Friday, 20 March 2020

जब माता ही नहीं होगी तब पुत्र कहाँ से उत्पन्न होंगे? भक्ति, ध्यान और देवासुरी भावजगत ----

जब माता ही नहीं होगी तब पुत्र कहाँ से उत्पन्न होंगे? भक्ति, ध्यान और देवासुरी भावजगत ----
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ध्यान-साधना तभी करनी चाहिए जब हृदय में भगवान के प्रति बिना किसी शर्त के भक्ति (Unconditional love for the Divine) जागृत हो जाये| बिना भक्ति के की गई कोई भी ध्यान-साधना, साधक को आसुरी/राक्षसी जगत से जोड़ सकती है, जो स्वयं के लिए ही नहीं, समाज के लिए भी घातक हो सकती है| ऐसा व्यक्ति स्वयं या तो असुर/राक्षस हो जाता है या किसी आसुरी/राक्षसी मत से जुड़ जाता है| आसुरी/राक्षसी मतों का आरंभ ऐसे ही असुर/राक्षस व्यक्तियों ने किया होता है| ये असुर/राक्षस फिर उन सब की हत्या, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार, और देवालयों व संस्कृतियों को नष्ट करना आरंभ कर देते हैं जो उनके विचारों के अनुकूल नहीं होते|
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निज चेतना में जब तमोगुण अधिक होता है तब मनुष्य मूढ़ अवस्था में होता है| जब रजोगुण प्रधान होता है तब क्षिप्त या विक्षिप्त अवस्था होती है| सतोगुण प्रधान व्यक्ति एकाग्र या निरुद्ध अवस्था में होता है|
तमोगुण ..... आलस्य, सुस्ती, कार्य को आगे के लिए टालने की प्रवृति, मूर्खता ईर्ष्या-द्वेष, लोभ, अहंकार और अज्ञान को जन्म देता है| जब अच्छे-बुरे का विचार नहीं रहता है, हर समय प्रबल लोभ, क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष, स्वार्थ व कामुकता रूपी अज्ञान और अंधकार ह्रदय पर छाया रहता है, यह तमोगुणी तामसी मूढ़ अवस्था है|
रजोगुण ..... अंतःकरण को अशान्त और चंचल बनाता है| रजोगुणी व्यक्ति का अहंकार भी प्रबल होता है| रजोगुण जब प्रबल होता है तब मन में अनेक तरंगें, वासनायें और महत्वाकांक्षाएँ उठती हैं| ये आकांक्षाएँ यदि पूर्ण नहीं होती तब वह परेशान और दुःखी हो जाता है| यह क्षिप्तावस्था है| इच्छाओं के पूरी होने पर जो प्रसन्नता तनिक समय के लिये मिलती है व जो क्षणिक आनंद प्राप्त होता है वह विक्षिप्त अवस्था है| रजोगुण में भक्ति तो होती है पर वह सकाम भक्ति होती है, निष्काम नहीं|
सतोगुण ..... शान्ति, दिव्य प्रेम, आनन्द और ज्ञान प्रदान करता है| प्रसन्नता और शांति .... एकाग्रता का लक्षण है| तन्मयता निरुद्धता का लक्षण है| भगवान के प्रति अहेतुकी निष्काम (Unconditional) भक्ति सतोगुण से ही संभव है|
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जिन में तमोगुण प्रधान है उन्हें रजोगुण का, जिनमें रजोगुण प्रधान है उन्हें सतोगुण का, और जिन में सतोगुण प्रधान है उन्हें गुणातीत अवस्था में जाने का प्रयास करना चाहिए| यह भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है| गीता में विस्तार से इसका वर्णन है|
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इन पंक्तियों को लिखने का उद्देश्य सिर्फ यही बताना है कि जिन में भगवान के प्रति प्रबल भक्ति नहीं होती, उन्हें प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा व ध्यान-साधना आदि नहीं करने चाहिये| भक्ति माता है और ज्ञान व वैराग्य उसके पुत्र| जब माता ही नहीं होगी तब पुत्र कहाँ से उत्पन्न होंगे?
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२०

परमशिव एक अनुभूति है ....

