Wednesday, 28 July 2021

सज्जनों की रक्षा के लिए दुष्टों का नाश --- राजा का राजधर्म है ---

देश के शासक को समझौतावादी दृष्टिकोण छोड़ना ही होगा। देश के बहुसंख्यकों की हत्या पर मौन होकर देखते रहना केंद्र शासन का पाप है। मोदी सरकार दण्डनीति का प्रयोग करे। पता नहीं केंद्र सरकार भयभीत क्यों है।

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वेदान्त दर्शन -- साधु-सन्यासियों, विरक्तों व आध्यात्मिक-साधकों के लिए है, न कि देश के शासक के लिए। राजा जनक का युग दूसरा था। यदि देश का शासक, -- आततायियों व अधर्मियों में भी परमात्मा को देखना, उनके साथ प्यार-मोहब्बत करना, व उनके साथ और विश्वास को जीतने का प्रयास करते हैं, तो यह अधर्म की वृद्धि करने वाला आत्म-घातक कार्य है। ऐसे शासक को राजनीति छोड़कर सन्यासी बन जाना चाहिए। अधर्मियों व आततायियों से प्यार, धर्मद्रोह है जो धर्म से च्युत कर के धर्म का नाश करने वाला है।
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सनातन धर्म में शासक के लिए राजनीति क्या व कैसी हो, इसे विभिन्न ग्रन्थों में स्पष्ट बताया गया है। आततायियों व अधर्मियों को यथोचित दंड देना राज्य का कर्तव्य व दायीत्व है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण हमारे आदर्श हैं। महाभारत के युद्ध में अर्जुन तो सब कुछ छोड़कर सन्यासी बन जाना चाहता था, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसे उसके धर्म-मार्ग यानि दुष्टों के संहार हेतु युद्ध में प्रवृत्त किया। जो शासक अधर्मियों का भी साथ और विश्वास जीतने का कार्य करेगा, वह कभी भी सत्यनिष्ठों व धर्मनिष्ठों का साथ व विश्वास जीतने की चिंता नहीं करेगा।
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अतः सज्जनों की रक्षा के लिए दुष्टों का नाश --- राजा का राजधर्म है, जिससे च्युत उसे नहीं होना चाहिए। ॐ स्वस्ति !!
१२ जून २०२१

Tuesday, 27 July 2021

ब्रह्मविद्या के आचार्य और अधिकारी कौन है? ... (संशोधित व पुनर्प्रस्तुत लेख)

 

