Wednesday, 4 June 2025

कृष्ण जन्म से पूर्व जैसे कंस को श्रीकृष्ण जन्म का भय लग रहा था, वैसे ही आज के सेकुलरों को हिन्दू-पुनरोत्थान का भय लग रहा है|

कृष्ण जन्म से पूर्व जैसे कंस को श्रीकृष्ण जन्म का भय लग रहा था, वैसे ही आज के सेकुलरों को हिन्दू-पुनरोत्थान का भय लग रहा है| हमें सारा झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है| भारत में अनेक महान राजा हुए और अनेक महान राजवंश हुए हैं जैसे मौर्य, गुप्त, पांडियन, चोल, सातवाहन, पल्लव, कदंब, चालुक्य, राष्ट्रकुट, यादव, विजयनगर, वड्डियार, भोसले आदि आदि| पर हमारा इतिहास आज केवल तुघलक, खिलजी, घोरी, बाबर, अकबर, जहांगीर, औरंगजेब तथा उसके पश्चात अंग्रेजों तक ही सीमित है| हमें जान-बूझकर ऐसा झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है जिस से हीनता का बोध हो|

भारत की आत्मा धर्म है, पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मान्यताप्राप्त विद्यालयों में हमें अपना धर्म पढ़ाने की छूट नहीं है| असत्य अधिक दिनों तक चलने वाला नहीं है| सत्य की निश्चित रूप से विजय होगी| भारत अपने द्वीगुणित परम वैभव को निश्चित रूप से प्राप्त करेगा| ॐ ॐ ॐ !!
५ जून २०१८

यथार्थ में हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध परमात्मा से है, अन्य किसी से भी नहीं।

 

यथार्थ में हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध परमात्मा से है, अन्य किसी से भी नहीं।
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(जिन्हें इसी जीवन में मोक्ष चाहिए, उनके लिए गीता के आठवें अध्याय "अक्षरब्रह्मयोग" को समझना बहुत आवश्यक है। इस अध्याय को बहुत अच्छी तरह से समझकर उपासना करने से इसी जीवन में भगवान की प्राप्ति हो सकती है।) परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय पर चिंतन मेरे लिए अत्यंत दुखद है। मेरा एकमात्र सुख परमात्मा है। परमात्मा के अतिरिक्त मैं कुछ सोचना भी नहीं चाहता। अनात्म चिंतन बड़ा दुखद है।
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हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध भगवान से है, अन्य किसी से भी नहीं। जब हमारा जन्म इस मनुष्य शरीर में हुआ था, तब जन्म से पूर्व, भगवान ही हमारे साथ थे। इस शरीर की मृत्यु के पश्चात भी भगवान ही हमारे साथ रहेंगे। जन्म लेने पर भगवान का ही प्रेम हमें माता-पिता के माध्यम से मिला। भाई-बहिन, सभी संबंधियों, और सभी मित्रों के माध्यम से जो भी प्रेम हमें मिला वह भगवान का ही प्रेम था; अन्य सब एक माध्यम थे। हमारा अस्तित्व भगवान का ही एक संकल्प या उन के मन की एक कल्पना मात्र है। कोई अपना पराया नहीं है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी भगवान से ही सम्बन्ध है। गुरू भी एक निश्चित भावभूमि तक ले जा कर छोड़ देता है, आगे की यात्रा तो स्वयं को ही करनी पड़ती है। फिर न कोई गुरु है और न कोई शिष्य, एकमात्र भगवान ही सब कुछ हैं। सारे सम्बन्ध एक भ्रम मात्र हैं।
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हमारा अस्तित्व भगवान की ही एक अभिव्यक्ति है। वे ही इस देह को जीवंत रखे हुए हैं, वे ही इस हृदय में धड़क रहे हैं, वे ही इन आंखों से देख रहे हैं, इन हाथ-पैरों से वे ही सारा कार्य कर रहे हैं। हमारा पृथक अस्तित्व एक माया और भ्रम है। हमारा एकमात्र लक्ष्य सिर्फ उन के परमप्रेम की अभिव्यक्ति और उन में समर्पण है।
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जो भी हमें उन की चेतना से दूर ले जाए वह कुसंग है जो सर्वदा त्याज्य है। जो उन का प्रेम हमारे में जागृत करे वह सत्संग है। जब हमें भूख लगती है, तब भोजन तो स्वयं को ही करना पड़ता है। दूसरे का किया भोजन हमारा पेट नहीं भर सकता। वैसे ही स्वाध्याय, सत्संग और साधना तो स्वयं को ही करनी होगी। प्रभु के प्रेम में निरंतर डूबे रहना ही सत्संग है, और प्रभु को विस्मृत करना कुसंग है।
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श्रीमद्भगवद्गीता के "अक्षरब्रह्मयोग" में भगवान का निर्देश है कि निरंतर हर समय, अंत समय तक उनका ही स्मरण रहे --
"अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥८:४॥"
"अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥८:५॥"
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥८:६॥"
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌॥८:७॥"
"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌॥८:८॥"
"कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌॥८:९॥"
"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥८:१०॥"
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
(उपरोक्त श्लोकों का अर्थ और भाष्य का स्वाध्याय आप अपनी श्रद्धानुसार अपने समय में पूर्ण एकाग्रता से कीजिये)
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मुझे तो पूरी श्रद्धा और विश्वास है कि भगवान ही हर समय मुझे याद करेंगे, इस देह के अंतकाल में भी। यह जीवन उन्हीं का है, यह देह भी उन्हीं की है, जो जला कर भस्म कर दी जाएगी, लेकिन मैं तो उनके हृदय में ही निरंतर सदा रहूँगा।
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"वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम्‌।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥" (ईशावास्योपनिषद मंत्र १७)
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भगवान हैं, इसी समय हैं, हर समय हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं, मेरे समक्ष हैं, हर समय मेरे साथ हैं। उन की असीम कृपा सब पर निरंतर बनी रहे।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ जून २०२३