हमारा शिव-संकल्प, अंतर्दृष्टि, प्राण-तत्व और गुरुकृपा ..... ये साधन हैं, जिनकी सहायता से परमशिव का ध्यान किया जाता है| परमशिव एक अनुभूति है जो परमात्मा की परमकृपा से उनके द्वारा भेजे हुए सद्गुरु के मार्गदर्शन से होती है| गुरु का भौतिक देहधारी होना आवश्यक नहीं है| सूक्ष्म जगत की महान आत्मायें भी गुरु रूप में मार्ग-दर्शन कर सकती हैं|
प्राण का घनीभूत रूप कुंडलिनी महाशक्ति है| कुंडलिनी महाशक्ति और परमशिव का मिलन 'योग' है|
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जब हृदय में भगवान से परमप्रेम (भक्ति) और उन्हें पाने की अभीप्सा जागृत होती है, तब सद्गुरु लाभ होता है| भगवान श्रीकृष्ण स्वयं परात्पर गुरु रूप में निष्ठावान साधकों का मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| भगवद्गीता के रहस्य उन्हीं की कृपा से समझ में आ सकते हैं, अन्यथा नहीं| वे हमारे अंतर में सर्वदा बिराजमान हैं| उनका आभास उनकी परमकृपा से ही होता है| हमारे हिमालय जैसे बड़े बड़े पाप भी उनके विराट कृपासिंधु में छोटे-मोटे महत्वहीन कंकर-पत्थर से अधिक नहीं हैं| सब कर्मफलों से मुक्ति और आगे की गतियाँ उनकी कृपा से होती हैं| वे ही परमब्रह्म हैं, वे ही जगन्माता हैं|
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ब्रह्मरंध्र से परे अनंत महाकाश है| उस से भी बहुत परे श्वेत क्षीरसागर है जहाँ भगवान नारायण, परमशिव के रूप में बिराजमान हैं| उनके दर्शन एक विराट पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के रूप में होते हैं| वे पंचमुखी महादेव हैं| उनके संकल्प से ही यह सारी सृष्टि निर्मित हुई और चलायमान है| गीता में उस लोक के बारे में कहा गया है ....
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः| यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम||"
श्रुति भगवती कहती है .....
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः| तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति||"
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उन परमात्मा की परमकृपा मुझ अकिंचन पर और हम सब पर सदा बनी रहे|
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च| नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व| अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ ॐ ॐ!!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०२०

विद्वान कौन है?

विद्वान कौन है?
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन्विद्वान्भवते नातिवादी |
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ||मुण्डकोपनिषद, ३.१.४ ||
..... प्राण तत्व, जो सब भूतों/प्राणियों में प्रकाशित है, को जानने वाला ही विद्वान् है, न कि बहुत अधिक बात करने वाला| वह आत्मक्रीड़ारत और आत्मरति यानि आत्मा में ही रमण करने वाला क्रियावान ब्र्ह्मविदों में वरिष्ठ यानि श्रेष्ठ है|
(भक्तिसुत्रों में आत्मा में रमण करने वाले को आत्माराम कहा गया है ... "यज्ज्ञात्वा मत्तो-भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति")

Saturday, 7 March 2020

सृष्टि के आदिकाल से ही भारतवर्ष एक 'हिन्दू राष्ट्र' था, अभी भी हैै, और सदा ही रहेगा ----

