Sunday, 24 August 2025

जो कुछ भी भगवान का है उस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ---

स्वयं की (विश्व, राष्ट्र और समाज की) सारी समस्याओं, व उनके समाधान के प्रति मैं पूरी तरह सजग और अवगत हूँ। स्वयं की कमियों और क्षमता का भी पता है। परमात्मा के आदेशानुसार निज जीवन उन्हें समर्पित कर रहा हूँ।
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धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। धर्म की पुनः प्रतिष्ठा अवश्यंभावी है, जिसे कोई नहीं रोक सकता। भगवान स्वयं धर्म की सर्वत्र पुनःस्थापना करने आ रहे हैं। हम आत्म-मुग्धता और मिथ्या अहंकार को त्याग कर सत्य-धर्मनिष्ठ बनें, अन्यथा हमारा विनाश निश्चित है। पूरे विश्व में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होने लगा है।
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नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥
(कठोपनिषद/१/२/२३) व (मुण्डकोपनिषद/3/2/3)
अर्थात् -- यह 'आत्मा' प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से 'यह' लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा 'यह' लभ्य है, उसी के प्रति यह 'आत्मा' अपने कलेवर को अनावृत करता है।
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हम कोई मंगते-भिखारी नहीं हैं। भगवान से कुछ मांग नहीं रहे हैं। परंतु जो कुछ भी भगवान का है उस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। उनकी सर्वव्यापकता हमारी सर्वव्यापकता है, उनका आनंद हमारा आनंद है, और उनका सर्वस्व हमारा है। उससे कम हमें कुछ भी नहीं चाहिये। एक पिता की संपत्ति पर पुत्र का अधिकार होता है, वैसे ही उन की पूर्णता पर हमारा भी पूर्ण अधिकार है। उनकी पूर्णता से कम कुछ भी हमें नहीं चाहिए। यह शरीर महाराज भी अपना प्रारब्ध पूर्ण होते ही उनकी पूर्णता का ध्यान करते करते एक दिन छूट जाएगा। पर उनकी पूर्णता से कम कुछ भी हम स्वीकार नहीं करेंगे।
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महादेव महादेव महादेव॥ ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥ 🙏🙏🙏🙏🙏
कृपा शंकर

२४ अगस्त २०२५ 

मेरे परिचित और अपरिचित सभी जैन समाज को "मिच्छामी दुक्कड़म्" ---

मेरे परिचित और अपरिचित सभी जैन समाज को "मिच्छामी दुक्कड़म्" ---

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आज २४ अगस्त २०२२ से अगले ८ दिन तक श्वेतांबर जैन समाज, और अगले १० दिनों तक दिगंबर जैन समाज -- जैन मत का प्रमुख पर्व "पर्युषण" मनायेगा। इस पर्व को दिगंबर समाज -- "दशलक्षण", और श्वेतांबर समाज -- "अष्टांहिका" भी कहते हैं। इस अवधि में उपवास और पूजा अर्चना की जाती है, व जाने-अनजाने में किए गए सभी बुरे कर्मों की क्षमा-याचना हेतु एक-दूसरे को "मिच्छामी दुक्कड़म्" कहा जाता है। "मिच्छामी दुक्कड़म" प्राकृत भाषा का शब्द है। मिच्छामी का अर्थ क्षमा और दुक्कड़म का अर्थ दुष्ट-कर्म होता है, अर्थात जाने-अनजाने किए गए बुरे कर्मों के प्रति क्षमा याचना करना। हम कभी ना कभी जाने-अनजाने में मन, वचन या कर्म से किसी न किसी व्यक्ति को दु:खी करते रहते हैं। अतः आज के दिन क्षमा याचना कर ली जाती है, और क्षमा व अभय प्रदान कर दिया जाता है।
"मिच्छामी दुक्कड़म्॥"