ब्रह्मविद्या के आचार्य और अधिकारी कौन है? ... (संशोधित व पुनर्प्रस्तुत लेख)
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इस सृष्टि में परमात्मा की उपासना से बड़ी और कोई चीज नहीं है, अतः हमारा सब से बड़ा दायित्व बनता है कि हम सर्वप्रथम परमात्मा की ही भक्ति और उपासना करें|
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यह प्रस्तुत प्रकरण बहुत अधिक सुन्दर एवं मननीय है, जिस पर बड़े-बड़े अनेक मनीषियों ने लिखकर अपने जीवन तथा लेखनी को धन्य किया है| मैं भी धन्य हूँ, पता नहीं किस जन्म के पुण्यों का फल है, जो ये पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ|
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ब्रह्मा जी ने आरंभ में सृष्टि का नौ बार निर्माण किया परंतु उन्हें संतुष्टि नहीं मिली| फिर नारायण का ध्यान कर के दसवीं सृष्टि सनकादि मुनियों कि की जो विष्णु के अवतार साक्षात भगवान ही थे| ये सनक, सनन्दन, सनातन, व सनत्कुमार नाम के चार ऋषि थे जिनकी आयु सदा पाँच वर्ष की रहती है| वे अमर हैं और सदा ब्रह्मलोक में निवास करते हैं|
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इन में से भगवान सनत्कुमार ने हर युग में समय-समय पर इस पृथ्वी पर अवतरित होकर सुपात्रों को ब्रह्मविद्या का ज्ञान दिया है| वे ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य और साक्षात मूर्तिमान ब्रह्मविद्या हैं| उन्हीं की कृपा से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र नारद जी देवर्षि बने| ब्रह्मविद्या का ज्ञान सर्वप्रथम भगवान सनत्कुमार ने नारद जी को दिया था|
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जो धर्म का दान करते हैं और भगवद् महिमा का प्रचार कर नरत्व और देवत्व को उभारते हैं वे ही नारद हैं| परमात्मा प्रसन्न होकर जीवों को सद्गति प्रदान करते हैं, इसलिए उनका नाम 'नर' है| नरपदवाच्य परमात्मा से सम्बद्ध दिव्य ज्ञान को 'नार' कहते हैं| भगवान् के विषय के दिव्य ज्ञान 'नार' को जो प्रदान करें, वे देवर्षि नारद हैं|
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त्रेता युग में भगवान् श्रीराम ने अपना पीताम्बर उतार कर भगवान् सनत्कुमार को उस पर बैठाया था और कहा कि माया आपके ऊपर सवार नहीं हो सकती, आप माया के ऊपर सवार हों| भगवान का पीताम्बर माया का स्वरुप है|
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द्वापर युग में भगवान सनत्कुमार ने विदुर जी को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया था| विदुर जी की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान सनत्कुमार ने प्रकट होकर धृतराष्ट्र को भी ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया| महाभारत युद्ध से पूर्व धृतराष्ट्र ने विदुर जी से प्रार्थना की कि युद्ध में अनेक सगे-सम्बन्धी मारे जायेंगे और भयंकर प्राणहानि होगी, तो उस शोक को मैं कैसे सहन कर पाऊंगा? विदुर जी बोले की मृत्यु नाम की कोई चीज ही नहीं होती| मृत्युशोक तो केवल मोह का फलमात्र होता है| धृतराष्ट्र की अकुलाहट सुनकर विदुर ने उन्हें समझाया कि इस अनोखे गुप्त तत्व को मैं भगवन सनत्कुमार की कृपा से ही समझ सका था पर ब्राह्मण देहधारी ना होने के कारण मैं स्वयं उस तत्व को अपने मुंह से व्यक्त नहीं कर सकता| मैं अपने ज्ञानगुरु मूर्त ब्रह्मविद्यास्वरुप भगवान सनत्कुमार का आवाहन ध्यान द्वारा करता हूँ| भगवान सनत्कुमार जैसे ही प्रकट हुए धृतराष्ट्र उनके चरणों में लोट गए और रोते हुए अपनी प्रार्थना सुनाई| तब भगवन सनत्कुमार ने धृतराष्ट्र को ब्रह्मविद्या के जो उपदेश दिए वह उपदेशमाला --- "सनत्सुजातीयअध्यात्म् शास्त्रम्" कही जाती है|
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भगवान सनत्कुमार का ही दूसरा नाम सनत्सुजात है| एक कथा है कि पार्वती जी ने सनत्कुमार के समान ही पुत्र की कामना की थी अतः सनत्कुमार के अवतार स्कन्द यानि कार्तिकेय हुए|
(यह विषय बहुत लंबा है और इसकी चर्चा को कोई अंत नहीं है अतः इसको यहीं विराम देता हूँ)
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ब्रह्मविद्या के आचार्य भगवान श्री सनत्कुमार को कोटि-कोटि दंडवत् प्रणाम !!
ॐ नमो भगवते सनत्कुमाराय !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२०

बंद आँखों के अंधकार के पीछे क्या है? ---

बंद आँखों के अंधकार के पीछे क्या है?

बंद आँखों के अंधकार के पीछे भ्रूमध्य से परे अनंत में एक आलोकमय जगत है| एक विराट आकाश है, जिसमें एक सूर्यमंडल है| उस सूर्यमंडल में परम-पुरुष का ध्यान करें| ये परम-पुरुष ही गायत्री मंत्र के सविता देव हैं जिनकी भर्ग: ज्योति का हम ध्यान करते हैं| ये ही ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं| इनका ध्यान करते-करते जब नाद-श्रवण होने लगे तब उस में अपने चित्त को विलीन कर दें| अपनी चेतना को पूरी सृष्टि में और उससे भी परे विस्तृत कर दें| परमात्मा की अनंतता ही हमारी वास्तविक देह है|
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रात्री को सोने से पूर्व भगवान का गहनतम ध्यान कर के ही सोयें, वह भी इस तरह जैसे जगन्माता की गोद में निश्चिन्त होकर सो रहे हैं| प्रातः उठते ही एक गहरा प्राणायाम कर के कुछ समय के लिए भगवान का ध्यान करें| दिवस का प्रारम्भ सदा भगवान के ध्यान से होना चाहिए| दिन में जब भी समय मिले भगवान का फिर ध्यान करें| उनकी स्मृति निरंतर बनी रहे| यह शरीर चाहे टूट कर नष्ट हो जाए, पर परमात्मा की स्मृति कभी न छूटे|
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ॐ तत्सत ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२०

