Monday, 28 April 2025

भारत विजयी होकर एक अखंड, धर्मनिष्ठ, व आध्यात्मिक हिन्दू राष्ट्र होगा। सत्य-सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा व वैश्वीकरण होगा ---

हम व्यवहार में हिन्दू बनें, हिंदु समाज में कोई किसी भी तरह की कमी नहीं है। हम उच्च कोटि का अच्छा मौलिक साहित्य पढ़ें (विदेशी लेखकों का नहीं), नित्य नियमित व्यायाम करें, अच्छा आहार लें और तनावमुक्त जीवन जीयें। प्रातः-सायं परमात्मा का ध्यान करें, किसी भी तरह का नशा न करें, और हर दृष्टि से शक्तिशाली बनें। हिन्दू समाज अपनी हीनता के बोध से ऊपर उठें। भारत का हिन्दू समाज निश्चित रूप से अपने गौरवशाली परम वैभव को प्राप्त होगा|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२९ अप्रेल २०२१

भगवान हमें अपने साथ अनन्य बनाना चाहते हैं, अतः उन्हीं की उपासना करें ---

 भगवान हमें अपने साथ अनन्य बनाना चाहते हैं, अतः उन्हीं की उपासना करें ---

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हम भगवान में ही अपने पूरे मन और बुद्धि को लगा कर भगवान में ही निरंतर निवास करें। अनन्य भक्ति और उपासना क्या है? यह स्वयं को ही समझना होगा, कोई अन्य समझाने नहीं आएगा। कोई बात समझ में नहीं आए तो उसे समझने के लिए भगवान से ही प्रार्थना करें। दूसरों के उत्तर कभी संतुष्ट नहीं कर सकते। हर शंका का निवारण भगवान से स्वयं ही करो। भगवान के प्रति जो मेरी समझ है वह मेरी अपनी समझ है जो स्वयं भगवान ने ही मुझे समझाई है। मैँ किसी भी अन्य को नहीं समझा सकता। मेरी हरेक साँस स्वयं भगवान ले रहे हैं, और मुझे एक निमित्त मात्र यानि अपना उपकरण बनाकर सारी उपासना भी स्वयं ही कर रहे हैं। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है।
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उपासना क्या है? --- अचिंत्य और कूटस्थ परमात्मा को बुद्धि का विषय बनाकर, तैलधारा के तुल्य दीर्घकाल तक पूरे मन से समभाव से उस में स्थित रहने के अभ्यास को उपासना कहते हैं। यह उसी के समझ में आ सकती है जिस पर भगवान की विशेष कृपा हो। भगवान को प्रेम करने से ही उनकी कृपा प्राप्त होती है।
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अपने सारे कर्मफल और अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) परमात्मा को सौंप दें। उनके अतिरिक्त हमारे पास और है ही क्या? फिर सारे सदगुण परमात्मा की कृपा से स्वयं ही प्राप्त होंगे। भगवान को कौन प्रिय है? इसका उत्तर भगवान ने गीता में अनेक स्थानों पर दिया है। हम उनके प्रिय बनें। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ अप्रेल २०२३

अनन्य भक्ति योग व उपासना ---

 अनन्य भक्ति योग व उपासना ---

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मैं अपने सबसे अधिक प्रिय विषय पर लिख रहा हूँ। मेरा सर्वाधिक प्रिय विषय है -- "अनन्य भक्ति योग"। परमात्मा की अनन्य भक्ति को ही "अव्यभिचारिणी भक्ति" कहते हैं। हम परमात्मा के साथ अनन्य बनें, इसी की उपासना करें। अपने पूरे अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को लगा कर परमात्मा में ही निरंतर रमण और निवास करें। यह एक ऐसा विषय है जो हरिःकृपा से ही समझ में आ सकता है। परमात्मा को कौन प्रिय है और कैसे उनकी कृपा प्राप्त होती है? इसका उत्तर भगवान ने गीता में अनेक स्थानों पर दिया है।
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आचार्य शंकर के अनुसार -- "अचिंत्य और कूटस्थ परमात्मा को बुद्धि का विषय बनाकर, तैलधारा के तुल्य दीर्घकाल तक पूरे मन से समभाव से उस में स्थित रहने के अभ्यास को उपासना कहते हैं।"
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यह विषय उसी के समझ में आ सकता है जिस पर भगवान की विशेष कृपा हो। भगवान को प्रेम करने से ही उनकी कृपा प्राप्त हो सकती है। यथासंभव अधिकाधिक भक्ति (भगवान से परम प्रेम) करें।
इस से अधिक कहने को मेरे पास कुछ भी नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ अप्रेल २०२४ . पुनश्च: --- थोड़ा चिंतन कीजिए तब समझ में आयेगा कि "अनन्य" का अर्थ क्या है| गहराई में जाने के लिए वेदान्त के दृष्टिकोण से विचार कीजिए|
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
अर्थात् अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ||
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्| साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः||९:३०||"
अर्थात् अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये| कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है|
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति| कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति||९:३१||"
अर्थात् हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता||

