Friday, 29 December 2017

गण, गणपति, पंचप्राण, दश महाविद्याएँ और कुण्डलिनी महाशक्ति .......

गण, गणपति, पंचप्राण, दश महाविद्याएँ और कुण्डलिनी महाशक्ति .......
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"ॐ नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमः" | वे कौन से गण हैं जिनके गणपति श्री गणेश जी हैं ? मेरी दृष्टि में इस का उत्तर है ..... पंच प्राण ही वे गण हैं जिनके अधिपति ॐकार रूप में श्री गणेश जी हैं | वे ही प्रथम पूज्य हैं |
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मेरी अनुभूति से ॐकार ही सर्वव्यापी प्राण तत्व है, यह ॐकार ही प्राण तत्व के रूप में परमात्मा की सर्वप्रथम अभिव्यक्ति है, और साकार रूप में संसारी लोगों के लिए ये ही श्रीगणेश जी हैं |
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जहाँ तक मैं समझता हूँ, ॐकार पर ध्यान ही प्राण तत्व की साधना है क्योंकि ॐकार ही समस्त सृष्टि का प्राण है | यह प्राण तत्व ही कुण्डलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधार चक्र में व्यक्त होता है और यह कुण्डलिनी ही सुषुम्ना मार्ग से सभी चक्रों को भेदती हुई सहस्त्रार में प्रवेश कर अज्ञान का नाश करती है | प्राण का घनीभूत रूप ही कुण्डलिनी महाशक्ति है |
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सहस्त्रार ही श्रीगुरुचरण हैं, सहस्त्रार पर ध्यान ही श्रीगुरुचरणों का ध्यान है और सहस्त्रार में स्थिति ही श्रीगुरुचरणों में आश्रय है | सहस्त्रार से परे जो परब्रह्म यानि परमशिव हैं वे अनुभूतिगम्य और अनिर्वचनीय हैं |
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इन पंच प्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप ही दश महाविद्याएँ हैं |
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सार की बात यह है कि ॐकार से बड़ा कोई मन्त्र नहीं है, और आत्मानुसंधान से बड़ा कोई तंत्र नहीं है | ॐकार पर ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ साकार उपासना है |
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२१ दिसंबर २०१७

अपनी चेतना का सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तार करें .....

धारणा व ध्यान :---
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अपनी चेतना का सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तार करें .....

यह सम्पूर्ण अनन्त ब्रह्माण्ड मेरा घर है, सभी प्राणी मेरे साथ एक हैं, उनका कल्याण ही मेरा कल्याण है| पूरी समष्टि के साथ मैं एक हूँ, मैं किसी से पृथक नहीं हूँ, सभी मेरे ही भाग हैं, मैं यह देह नहीं, परमात्मा की अनंतता हूँ|
सम्पूर्ण समष्टि मैं स्वयं हूँ| यह सम्पूर्ण सृष्टि, सारा जड़ और चेतन मैं ही हूँ| यह पूरा अंतरिक्ष, पूरा आकाश मैं ही हूँ| सब जातियाँ, सारे वर्ण, सारे मत-मतान्तर, सारे सम्प्रदाय और सारे विचार व सिद्धांत मेरे ही हैं|

मैं अपना प्रेम सबके ह्रदय में जागृत कर रहा हूँ| मेरा अनंत प्रेम सबके ह्रदय में जागृत हो रहा है| मैं अनंत प्रेम हूँ| मैं इस सृष्टि की की आत्मा हूँ जो प्रत्येक अणु के ह्रदय में है|

मैं स्वयं ही परम प्रेम हूँ, मैं ही परमात्मा की सर्वव्यापकता हूँ, मैं ही सभी के हृदयों में धडकता हूँ| मैं परमात्मा के साथ एक हूँ, उनमें और मुझ में कोई भेद नहीं है|

