Wednesday, 9 June 2021

मेरी उपासना, और मेरा स्वधर्म ---

 मेरी उपासना, और मेरा स्वधर्म ---

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जब भी परमात्मा के प्रति हृदय में प्रेम उमड़ता है, आँखें स्वतः ही बंद हो जाती हैं, और दृष्टि कूटस्थ में चली जाती है। कूटस्थ -- एक अनंत विस्तारमय चेतना है, जिसमें सारी सृष्टि समाहित है -- सारी आकाश गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और जो भी कुछ भी सृष्ट व असृष्ट है, वह सब उस के भीतर है, बाहर कुछ भी नहीं। उसका केंद्र सर्वत्र है, परिधि कहीं भी नहीं, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है, कहीं कोई अंधकार नहीं। सिर्फ प्रेम ही प्रेम, और आनंद ही आनंद है। वह अनंत विस्तार और उस से परे जो कुछ भी है, वे ही मेरे परमप्रिय परमात्मा हैं, वे ही मेरे परमेष्ठि गुरु हैं, और वह ही मैं हूँ, यह नश्वर देह नहीं, जो उनका एक उपकरण मात्र है। यह सृष्टि चलायमान है जिसमें से एक अद्भुत मधुर ध्वनि निःसृत हो रही है। वह ध्वनि, प्रकाश, प्रेम और आनंद -- मैं ही हूँ। यही मेरी उपासना, यही मेरा स्वधर्म और यही मेरा अस्तित्व है| ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२ जून २०२०

श्रीमद्भगवद्गीता मेरा ही नहीं, सारे भारत का और हम सबका प्राण है ---

 श्रीमद्भगवद्गीता मेरा ही नहीं, सारे भारत का और हम सबका प्राण है ---

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श्रीमद्भगवद्गीता -- हमारा प्राण है, कोई धार्मिक ग्रंथ मात्र नहीं। जब तक गीता का ज्ञान हमारे हृदय में, और आचरण में है, तब तक भारत को और सनातन धर्म को कोई नष्ट नहीं कर सकता। गीता का ज्ञान ही सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण करेगा।
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गीता में साधकों के लिए भगवान ने स्वयं को ही हमारी आत्मा, उत्पत्ति, जीवन, और मृत्यु का कारण बताया हैं। उन्होनें स्वयं को सभी इंद्रियों में मन बताया है, जिसे हम यदि भगवान को ही बापस निरंतर समर्पित करते रहें, तो हमारा कल्याण होगा। उन्होने स्वयं को सभी प्राणियों में चेतना स्वरूप जीवन-शक्ति, यज्ञों में जपयज्ञ, सभी अक्षरों में ओंकार, और सभी को धारण करने वाला विराट स्वरूप बताया है।
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गीता में वे कहते हैं कि जो पुरुष अन्तकाल में (शरीर की मृत्यु के समय) मेरा ही स्मरण करता हुआ शारीरिक बन्धन से मुक्त होता है, वह मेरे ही भाव को, यानि मुझे (विष्णु के परम तत्त्व को) ही प्राप्त होता है। अंत समय में मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है, जिस भाव का जीवन में निरन्तर स्मरण किया है। इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध (अपने कर्म) करो। मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे। ॐकार रूपी एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण कर, मेरा स्मरण करता हुआ मनुष्य जब शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे परम-धाम को प्राप्त करता है। मुझे प्राप्त करके उस मनुष्य का इस दुख-रूपी, अस्तित्व-रहित, क्षणभंगुर संसार में, पुनर्जन्म कभी नही होता है।
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मुझे भगवान के इन वचनों के स्वाध्याय का अवसर मिला, मेरा यह जीवन और मैं स्वयं धन्य हुआ। जय हो !! सच्चिदानंद परमात्मा की जय हो !! सभी का कल्याण हो, सभी सन्मार्ग के पथिक हों !! हरिः ॐ तत्सत् !! 🌹🙏🌹
कृपा शंकर
२ जून २०२१

यज्ञानां जपयज्ञोsस्मि ---

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को "यज्ञानां जपयज्ञोsस्मि" अर्थात् यज्ञों में जप-यज्ञ बताया है। अग्नि पुराण के अनुसार "जप" का अर्थ है --
"जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः।
तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः॥"
‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश। इन दोनों प्रयोजनों को पूरा कराने वाली साधना को ‘जप’ कहते हैं।
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कोई भी साधना जितने सूक्ष्म स्तर पर होती है वह उतनी ही फलदायी होती है। वाणी के चार क्रम हैं -- परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी। जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण को बैखरी वाणी कहते हैं। उससे पूर्व मन में जो भाव आते हैं वह मध्यमा वाणी है। मन में भाव उत्पन्न हों, उससे पूर्व वे मानस पटल पर दिखाई भी दें वह पश्यन्ति वाणी है। और उससे भी परे जहाँ से विचार जन्म लेते हैं वह परा वाणी है। परा में प्रवेश कर के ही हम समष्टि का वास्तविक कल्याण कर सकते हैं। कूटस्थ में परमात्मा का निरंतर ध्यान करें, वे सब समझा देंगे.
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१ जून २०२१