सृष्टि के आदिकाल से ही भारतवर्ष एक 'हिन्दू राष्ट्र' था, अभी भी हैै, और सदा ही रहेगा ----
"हिन्दू राष्ट्र' ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो निज जीवन में अपने सर्वश्रेष्ठ को यानि परमात्मा को व्यक्त करना चाहते हैं, चाहे वे किसी भी देश के नागरिक हों या किसी भी मनुष्य जाति में उन्होने इस पृथ्वी पर जन्म लिया हो| भारतवर्ष का यही संदेश है| अतः भारतवर्ष एक हिन्दू राष्ट्र है| हिन्दुत्व एक ऊर्ध्वमुखी भाव है जिस से जीवन में समुत्कर्ष (अभ्युदय ... यानि बहुमुखी सर्वोच्च विकास) व निःश्रेयस (सभी दुःखों से मुक्ति) की सिद्धि होती है|
जब से सृष्टि आरंभ हुई है, तभी से जिस धर्म का जन्म हुआ, जिस से सारी सृष्टि संचालित है, वह सनातन धर्म है, जो अब हिन्दू धर्म के नाम से जाना जाता है| कोई माने या न माने, कुछ सत्य सनातन नियम हैं जो कभी परिवर्तित नहीं हो सकते .....
"हम यह देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं| आत्मा कभी नष्ट नहीं होती| हमारी सोच और हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं जिन का फल भोगने को हम बाध्य हैं| उन कर्मफलों को भोगने के लिए ही बार बार हमें जन्म लेना पड़ता है| ईश्वर करुणा और प्रेमवश हमारे कल्याण हेतु अवतार लेते हैं| जीवभाव से मुक्त हो कर परमात्मा में शरणागति व समर्पण हमें इस जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करते हैं| यह सृष्टि परमात्मा का एक संकल्प है| परमात्मा की प्रकृति अपनी सृष्टि के संचालन का हर कार्य अपने नियमों के अनुसार करती है| उन नियमों को न जानना हमारा अज्ञान है| परमात्मा से परमप्रेम ही भक्ति है जिस की परिणिती ज्ञान है|"
सरलतम भाषा में यही हिन्दू धर्म का सार है, बाकी सब इसी का विस्तार है| जो मनुष्य इस में आस्था रखते हैं, वे स्वतः ही हिन्दू हैं| हमारी मान्यता से प्रकृति के नियमों पर कोई अंतर नहीं पड़ता| प्रकृति तो अपने नियमों के अनुसार ही कार्य करती रहेगी|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०२०

मनुष्य जीवन की शाश्वत जिज्ञासा ..... "हम परमात्मा को कैसे उपलब्ध हों?"

