Thursday, 21 August 2025

हमें सत्यनिष्ठा से अपने स्वधर्म पर अडिग औए दृढ़ रहना चाहिये, क्योंकि स्वधर्म ही हमारी रक्षा कर सकेगा ---

हमें सत्यनिष्ठा से अपने स्वधर्म पर अडिग औए दृढ़ रहना चाहिये, क्योंकि स्वधर्म ही हमारी रक्षा कर सकेगा। भगवान पर श्रद्धा, विश्वास और आस्था रखें। नित्य व्यायाम करें और भगवान का खूब ध्यान हर समय करें। सकारात्मक सोच रखें। इस समय बहुत दीर्घकाल से सारी परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध है, लेकिन भगवान हमारी रक्षा निश्चित रूप से करेंगे। यह प्रतिकूल समय हमारे भी अनुकूल होगा।

नदी का विलय जब महासागर में हो जाता है, तब नदी का कोई नाम-रूप नहीं रहता, सिर्फ महासागर ही महासागर रहता है। वैसे ही हमारा भी विलय जब परमात्मा में हो जाता है, तब सिर्फ परमात्मा ही रहते हैं, हम नहीं।
हमारा समर्पण पूर्ण हो।

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२१ अगस्त २०२३

Wednesday, 20 August 2025

हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व ---

 हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व

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हरेक हिन्दू सनातन धर्मावलम्बी परिवार प्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपने परिवार में एक भयमुक्त प्रेममय वातावरण का निर्माण करे | अपने बालक बालिकाओं में इतना साहस विकसित करें कि वे अपनी कोई भी समस्या या कोई भी उलझन बिना किसी भय और झिझक के अपने माता/पिता व अन्य सम्बन्धियों को बता सकें | बच्चों की समस्याओं को ध्यान से सुनें, उन्हें डांटें नहीं, उनके प्रश्नों का उसी समय तुरंत उत्तर दें | इससे generation gap की समस्या नहीं होगी | बच्चे भी माँ-बाप व बड़े-बूढों का सम्मान करेंगे | हम अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं, इसीलिए बच्चे भी बड़े होकर माँ-बाप का सम्मान नहीं करते |
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परिवार के सभी सदस्य दिन में कम से कम एक बार साथ साथ बैठकर पूजा-पाठ/ ध्यान आदि करें, और कम से कम दिन में एक बार साथ साथ बैठकर प्रेम से भोजन करें | इस से परिवार में एकता बनी रहेगी |
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बच्चों में परमात्मा के प्रति प्रेम विकसित करें, उन्हें प्रचूर मात्रा में सद बाल साहित्य उपलब्ध करवाएँ और उनकी संगती पर निगाह रखें | माँ-बाप स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ सदाचारी आचरण का आदर्श अपने बच्चों के समक्ष रखें |
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इस से पीढ़ियों में अंतर (generation gap) की समस्या नहीं रहेगी और बच्चे बड़े होकर हमारे से दूर नहीं भागेंगे | लड़कियाँ भी घर-परिवार से भागकर लव ज़िहाद का शिकार नहीं होंगी |
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२० अगस्त २०१७

पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) कैसे दूर हो? .....

 पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) कैसे दूर हो? .....

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पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) पूरे विश्व में , विशेषकर भारत में एक बहुत बड़ी समस्या है जिसका कारण घर-परिवार के बड़े-बूढ़ों की नासमझी और अहंकार है| इसको दूर करने के लिए विशेष प्रशिक्षण और विवेक की आवश्यकता है| जिस परिवार में यह समस्या होती है उस परिवार के बच्चे बड़े होकर अपने माँ-बाप व बुजुर्गों का कोई सम्मान नहीं करते|
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हर परिवार प्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपने परिवार में एक भयमुक्त प्रेममय वातावरण का निर्माण करे| अपने बालक बालिकाओं में इतना साहस विकसित करें कि वे अपनी कोई भी समस्या या कोई भी उलझन बिना किसी भय और झिझक के अपने माता/पिता व अन्य सम्बन्धियों को बता सकें| बच्चों की समस्याओं को ध्यान से सुनें, उनके साथ मारपीट नहीं करें, उन्हें डांटें नहीं, और उनके प्रश्नों का तुरंत उसी समय उत्तर दें|
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इससे generation gap की समस्या नहीं होगी| बच्चे भी माँ-बाप व बड़े-बूढों का सम्मान करेंगे| हम अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं, इसीलिए बच्चे भी बड़े होकर माँ-बाप का सम्मान नहीं करते| परिवार के सभी सदस्य दिन में कम से कम एक बार साथ साथ बैठकर पूजा-पाठ/ ध्यान आदि करें, और कम से कम दिन में एक बार साथ साथ बैठकर प्रेम से भोजन करें| इस से परिवार में एकता बनी रहेगी |
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बच्चों में परमात्मा के प्रति प्रेम विकसित करें, उन्हें प्रचूर मात्रा में सद बाल साहित्य उपलब्ध करवाएँ और उनकी संगती पर निगाह रखें| माँ-बाप स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ सदाचारी आचरण का आदर्श अपने बच्चों के समक्ष रखें| इस से पीढ़ियों में अंतर (generation gap) की समस्या नहीं रहेगी और बच्चे बड़े होकर हमारे से दूर नहीं भागेंगे | लड़कियाँ भी घर-परिवार से भागकर लव ज़िहाद का शिकार नहीं होंगी|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२० अगस्त २०१७

