Tuesday, 18 March 2025

वेदों को समझने के लिए --

 वेदों को समझने के लिए --

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"शिक्षा", "कल्प", "व्याकरण", "निरुक्त", "छंद", और "ज्योतिष" का ज्ञान अनिवार्य है। इनके बिना वेदों को समझना असंभव है। जिनको इन का ज्ञान नहीं है, वे वेदों को नहीं समझ पायेंगे। जिन्हें वेदों को समझने की जिज्ञासा है वे किसी ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य के पास जाकर पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता से उनसे ज्ञान ग्रहण करें। सिर्फ अनुवाद पढ़ने से कुछ नहीं मिलेगा। जो इन वेदांगों की शिक्षा देते हैं, उन्हें 'उपाध्याय' कहते हैं। आजकल तो ब्राह्मणों का एक वर्ग स्वयं को 'उपाध्याय' लिखता है, लेकिन 'उपाध्याय' वह है जिसे वेदांगों का ज्ञान है।
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(१) वेदों के सही उच्चारण के ढंग को "शिक्षा" कहते हैं| वेदों के एक ही शब्द के दो प्रकार से उच्चारण से अलग अलग अर्थ निकलते है| इसलिये वेद को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उच्चारण कैसे हो|
(२) जितने भी धार्मिक कर्म -- पूजा, हवन आदि है उन सब को करने का तरीका जिन ग्रंथों में है वे "कल्प" सूत्र है|
(३) "व्याकरण" वेद के पदों को कैसे समझा जाये यह बताता है|
(४) "निरुक्त" शब्दों के अर्थ लगाने का तरीका है|
(५) "छंद" अक्षर विन्यास के नियमों का ज्ञान कराता है|
(६) "ज्योतिष" से कर्म के लिये उचित समय निर्धारण का ज्ञान होता है|
१८ मार्च २०२३

मनुष्य जाति सदा से ही आपस में लड़ती-झगड़ती आई है, और लड़ते-झगड़ते ही समाप्त हो जाएगी ---

 मनुष्य जाति सदा से ही आपस में लड़ती-झगड़ती आई है, और लड़ते-झगड़ते ही समाप्त हो जाएगी ---

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जब तक 'अहंकार' और 'लोभ' (तमोगुण) है, तब तक मनुष्य जाति में कोई एकता, प्रेम और सद्भावना नहीं हो सकती। मनुष्य जाति सदा से ही आपस में लड़ती-झगड़ती आई है, और लड़ते-झगड़ते ही समाप्त हो जाएगी। मनुष्यों में ईर्ष्या-द्वेष, काम-क्रोध और मोह के पीछे भी 'अहंकार' और 'लोभ' ही है। कोई कितनी भी बड़ी-बड़ी 'सद्भाव', 'प्रेम', व 'जीओ और जीने दो' की बातें करता रहे, लेकिन लोभ और अहंकार से उस व्यक्ति का तुरंत पतन हो जाता है।
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मनुष्यों में प्रेम और एकता सिर्फ और सिर्फ आध्यात्म यानि ब्रह्मज्ञान से ही हो सकती है, लेकिन त्रिगुण (तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण) उसे आध्यात्म में प्रवेश नहीं करने देते। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसीलिए अर्जुन को "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" कहते हैं। यह एक साधना है जिसका दीर्घकाल तक किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ, सिद्ध आचार्य के मार्गदर्शन में गहन अभ्यास करना पड़ता है। निस्त्रैगुण्य यानि त्रिगुणातीत होकर ही व्यक्ति आध्यात्मिक हो सकता है। इसके लिए भी भक्ति और अभीप्सा अनिवार्य है।
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जो राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त है, उसे वीतराग कहते हैं। जो सब प्रकार की स्पृहाओं से मुक्त है, वह निःस्पृह है। इन से भी ऊंची अवस्था स्थितप्रज्ञता है। जो सब प्रकार की तृष्णाओं व एषणाओं से मुक्त है, वह स्थितप्रज्ञ है। जो स्थितप्रज्ञ है, वही सन्यासी है, और वही आत्माराम (आत्मा में रमण करने वाला) है।
ॐ तत्सत् !!
१८ मार्च २०२३

होली के त्योहार की बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा है, उस दिन स्वयं भगवान पुरुषोत्तम हमारे साथ भक्ति के रंगों से होली खेलेंगे ---

होली के त्योहार की बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा है, उस दिन स्वयं भगवान पुरुषोत्तम हमारे साथ भक्ति के रंगों से होली खेलेंगे। वे ही एकमात्र पुरुष हैं। अभी से वे चैतन्य में छा गए हैं। वे ही इस देह में जी रहे हैं। इन नासिकाओं से वे ही सांसें ले रहे हैं, इस हृदय में वे ही धडक रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, वे ही सम्पूर्ण अस्तित्व हैं। उनके अतिरिक्त किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है। वे निरंतर हमारे चैतन्य में रहें। मैं उनकी शरणागत हूँ।

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"परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥१०:१२॥"
"स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१०:१५॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- आप परमब्रह्म परमात्मा, परमधाम परमतेज और परमपावन हैं, तथा आप नित्य और दिव्य पुरुष हैं। आप आदिदेव अजन्मा और सर्वव्यापी हैं। (१०:१२)
हे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवों के देव ! हे जगत् के स्वामी ! आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं॥ (१०:१५)
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"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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साधना की दृष्टि से हिन्दू धर्म में चार रात्रियों का बड़ा महत्व है -- कालरात्रि (दीपावली), दारुणरात्रि (होली), मोहरात्रि (जन्माष्टमी), और महारात्रि (महाशिवरात्रि)। इन रात्रियों को की गई उपासना कई गुना अधिक फलदायी होती हैं॥ एक सप्ताह के पश्चात आने वाले होली के त्योहार की अभी से तैयारी आरंभ कर दीजिये। होली की दारुण रात्रि, व धुलन्डी का अपराह्न काल -- भगवान की आराधना/उपासना के लिए है, न कि अन्य किसी प्रयोजन के लिए।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
१८ मार्च २०२४

Monday, 17 March 2025

अभ्यास और वैराग्य का महत्व .....

