Monday, 17 March 2025

कुछ भी हो, हर परिस्थिति में भारत ही विजयी होगा ---

 कुछ भी हो, हर परिस्थिति में भारत ही विजयी होगा ---

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इंग्लैंड और अमेरिका को भारत पर कारवाई (आक्रमण) करने के लिए उकसाना, व भारत के विरुद्ध शत्रुदेश चीन के लिए झूठा महिमा-गान एक देशद्रोह का कृत्य है। इंग्लैंड और अमेरिका का इतिहास देखिए, ये देश कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं। यूक्रेन को मोहरा बनाकर रूस को नष्ट करने के लिए युद्ध शुरू करने के पीछे भी विश्व में नशीले पदार्थ बेचने वालों, और हथियार बेचने वालों का अमेरिकी गिरोह है। भारत में भी उनका खूनी खेल चल रहा है। पाकिस्तान को मोहरा बनाकर ये देश भारत के विरुद्ध भी युद्ध छेड़ सकते हैं।
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भारत का प्रभाव कम करने के लिए किये जा रहे चीनी प्रयास, और पर्दे के पीछे भारत के विरुद्ध चल रही अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय कूटनीति ताड़ने योग्य है।
भारत के समर्पित और सफल नेतृत्व के कारण विरोधियों का दांव नहीं पड़ रहा है। भारत में उनके जासूसी कांड, और जी-२० समिट के समय भारत पर आतंकी हमला करवाने के षड़यंत्र खुल कर सामने आ गए हैं।
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भारत-विभाजन, नेहरू को सत्ता-हस्तांतरण, पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध छेड़े गए सारे युद्ध, और भारत में की गई सारी लूट-खसोट व आतंकी हमलों के पीछे ब्रिटिश-अमेरिकी छल-नीति ही थी।
कुछ भी हो, हर परिस्थिति में भारत ही विजयी होगा। भारत की रक्षा धर्म ने की है, और धर्म ही भारत की रक्षा करेगा। किसी भी परिस्थिति में हम अपना स्वधर्म न छोड़ें। गीता में भगवान का वचन है --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।।"
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१७ मार्च २०२३

Sunday, 16 March 2025

हमारी प्रज्ञा, परमात्मा में प्रतिष्ठित हो, हमारी हर क्रिया से उन के प्रकाश का निरंतर विस्तार हो, यह हमारा स्वधर्म है ---

 हमारी प्रज्ञा, परमात्मा में प्रतिष्ठित हो, हमारी हर क्रिया से उन के प्रकाश का निरंतर विस्तार हो। यह हमारा स्वधर्म है। ॐ स्वस्ति !!

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हमारा लक्ष्य उच्चतम हो। हमारे भावों में पवित्रता हो। हर परिस्थिति में हम विजयी होंगे। हमारी रक्षा धर्म ने की है, और धर्म ही हमारी रक्षा करेगा। किसी भी परिस्थिति में हम अपना स्वधर्म न छोड़ें। गीता में भगवान का वचन है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
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"अहमिन्द्रो न पराजिग्ये॥" (अहम् इन्द्रः अस्मि, पराजितः न भवामि।)"
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"ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्‌विषावहै॥" ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
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"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात्॥"
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥ कृपा शंकर
१७ मार्च २०२४

द कश्मीर फाइल्स" फिल्म देखने का साहस मैं अभी तक नहीं जुटा पाया हूँ

 द कश्मीर फाइल्स" फिल्म देखने का साहस मैं अभी तक नहीं जुटा पाया हूँ। कश्मीरी हिंदुओं का इज़राइल की तरह सैन्यीकरण हो। राष्ट्रहित में वे बलशाली वीर क्षत्रिय बनें। महाराजा ललितादित्य जैसे पराक्रमी राजा उनके आदर्श बनें।

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जिस भूमि में आचार्य अभिनव गुप्त जैसे महान दार्शनिक और लल्लेश्वरी देवी जैसी महान भक्त हुई हैं, जहाँ की शारदापीठ पूरे भारत में वैदिक शिक्षा की एक प्रमुख पीठ थी, उस कश्मीर की भूमि से असत्य का तमोगुणी अंधकार निश्चित रूप से नष्ट होगा।
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जय अखंड भारत !! जय सत्य-सनातन-धर्म !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मार्च २०२२

"जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्वरानने" ---

 "जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्वरानने" ---

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मुझे कुछ भी नहीं आता-जाता, कुछ भी ज्ञान नहीं है, लेकिन जब से नींद से उठा हूँ, परमात्मा की परम कृपा से उनकी चेतना में खोया हुआ हूँ। विशाल महासागर में जल की एक बूंद जैसे विलीन हो जाती है, वैसे ही परमात्मा की दिव्य चेतना में विलीन हो गया हूँ। भगवान सच्चिदानंद (सत् चित्त आनंद) हैं, उनकी अनुभूति सच्चिदानंद के रूप में होती है। जब से उठा हूँ, चारों ओर उनका आनंद व्याप्त है, जो मैं स्वयं हूँ, यह नश्वर देह नहीं।
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पूरी सृष्टि, सारा ब्रह्मांड -- प्रणव का जप कर रहा है, जिसे मैं सुन रहा हूँ। नेत्रों के दोनों गोलक बिना किसी तनाव के नासिका-मूल के समीप हैं, और उनका दृष्टि-पथ भ्रूमध्य की ओर है। सहस्त्रारचक्र में एक ज्योति प्रकट हुई थी जो अब सारे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गई है। उस ज्योतिर्मय ब्रह्म और प्रणवनाद के साथ मैं एक हूँ, यह नश्वर देह नहीं। शांभवी-मुद्रा अपने आप लग गई है, और देख रहा हूँ कि सारा ब्रह्मांड जप-योग कर रहा है, जिसका मैं साक्षीमात्र हूँ। गीता में भगवान ने कहा है --
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०:२५॥"
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी सम्बन्धी भेदों में (पदात्मक वाक्यों में) एक अक्षर 'ओंकार' हूँ। यज्ञों में जपयज्ञ हूँ, और स्थावरों में अर्थात् अचल पदार्थों में हिमालय हूँ। (महर्षीणां भृगुः अहम्। गिरां वाचां पदलक्षणानाम् एकम् अक्षरम् ओंकारः अस्मि। यज्ञानां जपयज्ञः अस्मि। स्थावराणां स्थितिमतां हिमालयः॥)
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तंत्र शस्त्रों में भगवान शिव कहते हैं -- ‘हे पार्वती जी! मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि जप से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है।’
लगभग ९० प्रतिशत साधक जपयोग की ही साधना करते हैं। योगसूत्रों में महर्षि पतंजलि सर्वप्रथम क्रियायोग को बतलाते है। क्रियायोग वे क्रियाएं हैं, जिन से योग सधे। क्रियायोग का एकमात्र उद्देश्य समाधि की सिद्धि है।
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मंत्र का अर्थ क्या है? --- वह शक्ति जो मन को बन्धन से मुक्त कर दे, वही मंत्र है। ध्वनि के सूक्ष्म विद्युत रुपान्तर को मंत्र कह सकते हैं। मंत्र का जप करते-करते मन जब अपने आराध्य के ध्यान में तन्मय होकर लयभाव को प्राप्त कर लेता है, तब मंत्र की सिद्धि होती है। जिसके जपने मात्र से मनुष्य संसार रूपी भवसागर से पार हो जाता है, वह मंत्र की सार्थकता है। यह बहुत बड़ा विषय है जिसका कोई अंत नहीं है, अतः इसका समापन करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मार्च २०२३

Saturday, 15 March 2025

अपनी ठुड्डी -- भूमि के समानान्तर रखें

 एक बहुत महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहता हूँ, कृपया इसे गंभीरता से लें ---

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उठते-बैठते, चलते-फिरते हर समय, विशेषकर पूजा-पाठ, ध्यान-साधना के समय प्रयासपूर्वक अपनी ठुड्डी -- भूमि के समानान्तर रखें। इससे आपकी गर्दन सीधी रहेगी। गर्दन सीधी रहेगी तो मेरुदण्ड भी उन्नत रहेगा। इसका असर जादू का सा होगा। जो आध्यात्मिक साधना करते हैं, उनको इस मुद्रा में प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान में बड़ी सुगमता होगी। जो श्रीविद्या, और क्रियायोग की साधना करते हैं, वे इसे अपनी साधना में बड़ा सहायक पायेंगे।
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आप कर के देखिये। पद्मासन या सिद्धासन में खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा (शांभवी मुद्रा) में बैठिए और भ्रूमध्य में ध्यान कीजिये। ठुड्डी हर समय भूमि के समानान्तर रहे। आगे आपकी गुरु-परंपरा निश्चित रूप से आपकी सहायता करेगी। किसी गुरु-परंपरा से जुड़ना भी अति आवश्यक है।
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अधिक लिखने में असमर्थ हूँ। भौतिक स्वास्थ साथ नहीं दे रहा है। आत्मबल से ही यह दीपक प्रज्ज्वलित है। यह शरीर बड़ा धोखेबाज मित्र है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ मार्च २०२४

Friday, 14 March 2025

पञ्चमकार साधन रहस्य ......