 

 

 

Monday, 26 July 2021

क्रियायोग और भक्ति ---

क्रियायोग और भक्ति --- अब ये जीवन के अविभाज्य अंग बन गए हैं। इनके लिए अब अलग से प्रयास की आवश्यकता नहीं रही है। जब तक सुषुम्ना की ब्रह्मनाड़ी में प्राण प्रवाहित हो रहे हैं, क्रियायोग की साधना मेरे माध्यम से होती रहेगी। जब तक ये साँसें चल रही है, तब तक भगवान की भक्ति भी स्वतः ही होती रहेगी। इस का पुण्य-फल भगवान को समर्पित है। मैं -- भगवान का एक उपकरण और एक निमित्त मात्र हूँ, उस से अधिक कुछ भी नहीं।

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सुषुम्ना नाड़ी -- तीन नाड़ियों का समन्वय है। सुषुम्ना के भीतर वज्रा नाड़ी है। उस वज्रा नाड़ी के भीतर चित्रा नाड़ी है, चित्रा के बीच में शुद्ध ज्ञानरूपी ब्रह्मनाड़ी है जो मूलाधार स्थित स्वयंभू शिव-लिंग के मुख से निकल कर सहस्त्रार दल पर्यन्त चली गयी है। तंत्रागमों के अनुसार सुषुम्ना नाड़ी में सात पद्म अधोमुखी होकर गुंथे हुए हैं। इन पद्मो को जागृत कर के उर्ध्वमुखी करने के लिए सुषुम्ना में प्राणोत्थान की आवश्यकता है, जो कि अंतर्मुखी विशिष्ट प्राणक्रिया (क्रियायोग) के द्वारा संभव है।
यह एक गुरुमुखी विद्या है जो गुरु द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शिष्य को पात्रतानुसार दी जाती है। इस विषय का ज्ञान गुरुकृपा से ही होता है। इस का और अधिक वर्णन करना मेरे लिए संभव नहीं है। भगवान ने इसे समझने की शक्ति तो दी है, लेकिन इतनी शक्ति नहीं दी है कि किसी अन्य को समझा सकूँ। इसलिए इस विषय पर कोई प्रश्न मुझ से न करें। योगिराज श्रीश्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय और परमहंस योगानन्द ने इस विषय को अपने साहित्य में बहुत अच्छी तरह से समझाया है।
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"ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२१

Sunday, 25 July 2021

मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ---


निम्न पंक्तियाँ मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूँ| यह आवश्यक नहीं है कि ये सत्य ही हों| मेरा आंकलन भी गलत हो सकता है|
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सनातन हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष) को मानव जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य बताया गया है| माता-पिता, आचार्यों और शास्त्रों के उपदेशानुसार आचरण भी पुरुषार्थ है|
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लेकिन इस जीवन का मेरा अनुभव यह कहता है कि जीवन में हमारे साथ वही होता है जो हमारी नियति में है| हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता| हमारी महत्वाकांक्षायें कभी पूरी नहीं होतीं| होता वही है जैसी परिस्थितियाँ हमारे चारों ओर होती हैं, और जैसी हमारी समझ और मस्तिष्क यानि दिमाग की क्षमता होती है| जितनी अधिक आकांक्षाएँ हमारे में होती हैं, उतनी ही अधिक हमारे जीवन में कुंठायें होती हैं| पुरुषार्थ भी तभी होता है जब वह हमारे भाग्य यानि नियति में लिखा हो, अन्यथा नहीं|
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हमारे पास एक ही स्वतंत्र चयन (free choice) है कि हम परमात्मा को प्रेम करें या नहीं| अन्य सब तरह के पुरुषार्थ की बात एक आदर्श लुभावनी मीठी-मीठी अव्यवहारिक कल्पना मात्र ही है| हम अपने कर्मफलों को भोगने के लिए ही आते हैं| बहुत ही कम विकल्प/अवसर, और उनका उपयोग करने की क्षमता हमें जीवन में मिलती हैं| होता वही है जैसी सृष्टिकर्ता की इच्छा होती है|
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! आप के विचार आमंत्रित हैं|
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२०

