Friday, 27 December 2019

हमारे गरीब और लाचार हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन मत करो ....

हे ईसाई धर्म प्रचारको, आप लोग अपने मत में आस्था रखो पर हमारे गरीब और लाचार हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन मत करो| हमारे सनातन धर्म की निंदा और हम पर झूठे दोषारोपण मत करो|
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क्राइस्ट एक चेतना है -- श्रीकृष्ण चैतन्य या कूटस्थ चैतन्य| ईश्वर को प्राप्त करना हम सब का जन्मसिद्ध अधिकार है| सभी प्राणी ईश्वर की संतान हैं| जन्म से कोई भी पापी नहीं है| सभी अमृतपुत्र हैं परमात्मा के| मनुष्य को पापी कहना सबसे बड़ा पाप है| अपने पूर्ण ह्रदय से परमात्मा को प्यार करो|
सभी जीसस क्राइस्ट में आस्था वालों को क्रिसमस की शुभ कामनाएँ|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०१९

मैं एक सलिल-बिन्दु हूँ तो आप महासागर हो -----

मैं एक सलिल-बिन्दु हूँ तो आप महासागर हो -----
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मैं नहीं चाहता कि मैं किसी पर भार बनूँ ..... न तो जीवन में और न ही मृत्यु में| मैं नित्य मुक्त हूँ| मेरे परमप्रिय परमात्मा की इच्छा ही मेरा जीवन है| मेरा आदि, अंत और मध्य ..... सब कुछ परमात्मा स्वयं हैं| यह शरीर-महाराज रूपी पिंड भी परमात्मा को अर्पित है| मेरे सारे बुरे-अच्छे कर्मफल, पाप-पुण्य, और सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हैं| मुझे कोई उद्धार नहीं चाहिए| उद्धार तो कभी का हो चुका है| कोई किसी भी तरह की मुक्ति भी नहीं चाहिए, क्योंकि मैं तो बहुत पहिले से ही नित्यमुक्त हूँ|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्| आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः||६:५||
अर्थात मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है||
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श्रुति भगवती कहती है ..... "एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्नि: सलिले संनिविष्ट:| तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेSयनाय||"
इस ब्रह्मांड के मध्य में जो एक ..... >>> "हंसः" <<< यानि एक प्रकाशस्वरूप परमात्मा परिपूर्ण है; जल में स्थितअग्नि: है| उसे जानकर ही (मनुष्य) मृत्यु रूप संसार से सर्वथा पार हो जाता है| दिव्य परमधाम की प्राप्ति के लिए अन्य मार्ग नही है||
(यह संभवतः अजपा-जप की साधना है जिसका निर्देश कृष्ण यजुर्वेद के श्वेताश्वतरोपनिषद में दिया हुआ है)
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गुरुकृपा से इस सत्य को को समझते हुए भी यदि मैं अपने बिलकुल समक्ष परमात्मा को समर्पित न हो सकूँ तो मेरा जैसा अभागा अन्य कोई नहीं हो सकता| हे प्रभु, मैं तो निमित्तमात्र आप का एक उपकरण हूँ| इसमें जो प्राण, ऊर्जा, स्पंदन, आवृति और गति है, वह तो आप स्वयं ही हैं| मैं एक सलिल-बिन्दु हूँ तो आप महासागर हो| मैं जो कुछ भी हूँ वह आप ही हो| ॐ ॐ ॐ ||
ॐ तत्सत् |
कृपा शंकर
२३ दिसंबर २०१९

जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन 25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है? ....।

जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन 25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है?
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जीसस क्राइस्ट के जन्म दिवस का कोई प्रमाण नहीं है, बाइबल की किसी भी पुस्तक में उनके जन्मदिवस का उल्लेख नहीं है| ईसा की तीसरी शताब्दी तक जीसस का जन्मदिवस नहीं मनाया जाता था| जहाँ तक प्रमाण मिलते हैं 336 AD से इसकी मान्यता के पीछे रोमन सम्राट कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट की भूमिका है| उनका जन्म 27 फरवरी 272 AD को सर्बिया में हुआ था, और उनकी मृत्यु 22 मई 337 AD को निकोमीडिया में हुई| वे सूर्य के उपासक थे और जिस मत को मानते थे उसे Pagan कहा जाता था जिसका अर्थ है 'मूर्तिपूजक'| उन्होने ईसाई मत का प्रयोग अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया, और कोन्स्टेंटिनपोल (कुस्तुनतुनिया) (वर्तमान इस्तांबूल जो तुर्की में है) को 324 AD में बसाया| वे पहले रोमन शासक थे जिन्हें ईसाई बनाया गया था| 'दा विंसी कोड' के अनुसार जब वे मर रहे थे और अपनी मृत्यु शैया पर असहाय थे तब पादरियों ने बलात् उन का बपतिस्मा कर दिया| उन दिनों पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में 24 दिसंबर वर्ष का सबसे छोटा दिन होता था (अब 21दिसंबर), और 25 दिसंबर (अब 22 दिसंबर) से दिन बड़े होने प्रारम्भ हो जाते थे| सूर्योपासक होने के नाते कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने यह तय किया कि 25 दिसंबर को ही जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन मनाया जाये क्योंकि 25 दिसंबर से बड़े दिन होने प्रारम्भ हो जाते हैं| तभी से 25 दिसंबर को क्रिसमिस मनाई जाती है|
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25 दिसंबर के बारे में दूसरी मान्यता यह है कि उस दिन रोम के मूर्तिपूजक श्रद्धालु लोग 'शनि' (Saturn) नाम के देवता की आराधना करते थे| शनि को कृषि का देवता माना जाता था| उसी दिन फारस के लोग "मित्र" (Mithra) नाम के देवता की आराधना करते थे जिसे प्रकाश का देवता माना जाता था| अतः तत्कालीन पादरियों ने यह तय किया इसी दिन को यदि जीसस का जन्मदिन भी मनाया जाये तो रोमन और फारसी लोग इसे तुरंत स्वीकार कर लेंगे| इस आधार पर ईसाईयत को रोम का आधिकारिक मत और 25 दिसम्बर को आधिकारिक रूप से जीसस क्राइस्ट का जन्म दिन मनाया जाने लगा|
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संयुक्त राज्य अमेरिका में सन 1870 ई.तक क्रिसमिस को एक ब्रिटिश परंपरा मान कर नहीं मनाया जाता था| सन 1870 ई.से इसे आधिकारिक रूप से मनाया जाने लगा| 24 दिसंबर की पूरी रात श्रद्धालु लोग जागकर क्रिसमस के भजन गाते हैं जिन्हें Christmas carols कहते हैं| स्पेन और पुर्तगाल की परंपरा में इसे नाच गा कर मनाते हैं| भारत में पुर्तगालियों का प्रभाव रोमन कैथॉलिकों पर अधिक है विशेषकर गोआ और मुंबई में| इसलिए इस त्योहार को शराब पी कर और नाच गा कर मनाया जाता है| 25 दिसंबर को क्रिसमस की पार्टी में टर्की नाम के एक पक्षी का मांस और शराब परोसी जाती है| इस दिन एक-दूसरे को खूब उपहार भी दिये जाते हैं| सैंटा क्लोज वाली कहानी तो कपोल कल्पित और बच्चों को बहलाने वाली है| यह स्कैंडेनेवियन देशों जहाँ बर्फ खूब पड़ती है से आरंभ हुई परंपरा है|
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मेरी मान्यता :--- मेरी मान्यता है कि भगवान के भजन का कोई न कोई तो बहाना चाहिए ही| मैं विशुद्ध शाकाहारी हूँ और कोई नशा नहीं करता इसलिए कोई नशा या मांसाहार का तो प्रश्न ही नहीं है| इस दिन यथासंभव भगवान का खूब ध्यान और भजन करेंगे| मैं मानता हूँ कि जीसस क्राइस्ट ने भारत में रहकर शिक्षा ग्रहण की और सनातन धर्म की शिक्षाओं का ही फिलिस्तीन में प्रचार किया जहाँ आध्यात्मिक रूप से अज्ञान रूपी अंधकार ही अंधकार था| उन की शिक्षायें समय के साथ विकृत हो गईं| क्रिश्चियनिटी वास्तव में कृष्णनीति है| जब उन्हें शूली पर चढ़ाया गया तब वे मरे नहीं थे| उन्हें बचा लिया गया और वे अपने कबीले के साथ भारत आ गये| कश्मीर के पहलगाँव में उन्होने देह-त्याग किया| उनकी माँ मरियम का देहांत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मरी नाम के स्थान पर हुआ था जहाँ उन की कब्र भी है और उन के नाम पर ही उस स्थान का नाम 'मरी' है| 'दा विंसी कोड' के अनुसार उन की पत्नी मार्था और पुत्री सारा को यहूदी लोग सुरक्षित रूप से फ्रांस ले गये थे, जहाँ उन की मजार की एक संप्रदाय विशेष ने रक्षा की जिन्हें बाद में एक दूसरे संप्रदाय ने मरवा दिया|
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सार की बात यह है कि उन्होने भगवान श्रीकृष्ण की ही शिक्षा का ही प्रसार किया| इस दिन मेरे अनेक मित्र 12 घंटे भगवान का ध्यान करेंगे| अतः मैं भी पूरा प्रयास करूंगा उनका साथ देने में| आप सब मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें|
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात्, पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात्, कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि ||"
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"कस्तुरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकणम् |
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि |
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ||"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ दिसंबर २०१९