आज (१९ अगस्त २०२२ की मध्य रात्रि में) जितनी भक्ति तो मैंने मेरे इस पूरे जीवन में कभी भी नहीं देखी।

आज (१९ अगस्त २०२२ की मध्य रात्रि में) जितनी भक्ति तो मैंने मेरे इस पूरे जीवन में कभी भी नहीं देखी। यह मैं पूरी गंभीरता से लिख रहा हूँ। मैं एक ७५ वर्षीय वरिष्ठ नागरिक हूँ, और पूरे विश्व में व भारत में खूब घूमा हुआ हूँ।

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१८ अगस्त से ही पूरे विश्व से भक्ति के स्पंदन आ रहे थे, जो १९ अगस्त को तो बहुत अधिक बढ़ गए। मैंने तो जन्माष्टमी का व्रत कल १८ अगस्त को किया था। लेकिन मंदिरों में जन्माष्टमी १९ अगस्त को थी। १९ अगस्त की मध्यरात्री के समय सभी मंदिरों में अभूतपूर्व भीड़ थी। जिन लोगों से मुझे कभी भक्ति की उम्मीद भी नहीं थी, वे भी भाव-विभोर होकर कृष्ण-भक्ति में तल्लीन थे। यह एक चमत्कार था। इस बार तो अभूतपूर्व भक्ति देखी। यह एक सकारात्मक संकेत है जो हिंदुओं में पुनर्जागरण होता हुआ दिखा रहा है। यह भगवान श्रीकृष्ण की बड़ी कृपा है।
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२२