Sunday, 27 April 2025

जो साधक कोई साधना नहीं करता, सिर्फ प्रभावशाली बातें ही करता है, वह संसार को तो मूर्ख बना सकता है, लेकिन भगवान को नहीं।

जो साधक कोई साधना नहीं करता, सिर्फ प्रभावशाली बातें ही करता है, वह संसार को तो मूर्ख बना सकता है, लेकिन भगवान को नहीं। वह अपने अहंकार को ही तृप्त कर रहा है, अपनी आत्मा को नहीं। आत्मा की अभीप्सा, परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति से ही तृप्त होती है, जिस के लिए उपासना/साधना करनी पड़ती है।
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हमारा सारा शास्त्रों का ज्ञान, लिखने व बोलने की प्रभावशाली कला, -- निरर्थक और महत्वहीन है, यदि व्यवहारिक जीवन में कोई आध्यात्मिक साधना/उपासना नहीं है। जठराग्नि को तृप्त करने के लिए कुछ आहार लेना ही पड़ता है, भोजन की प्रशंसा सुनकर किसी का पेट नहीं भरता। बड़ी-बड़ी बातों से तृप्ति नहीं मिलती, तृप्ति -- प्रेम, समर्पण और उपासना से ही मिलती है।
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जो चेले से उपासना नहीं करा सकता, वह गुरु भी क्या गुरु है? गुरु ऐसा हो जो चेले को नर्ककुंड से बलात् निकाल कर अमृतकुंड में फेंक दे।
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जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति होती है, वैसे ही परमात्मा के समक्ष बैठने से उनका अनुग्रह मिलता ही है। प्रभु के समक्ष हमारे सारे दोष भस्म हो जाते हैं। परमात्मा का ध्यान निरंतर तेलधारा के सामान होना चाहिए। तेल को एक पात्र से दूसरे में डालते हैं तो उसकी धार खंडित नहीं होती, वैसे ही हमारी साधना भी अखंड होनी चाहिए।
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इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पडती है। भगवान भी परमप्रेम, अनुराग और समर्पण से मिलते हैं, इनके बिना नहीं। यह भगवान को पाने का शुल्क है। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
28 अप्रेल 2021

मैं वही लिखूँगा जिसका आदेश अन्तर्रात्मा में भगवान स्वयं देंगे ---

 मैं वही लिखूँगा जिसका आदेश अन्तर्रात्मा में भगवान स्वयं देंगे ---

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मैं स्वयं या किसी अन्य की प्रसन्नता के लिए नहीं, अपितु भगवान की प्रसन्नता के लिए ही लिखता हूँ। वर्तमान में मेरी सबसे बड़ी समस्या है -- भगवान को पूर्णतः समर्पण; क्योंकि अभी भी थोड़े-बहुत तमोगुण के अन्धकार का मुझ में अवशेष है।
अपने मित्रों को यही सलाह दूंगा कि गीता के भक्तियोग नामक १२ वें अध्याय का अर्थ सहित नित्य पाठ करें। इसमें सिर्फ २० श्लोक हैं। इसे रट लें। प्रातः और सायं दोनों समय या कम से कम एक बार तो इसका पाठ अवश्य करें।
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भगवान को साक्षी कर के मैं वचन देता हूँ कि अर्थ सहित जो गीता के इस भक्ति योग नाम के १२ वें अध्याय का नित्य पाठ करेगा, उसका इसी जन्म में अकल्पनीय कल्याण होगा। भगवान की उस पर विशेष कृपा होगी।
ॐ तत्सत् !!
२८ अप्रेल २०२३