क्या "ईश्वर", "गॉड" और "अल्लाह" एक है? ---

 मेरी समझ से तो बिलकुल भी नहीं। ईश्वर, अल्लाह और गॉड - में कोई समानता नहीं है। ये तीनों बिल्कुल अलग-अलग हैं। सिर्फ़ हिन्दू दृष्टिकोण ही इन्हें एक मान सकता है, अन्य कोई नहीं। इनमें कोई समानता है तो विद्वान मनीषी मुझे अपना ज्ञान दें। मैं आभारी रहूँगा।

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(१) ईश्वर -- एक सर्वव्यापी सत्ता है जो सृष्टि के कण-कण में है। ईश्वर ने स्वयं को ही इस सृष्टि के रूप में व्यक्त किया है। वह हम सब के हृदय में रहता है। ईश्वर को ही भगवान और परमात्मा आदि कहते हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥१८:६१॥"
अर्थात् - हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है॥
योगसूत्र के अनुसार - "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः"।
अर्थात् क्लेष, कर्म, विपाक और आशय से अछूता (अप्रभावित) वह विशेष पुरुष ईश्वर है।
पुरुष शब्द का प्रयोग भगवान विष्णु के लिए किया जाता है, क्योंकि वे इस पुर यानि सम्पूर्ण विश्व और सभी प्राणियों के भीतर शयन कर रहे हैं। विष्णु सहस्त्रनाम का पहला शब्द ही विश्व है। भगवान विष्णु ही पुरुषोत्तम कहलाते हैं। वे ही ईश्वर हैं।
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(२) अल्लाह -- इस्लाम का मूल मंत्र - "ला इलाह इल्ल अल्लाह मुहम्मद उर रसूल अल्लाह" है, अर्थात अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही है, और मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उनके आखरी रसूल (पैगम्बर)हैं। अल्लाह शब्द अरबी भाषा के दो शब्दों अल+इलाह से मिलकर बना है। कुरान की शुरूआत होतीं है "बिस्मिल्लाह हि रहमानो रहीम" अर्थात अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ जो दयालु और कृपाशील है"। अल्लाह शब्द अपने आप में अलग है। इसका कोई अनुवाद नहीं हो सकता। अल्लाह सर्वव्यापी नहीं है। वह सातवें आसमान से एक तख्त पर बैठकर सृष्टि का संचालन करता है और इंसाफ करता है। जो उस के आखिरी रसूल में ईमान लाते हैं, उनके प्रति वह बहुत दयालू है, और जो उस के आखिरी रसूल में ईमान नहीं लाते, उनके प्रति वह बहुत क्रूर है।
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(३) गॉड - भी सातवें आसमान में बैठा है। वह सारी दुनिया का सम्राट है। परंतु वह सारी दुनिया में व्याप्त नहीं है। उसने छह दिन में दुनिया बनाई और सातवें दिन आराम से सोया। करोड़ों वर्ष पुरानी सृष्टि में करोड़ों वर्ष के पश्चात एक प्रेतात्मा के जरिये एक कुमारी स्त्री से अपना इकलौता बेटा पैदा किया, जिसका नाम है यीशु। जो उसमें आस्था लाता है, उसे स्वर्ग मिलता है, अन्य सब को नर्क, चाहे वे कितने भी भले व्यक्ति हों।
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दूसरा सबसे बड़ा झूठ है कि सारे Religions एक हैं, और सबकी शिक्षाएँ भी एक हैं। मुझे तो किन्हीं में भी कोई एकता दिखाई नहीं दी। जो सब Religions/मज़हबों और उनकी शिक्षाओं को एक मानते हैं, वे या तो एकदम अज्ञानी हैं, या घोर कुटिल धूर्त।
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आप सब विद्वान महात्माओं को नमन !! हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
५ जून २०२२

