महाभारत में नहुषपुत्र ययाति कि कथा आती है जो कुरुवंश में कौरव-पांडवों के पूर्वज थे| उस समय सृष्टि में वे सबसे बड़े तपस्वी थे| सारे देवता भी उनके समक्ष नतमस्तक रहते थे| पर एक दिन उन्हें अपनी साधना का अभिमान हो गया जिससे उनके सारे पुण्य क्षीण हो गए और देवताओं ने उन्हें स्वर्ग से नीचे गिरा दिया|
Sunday, 10 November 2024
मेरा अस्तित्व परमात्मा के मन का एक स्वप्न मात्र है, उससे अधिक कुछ भी नहीं ---
अपने दिन का आरंभ और समापन ऊनी आसन पर बैठकर भगवान श्रीकृष्ण के साकार ध्यान से करें ---
अपने दिन का आरंभ और समापन ऊनी आसन पर बैठकर भगवान श्रीकृष्ण के साकार ध्यान से करें। कमर सीधी हो, ठुड्डी भूमि के समानान्तर हो, क्षमतानुसार पूर्ण-खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा हो, और दृष्टिपथ भ्रू-मध्य में हो। भगवान श्रीकृष्ण का साकार ध्यान आपको निराकार (सारे आकार जिसके हों) की भी अनुभूति करा देगा, अनंताकाश की व उससे परे की भी अनुभूतियाँ करा देगा, भगवान के पुरुषोत्तम, परमशिव व जगन्माता रूप की भी अनुभूतियाँ करा देगा। पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखो, व अपने हर कार्य का कर्ता बनाओ। आचार्य मधुसूदन सरस्वती ने उन्हें "परम-तत्व" कहा है। ध्यान का आरंभ प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा से होता है। एक ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।
(प्रश्न १) ईरान और इज़राइल में शत्रुता क्यों है? (प्रश्न २) रूस और यूक्रेन में युद्ध का क्या कारण है?
(उत्तर १) वैसे तो यहूदियत, ईसाईयत और इस्लाम -- इन तीनों ही मज़हबों का आरंभ पैग़ंबर इब्राहिम अलैहिसलाम (Prophet Abraham) से होता है। ये तीनों ही इब्राहिमी मज़हब यानि Abrahamic Religions कहलाते हैं। इनके एक बेटे इस्माइल की नस्ल में इस्लाम का जन्म हुआ। दूसरे बेटे इसाक की नस्ल में यहूदियत और ईसाईयत का जन्म हुआ। इन तीनों मज़हबों का आदि पुरुष पैग़ंबर इब्राहिम अलैहिसलाम (Prophet Abraham) है। इनका आपसी हिंसक झगड़ा पारिवारिक है।
रूस व यूक्रेन के बीच का युद्ध और क्रीमिया
आत्मा में अथाह शक्ति है ---
आत्मा में अथाह शक्ति है। अपने शिवस्वरूप में प्रतिष्ठित होइये, फिर सृष्टि में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो हमें दबा सके। परमशिव हमारा आत्मस्वरूप है, जिस में हम प्रतिष्ठित हों। आत्मा को कोई दबा नहीं सकता।
Saturday, 9 November 2024
जब तक मैं जीवित हूँ, अपनी अंतिम साँस तक परमात्मा के प्रकाश और परमात्मा के परमप्रेम में वृद्धि ही करूँगा ---
जब तक मैं जीवित हूँ, अपनी अंतिम साँस तक परमात्मा के प्रकाश और परमात्मा के परमप्रेम में वृद्धि ही करूँगा। जब यह भौतिक शरीर छोड़ने का समय आयेगा, तब परमात्मा की पूर्ण चेतना में श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई विधि से ही इस देह का त्याग करूँगा। इस समय संसार में आसुरी भाव बढ़ रहा है, जो मुझे पर भी हावी होने का प्रयास कर रहा है। ऐसे इस संसार में मैं जीवित रहूँ या मृत, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन नहीं, भगवान के आदेश का पालन जीवन के अंतिक क्षण तक करूंगा। स्वधर्म (परमात्मा की चेतना) में ही जीऊँगा, और स्वधर्म में ही इस संसार को छोडूंगा।