प्राणायाम की दो प्राचीन विधियाँ ---

 प्राणायाम की दो प्राचीन विधियाँ ---

प्राणायाम एक आध्यात्मिक साधना है जो हमारी चेतना को परमात्मा से जोड़ता है। यह कोई श्वास-प्रश्वास का व्यायाम नहीं है, यह योग-साधना का भाग है जो हमारी प्राण चेतना को जागृत कर उसे नीचे के चक्रों से ऊपर उठाता है। मैं यहाँ प्राणायाम की दो अति प्राचीन और विशेष विधियों का उल्लेख कर रहा हूँ। ये निरापद हैं। ध्यान साधना से पूर्व खाली पेट इन्हें करना चाहिए। इनसे ध्यान में गहराई आयेगी।
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(१) (a) खुली हवा में पवित्र वातावरण में पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह कर के कम्बल पर बैठ जाइए। यदि भूमि पर नहीं बैठ सकते तो भूमि पर कम्बल बिछाकर, उस पर बिना हत्थे की कुर्सी पर कमर सीधी कर के बैठ जाइए। कमर सीधी रहनी चाहिए अन्यथा कोई लाभ नहीं होगा। कमर सीधी रखने में कठिनाई हो तो नितंबों के नीचे पतली गद्दी रख लीजिये। दृष्टी भ्रूमध्य को निरंतर भेदती रहे, और ठुड्डी भूमि के समानांतर रहे।
(b) अब तीनों बंध (मूलबंध, उड्डियानबंध और जलंधरबंध) लगायें; जिनकी विधि इस प्रकार है -- बिना किसी तनाब के फेफड़ों की पूरी वायू नाक द्वारा बाहर निकाल दीजिये, गुदा का संकुचन कीजिये, पेट को अन्दर की ओर खींचिए और ठुड्डी को नीचे की ओर कंठमूल तक झुका लीजिये। दृष्टी भ्रूमध्य में ही रहे।
(c) मेरु दंड में नाभी के पीछे के भाग मणिपुर चक्र पर मानसिक रूप से ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का जितनी देर तक बिना तनाव के जप कर सकें कीजिये। इस जप के समय हम मणिपुर चक्र पर प्रहार कर रहे हैं।
(d) आवश्यक होते ही सांस लीजिये। सांस लेते समय शरीर को तनावमुक्त कर a वाली स्थिति में आइये और कुछ देर अन्दर सांस रोक कर नाभि पर ओंकार का जप करें। जप के समय हम नाभि पर ओंकार से प्रहार कर रहे हैं।
(e) उपरोक्त क्रिया को दस बारह बार दिन में दो समय कीजिये| इस के बाद ध्यान कीजिये।
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(2)
एक दूसरी विधि है :------ उपरोक्त प्रक्रिया में a और b के बाद धीरे धीरे नाक से सांस लेते हुए निम्न मन्त्रों को सभी चक्रों पर क्रमश: मानसिक रूप से एक एक बार जपते हुए ऊपर जाएँ|
मूलाधारचक्र ........ ॐ भू:,
स्वाधिष्ठानचक्र ..... ॐ भुव:,
मणिपुरचक्र ......... ॐ स्व:,
अनाहतचक्र ........ ॐ मह:,
विशुद्धिचक्र ......... ॐ जन:,
आज्ञाचक्र ............. ॐ तप:,
सहस्त्रार................ ॐ सत्यम् |
(इसके पश्चात जिन का उपनयन संस्कार हो चुका है, वे गायत्री मंत्र का जप भी कर सकते हैं। उनके लिए तीन मंत्र और भी हैं).
इसके बाद सांस स्वाभाविक रूप से चलने दें लेते हुए अपनी चेतना को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तृत कर दीजिये| ईश्वर की सर्वव्यापकता आप स्वयं हैं| आप यह देह नहीं हैं| जैसे ईश्वर सर्वव्यापक है वैसे ही आप भी सर्वव्यापक हैं| पूरे समय तनावमुक्त रहिये| कई अनुष्ठानों में प्राणायाम करना पड़ता है वहां यह प्राणायाम कीजिये| संध्या और ध्यान से पूर्व भी यह प्राणायाम कर सकते हैं| धन्यवाद|
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१

