Thursday, 20 March 2025

"सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म" से प्रार्थना ---

 "सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म" से प्रार्थना ---

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हे परमप्रेममय सर्वव्यापी ब्रह्म, आप एकमात्र सत्य, ज्ञान और अनंत हो। मैं आप के साथ एक हूँ। आपकी आरोग्यकारी उपस्थिति सभी प्राणियों के अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) में निरंतर व्यक्त हो रही है। आप सच्चिदानंद (सत् चित्त आनंद) हैं। सारी सृष्टि आपका एक संकल्प है। आप स्वयं ही यह विश्व हो। आप प्रेम और आनंद के रूप में सर्वत्र व्याप्त हो।
ॐ ॐ ॐ !!
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं। आप ही सब को जानने वाले, जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
आप वायु (अनाहतचक्र), यम (मूलाधारचक्र), अग्नि (मणिपुरचक्र), वरुण (स्वाधिष्ठानचक्र) , चन्द्रमा (विशुद्धिचक्र), प्रजापति (ब्रह्मा) (आज्ञाचक्र), और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) (सहस्त्रारचक्र) हैं; आपके लिए सहस्र बार नमस्कार, नमस्कार है, पुन: आपको बारम्बार नमस्कार, नमस्कार है॥
हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्! आपके लिए अग्रत: और पृष्ठत: नमस्कार है, हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं॥
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कहीं कोई पृथकता का बोध न रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२१ मार्च २०२३

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो, उसमें "सत्यनिष्ठा" और "श्रद्धा" से ही सफलता मिलती है ---

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो, उसमें "सत्यनिष्ठा" और "श्रद्धा" से ही सफलता मिलती है। बिना सत्यनिष्ठा और श्रद्धा के कुछ भी नहीं मिलता, चाहे कितने भी जप-तप और अनुष्ठान कर लो। आने वाले कल से आरंभ होने वाले भारतीय नववर्ष (संवत्सर/वर्ष प्रतिपदा) और नवरात्र घट-स्थापना की मंगलमय शुभ कामनायें।

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आज मंगलवार २१ मार्च को सूर्य पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर था जिसके कारण उत्तरी गोलार्ध में भारत में महाबसंत विषुव (Equinox) है, जिसका अर्थ -- दिन और रात की अवधि लगभग बराबर रहती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर २३½° झुके हुए, सूर्य के चक्कर लगाती है, इस प्रकार वर्ष में एक बार पृथ्वी इस स्थिति में होती है जब वह सूर्य की ओर झुकी रहती है, व एक बार सूर्य से दूसरी ओर झुकी रहती है। वर्ष में दो बार ऐसी स्थिति आती है, जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है, और न ही सूर्य से दूसरी ओर, बल्कि बीच में होता है। इस स्थिति को विषुव या Equinox कहा जाता है। इन दोनों तिथियों पर दिन और रात की लंबाई लगभग बराबर होती है।
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भारतीय नव वर्ष और चैत्र नवरात्र कल २२ मार्च २०२३ से आरंभ हो रहे हैं।
घट-स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त आप अपने स्थानीय पारिवारिक पंडित जी से पूछ सकते हैं। नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। अनेक श्रद्धालु इस दिन भगवान श्रीराम और हनुमान जी की आराधना भी करते हैं।
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जहां तक मेरा प्रश्न है, जगन्माता अपने जिस भी रूप की साधना करवा देगी, वही ठीक है। मेरी कोई आकांक्षा नहीं है।
कृपा शंकर
21 मार्च 2023