पञ्चमकार साधन रहस्य ......

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तंत्र साधना में पञ्च मकारों का बड़ा महत्व है| पर जितना अर्थ का अनर्थ इन शब्दों का किया गया है उतना अन्य किसी का भी नहीं| इनका तात्विक अर्थ कुछ और है व शाब्दिक कुछ और| इनके गहन अर्थ को अल्प शब्दों में व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया गया उनको लेकर दुर्भावनावश कुतर्कियों ने सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया है| मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये पञ्च मकार हैं|
कुलार्णव तन्त्र के अनुसार --
"मद्यपानेन मनुजो यदि सिद्धिं लभेत वै| मद्यपानरता: सर्वे सिद्धिं गच्छन्तु पामरा:||
मांसभक्षेणमात्रेण यदि पुण्या गतिर्भवेत| लोके मांसाशिन: सर्वे पुन्यभाजौ भवन्तु ह||
स्त्री संभोगेन देवेशि यदि मोक्षं लभेत वै| सर्वेsपि जन्तवो लोके मुक्ता:स्यु:स्त्रीनिषेवात||"
मद्यपान द्वारा यदि मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर ले तो फिर मद्यपायी पामर व्यक्ति भी सिद्धि प्राप्त कर ले| मांसभक्षण से ही यदि पुण्यगति हो तो सभी मांसाहारी ही पुण्य प्राप्त कर लें| हे देवेशि! स्त्री-सम्भोग द्वारा यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर सभी स्त्री-सेवा द्वारा मुक्त हो जाएँ|
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(1) आगमसार के अनुसार मद्यपान किसे कहते हैं ----
"सोमधारा क्षरेद या तु ब्रह्मरंध्राद वरानने| पीत्वानंदमयास्तां य: स एव मद्यसाधक:||
हे वरानने! ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है उसका पान करने से जो आनंदित होते हैं उन्हें ही मद्यसाधक कहते हैं|
ब्रह्मा का कमण्डलु तालुरंध्र है और हरि का चरण सहस्त्रार है| सहस्त्रार से जो अमृत की धारा तालुरन्ध्र में जिव्हाग्र पर (ऊर्ध्वजिव्हा) आकर गिरती है वही मद्यपान है|
इसीलिए ध्यान साधना हमेशा खेचरी मुद्रा में ही करनी चाहिए|
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(२) आगमसार के अनुसार मांस भक्षण किसे कहते हैं --
"माँ शब्दाद्रसना ज्ञेया तदंशान रसना प्रियान | सदा यो भक्षयेद्देवि स एव मांससाधक: ||"
अर्थात मा शब्द से रसना और वाक्य जो रसना को प्रिय है| जो व्यक्ति रसना का भक्षण करते हैं यानी वाक्य संयम करते हैं उन्हें ही मांस साधक कहते हैं| जिह्वा के संयम से वाक्य का संयम स्वत: ही खेचरी मुद्रा में होता है| तालू के मूल में जीभ का प्रवेश कराने से बात नहीं हो सकती और इस खेचरीमुद्रा का अभ्यास करते करते अनावश्यक बात करने की इच्छा समाप्त हो जाए इसे ही मांसभक्षण कहते हैं|
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(३) आगमसार के अनुसार मत्स्य भक्षण किसे कहते हैं --
"गंगायमुनयोर्मध्ये मत्स्यौ द्वौ चरत: सदा| तौ मत्स्यौ भक्षयेद यस्तु स: भवेन मत्स्य साधक:||"
अर्थान गंगा यानि इड़ा, और यमुना यानि पिंगला; इन दो नाड़ियों के बीच सुषुम्ना में जो श्वास-प्रश्वास गतिशील है वही मत्स्य है| जो योगी आतंरिक प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित कर लेते हैं वे ही मत्स्य साधक हैं|
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(४) आगमसार के अनुसार चौथा मकार "मुद्रा" है जिसका अर्थ है --
"सहस्त्रारे महापद्मे कर्णिका मुद्रिता चरेत| आत्मा तत्रैव देवेशि केवलं पारदोपमं||
सूर्यकोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलं| अतीव कमनीयंच महाकुंडलिनियुतं|
यस्य ज्ञानोदयस्तत्र मुद्रासाधक उच्यते||"
सहस्त्रार के महापद्म में कर्णिका के भीतर पारद की तरह स्वच्छ निर्मल करोड़ों सूर्य-चंद्रों की आभा से भी अधिक प्रकाशमान ज्योतिर्मय सुशीतल अत्यंत कमनीय महाकुंडलिनी से संयुक्त जो आत्मा विराजमान है उसे जिन्होंने जान लिया है वे मुद्रासाधक हैं|
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(५) शास्त्र के अनुसार पाँचवा मकार मैथुन किसे कहते हैं अब इस पर चर्चा करते हैं ---
आगमसार में इस की व्याख्या कई श्लोकों में है अतः स्थानाभाव के कारण उन्हें यहाँ न लिखकर उनका भावार्थ ही लिख रहा हूँ) .....
मैथुन तत्व ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है| मैथुन द्वारा सिद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है|
नाभि (मणिपुर) चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजस तत्व 'र'कार है| उसके साथ आकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप 'म'कार का मिलन होता है|
ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, उस अवस्था में रमण करने का नाम ही "राम" है|
इसका वर्णन मुंह से नहीं किया जा सकता| जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए "राम" तारकमंत्र है|
हे देवि, मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं|
यह आत्मतत्व में स्थित होना ही मैथुन तत्व है|
अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है|
स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है|
केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है|
खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है|
अजपा-जप ही रमण है|
यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है|
यह पंचमकार की साधना भगवान शिव द्वारा पार्वती जी को बताई गयी है|
(संक्षिप्त में आत्मा में यानि राम में सदैव रमण ही तंत्र शास्त्रों के अनुसार मैथुन है न कि शारीरिक सम्भोग)
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(Note: यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं| योगी नाक से या मुंह से सांस नहीं लेते| वे सांस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है| नाक या या मुंह से ली गई सांस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है| जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब सांस रुक जाती है और मृत्यु हो जाती है| इसे ही प्राण निकलना कहते हैं|
अतः अजपा-जप और ध्यान का अभ्यास नित्य करना चाहिए|)
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ॐ तत्सत् !
कृपा शंकर
१४ मार्च २०१३