भक्ति का स्थान सर्वोपरि है, अन्य सब गौण हैं ---

 भक्ति का स्थान सर्वोपरि है, अन्य सब गौण हैं ---

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अपनी अति-अल्प और अति-सीमित बुद्धि द्वारा मैं जो कुछ भी लिखता हूँ उसका एकमात्र उद्देश्य स्वयं के हृदय में छिपी भक्ति को जागृत करना है, और कुछ भी नहीं। यह मेरा स्वयं के साथ एक सत्संग है, जिस में मुझे खूब आनंद मिलता है। योग आदि अन्य सारी साधनायें बाद में आती हैं, सर्वोपरि स्थान भक्ति का है।
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जब भी भक्तिभाव प्रबल होता है तब एकमात्र छवि भगवान श्रीकृष्ण की ही आती है, चाहे वह उनकी त्रिभंग मुद्रा में हो, या पद्मासनस्थ ध्यान मुद्रा में। उनका ध्यान करते करते मैं स्वयं को भूल जाता हूँ और सिर्फ उनकी छवि ही मेरे समक्ष रहती है। बस यही मेरी साधना है, बाकी सब बाद की बातें हैं। शेष जीवन उनके ध्यान में व्यतीत हो जाए, इस के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। उनसे पृथकता का बोध, और सम्पूर्ण अस्तित्व उनको समर्पित है। यही मेरी साधना और यज्ञ है।
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(आज के लिए ही गीता के कुछ संकलित श्लोक) भगवान कहते हैं ---
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"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९::२७॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥९:२८॥"
अर्थात् -- इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे॥
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"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् -- मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥
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"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
अर्थात् -- (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
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"यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥१०:३॥"
अर्थात् -- जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है, मर्त्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है॥
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"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥१०:११॥"
अर्थात् उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अन्त:करण में स्थित होकर, अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ॥
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाया॥" आप सब महान निजातमगण को नमन !!
कृपा शंकर
१ मई २०२१
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पुनश्च: --- "ब्रह्मस्वरूप प्रणव" का नाद -- अनंत ज्योतिर्मय होता है। उस के श्रवण से अनंताकाश का बोध होता हैं। वह अनंताकाश -- भगवान श्रीकृष्ण का परम पद है। वे उस अनंताकाश से भी परे हैं। उन्हीं में स्वयं का समर्पण निरंतर होता रहे।

कर्मफलों से कोई बच नहीं सकता ---

११ अगस्त १९७९ को मोछू बांध के अचानक टूटने से गुजरात के मोरवी नगर में भयानक बाढ़ आई थी। हजारों लोग मरे। लाशों की सड़न इतनी भयंकर थी कि प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिये| पूरे देश से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सैंकड़ों स्वयंसेवक वहाँ पहुंचे और लाशों के अंतिक संस्कार किए।

वहीं एक २९ साल का स्थानीय लड़का था जिसके मन में लालच आ गया। उसने मरी हुई सैंकड़ों महिलाओं के मृत शरीर से सोने के गहने लूटे और पोटली भर कर ले आया। दूसरे गाँव जाकर उसने उन गहनों को बेच कर एक घर बनाया, खेती की जमीन और एक दुकान भी खरीदी, और बड़ा सेठ हो गया। दो लड़के बड़े हुए तो उनके विवाह किये , और पोते हो गए।
समय का पहिया घूमा। २६ जनवरी २००१ को प्रातः ९ बजे सेठ जी अपने दो पोतों को लेकर भुज के पास उनके स्कूल गए हुए थे। स्कुल में बच्चों के कार्यक्रम थे। सेठ जी बाहर बैठ कर धूप का आनंद ले रहे थे। उनके प्रिय पोते आने ही वाले थे। अचानक भूमि में कम्पन हुआ, और स्कूल की इमारत जमीन पर आ गिरी जिससे उनके दोनों पोते दब कर मर गये। वे भाग कर घर गये तो देखा कि उनका दो मंज़िला मकान भी गिर गया था, जिसके नीचे आकर उनका पूरा परिवार मारा गया। दूसरे दिन संघ के स्वयं सेवक और अन्य सहायता कर्मी आए और मलवे में से उनकी दोनों पुत्र वधुओं और पत्नी की लाशें निकाली। सहायता कर्मियों ने कहा कि आप मृत लाशों के गहिने निकाल लें, आपके काम आएंगे।
सेठ जी रोने लगे, कहा कि जिस को चाहिए वह गहनों को निकाल ले, वे खुद तो उनके हाथ भी नहीं लगाएंगे। पूरी बात उन्होने रो-रोकर सब को बताई।
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आज जब मानवता पर महामारी ने प्रकोप किया है, और पीड़ित लोग दवा और ऑक्सीज़न के लिए दर दर भटक रहे हैं, तब कुछ मनुष्य रूपी राक्षस ब्लेक में ऊंचे दाम लेकर उन्हें लूट रहे है, तो इसके बहुत बुरे परिणाम उन्हें भुगतने होंगे।
१ मई २०२१