भारत की कूटनीति ने अमेरिका तक को झुका दिया है ---

Dated 27 April 2021  
मैं सोच रहा था कि अब आध्यात्म के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय पर नहीं लिखूँगा, लेकिन पिछले दो-तीन दिनों में एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना घटी है कि उसे लिखे बिना नहीं रह सकता। वह घटना है भारत की सफल विदेश नीति की जिसने अपनी कूटनीति द्वारा अमेरिका को झुका दिया है। इसके लिए तीन व्यक्ति धन्यवाद के पात्र हैं -- भारत के विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, और प्रधानमंत्री। सं १९४७ ई.के बाद से पहली बार भारत इस समय जितना सशक्त है, उतना पहले कभी भी नहीं था। यह भारत की कूटनीतिक विजय है।

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सैनिक दृष्टि से भी भारत अब जितना सशक्त है, जितना दृढ़ मनोबल और आत्म-विश्वास भारत में है, उतना पहले कभी भी नहीं था। उदाहरण है, लद्दाख में चीन को बिना युद्ध किए पीछे लौटने को बाध्य करना। धारा ३७० और ३५ए की समाप्ति, भारत के दृढ़ मनोबल को दिखाती है। सन २०१४ तक भारत, चीन से डरता था। अब स्थिति पलट गई है, अब चीन भारत से डरता है। अब चीन और पाकिस्तान ने अपना पूरा ज़ोर लगा रखा है कि कैसे भी भारत के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को बदला जाये ताकि वे ही पुराने कमीशनखोर और डकैत लोग सत्ता में आ जाएँ। भारत में पहले कभी उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई क्योंकि भारत का अधिकांश धन तो चोरी और डकैती द्वारा विदेशी बैंकों में चला जाता था जिस से दूसरे देशों की प्रगति होती थी, भारत की नहीं। अब भारत का पैसा बाहर जाना बंद हुआ है तब से भारत की प्रगति शुरू हुई है।
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पिछले दिनों अमेरिका का वाइडेन प्रशासन अपने पुराने भारत विरोध पर खुल कर उतर आया था, प्रत्युत्तर में भारत ने अपना बहुमुखी कूटनीतिक प्रहार किया|
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(१) सबसे पहले हमारे विदेश मंत्री ने बयान दिया कि भारत अपनी रणनीति को बदल सकता है। हो सकता है चीन के विरुद्ध युद्ध में भारत, अमेरिका का साथ न दे। यह सबसे बड़ा कूटनीतिक प्रहार था, जिस से अमेरिका तिलमिला गया।
(२) फिर भारत ने कह दिया कि भारत अपनी स्वदेशी कोवैक्सिन ही बनायेगा जिसका सारा कच्चा माल भारत में पर्याप्त है। इसकी कीमत भी बढ़ा दी, जो एक कूटनीति थी। इसका पूरी दुनिया में मनोवैज्ञानिक असर पड़ा। जो अप्रत्याशित घटनाक्रम हुआ, उस से यूरोपीय संघ एकदम से भारत के पक्ष में आ गया। दुनिया के गरीब देशों को भी भारत से ही आशा थी उनकी आवश्यकताओं को भारत का दवा उद्योग ही पूरा कर सकता है।
(३) चीन ने भी भारत को धमकियाँ देना शुरू कर दिया कि भारत, अमेरिका के पक्ष में न जाये, क्योंकि अमेरिका ने सदा भारत को धोखा दिया है। भारत का जनमानस भी अमेरिका विरोधी होने लगा। भारत के सुरक्षा सलाहकार ने अपने समकक्ष अमेरिकी अधिकारियों के कान भरने आरंभ कर दिये कि भारत का जनमानस अब अमेरिका के विरोध में जा रहा है अतः भारत से सहयोग की अपेक्षा न रखें।
(४) भारत ने अमेरिका को दी जाने वाली फार्मास्युटिकल सप्लाई को बंद करने की धमकी दे दी, जिस से अमेरिका के फार्मास्यूटिकल उद्योग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता, और वहाँ बनने वाली फाइजर वेक्सीन का उत्पादन रुक जाता।
(५) अमेरिका में भारतीय लॉबी खुल कर वाइडेन प्रशासन के विरोध में उतर आई। परिणाम आप सब के सामने है। वाइडेन प्रशासन को भारत के पक्ष में झुकना ही पड़ा।
यह भारत के प्रधानमंत्री की कूटनीतिक विजय और शक्ति है।

२७ अप्रेल २०२१