमेशा खेचरी मुद्रा में ही करनी चाहिए|
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(२) आगमसार के अनुसार मांस भक्षण किसे कहते हैं --
"माँ शब्दाद्रसना ज्ञेया तदंशान रसना प्रियान | सदा यो भक्षयेद्देवि स एव मांससाधक: ||"
अर्थात मा शब्द से रसना और वाक्य जो रसना को प्रिय है| जो व्यक्ति रसना का भक्षण करते हैं यानी वाक्य संयम करते हैं उन्हें ही मांस साधक कहते हैं| जिह्वा के संयम से वाक्य का संयम स्वत: ही खेचरी मुद्रा में होता है| तालू के मूल में जीभ का प्रवेश कराने से बात नहीं हो सकती और इस खेचरीमुद्रा का अभ्यास करते करते अनावश्यक बात करने की इच्छा समाप्त हो जाए इसे ही मांसभक्षण कहते हैं|
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(३) आगमसार के अनुसार मत्स्य भक्षण किसे कहते हैं --
"गंगायमुनयोर्मध्ये मत्स्यौ द्वौ चरत: सदा| तौ मत्स्यौ भक्षयेद यस्तु स: भवेन मत्स्य साधक:||"
अर्थान गंगा यानि इड़ा, और यमुना यानि पिंगला; इन दो नाड़ियों के बीच सुषुम्ना में जो श्वास-प्रश्वास गतिशील है वही मत्स्य है| जो योगी आतंरिक प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित कर लेते हैं वे ही मत्स्य साधक हैं|
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(४) आगमसार के अनुसार चौथा मकार "मुद्रा" है जिसका अर्थ है --
"सहस्त्रारे महापद्मे कर्णिका मुद्रिता चरेत| आत्मा तत्रैव देवेशि केवलं पारदोपमं||
सूर्यकोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलं| अतीव कमनीयंच महाकुंडलिनियुतं|
यस्य ज्ञानोदयस्तत्र मुद्रासाधक उच्यते||"
सहस्त्रार के महापद्म में कर्णिका के भीतर पारद की तरह स्वच्छ निर्मल करोड़ों सूर्य-चंद्रों की आभा से भी अधिक प्रकाशमान ज्योतिर्मय सुशीतल अत्यंत कमनीय महाकुंडलिनी से संयुक्त जो आत्मा विराजमान है उसे जिन्होंने जान लिया है वे मुद्रासाधक हैं|
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(५) शास्त्र के अनुसार पाँचवा मकार मैथुन किसे कहते हैं अब इस पर चर्चा करते हैं ---
आगमसार में इस की व्याख्या कई श्लोकों में है अतः स्थानाभाव के कारण उन्हें यहाँ न लिखकर उनका भावार्थ ही लिख रहा हूँ) .....
मैथुन तत्व ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है| मैथुन द्वारा सिद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है|
नाभि (मणिपुर) चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजस तत्व 'र'कार है| उसके साथ आकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप 'म'कार का मिलन होता है|
ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, उस अवस्था में रमण करने का नाम ही "राम" है|
इसका वर्णन मुंह से नहीं किया जा सकता| जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए "राम" तारकमंत्र है|
हे देवि, मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं|
यह आत्मतत्व में स्थित होना ही मैथुन तत्व है|
अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है|
स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है|
केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है|
खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है|
अजपा-जप ही रमण है|
यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है|
यह पंचमकार की साधना भगवान शिव द्वारा पार्वती जी को बताई गयी है|
(संक्षिप्त में आत्मा में यानि राम में सदैव रमण ही तंत्र शास्त्रों के अनुसार मैथुन है न कि शारीरिक सम्भोग)
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(Note: यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं| योगी नाक से या मुंह से सांस नहीं लेते| वे सांस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है| नाक या या मुंह से ली गई सांस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है| जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब सांस रुक जाती है और मृत्यु हो जाती है| इसे ही प्राण निकलना कहते हैं|
अतः अजपा-जप और ध्यान का अभ्यास नित्य करना चाहिए|)
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ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
१४ मार्च २०१३

भगवत्-प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है ---

 भगवत्-प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है ---

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मेरे व्यक्तिगत विचार, निजानुभूतियों पर आधारित हैं, किसी अन्य की नकल नहीं हैं। हम दूसरों की सेवा करने को ईश्वर की सेवा मानते हैं, यह सत्य है, क्योंकि प्रत्येक जीवात्मा -- परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। मातृरूप में परमात्मा स्वयं को जगन्माता के रूप में व्यक्त करते हैं। प्राणतत्व के रूप में जगन्माता स्वयं ही समस्त जगत को चैतन्य रखे हुए है। वे पूरी सृष्टि की प्राण हैं।
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परमात्मा के ध्यान में हमारी चेतना इस देह में नहीं रहती, हम समष्टि के साथ एक हो जाते हैं। इस बात को बुद्धि से नहीं, बल्कि अनुभव से ही समझा जा सकता है। उस अवस्था में भगवान स्वयं ही स्वयं का ध्यान करते हैं। परमात्मा सच्चिदानंद हैं। उनके ध्यान में हम स्वयं सच्चिदानंदमय हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उस स्थिति को ब्राह्मीस्थिति बताया है। योग की भाषा में उसे कूटस्थ-चैतन्य कहते हैं। यह स्थिति ही स्थितप्रज्ञता प्रदान कर हमें ईश्वर का साक्षात्कार कराती है। ईश्वर का साक्षात्कार ही सबसे बड़ी सेवा है जो हम ईश्वर की इस सृष्टि में कर सकते हैं। यह सभी प्राणियों का कल्याण करती है। दूसरे शब्दों में भगवत्-प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है जो हम भगवान की इस सृष्टि की कर सकते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ मार्च २०२४