महान आसुरी संस्कृति ---

 

महान आसुरी संस्कृति ---
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मुमताज महल से शाहजहाँ को इतना प्रेम था कि उसके मरने पर उसने उससे उत्पन्न १७ वर्ष की अपनी स्वयं की सगी बेटी जहाँआरा को ही अपनी बादशाह बेगम बना लिया था। यद्यपि शाहजहाँ की आठ बेगमों में से तीन जीवित थीं। किन्तु शाहजहाँ को १७ वर्ष की बेटी जहाँआरा ही “बादशाह बेगम” बनने योग्य लगी। जहाँआरा दारा शिकोह की समर्थक थी और बाप को कैद किये जाने पर बाप के साथ रही। किन्तु बाप के मरने पर औरंगजेब से दोस्ती करके अपनी छोटी बहन रोशनआरा को हटाकर औरंगजेब की “बादशाह बेगम” बन गयी। पहले अपने सगे बाप की बेगम थी फिर अपने भाई की बेगम बन गई। बाद में औरंगज़ेब ने अपनी सगी बेटी जीनत को अपनी “बादशाह बेगम” बनाया। इसी क्रम में मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने भी अपनी ही बेटी को अपनी “बादशाह बेगम” बनाया था। शाहजहाँ ने अपनी बेटी तथा औरंगजेब ने अपनी दो बहनों और बेटी को बारी−बारी से अपनी “बादशाह बेगम” बनाया। यह मुगलों की महान सभ्यता थी। उनकी बेगमों की सूची अंतर्जाल पर उपलब्ध है। मुगलों की कब्रें खोदकर जबतक उन सबका DNA टेस्ट नहीं होता तब तक कहना कठिन है कौन अपनी बहन वा बेटी का क्या था। मुगल क्रूर थे लेकिन नालायक निकम्मे और भ्रष्ट थे। उनके दरबारी मुल्लाओं का तर्क था कि अपने द्वारा रोपे वृक्ष का फल खाने से किसी को रोकना अन्याय है। इसलिए मुगल बादशाह लोग अपनी बेटियों के साथ शादी कर लेते थे।
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औरंगजेब ने अपनी बेटी जुब्दत−उन−निसा की शादी दाराशिकोह के बेटे से करायी, किन्तु दूसरी बेटी को अपनी “बादशाह बेगम” बनाया और तीसरी को बीस वर्षों तक जेल में रखा। अकबर ने स्वयं दो मुगल शहजादियों से शादी की — रुकैया और सलमा जो उसकी बहनें थीं (कजिन)। अकबर की सभी बेटियों की शादी हुई, केवल एक के सिवा जो जहाँगीर के साथ आजीवन रही। जहाँगीर ने अपनी तीन बहनों (कजिन) से शादी की। जहाँगीर की दो बेटियाँ थीं जिनमें से एक की शादी उसकी सौतेली माँ नूरजहाँ ने वैमनस्य के कारण नहीं होने दी और दूसरी की शादी जहाँगीर के भतीजे से हुई। उस भतीजे के बाप दानियाल की माँ कौन थी इसपर सारे समकालीन लेखक मौन हैं किन्तु उसका बाप अकबर था यह सब लिखते थे। दानियाल की माँ अनारकली थी, जिससे अकबर ने दानियाल को पैदा किया और जब अनारकली से सलीम का चक्कर चला तो अकबर ने अनारकली को जीवित दीवार में चिनवा दिया।
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यह थी महान मुगलों की महान संस्कृति जिसका महिमा मंडन करते करते हम नहीं थकते। जय हो !! जय हो !! आप सब की जय हो॥
५ जून २०२२

Tuesday, 3 June 2025

तन समर्पित, मन समर्पित, तुझको अपनापन समर्पित ---

 तन समर्पित, मन समर्पित, तुझको अपनापन समर्पित ---

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जब समर्पण में कमी होती है तभी आध्यात्मिक साधना में बहुत अधिक विक्षेप आते हैं। इस समय अब तक के जन्मों की सारी कमियाँ निकल कर सामने आ रही हैं। अब तक पता नहीं वे कहाँ छिपी हुई थीं। एक तरह की उथल-पुथल जीवन में चल रही है। अब तक के अच्छे-बुरे सभी कर्मफलों ने जीवन में उत्पात मचा रखा है। अच्छे-बुरे सब कर्मफलों से मुक्त होना पड़ेगा, और कोई उपाय नहीं है।
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माँ तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी
कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जून २०२३