सोsहं ! शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ! ॐ ॐ ॐ !!
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कृपया याद रखें ........ जन्म से कोई पापी नहीं है| आप पापी नहीं हैं| आप परमात्मा के दिव्य अमृत पुत्र हैं| जो परमात्मा का है वह आपका है, उस पर आपका जन्मसिद्ध अधिकार है| किसी पिता का पुत्र भटक जाए तो पिता क्या प्रसन्न रह सकता है| भगवान भी आप के दूर जाने से व्यथित हैं| भगवान के पास सब कुछ है पर आपका प्रेम नहीं है जिसके लिए वे भी तरसते हैं| क्या आप अपना अहैतुकी प्रेम उन्हें बापस नहीं दे सकते? उन्होंने भी तो आप को हर चीज बिना किसी शर्त के दी है| आप अपना सम्पूर्ण प्रेम उन्हें बिना किसी शर्त के दें|
आप भिखारी नहीं हैं| आपके पास कोई भिखारी आये तो आप उसे भिखारी का ही भाग देंगे| पर अपने पुत्र को आप सब कुछ दे देंगे| वैसे ही परमात्मा के पास आप भिखारी के रूप में गए तो आपको भिखारी का ही भाग मिलेगा पर उसके दिव्य पुत्र के रूप में जाएंगे तो भगवान अपने आप को आप को दे देंगे|
मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही परमात्मा की प्राप्ति है| आप स्वयं को उन्हें सौंप दें, आप उनके हो जाएँ पूर्ण रूप से तो भगवन भी आपके हो जायेंगे पूर्ण रूप से| अपने ह्रदय का सम्पूर्ण प्रेम बिना किसी शर्त के उन्हें दो| ईश्वर को पाना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है|

ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
२० दिसंबर २०१७

आजकल सड़कों पर चलते हुए डर लगता है....

आजकल सड़कों पर चलते हुए डर लगता है....
(१) आवारा सांडों से ,
(२) तीब्र गति से चलते हुए दुपहिया वाहनों से.
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(१) गोसंवर्धन कानून सिर्फ देशी नस्ल की गायों के लिए ही होना चाहिए, विलायती नस्ल की गायों व सांडों के लिए नहीं| विलायती यानि विदेशी नस्ल (जो सूअर के जीन के साथ मिलाकर विकसित की गयी हैं) की गायों के बछड़े किसी काम के नहीं होते| गाँवों में वे खेती को हानि पहुँचाते हैं अतः किसान लोग पिकअप में भरकर या हाँक कर उन्हें नगरीय क्षेत्रों में छोड़ देते हैं| राजस्थान के हर नगर की सड़कें आवारा विलायती नस्ल के सांडों से भरी हुई है जिनसे दुर्घटनाएँ भी होती रहती हैं| पता ही नहीं चलता कि कब आकर वे टक्कर मार दें या वाहनों को तोड़ दें| अतः सडकों पर बहुत संभल कर चलना पड़ता है| वाहन भी बहुत संभल कर चलाना पड़ता है| सब्जी बेचने वाले बहुत अधिक त्रस्त रहते हैं| वे उन्हें लाठियों से मार मार कर भगाते रहते हैं| ये आवारा सांड गन्दगी में मुंह मारते घूमते रहते हैं और लोगों से मार खाते रहते हैं| ये किसी काम के नहीं होते अतः कोई गोशाला भी इन्हें नहीं रखती| इनके लिए विशेष बाड़े बनाने चाहियें या इनके लिए अभयारण्य हों जैसे बाघों के लिए हैं|
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(२) आजकल सडकें दुपहिया वाहनों से भरी हुई हैं| युवा लड़के और लड़कियाँ बहुत तीब्र गति से वाहन चलाते हैं| इनको अपने प्राणों की भी परवाह नहीं होती| लडकियाँ तो लड़कों से भी अधिक तीब्र गति से स्कूटी चलाती हैं| सड़कों पर इन्हें देखकर ही डर लगता है| बहुत अधिक संभल कर सड़क पार करनी पड़ती है| कुछ न कुछ सुव्यवस्था इनके लिए होनी ही चाहिए|


११ दिसंबर २०१७

अमेरिकी संस्कृति पूरे विश्व में क्यों छाई हुई है ? .....

अमेरिकी संस्कृति पूरे विश्व में क्यों छाई हुई है ? .....

अमेरिका एक व्यवसायिक देश है जो अपने आर्थिक और राजनीतिक हित के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है .... कहीं भी युद्ध करा सकता है, किसी की भी ह्त्या करा सकता है, और कहीं भी सत्ता परिवर्तन करा सकता है | वह न किसी का मित्र है और न किसी का शत्रु | जिस से उसका हित टकराता है उसका वह शत्रु है व जिस से उसको लाभ होता है वह उसका मित्र है|