मनुष्य जीवन की शाश्वत जिज्ञासा ..... "हम परमात्मा को कैसे उपलब्ध हों?"
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जिस ने भी मनुष्य देह में जन्म लिया है, चाहे वह घोर से घोर नास्तिक हो, उसे जीवन में एक न एक बार तो यह जिज्ञासा अवश्य ही होती है कि यदि परमात्मा है तो उन्हें कौन, व कैसे पा सकता है? यह मनुष्य जीवन की शाश्वत जिज्ञासा है| भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसका बड़ा सुंदर उत्तर दिया है ....
"मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः| निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव||११:५५||"
अर्थात् "हे पाण्डव! जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है तथा संगरहित है, जो भूतमात्र के प्रति निर्वैर है, वह मुझे प्राप्त होता है||"
गीता में भगवान दो बार कहते हैं ... "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः||९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
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आचार्य शंकर व आचार्य रामानुज जैसे स्वनामधन्य परम विद्यावान अनेक महान आचार्यों ने गीता की बड़ी सुंदर व्याख्याएँ की हैं| मुझ अकिंचन की तो उनके समक्ष कोई औकात ही नहीं है| मैंने अर्थ समझने का प्रयास ही छोड़ दिया है, क्योंकि यह मेरी बौद्धिक क्षमता से परे है| मेरे हृदय में परमात्मा जो बैठे हैं, उन्हें ही पता है कि उन के मन में क्या है, अतः मुझे उनके शब्दों से नहीं, उन से ही प्रेम है| वे हृदयस्थ परमात्मा सदा मेरे समक्ष रहें, और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए|
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सार की बात है .... "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु|" परमात्मा से प्रेम ही सब कुछ है| वे ही हमारे एकमात्र सम्बन्धी हैं, वे ही हमारे एकमात्र मित्र हैं, और उन में तन्मयता ही हमारा जीवन है| वे हमारे इतने समीप हैं की हम उनका बोध नहीं कर पाते| हम अपना हर कर्म उन की प्रसन्नता के लिए, उन्हें ही कर्ता बनाकर करें|
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प्रेम एक स्थिति है, कोई क्रिया नहीं| यह हो जाता है, किया नहीं जाता| परमात्मा से परमप्रेम .... आत्मसाक्षात्कार का द्वार है| आत्मसाक्षात्कार सबसे बड़ी सेवा है जो हम समष्टि के लिए कर सकते हैं| परमात्मा से परमप्रेम होना परमात्मा की परमकृपा है जो हमारा परमकल्याण कर सकती है| वे हमारे एकमात्र सम्बन्धी और मित्र हैं, उन में तन्मयता ही हमारा जीवन है| वे हमारे इतने समीप हैं की हम उनका बोध नहीं कर पाते|
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मैं क्षमायाचना सहित कुछ जटिल व कठिन शब्दों का प्रयोग करता हूँ क्योंकि हृदय के भाव उन्हीं से व्यक्त होते हैं| मेरा शब्दकोष बहुत सीमित है, अपने आध्यात्मिक भावों को सरल भाषा में व्यक्त करने की कला मुझे नहीं आती| महात्माओं के सत्संग से जानी हुई सार की बात है कि जिस की बुद्धि हेय-उपादेय है वह अहेय-अनुपादेय ब्रह्मतत्त्व को नहीं पा सकता| जो अहेय-अनुपादेय परमार्थतत्त्व को पाना चाहता है, वह हेय-उपादेय दृष्टि नहीं कर सकता| हम भगवान से प्रेम की यथासंभव पूर्ण अभिव्यक्ति करते हुए अपना कर्म करते रहें पर किसी से घृणा न करें| घृणा करने वाला व्यक्ति, आसुरी शक्तियों का शिकार हो जाता है|
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परमात्मा से प्रेम के विचार ही मेरी तीर्थयात्रा है| भगवान से प्रेम ही सबसे बड़ा तीर्थ है| वे हमारे प्रेम को अपनी पूर्णता दें| उन की और आप सब की जय हो|
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
२२ फरवरी २०२०
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पुनश्च: :---- 'हेय' का अर्थ होता है ....'अवलंबन योग्य नहीं'| जो हेय है वह लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य तो कुछ और ही है| 'उपादेय' का अर्थ होता है .... 'अवलम्बन योग्य है'| उपादेय की प्राप्ति करनी है तो जो हेय है उसे पकड़े नहीं रहना है, अन्यथा लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा| जैसे खड्डे से निकलने के लिए रस्सी का सहारा लें और उस रस्सी को पकड़ें ही रहें तो बाहर निकलने का लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा| यदि बाहर निकलना है तो रस्सी को अंततः छोड़ना ही होगा| किन्तु यदि पहले ही छोड़ दिया जाए तो कोई बाहर नहीं आ सकेगा| यहाँ रस्सी हमें बाहर नहीं निकालती, निकलते तो हम स्वयं के पुरुषार्थ से हैं| रस्सी तो मात्र हमारे पुरुषार्थ की सहचर है| वैसे ही सारे साधन व साधनायें हमारी सहचरी हैं, जिनका परित्याग लक्ष्य प्राप्ति पर करना ही पड़ता है| वैसे ही गुरु-तत्व भी मात्र सहचर है, लक्ष्य नहीं| गुरु-तत्व के बिना ज्ञान नहीं होता, पर गुरु जी को पकड़े रहने से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती, स्वयं को ही पुरुषार्थ करना होगा| गुरुजी तो मात्र सहचर हैं, जो अंततः स्वयं ही चले जाएँगे|

मुक्ति की सोचें, बंधनों की नहीं .....

