Saturday, 24 July 2021

ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग क्या है? ---

 

ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग क्या है?
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जिसके अन्दर सबका विलय होता है उसे लिंग कहते हैं| स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में और कारण जगत का सभी आयामों से परे .... तुरीय चेतना में विलय हो जाता है| उस तुरीय चेतना का प्रतीक हैं .... शिवलिंग, जो साधक के कूटस्थ में निरंतर जागृत रहता है| उस पर ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है| ध्यान में आत्मतत्व की अनुभूति ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप एक बृहत लिंगाकार में होती है, जिस में सारी सृष्टि समाहित है|
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ध्यान उन परमशिव का ही हो, जिनकी अनुभूति गुरुकृपा से कूटस्थ में ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग के रूप में होती है| उन की गहन अनुभूति के पश्चात सारे संचित कर्मफल, विक्षेप और आवरण, उन्हीं में विलीन होने लगते हैं| फिर उन्हीं की उपासना हो और चेतना वहीं पर रहे, अन्यत्र कहीं भी नहीं, अन्यथा भटकाव की पीड़ा और कष्ट बड़ा भयंकर है, जिसे मैं अनेक बार भुगत चुका हूँ| अब और नहीं भटकना चाहता|
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कुछ अति गूढ़ मूल-तत्व की बातें परमात्मा की विशेष कृपा से ही समझ में आ सकती हैं, जिन्हें अन्य कोई नहीं, स्वयं परमात्मा ही समझा सकते हैं| उन के मार्ग-दर्शन के पश्चात इधर-उधर अन्यत्र कहीं भी नहीं देखना चाहिए| भगवान परमशिव, जीवात्मा को संसारजाल, कर्मजाल और मायाजाल से मुक्त कर, स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह के तीन पुरों को ध्वंश कर महाचैतन्य में प्रतिष्ठित कराते है, अतः वे त्रिपुरारी हैं| वे ही मेरे परम आराध्य हैं|
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सर्वश्रेष्ठ सत्संग ... परमात्मा का संग है| साधक को नाप-तोल कर कम से कम और सिर्फ आवश्यक, त्रुटिहीन व स्पष्ट शब्दों का ही प्रयोग पूरे आत्मविश्वास से करना चाहिए| आत्मनिंदा, आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचें| किसी की अनावश्यक प्रशंसा भी हमारी हानि करती है| दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा और निंदा की ओर ध्यान न दें| किसी की भी बातों से व्यक्तिगत रूप से आहत न हों, और आल्हादित भी न हों|
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परमात्मा की चेतना में रहते हुए बात करें| कुछ भी बोलते समय हमारी आतंरिक चेतना कूटस्थ में हो| अपनी बात को पूरे आत्मविश्वास से प्रस्तुत करें| बोलते समय यह भाव रखें कि स्वयं भगवान हमारी वाणी से बोल रहे हैं|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२०

Thursday, 22 July 2021

पूर्वजन्मों में भगवान की उपासना नहीं की, इसी लिए यह कष्टमय सांसारिक जन्म मिला ---

 

पूर्वजन्मों में भगवान की उपासना नहीं की, कोई अच्छे कर्म नहीं किए, इसी लिए यह कष्टमय सांसारिक जन्म मिला| अपने सारे कष्ट और पीड़ायें, भगवान को ही बापस अर्पित करता हूँ, अन्य कोई उपाय नहीं है|
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गुरु महाराज तो कहते हैं कि तुम्हारी कोई समस्या नहीं है| तुम्हारी एकमात्र समस्या भगवान को प्राप्त करना है, अपनी चेतना को कूटस्थ में रखो और निरंतर भगवान का ध्यान करो| भगवान का स्मरण करते-करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय संसारी जीवन से तो श्रेष्ठ ही होगा| गुरु महाराज की यह आज्ञा स्वीकार्य है, और मृत्यु के देवता का भी स्वागत है|
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जिन का कभी जन्म ही नहीं हुआ, वे परमशिव मेरे उपास्य हैं, अतः मृत्यु मेरा क्या बिगाड़ सकती है? चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ?? सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु, कष्ट, पीड़ा और सब तरह की बाधाओं में हे प्रभु, आप मुझे विस्मृत मत करना| हो सकता हो मैं आपको याद नहीं कर पाऊँ, आप ही मुझे याद करते रहना|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२२ जुलाई २०२०