मेरे दिमाग में चालीस वर्ष पूर्व एक प्रश्न था कि अमेरिकी संस्कृति पूरे विश्व पर हावी क्यों है ? इसका उत्तर भी मुझे अमेरिका जाकर ही मिला| सन १९७६ से सन १९८६ तक कई बार अमेरिका जाने का अवसर मिला|
अमेरिकी संस्कृति का एक सकारात्मक पक्ष भी है| वहाँ की सबसे बड़ी विशेषता है कि वहाँ मनुष्य की कार्यकुशलता पर ही पूरा जोर है और कार्यकुशलता का ही सम्मान है | जिस व्यक्ति में कार्यकुशलता नहीं होती उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है | जो व्यक्ति अपने कार्य में कुशल होता है उसको पूरा सम्मान मिलता है | अतः वे लोग अपने कार्य को पूरी कुशलता से करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अन्यथा बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा और उनकी कहीं भी कोई पूछ नहीं होगी | किसी तरह का कोई आरक्षण नहीं है |
यही वहाँ की संस्कृति का एक सकारात्मक पक्ष है जिसके कारण अमेरिका पूरे विश्व पर हावी है|
पता नहीं वह दिन भारत में कब आयेगा जब यहाँ व्यक्ति की कार्यकुशलता का सम्मान होगा|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१० दिसंबर २०१७

Sunday, 10 December 2017

भगवान की पकड़ ......

भगवान की पकड़ ......
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कई बार प्रेमवश स्वयं भगवान ही हमें पकड़ लेते हैं, और सही मार्ग पर ले आते हैं ..... इसे कहते हैं ... भगवान की परम कृपा ..... | कोई भी माँ-बाप नहीं चाहते कि उनकी संतान बिगड़े| जब संतान गलत मार्ग पर चल पड़ती है तब माँ-बाप अपने बालक/बालिका को पकड़ कर सही मार्ग पर ले आते हैं| भगवान भी हमारे माता-पिता हैं| वे कभी भी नहीं चाहेंगे कि हम गलत रास्ते पर चलें| वे भी हमें पकड़ कर सही मार्ग पर ले आते हैं| उनकी पकड़ का हमें आनंद लेना चाहिए|
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मैनें जीवन में अनेक बार हिमालय जैसी बड़ी बड़ी भयंकर भूलें की हैं, जिनकी कोई क्षमा नहीं हो सकती| नित्य कोई न कोई भूल होती ही रहती है| पर भगवान इतने दयालू हैं कि अपनी परम करुणा से कैसे भी मुझे सही मार्ग पर ले आते हैं और पीछे की सभी भूलों को क्षमा कर देते हैं| उनकी करुणा और प्रेम का सागर इतना विराट है कि मेरी हिमालय जैसी सी भूलें भी उन के प्रेमसिन्धु में छोटे मोटे कंकर पत्थर से अधिक नहीं है|
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कभी कभी जब मैं स्वयं साधना नहीं कर पाता तो स्वयं वे ही मेरे स्थान पर मेरे ही माध्यम से साधना करने लगते हैं| उनकी पकड़ में बड़ा आनन्द है| कितना प्रेम है उनके हृदय में मेरे लिए! मुझे भी उन से प्रेम हो गया है| अब जीवन में और कुछ भी नहीं चाहिए| जीवन से पूर्ण संतुष्टि है, कोई शिकायत नहीं है, और आनंद ही आनन्द है| शेष जीवन का उपयोग उनकी ध्यान साधना में ही हो|

ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ
कृपा शंकर
१० दिसम्बर २०१७

प्राण जाएँ पर मोबाइल न जाए .....