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ---

 यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ---

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भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में स्वयं को यज्ञों में जपयज्ञ बताया है। अब प्रश्न यह उठता है कि -- हम जप किस विधि से कैसे करें? किसका जप करें? कितनी देर तक करें? आदि आदि॥ इस विषय पर अनेक मत हैं।
मेरा अनुभव यह है कि हमारे में सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण में से कौन सा गुण किस समय प्रधान होता है, उसी के अनुसार हमारा जप उस समय होता है। इस विषय पर मैंने अनेक लेख लिखे हैं। उस समय जैसी मेरी मनःस्थिति थी, उसी के अनुसार वे लेख लिखे गए थे। सब में कुछ न कुछ भेद अवश्य निकलेगा।
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जिसमें भक्ति है उसी से संवाद करना सार्थक है। भक्तिहीन व्यक्ति से कोई किसी भी तरह की आध्यात्मिक चर्चा करना -- अपने समय को नष्ट करना है।
जप निरंतर हर समय मूर्धा में ही करना चाहिए -- ऐसा मेरा अनुभव है। इसको समझाऊंगा। सत्संगों में तीन बार ओंकार का जप करते हैं। पहली बार मूलाधारचक्र में, दूसरी बार अनाहतचक्र में, तीसरी बार आज्ञाचक्र में करते हैं।
अपनी आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार आज्ञाचक्र, सहस्त्रारचक्र, ब्रह्मरंध्र या अपनी चेतना में इस शरीर से बाहर निकलकर अनंतता से भी परे दिखाई दे रही ज्योति में स्थित होकर जप करें।
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मूर्धा में जप का अर्थ है कि अपने जबड़े, यानि दांतों के ऊपरी भाग से भी ऊपर, तालु से आज्ञाचक्र तक के क्षेत्र में स्थित होकर जप करें। इसे मूर्धा में जप कहते हैं। यदि इससे अधिक कुछ है, तो मुझे उसका ज्ञान नहीं है।
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जप की सर्वश्रेष्ठ विधि --- तो यह है कि हमारी देह का रोम रोम जप करे। यह पूरा ब्रह्मांड हमारा शरीर है। पूरा ब्रह्मांड, यानि पूरी सृष्टि ही भगवान के नाम का जप कर रही है। हमारी चेतना पूरे ब्रह्मांड में, पूरी सृष्टि के साथ एक हो। जप या तो राम नाम (रां) का होता है या ओंकार का। दोनों का फल एक ही है।
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अपनी बात मैंने सरलतम हिन्दी भाषा में, सरलतम शब्दों में कही है। इससे अधिक सरल और कुछ नहीं हो सकता। कोई समझे या न समझे, यह उसका भाग्य है। किसी को कोई संशय है तो किसी ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय महात्मा से मार्गदर्शन प्राप्त करें।
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पुनश्च: (बाद में जोड़ा हुआ) -- भगवान श्रीकृष्ण हमें मूर्धा में ओंकार के जप का निर्देश देते हैं। गीता के आठवें अध्याय का १२वां और १३वां मंत्र देखिये --
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||८:१२||"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८:१३||"
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !!​ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
झुञ्झुणु (राजस्थान)
२४ अगस्त २०२३

Saturday, 23 August 2025

कुंडलिनी महाशक्ति का ही साकार रूप भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी हैं। वे ही श्रीविद्या हैं ---

 कुंडलिनी महाशक्ति का ही साकार रूप भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी हैं। वे ही श्रीविद्या हैं ---

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अनेक जिज्ञासु लोग मुझे संदेश भेज कर श्रीविद्या साधना सिखाने का अनुरोध करते हैं। मुझे इसका कोई अधिकार नहीं है। इसके बारे में बहुत अधिक भ्रांतियाँ लोगों में हैं। अधिकांश लोग समझते हैं कि यह कोई धन कमाने की विद्या है। यह कोई धन कमाने की विद्या नहीं है। इसके मंत्र परम गोपनीय होते हैं। इसका परम उद्देश्य कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर उसका परमशिव में विलय है। इसमें यम-नियमों का पालन अनिवार्य है। जिनको श्रीविद्या की साधना सीखनी है वे किन्ही दण्डी सन्यासी महात्मा से मार्गदर्शन प्राप्त करें। यह विद्या दण्डी सन्यासियों या नाथ संप्रदाय के कुछ सिद्ध योगियों से ही सीखी जा सकती है। आपका मंगल हो।
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पुनश्च : यह सिद्धों, सन्यासियों और उनके शिष्यों का विषय हैं। इस विषय पर मेरी कुछ भी टिप्पणी अनधिकृत चेष्टा होगी। इस का एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ "सौंदर्य लहरी" है। मेरा अनुभव तो यह है कि कुंडलिनी महाशक्ति का ही साकार रूप भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी हैं। वे ही श्रीविद्या हैं। भगवती के जितने भी स्तोत्र हैं, उनमें काव्यात्मक व आध्यात्मिक दृष्टि से "श्रीललितासहस्त्रनाम" सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र है। इसकी साधना का एक क्रम है, जिसे सिद्ध गुरु ही बता सकते हैं।
कृपा शंकर
२१ अगस्त २०२५