"राम" नाम परम सत्य है, और सत्य ही परमात्मा है ---


साकार रूप में तो भगवान श्रीराम परमात्मा के अवतार हैं ही, निराकार रूप में भी परमब्रह्म हैं| "राम" नाम तारकमंत्र है| मृत्युकाल में "राम" नाम जिनके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं| अजपा-जप और नाद-श्रवण करते करते अनंत परमात्मा व आत्म-तत्व की अनुभूति होती है| उस आत्म-तत्व में रमण करते-करते चेतना राममय हो जाती है| आत्मतत्व में रमण करने का नाम "राम" है|
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तंत्र की भाषा में साधना के पंच मकार और राम नाम .....
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(१) मद्य :-- परमात्मा के निरंतर चिंतन से मद्य यानि शराब का सा नशा होता है| परमात्मा का निरंतर चिंतन ही मद्यपान है|
(२) मांस :-- पुण्य और पाप रूपी पशुओ की ज्ञान रूपी खड़ग से हत्या कर उनका भक्षण करने से मौन में स्थिति होती है| मौन में स्थिति ही मांस है|
(३) मीन :-- ध्यान के द्वारा इड़ा (गंगा) और पिंगला (यमुना ) के मध्य सुषुम्ना (सरस्वती) में विचरण करने वाली प्राण-ऊर्जा मीन है|
(४) मुद्रा :-- दुष्टों की संगती रूपी बंधन से बचे रहना ही मुद्रा है|
(५) मैथुन :-- मूलाधार से कुंडलिनी महाशक्ति को उठाकर सहस्त्रार से भी परे परमशिव से मिलाना मैथुन है|
महाशक्ति कुंडलिनी और परमशिव के मिलन के बाद की स्थिति आत्माराम और राममय होना है|
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२०

Saturday, 24 July 2021

ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग क्या है? ---

 

ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग क्या है?
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जिसके अन्दर सबका विलय होता है उसे लिंग कहते हैं| स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में और कारण जगत का सभी आयामों से परे .... तुरीय चेतना में विलय हो जाता है| उस तुरीय चेतना का प्रतीक हैं .... शिवलिंग, जो साधक के कूटस्थ में निरंतर जागृत रहता है| उस पर ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है| ध्यान में आत्मतत्व की अनुभूति ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप एक बृहत लिंगाकार में होती है, जिस में सारी सृष्टि समाहित है|
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ध्यान उन परमशिव का ही हो, जिनकी अनुभूति गुरुकृपा से कूटस्थ में ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग के रूप में होती है| उन की गहन अनुभूति के पश्चात सारे संचित कर्मफल, विक्षेप और आवरण, उन्हीं में विलीन होने लगते हैं| फिर उन्हीं की उपासना हो और चेतना वहीं पर रहे, अन्यत्र कहीं भी नहीं, अन्यथा भटकाव की पीड़ा और कष्ट बड़ा भयंकर है, जिसे मैं अनेक बार भुगत चुका हूँ| अब और नहीं भटकना चाहता|
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कुछ अति गूढ़ मूल-तत्व की बातें परमात्मा की विशेष कृपा से ही समझ में आ सकती हैं, जिन्हें अन्य कोई नहीं, स्वयं परमात्मा ही समझा सकते हैं| उन के मार्ग-दर्शन के पश्चात इधर-उधर अन्यत्र कहीं भी नहीं देखना चाहिए| भगवान परमशिव, जीवात्मा को संसारजाल, कर्मजाल और मायाजाल से मुक्त कर, स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह के तीन पुरों को ध्वंश कर महाचैतन्य में प्रतिष्ठित कराते है, अतः वे त्रिपुरारी हैं| वे ही मेरे परम आराध्य हैं|
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सर्वश्रेष्ठ सत्संग ... परमात्मा का संग है| साधक को नाप-तोल कर कम से कम और सिर्फ आवश्यक, त्रुटिहीन व स्पष्ट शब्दों का ही प्रयोग पूरे आत्मविश्वास से करना चाहिए| आत्मनिंदा, आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचें| किसी की अनावश्यक प्रशंसा भी हमारी हानि करती है| दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा और निंदा की ओर ध्यान न दें| किसी की भी बातों से व्यक्तिगत रूप से आहत न हों, और आल्हादित भी न हों|
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परमात्मा की चेतना में रहते हुए बात करें| कुछ भी बोलते समय हमारी आतंरिक चेतना कूटस्थ में हो| अपनी बात को पूरे आत्मविश्वास से प्रस्तुत करें| बोलते समय यह भाव रखें कि स्वयं भगवान हमारी वाणी से बोल रहे हैं|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२०