आध्यात्म में भगवान से कोई मांग नहीं होती, केवल समर्पण ही होता है ---

 आध्यात्म में भगवान से कोई मांग नहीं होती, केवल समर्पण ही होता है ---

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मेरे विचार अधिकांश श्रद्धालुओं से नहीं मिलते, इसलिए मुझे भीड़ से दूरी में ही आनंद मिलता है। जिन से मेरे विचार मिलते हैं, उनका थोड़ा-बहुत सत्संग आनंददायक होता है। मेरी मान्यता भगवान से कुछ मांगने की नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व उन्हें समर्पित करने की ही है। भगवान से कुछ मांगना मेरे लिए संभव नहीं है। यदि भगवान से कुछ मांगना ही है तो उनकी अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति ही मांगनी चाहिए, अन्य कुछ भी भगवान से मांगना, भगवान का अपमान है।
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शिवभक्ति के संस्कार पूर्व जन्म से ही हैं। शिव को मैं सीमित नहीं कर सकता। ध्यान-साधना में सहस्त्रार से ऊपर का भाग खुल जाता है, अतः ध्यान-साधना सूक्ष्म-जगत की अनंतता से भी परे के एक परम आलोकमय जगत में होती है, जहाँ स्वयं भगवान परमशिव हैं। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन, और परमशिव का साक्षीभाव से ध्यान मेरी आध्यात्मिक साधना है। कुछ निषेधात्मक कारणों से कुंडलिनी महाशक्ति के बारे में सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं की जा सकती। इस विषय की चर्चा का अधिकार गुरु-परंपरा के भीतर ही है, बाहर नहीं।
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सारी प्रेरणा मुझे श्रीमद्भगवद्गीता से मिलती है। मेरे सारे संशयों का निवारण भी श्रीमद्भगवद्गीता से ही हुआ है। अतः गीता-पाठ और शिव पूजा -- साधना के भाग हैं। कर्ता के रूप में तो भगवान स्वयं है। वे ही साध्य, साधक और साधना हैं। भगवान से कुछ मांगना, भगवान का अपमान है; अतः मैं भगवान से कुछ मांग नहीं सकता। जो कुछ भी सामान मेरे पास है, वह सब उन्हें समर्पित है। पूर्व-जन्म की स्मृतियाँ कभी कभी जागृत हो जाती थीं, अब उन्हें पूरी तरह भुला दिया है। भगवान की अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी भगवान से मांगने योग्य नहीं है।
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"अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:८॥"
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥१३:९॥"
"असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१३:१०॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१३:१२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् --
अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥
इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन॥
आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।
अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है॥
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आज के स्वाध्याय के लिए गीता के उपरोक्त पाँच श्लोक ही पर्याप्त हैं। भगवान से कोई मांग नहीं, बल्कि स्वयं को उन्हें पूर्णतः समर्पित करें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२४

Wednesday, 19 March 2025

परमात्मा का निज जीवन में अवतरण ही धर्म है। स्वर्ग एक प्रलोभन, और नर्क एक भय है ---

 परमात्मा का निज जीवन में अवतरण ही धर्म है। स्वर्ग एक प्रलोभन, और नर्क एक भय है ---

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परमात्मा का निज जीवन में अवतरण ही धर्म है, और जीवन में परमात्मा का न होना अधर्म है। यही सनातन सत्य है, जिसके अपरिवर्तनीय नियमों के अंतर्गत सारी सृष्टि चल रही है। इसी को सत्य-सनातन-धर्म कहते हैं। मनुष्य का स्वभाव परिवर्तित होकर दैवीय या आसुरी हो सकता है, मनुष्य अधर्मी हो सकता है, धर्म-विरुद्ध होकर विधर्मी हो सकता है, पर धर्म कभी परिवर्तित नहीं हो सकता। धर्म एक ही है जो अपरिवर्तनीय है।
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परमात्मा ही एकमात्र सत्य है, जिसका अंश होने से आत्मा भी सत्य है जिसका नाश नहीं हो सकता। आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता, वायु उड़ा नहीं सकती, आकाश अपने में विलय नहीं कर सकता, और कोई भी पंचभूत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अतः कोई आत्मा कभी धर्मभ्रष्ट नहीं हो सकती। यह हो सकता है कि आत्मा पर अज्ञान का आवरण छा जाये, लेकिन धर्म कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता।
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जीवन का लक्ष्य कोई इन्द्रीय सुखों कि प्राप्ति नहीं है। इन्द्रीय सुख उस मधु की तरह हैं जिसमें विष घुला हुआ है। जीवन का लक्ष्य किसी स्वर्ग की प्राप्ति भी नहीं है, जहाँ कोई पूर्णता व तृप्ति नहीं, केवल पतन ही पतन है। आत्म-तत्व यानि परमात्मा में स्थिति ही हमारा एकमात्र परम धर्म है, अन्य सब इसी का विस्तार है। यही जीवन कि सार्थकता है। स्वर्ग एक प्रलोभन, और नर्क एक भय है। ईश्वर ही एकमात्र सत्य है।
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मत- मतान्तरों को "धर्म" से न जोड़िये। धर्म इतना व्यापक है कि उसे मत-मतान्तरों में सीमित नहीं किया जा सकता। हम किसी मत विशेष को धर्म मान लेते हैं, यहीं से सब समस्याओं का आरम्भ होता है। धर्म एक ही है, अनेक नहीं। कणाद ऋषि ने धर्म को "यथोअभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिसधर्मः" परिभाषित किया है। हम मत-मतान्तरों को ही धर्म मान लेते हैं जो गलत है। हम मनुष्य नहीं बल्कि शाश्वत आत्मा हैं। मनुष्य देह एक वाहन मात्र है जो इस लोकयात्रा के लिये मिला है। यह एक मोटर साइकिल की तरह है, जिस पर कुछ काल के लिए यात्रा कर रहे हैं। मानवतावाद नाम का कोई शब्द हमारे शास्त्रों में नहीं है। हमारे शास्त्रों में समष्टि के कल्याण की बात की गयी है, न कि व्यष्टि यानि मनुष्य मात्र के कल्याण की।
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जीवन में 'धर्म' तभी साकार हो सकता है जब हमारे ह्रदय में परमात्मा हो। मनु-स्मृति में मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं --
"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥"
धृति (धैर्य), क्षमा (क्षमाशील होना), दम (वासनाओं पर नियन्त्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये धर्म के दस लक्षण हैं जिन्हें धारण करना ही धर्म है। जहाँ ये नहीं हैं, वहाँ अधर्म है।
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० मार्च २०२५