देश प्रथम, देश है तो सब कुछ है, देश नहीं तो कुछ भी नहीं ....

देश प्रथम| देश है तो सब कुछ है, देश नहीं तो कुछ भी नहीं| हम अपनी अस्मिता की रक्षा करें| भारत विजयी होगा| धर्म की पुनर्स्थापना होगी| असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा| हम जहाँ भी हैं, अपना सर्वश्रेष्ठ करें| राष्ट्र के प्रति अपना दायित्व न भूलें| भारत माता की जय|
जब तक इस शरीर को धारण कर रखा है तब तक मैं सर्वप्रथम भारतवर्ष का एक विचारशील नागरिक हूँ| भारतवर्ष में ही नहीं पूरे विश्व में होने वाली हर घटना का मुझ पर ही नहीं सब पर प्रभाव पड़ता है| आध्यात्म के नाम पर भौतिक जगत से मैं तटस्थ नहीं रह सकता| यदि भारत, भारत ही नहीं रहेगा तब धर्म भी नहीं रहेगा, श्रुतियाँ-स्मृतियाँ भी नहीं रहेंगी, यानि वेद आदि ग्रन्थ भी नष्ट हो जायेंगे, साधू-संत भी नहीं रहेंगे, सदाचार भी नहीं रहेगा और देश की अस्मिता ही नष्ट हो जायेगी| इसी तरह यदि धर्म ही नहीं रहा तो भारत भी नहीं रहेगा| दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं| अतः राष्ट्रहित हमारा सर्वोपरि दायित्व है| धर्म के बिना राष्ट्र नहीं है, और राष्ट्र के बिना धर्म नहीं है| भारतवर्ष की अस्मिता सनातन धर्म है, वही इसकी रक्षा कर सकता है| भारतवर्ष की रक्षा न तो मार्क्सवाद कर सकता है, न समाजवाद, न धर्मनिर्पेक्षतावाद न सर्वधर्मसमभाववाद और न अल्पसंख्यकवाद| यदि सनातन धर्म ही नष्ट हो गया तो भारतवर्ष भी नष्ट हो जाएगा| भारत के बिना सनातन धर्म भी नहीं है, और सनातन धर्म के बिना भारत भी नहीं है| विश्व का भविष्य भारतवर्ष से है, और भारत का भविष्य सनातन धर्म से है| यदि सनातन धर्म ही नष्ट हो गया तो यह संसार भी आपस में मार-काट मचा कर नष्ट हो जायेगा|
कृपा शंकर
२१ दिसंबर २०१९

जीसस क्राइस्ट .... एक चेतना है .....