प्राण जाएँ पर मोबाइल न जाए .....
वर्तमान युवा व किशोर पीढ़ी को सर्वाधिक प्रिय यदि कोई चीज है तो वह है मोबाइल फोन| यह उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय है| दुपहिया और चारपहिया वाहनों को चलाते समय भी मोबाइल कानों से सटा ही रहता है| उनको न तो अपने स्वयं के प्राण की चिंता है और न दूसरों के प्राणों की| कोई कुछ कहता है तो स्पष्ट कहते हैं कि मोबाइल हमारे जीवन का अभिन्न भाग है, उसके बिना हम जी नहीं सकते|
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विद्यालयों के बालक/बालिकाएँ भी आजकल अपने माँ-बाप को अपनी सुरक्षा की दुहाई देकर मोबाइल खरीदवा ही लेते हैं| वे क्या सुनते हैं और क्या बात करते हैं यह तो सिर्फ वे और परमात्मा ही जानता है|
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किसी भी महाविद्यालय के बाहर का दृश्य देख लीजिये जो आजकल बहुत सामान्य है| कई लड़के सजधज कर मोटरसाइकिलों पर चक्कर लगाते ही रहते हैं, कानों में उनके मोबाइल सटा रहता है| लड़कियाँ भी सजधज कर अपने मुँह को कपड़े से ढककर और कानों में मोबाइल सटाकर आती हैं जिससे कोई उन्हें पहिचान नहीं सकता| अपने मोबाइल पर पता नहीं किस भाषा में क्या संकेत करती हैं, उनका मित्र लड़का अपनी मोटर साइकिल पर तुरंत उपस्थित हो जाता है| माँ-बाप सोचते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं, पर बच्चे क्या गुल खिला रहे हैं यह माँ-बाप की कल्पना के बाहर की बात है| तो यह सारी महिमा मोबाइल की है| आजकल व्हाट्सएप्प और अन्य कई एप्प इतने लोकप्रिय हैं युवा पीढी में कि उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते|
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हमारे समय में खाली समय में सिर्फ दो तीन बाते ही दिमाग में रहती थीं .... या तो किसी पुस्तकालय में जाकर पत्रिकाएँ और पुस्तकें पढ़ना, या किसी खेल के मैदान में जाकर फ़ुटबाल या वॉलीबॉल खेलना| इससे भी परे की कोई बात यदि दिमाग में रहती थी तो वह थी संघ की सायं शाखा में जाना| इससे आगे की कोई बात दिमाग में कभी आई ही नहीं| उस जमाने में न तो मोबाइल फोन थे, न टेलीविजन और न मोटर साइकिलें| किसी के पास बाइसिकल होती तो सब उसको भाग्यशाली मानते थे| बड़ी से बड़ी विलासिता की कोई चीज थी तो वह थी एक ट्रांजिस्टर रेडियो का होना|
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मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा, जो कह रहा हूँ वह एक वास्तविकता है| समय बहुत शीघ्रता से बदलता है| टेक्नोलॉजी भी इतनी शीघ्रता से बदल रही है कि उसके साथ कदम से कदम मिला के चलना असम्भव सा हो रहा है| यह सृष्टि परमात्मा की है, हम तो उसके सेवक मात्र हैं| जो कुछ भी हो रहा है उसे बिना कोई प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए देखते रहो| इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प भी नहीं है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
०९ दिसंबर २०१७

आत्मतत्व में स्थित होना ही स्वस्थ (स्व+स्थ) होना है .....

आत्मतत्व में स्थित होना ही स्वस्थ (स्व+स्थ) होना है, स्व में स्थिति ही स्वास्थ्य है, यही आध्यात्म है, यही गुरुतत्व है, और यही परमात्मा की प्राप्ति है ....
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यह एक अनुभूति का विषय है जो परमात्मा की कृपा से ही समझ में आता है, बुद्धि से नहीं, अतः इस पर किसी भी तरह का विवाद निरर्थक है| आत्मतत्व में स्थिति ही गुरुतत्व में स्थिति है, और यही परमात्मा की प्राप्ति है| लोग कुतर्क करते हैं कि परमात्मा तो सदा प्राप्त है, परमात्मा कब अप्राप्त था? यह एक भ्रामक कुतर्क मात्र है| वास्तव में परमात्मा उसी को प्राप्त है जो आत्मतत्व में स्थित है| यही आध्यात्म है| बिना किसी शर्त के परमात्मा से परम प्रेम यानि Unconditional love to the Divine ही द्वार है| जितना अधिक हमें परमात्मा से प्रेम होता है उसी अनुपात में हमारा मार्ग प्रशस्त होता जाता है|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है .....
"निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः |
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ||"
अर्थात जो मोह से रहित हैं, जिन्होनें संगदोषों अर्थात आसक्ति से होने वाले दोषों को जीत लिया है, जो नित्य आध्यात्म (निरंतर आत्मा में ही) में स्थित हैं, जो कामनाओं से रहित हैं, जो सुख-दुःख रूपी द्वंद्वो से मुक्त है, ऐसे साधक भक्त उस अविनाशी परमपद (परमात्मा) को प्राप्त होते हैं|

यहाँ भगवान ने "अध्यात्मनित्याः" शब्द का प्रयोग भी किया है जो विचारणीय है| अनेक मनीषी व्याख्याकारों ने इसकी बड़ी सुन्दर और विस्तृत व्याख्या की है| यह भगवान का आदेश है कि हम निरंतर आत्म तत्व यानि परमात्मा का चिंतन करें| यही आध्यात्म है और यही परमात्मा की प्राप्ति है|
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इन पंक्तियों के लिखते समय हमारे मोहल्ले की अनेक माताएँ संकीर्तन करते हुए अपनी दैनिक प्रभातफेरी निकाल रही हैं, उनके शब्द आत्मा को जागृत कर रहे हैं| उन सब को मैं प्रणाम करता हूँ| इसे मैं परमात्मा का आशीर्वाद मान कर स्वीकार कर रहा हूँ| उनकी कृपा सदा बनी रहे|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
८ दिसंबर २०१७