कल बहुत अधिक आनंद का पर्व जन्माष्टमी थी। आज दो लोक उत्सव हैं ---

 कल बहुत अधिक आनंद का पर्व जन्माष्टमी थी। आज दो लोक उत्सव हैं ---

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(१) आज महान लोकपर्व गोगा-नवमी है। सभी श्रद्धालुओं का अभिनंदन, बधाई और मंगलमय शुभ कामनाएँ। लोकदेवता जाहरवीर गोगा जी महाराज की जय॥
आज से गोगा जी का मेला सात दिन तक भरेगा। जाहरवीर गोगाजी महाराज राजस्थान के प्रमुख पाँच लोक देवताओं में से एक हैं। गुरु गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से ये नागों के देवता हैं। राजस्थान के हर किसान के खेत में गोगा जी का एक छोटा सा मंडप अवश्य मिलेगा। जिन पर इनका आशीर्वाद हो, उन्हें सांप नहीं काट सकते। इनका पूरा नाम जाहरवीर राजा गोगाराव चौहान था, जिनका राज्य सतलज नदी से हरियाणा के हांसी तक था। इनकी राजधानी राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा में थी। राजस्थान की प्रायः सभी जनजातियाँ और किसान गोगा जी पर विशेष आस्था रखते हैं। गोगा जी नाग-वंश के क्षत्रिय राजा थे और गुरु गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से नागों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। वे साँपों से रक्षा भी करते हैं, अतः उनमें लोगों की बहुत आस्था है। राजस्थान के सभी लोक देवता महान योद्धा थे जिन्होंने धर्म-रक्षार्थ बड़े दुर्धर्ष युद्ध किए। वे अमर हैं।
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(२) आज राजस्थान के झुंझुनू जिले में अरावली की पहाड़ियों में स्थित लोहार्गल तीर्थ से मालकेतु पर्वत की २४ कोसीय परिक्रमा आरंभ होगी। यह आस्था का बहुत बड़ा पर्व है, जिसमें लाखों लोग भाग लेते हैं। मालकेतु पर्वत की आराधना भगवान विष्णु के रूप में होती है। इस पर्वत को लोक आस्था से "मालकेत बाबा" कहते हैं। यह माउंट आबू के गुरु-शिखर के बाद अरावली पर्वतमाला का दूसरा सबसे ऊंचा शिखर है। इस परिक्रमा-पथ पर जल-कुंड सहित सात झरने आते हैं, जिनमें श्रद्धालु स्नान करते हैं।
वैष्णव खाकी अखाड़े के महंत जी की अगुवाई में यह यात्रा लोहार्गल के सूर्यकुंड स्थित भगवान सूर्यनारायण के मंदिर में पूजा-अर्चना व दर्शन के पश्चात साधू-संतों के नेतृत्व में आरम्भ होती है, जो भाद्रपद अमावस्या तक चलती है। आगे-आगे ठाकुर जी को पालकी में लेकर साधू-संत चलते हैं, पीछे-पीछे लाखों श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए चलते हैं। चिराणा, किरोड़ी घाटी, कोट गाँव, शाकम्भरी, सकराय, नागकुंड, टपकेश्वर, शोभावती, नीम की घाटी, खोरी कुंड व रघुनाथगढ़ होते हुए यह यात्रा अमावस्या के दिन बापस लोहार्गल पहुँचती है। सूर्यकुंड में अमावस्या के स्नान के पश्चात श्रद्धालू अपने अपने घर लौटना आरंभ कर देते हैं। पूरे मार्ग में स्वयंसेवी संस्थाओं और पंचायतों द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा की व्यवस्था की जाती है।
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आने वाला अगला लोकोत्सव आज से छठे दिन भाद्रपद अमावस्या पर झुंझुनू के विश्व प्रसिद्ध श्रीराणी सती जी मंदिर का वार्षिकोत्सव है।।
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ॐ तत्सत् ॥
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२२

(प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---

 (प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---

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(उत्तर) : भारत का आध्यात्म और दर्शन इस प्रश्न के चारों ओर घूमता है कि मैं कौन हूँ। हम यह नश्वर शरीर तो नहीं हो सकते। यह शरीर इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक दोपहिया वाहन मात्र है। संसार में हमारी पहिचान इस वाहन से ही है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि हम एक शाश्वत आत्मा हैं, और जब यह शरीर रूपी वाहन जर्जर हो जाता है तब जीवात्मा इसे बदल लेती है। अंत समय की मति के अनुसार हमें दूसरी देह तुरंत मिल जाती है।
शास्त्र वचन सत्य हैं। लेकिन मैं परमात्मा के हृदय का परमप्रेम, और उनके साथ एक हूँ। मैं उनसे पृथक नहीं हो सकता। गीता में भगवान कहते हैं --
"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥१०:८॥"
"मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥१०:९॥"
"तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१०:१०॥"
"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥१०:११॥"
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परब्रह्म वासुदेव जगत की उत्पत्ति का कारण हैं। उन्हीं का चिंतन करना चाहिए। हमारा चित्त और प्राण उन्हीं में रत रहे, और उन से ही पूर्ण प्रेम हो। फिर उनका ज्योतिर्मय रूप हमारे समक्ष प्रकट होगा।
हमारी साधना मौन ही हो। किसी तरह के शोरगुल और दिखावे की आवश्यकता नहीं है। गीता के इसी दसवें अध्याय के ३८ वें श्लोक में भगवान कहते हैं --
"मौनं चैवास्मि गुह्यानां" अर्थात् गुप्त रखने योग्य भावों में मौन मैं हूँ।
जिस अनुपात में भगवान से प्रेम होता है, उसी अनुपात में उनकी कृपा होती है। उनको अपने हृदय का पूर्ण प्रेम देंगे तो पूर्ण प्रेम ही प्राप्त होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२३