जहाँ आसुरी शक्तियाँ अपना तांडव कर रही है, वहीं समय के साथ बदली हुई परिस्थितियों में अब एक समय ऐसा भी आ गया है कि धीरे धीरे मनुष्य की चेतना ऊर्ध्वमुखी हो रही है| धीरे धीरे पूरे विश्व में जागरूक क्रिश्चियन मतावलंबी यानि जीसस क्राइस्ट के अनुयायी स्वेच्छा से सनातन धर्म का अनुसरण आरंभ कर देंगे| पश्चिमी जगत में करोड़ों लोग नित्य नियमित ध्यान साधना और प्राणायाम करने लगे हैं| लाखों लोग नित्य नियमित रूप से गीता का स्वाध्याय करते हैं| "कूटस्थ चैतन्य" या "श्रीकृष्ण चैतन्य" शब्द को "Christ Consciousness" के रूप में कहना बहुत लोकप्रिय हो रहा है| वास्तव में Christ किसी का नाम नहीं है, Christ का अर्थ है ...."अभिषेक", जिसका अभिषेक हुआ हो (anointed one)|
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जीसस क्राइस्ट को मैं एक व्यक्ति नहीं, एक चेतना मानता हूँ जो वास्तव में
"श्रीकृष्ण चैतन्य" यानि "कूटस्थ चैतन्य" ही थी| उस चेतना की अनुभूति गहन ध्यान में होती है| वर्तमान ईसाई मत तो एक चर्चवाद है, जिस का क्राइस्ट से कोई लेनदेन नहीं है| अजपा-जप, आज्ञाचक्र और उस से ऊपर अनंत में असीम ज्योतिर्मय ब्रह्म के ध्यान, नादानुसंधान,और जपयोग से जिस चेतना का प्रादुर्भाव होता है वह "कूटस्थ चैतन्य" यानि "Christ Consciousness" है| यह चेतना ही भविष्य में मानवता को जोड़ेगी और विश्व को एक करेगी| संसार का बीज "कूटस्थ" है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ दिसंबर २०१९

यह वसुंधरा न तो किसी की हुई है और न किसी की होगी .....