सृष्टिकर्ता परमात्मा से जुड़ कर ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा हम कर सकते हैं।

सृष्टिकर्ता परमात्मा से जुड़ कर ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा हम कर सकते हैं। स्वयं में उनको निरंतर व्यक्त करें। कमर को सदा सीधी रखते हुए खेचरी/अर्ध-खेचरी/शांभवी मुद्रा में बैठें, और भ्रूमध्य की ओर अपने नेत्रों के गोलकों को स्थिर कर कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें।

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जब भी समय मिले तब गीता के १५वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" का स्वाध्याय करें और उसके आरंभ के ऊर्ध्वमूल वाले श्लोकों को समझते हुए तदानुसार ऊर्ध्वमूल में ही ध्यान करते हुए अपनी चेतना का अनंत में विस्तार करें।
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मैं पूर्ण सत्यनिष्ठा से यह कह रहा हूँ कि गीता के स्वाध्याय से मेरे सारे संशय दूर हुए हैं, और अनेक रहस्य अनावृत हुए हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म -- इन तीनों विषयों को भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छी तरह समझाया है।
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हमारा निवास आनंद-सिंधु के मध्य हैं, अब कभी प्यासे नहीं रहेंगे।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जून २०२२

मैं आपको प्यार करता हूँ, आप को उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा ---

 मैं आपको प्यार करता हूँ, आप को उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा ---

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आप मेरा अस्तित्व हैं। आप ही यह मैं बने हुए हो, आपको सब पता है, फिर भी मैं स्वभाव-वश बार-बार यही कहता हूँ कि मैं आपको प्यार करता हूँ। आप स्वयं ही यह 'मैं' बन कर स्वयं को प्रेम कर रहे हो, और आप स्वयं ही गुरु रूप में स्वयं के यानि मेरे समक्ष हो। आप ही यह मैं बन कर इन पंक्तियों को लिख रहे हो। यह भेद ही आपकी लीला है। आपकी इन लीलाओं को मैं समझ गया हूँ। अब आप और छिप नहीं सकते।
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(१) जब भी आनंद की जरा सी भी अनुभूति हो, भगवान को पधारने के लिए धन्यवाद दो। भगवान इन आनंद की अनुभूतियों के रूप में ही आते हैं।
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(२) जीवन को मधुर और सरल बनाओ, व भगवान की उधार उतारने के लिए भगवान को अपना कीमती समय दो। यह समय उधार में उन्हीं से मिला हुआ है। भगवान की उपासना और स्मरण द्वारा हम भगवान की उधार ही उतार रहे होते हैं। जीवन में जो भी अनावश्यक है, उसे त्याग दो।
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(३) भगवान ने सदा साथ दिया है, वे हमें कभी भी छोड़ नहीं सकते। दुःख में, सुख में वे सदा हमारे साथ हैं। निज जीवन का हरेक क्षण उन्हीं को समर्पित है। वे ही यह 'मैं' बनाकर सारा कार्य कर रहे हैं। इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं। वे ही ये साँसें ले रहे हैं, वे ही सर्वस्व हैं। मेरा अस्तित्व -- भगवान का अस्तित्व है। मैं हूँ, यही उनकी उपस्थिती का सबसे बड़ा प्रमाण है। आपका गीता में दिया हुआ यह आदेश इस जीवन में चरितार्थ हो --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
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(४) हे प्रभु, आप शांत और सौम्य रूप में ही मेरे समक्ष रहो। अपनी इस उग्रता, क्रोध और अशांति का प्रदर्शन और कहीं जाकर करो। मेरे समक्ष तो बिलकुल भी नहीं। आपका वास्तविक स्वरूप ही मुझ में व्यक्त हो। यह उपासना भी आप ही कीजिये, चारों ओर छाए हुए असत्य का अंधकार भी आप ही दूर कीजिये। आप स्वयं ही सत्य हैं। जहां आप हैं, वहाँ कोई अंधकार हो ही नहीं सकता। आपका प्रकाश, आपकी ज्योति, और आपका अस्तित्व यह मैं ही हूँ।
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(५) और कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी है वह आप ही हो। आप ही सर्वस्व हो।
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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और कहने को इस समय और कुछ भी नहीं है। बाद में जब भी आपकी इच्छा हो, मुझे माध्यम यानि एक निमित्त मात्र बनाकर स्वयं को व्यक्त करते रहना। यह मैं बन कर आप स्वयं अपनी ओर चलते रहो। मैं आपको प्यार करता हूँ, आपको उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।
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हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जून २०२२