मुक्ति की सोचें, बंधनों की नहीं, जो हमें मृत्यु देना चाहते हैं, उन्हें मृत्यु देना भी हमारा धर्म है ...
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इस जीवन में इस पृथ्वी पर, और इस जीवन के पश्चात् एक काल्पनिक स्वर्ग में मौज-मस्ती-मजा लेने की कामना/अपेक्षा ..... घोर निराशाजनक, असत्य, महादुखदायी और धोखा होगी| ऐसी कामनाएँ और अपेक्षाएँ महाबंधनकारी, झूठी और अंधकारमय नर्क में धकेलने वाली होती हैं| इस खतरे से सावधान! अपनी इन्द्रियों को और मन को वश में रखें| मुक्ति की सोचें, बंधनों की नहीं| हमारा कार्य परमात्मा के प्रकाश की वृद्धि करना है, न कि अंधकार की| अन्धकार की वृद्धि करेंगे तो अज्ञान व दुःख ही प्राप्त होगा| पूर्व जन्मों में कुछ पुण्य किये होंगे इसीलिये भगवान हमें सदा अपने हृदय में रखते हैं| कुछ पाप भी किये होंगे जिनका दंड भी मिलता है| हमारे हृदय में परमात्मा की चेतना निरंतर बनी रहे| हृदय में परमात्मा होंगे तो सभी कार्य अच्छे ही होंगे|
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वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में गीता में भगवान् ने दुराचारी आसुरी गुणों वाले व्यक्तियों के लक्षण बताये हैं जिन से सदा दूरी रखना ही ठीक है .....
"प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः| न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते||१६:७||"
"असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्| अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्||१६:८||"
"एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः| प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः||१६:९||"
"काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः|मोहाद्‌गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः||१६:१०||"
"चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः| कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः||१६:११||"
"आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः| ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्||१६:१२||"
"अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः| मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः||१६:१८||"
"तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्| क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु||१६:१९||"
"तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्| क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु||१६:२०||"
"त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः| कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्||१६:२१||"
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जिन लोगों के साथ हम रहते हैं, उन के गुण हमारे में आये बिना नहीं रहते| अतः दुष्ट असुर/राक्षस प्रकृति के लोगों को दूर से ही नमन कर देना अच्छा है| साथ ही रहना है तो सदाचारी लोगों के साथ रहो, अन्यथा अकेले रहना ही ठीक है|
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जो दूसरों को अपना मत मानने को बलात् बाध्य करते हैं वे ही असुर राक्षस हैं| आतताई से आत्म-रक्षा करना हमारा अधिकार ही नहीं कर्त्तव्य भी है| आतताई .... यानि जो क्रूर हिंसक दुष्ट प्रवृत्ति का व्यक्ति जिसका दमन कठिन हो, जो हमारे प्राण लेने, हमारी स्त्री, संतानों आदि का अपहरण करने, हमारी संपत्ति को लूटने व जलाने के लिए आ रहा हो, उसके लिए हमारे शास्त्रों में क्षमा का कोई प्रावधान नहीं है| उसके लिए मृत्यु दंड ही निर्धारित है| जो हमें मृत्यु देना चाहते हैं, उन्हें मृत्यु देना कोई पाप नहीं है|
भारत के भीतर व बाहर के शत्रुओं का, असत्य और अंधकार की शक्तियों का नाश हो| धर्म की जय हो|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२१ फरवरी २०२०

महाशिवरात्रि पर भगवान परमशिव को नमन .....

महाशिवरात्रि पर भगवान परमशिव को नमन .....
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भगवान शिव की परम कृपा हम सब पर बनी रहे| शिवभाव में स्थित होकर हम स्वयं ही स्वयं को नमन कर रहे हैं| महाशिवरात्रि हमारे लिए ज्योतिर्मय हो, हमारे चैतन्य में कोई असत्य और अंधकार का अवशेष न रहे| हमारा हर संकल्प, हर विचार और हर क्रिया शिवमय हो| हमारा शिवरात्रि का उपवास सफल हो| हमारे धर्म और राष्ट्र की रक्षा हो| भारत के भीतर और बाहर के शत्रुओं का नाश हो| भारत विजयी हो|
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असत्य से निवृत होकर जीवात्मा तथा परमात्मा का योगस्थ होकर एक साथ रहना उपवास कहलाता है, शरीर को भूख से सुखाने का नाम उपवास नहीं है| पुराने जमाने के सक्षम लोग शिवरात्रि के दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक निर्जला व्रत करते थे और पूरी रात जागकर जप करते थे|
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मृत संजीवनी मंत्र :----
"ॐ हौं ॐ जूँ ॐ सः ॐ भू: ॐ भुवः ॐ स्व: ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम् |
तत्सवितुर्वरेण्यम् त्र्यंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् भर्गो देवस्य धीमहि उर्वा रूकमीव बन्धनान् धियोयोनः प्रचोदयात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् |
ॐ सत्यम ॐ तप: ॐ जन: ॐ मह: ॐ स्वः ॐ भुव: ॐ भू: ॐ स: ॐ जूँ ॐ हौं ॐ ||"
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रुद्राष्टकम् :---
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥ (१)
निराकांर मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥ (२)
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥(३)
चलत्कुण्डलं शुभ्र सुनेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌ ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥(४)
प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌ (५)
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिदान्द दाता पुरारी |
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥(६)
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्‌ ।
न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥(७)
न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
जरा जन्म दुःखौध तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥(८)
रुद्राष्टकम् इदं प्रोक्तं विप्रेणहरोतषये, ए पठन्त‍ि नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसिदति।।
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ॐ नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव| ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२१ फरवरी २०२०