भगवत्-प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है ---

 भगवत्-प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है ---

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मेरे व्यक्तिगत विचार, निजानुभूतियों पर आधारित हैं, किसी अन्य की नकल नहीं हैं। हम दूसरों की सेवा करने को ईश्वर की सेवा मानते हैं, यह सत्य है, क्योंकि प्रत्येक जीवात्मा -- परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। मातृरूप में परमात्मा स्वयं को जगन्माता के रूप में व्यक्त करते हैं। प्राणतत्व के रूप में जगन्माता स्वयं ही समस्त जगत को चैतन्य रखे हुए है। वे पूरी सृष्टि की प्राण हैं।
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परमात्मा के ध्यान में हमारी चेतना इस देह में नहीं रहती, हम समष्टि के साथ एक हो जाते हैं। इस बात को बुद्धि से नहीं, बल्कि अनुभव से ही समझा जा सकता है। उस अवस्था में भगवान स्वयं ही स्वयं का ध्यान करते हैं। परमात्मा सच्चिदानंद हैं। उनके ध्यान में हम स्वयं सच्चिदानंदमय हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उस स्थिति को ब्राह्मीस्थिति बताया है। योग की भाषा में उसे कूटस्थ-चैतन्य कहते हैं। यह स्थिति ही स्थितप्रज्ञता प्रदान कर हमें ईश्वर का साक्षात्कार कराती है। ईश्वर का साक्षात्कार ही सबसे बड़ी सेवा है जो हम ईश्वर की इस सृष्टि में कर सकते हैं। यह सभी प्राणियों का कल्याण करती है। दूसरे शब्दों में भगवत्-प्राप्ति ही सबसे बड़ी सेवा है जो हम भगवान की इस सृष्टि की कर सकते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ मार्च २०२४