यह वसुंधरा न तो किसी की हुई है और न किसी की होगी .....
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यह सृष्टि, यह संसार, यह वसुंधरा न तो किसी की हुई है और न कभी किसी की होगी| पता नहीं कितने ही बड़े-बड़े भूमिचोरों, आतताइयों, तस्करों और अन्यायी शासकों ने अपने आतंक, अत्याचार और कुटिलता से; व कितने ही चक्रवर्ती सम्राटों ने अपनी वीरता से इस वसुंधरा पर अपने अधिकार का प्रयास किया है| वसुंधरा तो वहीं है, पर वे अब कहाँ हैं? सब काल के गाल में समा गए| काल यानि मृत्यु पर विजय तो सिर्फ मृत्युंजयी परमशिव ही दिला सकते हैं जिन का कभी जन्म ही नहीं हुआ| ध्यान हम उन्हीं का करें जिन का कभी जन्म ही नहीं हुआ हो|
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शाश्वत प्रश्न तो यह है कि हम कौन हैं, और कौन हमारा है? इन प्रश्नों पर अपनी पूरी चेतना से मैंने बहुत अधिक विचार किया है| जो दिखाई दे रहा है, वह ही सत्य नहीं है, हमारी दृष्टि-सीमा से परे भी अज्ञात बहुत कुछ है| पता नहीं कितने ही अंधकारमय, कितने ही ज्योतिर्मय और कितने ही हिरण्य लोक हैं| यह वसुंधरा तो इस भौतिक जगत में ही अति अकिंचन महत्वहीन है| इस भौतिक जगत से परे भी बहुत अधिक विशाल एक सूक्ष्म जगत है, उस से भी परे कारण जगत है और उस से भी परे हिरण्यलोक हैं| यह सृष्टि अनंत है| वर्षों पहिले की बात है| एक बार बैठे हुए मैं ध्यान कर रहा था कि अचानक ही चेतना इस शरीर से निकल कर एक अंधकारमय लोक में चली गई जहाँ सिर्फ अंधकार ही अंधकार था, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था| एक अंधेरी सुरंग की तरह का खड़ा हुआ बहुत विशाल लोक था| ऐसा लग रहा था कि यहाँ और भी बहुत अधिक लोग हैं जो अत्यधिक कष्ट में हैं| कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था| अचानक ही किसी ने बहुत ही कड़क आवाज़ में कहा कि "तुम यहाँ कैसे आ गए? निकलो यहाँ से बाहर", फिर उस ने धक्का मार कर वहाँ से बलात् बाहर फेंक दिया| उसी क्षण बापस इस शरीर में आ गया| भगवान से प्रार्थना की कि ऐसा कोई अनुभव दुबारा न हो| फिर दुबारा कोई वैसा अनुभव नहीं हुआ और कभी होगा भी नहीं| ध्यान में जब चेतना एक अतिन्द्रीय अवस्था में थी तब दो-तीन बार सूक्ष्म जगत के कुछ महात्माओं ने अपना आशीर्वाद अवश्य दिया है| उन्हीं के आशीर्वाद से शक्तिपात की अनुभूति हुई और हृदय में भक्ति जागृत हुई| यह एक गोपनीय विषय है जिस पर एक अज्ञात प्रेरणावश चर्चा कर बैठा| अब और नहीं करूँगा| कोई मुझ से इस विषय पर चर्चा भी न करे| मैं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करूंगा|
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इस सृष्टि के पीछे एकमात्र सत्य सृष्टिकर्ता परमात्मा ही हमारे हो सकते हैं, अन्य कोई या कुछ भी नहीं| किसी की अपेक्षाओं की पूर्ति हम नहीं कर सकते, और न कोई हमारी अपेक्षाओं पर ही खरा उतर सकता है| परमात्मा की अनंतता ही हमारा अस्तित्व है और स्वयं परमात्मा ही हमारे हैं| अन्य कोई नहीं| उन परमात्मा को हम परमशिव, ब्रह्म, पारब्रह्म, नारायण, वासुदेव, विष्णु, भगवान, आदि आदि किसी भी नाम से संबोधित करें, कोई फर्क नहीं पड़ता| एकमात्र सत्य वे ही हैं, बाकी सब मिथ्या है|
ॐ तत्सत् | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
१९ दिसंबर २०१९

परमात्मा की उपस्थिती का आभास ही आनंद है .....

परमात्मा की उपस्थिती का आभास ही आनंद है .....
जिस आनंद को हम अपने से बाहर खोज रहे हैं, वह आनंद तो हम स्वयं हैं| संसार में हम विषयभोगों में, अभिमान में, और इच्छाओं की पूर्ति में,सुख की खोज करते हैं, पर उस से तृप्ति और संतोष नहीं मिलता| संसार में सुख की खोज अनजाने में आनंद की ही खोज है|
भगवान की अनन्य भक्ति और समर्पण से ही हमें आनंद प्राप्त हो सकता है| अन्य कोई स्त्रोत नहीं है| सार की बात है कि आनंद कुछ पाना नहीं, बल्कि स्वयं का होना है| हम आनंद को कहीं से पा नहीं सकते, स्वयं आनंदमय हो सकते हैं| हमारा वास्तविक अस्तित्व ही आनंद है|
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः| ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
१७ दिसंबर २०१९