नकारात्मक शक्तियों पर विजय कैसे पाएँ? ---

 नकारात्मक शक्तियों पर विजय कैसे पाएँ? ---

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जिस भौतिक विश्व में हम रहते हैं, उससे भी बहुत अधिक बड़ा एक सूक्ष्म जगत हमारे चारों ओर है, जिसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की सत्ताएँ हैं। हर कोई उसे नहीं समझ सकता। उस विश्व को मैं अनुभूत कर रहा हूँ, इसीलिए गुरूकृपा से ये पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ।
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जितना हम अपनी दिव्यता की ओर बढ़ते हैं, सूक्ष्म जगत की नकारात्मक आसुरी शक्तियाँ उतनी ही प्रबलता से हम पर अधिकार करने का प्रयास करती हैं। उन आसुरी जगत की शक्तियों के प्रभाव से हम जीवन में कई बार न चाहते हुए भी अनेक क्षुद्रताओं से बंधे हुए एक पशु की तरह आचरण करने लगते हैं, और चाह कर भी पतन से बच नहीं पाते। ऐसी परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए?
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आग लगने पर कुआँ नहीं खोदा जा सकता, कुएँ को तो पहिले से ही खोद कर रखना पड़ता है। अपने समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में करें। लोभ, कामुकता, अहंकार, क्रोध, प्रमाद व दीर्घसूत्रता जैसी वासनायें हमें नीचे गड्ढों में गिराती हैं, जिन से बचने के किए हमें अपनी चेतना, विचारों, व चिंतन के स्तर को अधिक से अधिक ऊँचाई पर रखना चाहिए।
सहस्त्रारचक्र में गुरू-चरणों का ध्यान करो। सहस्त्रारचक्र में दिखाई दे रही ज्योति ही गुरूमहाराज के चरण-कमल हैं। वहाँ होने वाली स्थिति ही श्रीगुरू-चरणों में आश्रय है।
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यदि चेतना ब्रह्मरंध्र को भेद कर अनंतता में चली जाती है तो विराट अनंतता का ध्यान करो। वहाँ दिखाई दे रहे चक्रों का भी ध्यान करो। अनंताकाश से भी परे पंचमुखी महादेव के दर्शन होते हैं तो उन में स्वयं को समर्पित कर दो। फिर उन्हीं का ध्यान करो। चेतना को बिलकुल भी नीचे मत लाओ। डरो मत। जब तक प्रारब्ध में जीवन लिखा है, तब तक मरोगे नहीं।
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वासनायें -- चूहों व कौवों की तरह हैं, जिन पर अपना समय नष्ट न करें। स्वयं भाव-जगत की ऊँचाइयों पर परमशिव की चेतना में रहें, ये क्षुद्रतायें अपने आप ही नष्ट हो जायेंगी।
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वर्षों पहले युवावस्था में एक साहित्य पढ़ा था, जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय के एक युद्धक वायुयान चालक (Pilot) के अनुभव थे। वह वायुयान अपने लक्ष्य की ओर जा रहा था कि पायलट ने देखा कि एक चूहा एक बिजली के तार को काट रहा था| यदि चूहा उस तार को काटने में सफल हो जाता तो यान की विद्युत प्रणाली बंद हो जाती और विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाता। पायलट उस चूहे को किसी भी तरह से भगाने में असमर्थ था। समय बहुत कम और कीमती था। चालक ने भगवान को स्मरण किया, और विमान को उस अधिकतम ऊंचाई तक ले गया जहाँ तक जाना संभव था। वहाँ वायु का दबाव कम हो गया जिसे चूहा सहन नहीं कर पाया और बेहोश हो कर गिर गया। पायलट अपना कार्य पूरा कर सुरक्षित बापस आ गया। उस की रक्षा ऊँचाई के कारण हुई।
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बाज पक्षी कई बार ऐसे पशु का मांस खा जाते हैं जिसे कौवे खाना चाहते हैं। बाज के आगे कौवे असहाय होते हैं पर वे हिम्मत नहीं हारते। कौवा बाज़ की पीठ पर बैठ जाता है, और उसकी गर्दन पर अपनी चोंच से घातक प्रहार करता है, और काटता है। बाज भी ऐसी स्थिति में कौवे के आगे असहाय हो जाते हैं। बाज अपना समय नष्ट नहीं करते, और अपने पंख खोलकर आकाश में बहुत अधिक ऊँचाई पर चले जाते हैं। ऊँचाई पर वायु का दबाव कम होने से कौवा बेहोश होकर नीचे गिर जाता है। यहाँ भी बाज की रक्षा ऊँचाई से होती है। अतः अपनी उच्चतम चेतना में रहो, आपकी रक्षा होगी।
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शिवोहम् शिवोहम् अहम् ब्रह्मास्मि !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२३