किसी भी परिस्थिति में "सत्य" और "धर्म" पर सदा अडिग रहें ---

किसी भी परिस्थिति में "सत्य" और "धर्म" पर सदा अडिग रहें। जीवन में कैसी भी दुःख और कष्टों से भरी परिस्थिति हो, उसमें सत्य का त्याग न करें, और धर्म पर अडिग रहें। रामायण में भगवान श्रीराम और भगवती सीताजी; महाभारत ग्रंथ में वर्णित -- पांडवों-द्रोपदी, नल-दमयंती, व सावित्री-सत्यवान को प्राप्त हुए कष्ट यही सत्य सिखाते हैं कि जीवन के उद्देश्य "पूर्णता" को प्राप्त करने के लिए कष्ट उठाने ही पड़ते हैं।

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सोने को शुद्ध करने के लिए उसे तपाना पड़ता है, वैसे ही कष्ट, दुःख और पीड़ायें हमें अधिक समझदार बनाती हैं। व्यावहारिक जीवन में मैंने देखा है कि जिन लोगों ने अपने बचपन में अभाव और दुःख देखे, उन्होने जीवन में अधिक संघर्ष किया और प्रगति की। जिन को बचपन से ही सारे विलासिता के साधन मिले, वे जीवन में कुछ भी सार्थक नहीं कर पाये।
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"जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल।
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीडा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुख-सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान।" (जयशंकर प्रसाद)
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कष्ट और पीड़ाओं में ही व्यक्ति परमात्मा को याद करता है। ईश्वर-लाभ ऐसे ही सुख से बैठे-बैठाये नहीं मिलता। उसके लिए कठोर साधना करनी पड़ती है और कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। हम सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते रहें, चाहे कितने भी कष्ट उठाने पड़ें। अंत में ईश्वर की प्राप्ति तो निश्चित है ही। ॐ तत्सत् !!
१ मई २०२१

ज्ञान की प्राप्ति स्वयं की श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम से होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं ....

ज्ञान की प्राप्ति स्वयं की श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम से होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं ....
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आचार्य शंकर के अनुसार श्रद्धा वह है जिसके द्वारा मनुष्य शास्त्र एवं आचार्य द्वारा दिये गये उपदेश से तत्त्व का यथावत् ज्ञान प्राप्त कर सकता है|
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः| ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति||४:३९||"
अर्थात् श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है| ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है||
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गीता के अनुसार समत्व ही ज्ञान है| समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है, और समत्व में स्थित व्यक्ति ही समाधिस्थ है|
भगवान कहते हैं .....
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय| सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते||२:४८||"
अर्थात हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है|
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भगवान फिर आगे कहते हैं ...
"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते| तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्||२:५०||"
अर्थात समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ| कर्मों में कुशलता योग है||
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योगसुत्रों में भगवान पातञ्जलि द्वारा बताए "योगः चित्तवृत्तिनिरोधः" और गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए "समत्वं योग उच्यते" में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि चित्तवृत्तिनिरोध से समाधि की प्राप्ति होती है जो समत्व ही है|
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"योगस्थ" होना क्या है ? .....
सारा कर्ताभाव जहाँ तिरोहित हो जाए, भगवान स्वयं ही एकमात्र कर्ता जहाँ हो जाएँ, जहाँ कोई कामना व आसक्ति नहीं हो, भगवान स्वयं ही जहाँ हमारे माध्यम से प्रवाहित हो रहे हों, मेरी समझ से वही योगस्थ होना है, और वही समत्व यानि समाधि में स्थिति है, और वही ज्ञान है|
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जो कुछ भी मुझे समझ में आया वही मैंने यहाँ लिख दिया| इस से आगे जो कुछ भी है उसे समझना मेरी अति-अति अल्प व सीमित बुद्धि द्वारा संभव नहीं है|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
०९ जून २०२०