क्या भारत में कभी ऐसे शासक और ऐसा शासन भी आयेगा जिसका लक्ष्य "धर्मरक्षा" होगी? ---

शासन का लक्ष्य धर्मरक्षा है, तथाकथित समाज-सेवा नहीं। भारत के सभी हिन्दू सम्राटों/राजाओं के लिए राज्य करना, और राज्य की रक्षा करना -- उनका धर्म था। अपने धर्म-पालन के लिए ही वे राज्य करते थे, न कि अहंकार की तृप्ति के लिए। ईश्वर के सभी अवतार भी धर्म के अभ्युत्थान और धर्म की रक्षा के लिए ही अवतरित हुए हैं। "अभ्युदय" और "निःश्रेयस" की सिद्धि को ही भारत में "धर्म" माना गया है। ॐ तत्सत् !! २० मार्च २०२४

आजकल लोगों की जैसी सोच है, उसमें मैं स्वयं को इस संसार के लिए अनुपयुक्त (Misfit) पाता हूँ ---

आजकल लोगों की जैसी सोच है, उसमें मैं स्वयं को इस संसार के लिए अनुपयुक्त (Misfit) पाता हूँ।

मेरी स्वभाविक रुचि -- ब्रह्म-चिंतन यानि परमात्मा के चिंतन मनन निदिध्यासन और ध्यान आदि में है। सच्चिदानंद की चेतना का स्वयं में अवतरण व विलय ही मेरी उपासना और आनंद है। गुरु महाराज ने और अन्य महापुरुषों ने क्या कहा है, उनके शब्दों का अब कोई महत्व नहीं रहा है। महत्व उनकी चेतना का है। वे चेतना की जिस स्थिति में थे, उस चेतना में स्थिति ही मेरी रुचि का विषय है। शेष जीवन इसी में व्यतीत हो जाये। सोशियल मीडिया से मन भर गया है। किसी भी तरह का मोक्ष या मुक्ति नहीं चाहिये। हर जन्म में ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। संसार में जिसे हम पाना चाहते हैं और ढूँढ़ रहे हैं, वह हम स्वयं हैं। कुछ पाने की अवधारणा मिथ्या है। हम कुछ बन सकते हैं, पा नहीं सकते। परमात्मा को पाने के लिए हमें स्वयं परमात्मा बनना पड़ेगा। ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१९ मार्च २०२५

क्या ३० मार्च २०२५ से कुछ परिवर्तन होने वाला है? ---

 क्या ३० मार्च २०२५ से कुछ परिवर्तन होने वाला है? ---

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मुझे ज्योतिष का मूलभूत अल्प ज्ञान भी नहीं है, इसीलिए यह पोस्ट डाल रहा हूँ। कुछ ज्योतिषी मित्र सलाह और चेतावनी दे रहे हैं कि ३० मार्च २०२५ से ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति ऐसी होगी कि हमारी मानसिक स्थिति विचलित हो सकती है, जिसके लिये तैयार रहना चाहिये।
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उनके अनुसार हमारी सोच में परिवर्तन हो सकता है, बेचैनी और घबराहट हो सकती है, चिड़चिड़ापन, घर में तनाव, अशांत चित्त, और ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है जैसे दलदल में फंसे व्यक्ति की होती है। उनके अनुसार ऐसी विषम परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिये।
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जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं तो इसके लिए तैयार हूँ; लेकिन मेरे से जुड़े अन्य व्यक्ति नहीं। जिनको इस बारे में कुछ ज्ञान है केवल वे ही अपना मत व्यक्त करें, अन्य नहीं। फालतू की टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी। सभी को धन्यवाद। जय सियाराम॥
कृपा शंकर
१९ मार्च २०२५