ब्रह्मलीन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की ग्यारहवीं पुण्यतिथि पर उनको नमन ---

ब्रह्मलीन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की ग्यारहवीं पुण्यतिथि पर उनको नमन! उनके प्रभाव से ओडिशा के वनवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों द्वारा किये जा रहे धर्मान्तरण के कार्य लगभग बंद होने लगे थे| ईसाई बन चुके वनवासियों की सनातन हिन्दू धर्म में बापसी आरम्भ हो गयी थी| इस से बौखला कर कुछ धर्मद्रोहियों ने आज से दस वर्ष पूर्व २३ अगस्त २००८ को उनकी निर्मम ह्त्या कर दी| पहले उन्हें गोली मारी गयी फिर कुल्हाड़े से उनके शरीर को कई टुकड़ों में काट डाला गया| उस क्षेत्र के लोग कहते हैं कि उनकी ह्त्या मिशनरियों ने नक्सलवादियों के साथ मिल कर करवाई|

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ऐसे संतों की भारत भूमि पर कृपा बनी रहे, धर्मोद्धार के लिए पवित्र भारतभूमि पर उनका अवतरण होता रहे| ॐ नमो नारायण ! ॐ ॐ ॐ !! कृपा शंकर
२३ अगस्त २०१९

मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है ---

मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है। मुझे मेरी सब कमियों का पता है, लेकिन उनके समक्ष मैं असहाय हूँ। भगवान से मैंने प्रार्थना की तो भगवान ने कहा कि अपने सब शत्रु मुझे सौंप दो, लेकिन उनसे पहले स्वयं को (यानि अपने को) मुझे (यानि भगवान को) अर्पित करना होगा। स्वयं को अर्पित करने में बाधक है मेरा लोभ और अहंकार, यानि कुछ होने का और खोने का भाव।

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मेरी चेतना और प्रज्ञा दोनों ही परमात्मा को समर्पित ही नहीं, परमात्मा में स्थित है। इस जीवन का बहुत थोड़ा सा भाग बाकी बचा है, यानि इस दीपक में बहुत कम ईंधन बाकी बचा है। अब उसकी चिंता नहीं है। सारी चेतना, प्रज्ञा और सारा अस्तित्व, परमात्मा को समर्पित है। मेरी कोई मृत्यु नहीं है, मैं शाश्वत हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ अगस्त २०२५
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पुनश्च: --- जैसे एक सुपात्र शिष्य की रक्षा गुरु-परंपरा करती है, वैसे ही भगवान को अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) सौंप देने वाले भक्त की रक्षा का दायित्व भगवान स्वयं लेते हैं ...
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता ||

बचपन में हम लोग गणेश-चतुर्थी कैसे मनाते थे। (चथड़ा चौथ भादुड़ों, दे दे माई लाडुडो)

 गणेशचतुर्थी पर मैं एक बहुत पुराना बच्चों द्वारा गाये जाने वाला एक राजस्थानी गीत प्रस्तुत करना चाहता था जिसे ५०-६० वर्षों पूर्व गणेश चतुर्थी पर बच्चे लोग गाया करते थे, और किसी भी सहपाठी या परिचित के घर लड्डू खाने चले जाते थे| जिस के भी घर जाते वह बच्चों को लड्डू, गुड़-धाणी तो बड़े प्रेम से खिलाता ही, साथ में कुछ पैसे भी देता| मुझे वह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा था और नेट पर भी कहीं मिल नहीं रहा था| आज एक मित्र ने भेजा है, जिसे प्रस्तुत कर रहा हूँ ...

"चौक च्यानणी भादूड़ो,
दे दे माई लाडूड़ो |
आधौ लाडू भावै कौनी,
सा'पतौ पाँती आवै कौनी ||
सुण सुण ऐ गीगा की माँ,
थारौ गीगौ पढ़बा जाय |
पढ़बा की पढ़ाई दै,
छोराँ नै मिठाई दै ||
आळो ढूंढ दिवाळो ढूंढ,
बड़ी बहु की पैई ढूंढ |
ढूंढ ढूंढा कर बारै आ,
जोशी जी कै तिलक लगा ||
लाडूड़ा में पान सुपारी,
जोशी जी रै हुई दिवाळी |
जौशण जी ने तिलिया दै,
छोराँ नै गुड़-धाणी दै |
ऊपर ठंडो पाणी दै ||
एक विद्या खोटी,
दूजी पकड़ी . चोटी |
चोटी बोलै धम धम,
विद्या आवै झम झम ||"
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२३ अगस्त २०२०