Wednesday, 12 March 2025

भगवान से प्रार्थना करना क्या आवश्यक है? ---

 भगवान से प्रार्थना करना क्या आवश्यक है? ---

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भगवान तो हमारे हृदय में हैं। विचारों के उदय होने से पूर्व ही उन्हें पता होता है कि हम क्या सोचने वाले हैं। अतः क्या प्रार्थना करना आवश्यक है?
उपरोक्त प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है। फिर भी आज भगवान से दो प्रार्थनाएँ हैं -
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(१) मुझसे किसी भी प्रकार का कोई प्रज्ञा-अपराध न हो।
(२) जिन भी नकारात्मक परिस्थितियों में भगवान ने मुझे रखा है, उनकी नकारात्मकता से प्रेमाग्नि की प्रज्ज्वलित आभा कम न हो। किसी भी तरह की कामना/आकांक्षा का अंतःकरण में जन्म ही न हो।
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मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए। मुझमें हिमालय से भी बड़ी-बड़ी लाखों कमियाँ हैं, जिन्हें मैं कभी दूर नहीं कर सकता। किसी भी तरह के रूप-गुण का सौंदर्य मुझमें नहीं है। अपना सर्वस्व यथावत् उन्हें समर्पित है। वे मुझे मेरे सभी अवगुणों के साथ स्वीकार करें। कोई गुण भूलवश यदि मुझमें हो तो उसे भी वे स्वीकार करें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१3 मार्च २०२४

गीता के आत्म-संयम योग का सत्संग और स्वाध्याय ---

 गीता के आत्म-संयम योग का सत्संग और स्वाध्याय : भगवान कहते हैं ....

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यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||
भावार्थ : परमात्मा को प्राप्त करके वह योग में स्थित मनुष्य परम आनन्द को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है।
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तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्| स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा||६:२३||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये कि दृड़-विश्वास के साथ योग का अभ्यास करते हुए सभी सांसारिक संसर्ग से उत्पन्न दुखों से बिना विचलित हुए योग समाधि में स्थित रहकर कार्य करे।
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सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः| मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ||६:२४||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये मन से उत्पन्न होने वाली सभी सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण-रूप से त्याग कर और मन द्वारा इन्द्रियों के समूह को सभी ओर से वश में करे।
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शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया| आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ||६:२५||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये क्रमश: चलकर बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करता हुआ मन को आत्मा में स्थित करके, परमात्मा के चिन्तन के अलावा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करे।
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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ | ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ||६:२६||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी आत्मा में ही स्थिर करे।
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ | उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ||६:२७||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य का मन जब परमात्मा में एक ही भाव में स्थिर रहता है और जिसकी रज-गुण से उत्पन्न होने वाली कामनायें भली प्रकार से शांत हो चुकी हैं, ऎसा योगी सभी पाप-कर्मों से मुक्त होकर परम-आनन्द को प्राप्त करता है।
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः| सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते||६:२८||
भावार्थ : इस प्रकार योग में स्थित मनुष्य निरन्तर योग अभ्यास द्वारा सभी प्रकार के पापों से मुक्त् होकर सुख-पूर्वक परब्रह्म से एक ही भाव में स्थिर रहकर दिव्य प्रेम स्वरूप परम-आनंद को प्राप्त करता है।
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सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि| ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः||६:२९||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य सभी प्राणीयों मे एक ही आत्मा का प्रसार देखता है और सभी प्राणीयों को उस एक ही परमात्मा में स्थित देखता है, ऎसा योगी सभी को एक समान भाव से देखने वाला होता है।
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||
भावार्थ : जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
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सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः| सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||६:३१||
भावार्थ : योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है |
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन| सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः||६:३२||
भावार्थ : हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणीयों को देखता है, सभी प्राणीयों के सुख और दुःख को भी एक समान रूप से देखता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये।
१२ मार्च २०१९

भगवान से परमप्रेम की अवस्था में हम जो कुछ भी करेंगे वह अच्छा ही होगा ---

 भगवान से परमप्रेम की अवस्था में हम जो कुछ भी करेंगे वह अच्छा ही होगा ---

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जिस प्रकार सूखी लकड़ी के दो टुकड़ों के लगातार घर्षण से अग्नि प्रज्ज्वलित होकर उस लकड़ी को जला देती है, वैसे ही भक्तिपूर्वक किया हुआ साधन ज्ञानाग्नि को उद्दीप्त कर अज्ञानरूपी ईंधन को भस्म कर देता है| स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी बापस आत्मा में ही स्थिर करते रहना चाहिए|

जब हम परमात्मा की चेतना में होते हैं, तब हमारे माध्यम से परमात्मा जो भी कार्य करते हैं, वह पुण्य होता है।
जब हम राग-द्वेष, लोभ और अहंकार के वशीभूत होकर कुछ भी कार्य करते हैं, वह पाप होता है।
१२ मार्च २०२० 

हमारा लक्ष्य परमात्मा है, उन्हीं की उपासना करें ---

हमारा लक्ष्य परमात्मा है। उन्हीं की उपासना करें। सारा मार्गदर्शन उपनिषदों व गीता में है। उनको पाने की पात्रता विकसित करें। पात्रता होने पर परमात्मा स्वयं आयेंगे। उनको पाने का कोई लघुमार्ग (Short Cut) नहीं है। परमात्मा से कम किसी भी उपलब्धि के लिए समय नष्ट न करें। हमारे में चाहे लाख कमियाँ हों, वे भी उन्हें ही समर्पित कर दें। अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम उन्हें दें। वे कहीं दूर नहीं हैं, निकटतम से भी अधिक निकट हैं। हमारा लक्ष्य सदा हमारे समक्ष रहे।

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१२ मार्च २०२२