 अभ्यास और वैराग्य का महत्व .....

भगवान कहते हैं .....
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं| अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||१६:३५||
अर्थात .... हे महाबाहो, यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है, यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है| परन्तु हे कुन्तीनन्दन, अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है|
प्रकृति में कुछ भी निःशुल्क नहीं है| हर चीज का शुल्क चुकाना पड़ता है| जब तक मन चंचल है तब तक ईश्वर की परिकल्पना असम्भव है| मन की चंचलता को स्थिर करना साधना का प्रथम लक्ष्य है| इसके लिए अभ्यास और वैराग्य दोनों ही आवश्यक हैं| अभ्यास और वैराग्य वह शुल्क है जो हमें मन की चंचलता को स्थिर करने के लिए चुकाना पड़ता है|
अपनी गुरु-परम्परानुसार खूब अभ्यास करें| परमात्मा से परम प्रेम होने पर वैराग्य भी होने लगता है पर वैराग्यवान यानि विरक्त लोगों के साथ नियमित सत्संग करने से वैराग्य निश्चित रूप से सिद्ध होता है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ मार्च २०१८

हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती, इसमें कोई दोष हमारा नहीं, सारा दोष भगवान का है ---

हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती, इसमें कोई दोष हमारा नहीं, सारा दोष भगवान का है| वे जो विलंब कर रहे हैं, इसके लिए उन्हें पछताना पड़ेगा| हमारा दोष इतना ही है कि -- हमें उन से प्रेम है, और उनके सिवाय हमें अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता|

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वे सब नियमों, शास्त्रों, उपासनाओं और बंधनों से परे हैं| कोई बंधन उन पर लागू नहीं होता| उन की मर्जी, जितना चाहें वे तड़पा लें, हम तो उन्हीं के हैं, और उन्हीं के रहेंगे| वे आज आयें या कल, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता| आना तो उन्हें पड़ेगा ही| अब वे और नहीं छिप सकते| अपने सारे गुण/दोष और पाप/पुण्य -- हम बापस उन्हें ही अर्पित करते हैं| उनके सिवाय हमें अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| इस अति दारुण विलंब के लिए वे स्वयं ही दोषी हैं|
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
१७ मार्च २०२१

"अहमिन्द्रो न पराजिग्ये॥" (अहम् इन्द्रः अस्मि, पराजितः न भवामि।)" ---

"अहमिन्द्रो न पराजिग्ये॥" (अहम् इन्द्रः अस्मि, पराजितः न भवामि।)"
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"ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्‌विषावहै॥" ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
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"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात्॥"
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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥
अर्थ - हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।
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देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्। देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥
अर्थ - यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।
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तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।
अर्थ - हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।
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तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः। तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥
अर्थ - वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।
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तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
अर्थ - हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।
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स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
अर्थ - महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
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पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः।अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥
अर्थ - चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञआलाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।
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भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
अर्थ - हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।
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शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम।पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥
अर्थ - हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।
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अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥
अर्थ - अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।
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ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थ - द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

कुछ भी हो, हर परिस्थिति में भारत ही विजयी होगा ---

 कुछ भी हो, हर परिस्थिति में भारत ही विजयी होगा ---

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इंग्लैंड और अमेरिका को भारत पर कारवाई (आक्रमण) करने के लिए उकसाना, व भारत के विरुद्ध शत्रुदेश चीन के लिए झूठा महिमा-गान एक देशद्रोह का कृत्य है। इंग्लैंड और अमेरिका का इतिहास देखिए, ये देश कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं। यूक्रेन को मोहरा बनाकर रूस को नष्ट करने के लिए युद्ध शुरू करने के पीछे भी विश्व में नशीले पदार्थ बेचने वालों, और हथियार बेचने वालों का अमेरिकी गिरोह है। भारत में भी उनका खूनी खेल चल रहा है। पाकिस्तान को मोहरा बनाकर ये देश भारत के विरुद्ध भी युद्ध छेड़ सकते हैं।
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भारत का प्रभाव कम करने के लिए किये जा रहे चीनी प्रयास, और पर्दे के पीछे भारत के विरुद्ध चल रही अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय कूटनीति ताड़ने योग्य है।
भारत के समर्पित और सफल नेतृत्व के कारण विरोधियों का दांव नहीं पड़ रहा है। भारत में उनके जासूसी कांड, और जी-२० समिट के समय भारत पर आतंकी हमला करवाने के षड़यंत्र खुल कर सामने आ गए हैं।
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भारत-विभाजन, नेहरू को सत्ता-हस्तांतरण, पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध छेड़े गए सारे युद्ध, और भारत में की गई सारी लूट-खसोट व आतंकी हमलों के पीछे ब्रिटिश-अमेरिकी छल-नीति ही थी।
कुछ भी हो, हर परिस्थिति में भारत ही विजयी होगा। भारत की रक्षा धर्म ने की है, और धर्म ही भारत की रक्षा करेगा। किसी भी परिस्थिति में हम अपना स्वधर्म न छोड़ें। गीता में भगवान का वचन है --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।।"
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१७ मार्च २०२३