Wednesday, 21 July 2021

एकै साधे सब सधै ---


रहीम जी का एक प्रसिद्ध दोहा है --
"एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय| रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय||"
इस दोहे का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि एक परमात्मा को साधने से संसार अपने आप सध जाता है, क्योंकि परमात्मा सब का मूल है|
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कुछ बातें मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ क्योंकि मैंने आध्यात्मिक रूप से भटक-भटक कर खूब समय भी नष्ट किया है, खूब धक्के भी खाये हैं, और खूब अनुभव भी लिए हैं| मैं नहीं चाहता कि जितना मैं भटका हूँ, उतना कोई और भटके|
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कोई भी आध्यात्मिक साधना हो, हमारा एकमात्र लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, न कि कुछ और| जहाँ अन्य भी कोई लक्ष्य हो, उन्हें मेरे जैसे गलत व्यक्ति के लेख पढ़कर अपना समय नष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है| परमात्मा के एक ही रूप की उपासना करें| सत्संग भी उन्हीं महात्माओं का करें जो हमारी साधना के अनुकूल हो|
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चाहे कितना भी बड़ा महात्मा हो, यदि उसका आचरण गलत हो तो उसे विष की तरह त्याग दें| वह विष मिले मधु की तरह है| यदि गुरु का आचरण गलत है, तो गुरु भी त्याज्य है|
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जब अनेक पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों का उदय होता है तब भगवान की भक्ति जागृत होती है| फिर कुछ और जन्म बीत जाते हैं तब अंतर्रात्मा में परमात्मा को पाने की अभीप्सा जागृत होती है| जब वह अभीप्सा अति प्रबल हो जाती है तब जीवन में सद्गुरु की प्राप्ति होती है| फिर भी हमारी निम्न प्रकृति हमें छोड़ती नहीं है| वह निम्न प्रकृति हमारे अवचेतन मन में छिपे पूर्व जन्मों के बुरे संस्कारों, और गलत आदतों को जागृत करती रहती है| इस निम्न प्रकृति पर विजय पाना ही सबसे बड़ी आरंभिक मुख्य साधना है|
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घर-परिवार के प्रति मोह बहुत बड़ी बाधा है| घर-परिवार के लोगों की नकारात्मक सोच, गलत माँ-बाप के यहाँ जन्म, गलत पारिवारिक संस्कार, गलत विवाह, गलत मित्र, और गलत वातावरण, कोई साधन-भजन नहीं करने देता| घर-परिवार के मोह के कारण ऐसे जिज्ञासु बहुत अधिक दुखी रहते हैं| वर्तमान में जैसा वातावरण है उसमें घर पर रहकर साधना करना लगभग असम्भव और अत्यंत कष्टप्रद है|
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मेरा तो यह मानना है कि जब एक बार युवावस्था में ईश्वर की एक झलक भी मिल जाये तब उसी समय व्यक्ति को गृहत्याग कर देना चाहिए| रामचरितमानस में कहा है .....
"सुख सम्पति परिवार बड़ाई | सब परिहरि करिहऊँ सेवकाई ||
ये सब रामभक्ति के बाधक | कहहिं संत तव पद अवराधक ||"
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आज के समाज का वातावरण अत्यंत प्रदूषित और विषाक्त है जहाँ भक्ति करना असम्भव है| यदि कोई कर सकता है तो वह धन्य है| बहुत कम ऐसे भाग्यशाली हैं, लाखों में कोई एक ऐसा परिवार होगा जहाँ पति-पत्नी दोनों साधक हों| ऐसा परिवार धन्य हैं| वे घर में रहकर भी विरक्त हैं| ऐसे ही परिवारों में महान आत्माएं जन्म लेती हैं|
आप सब महान आत्माओं को नमन| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जुलाई २०२०

Saturday, 17 July 2021

अभ्यास और वैराग्य ---

 

अभ्यास और वैराग्य ---
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हमारे चैतन्य में सदा से एक बड़ी भयंकर रस्साकशी चल रही है, और वह इस जीवन के अंत तक चलती रहेगी| एक शक्ति हमें ऊपर परमात्मा की ओर खींच रही है, व दूसरी शक्ति नीचे वासनाओं की ओर| हम बीच में असहाय हैं| जो शक्ति नीचे की ओर खींच रही है वह बड़ी आकर्षक और सुहावनी है, पर अंततः दुःखदायी है| जो शक्ति ऊपर खींच रही है वह लग तो रही है कष्टमय, पर अंत में स्थायी आनंददायक है| योगसूत्रों के व्यास भाष्य में इसे "उभयतो वाहिनी नदी" यानि परस्पर विपरीत दिशाओं में प्रवाहित होने वाली अद्भुत नदी कहा गया है|
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हमें उस प्रवाह को शक्ति देनी है जो ऊपर की ओर बह रहा है| वह कल्याण का मार्ग है| योगदर्शन में एक सूत्र है ... "अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः|" अर्थात् अभ्यास और वैराग्य से उन चित्तवृत्तियों का निरोध होता है| गीता में भी भगवान कहते हैं ...
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं| अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||६:३५||"
अर्थात् हे महबाहो निसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु हे कुन्तीपुत्र उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है|
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यहाँ अभ्यास का अर्थ है .... अपनी चित्तभूमि में एक समान वृत्ति की बारंबार आवृत्ति| वैराग्य का अर्थ है दृष्ट व अदृष्ट प्रिय भोगों में बारंबार दोषदर्शन और उन से विरक्ति| सुषुम्ना में नीचे के तीन चक्रों में यदि चेतना रहेगी तो वह अधोगामी होगी और ऊपर के तीन चक्रों में ऊर्ध्वगामी| अपनी चेतना को सदा प्रयासपूर्वक उत्तरा-सुषुम्ना में यानि आज्ञाचक्र से ऊपर रखें| सूक्ष्म देह में मूलाधार चक्र से स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि व आज्ञा चक्रों से होते हुए सहस्त्रार तक एक अति-अति सूक्ष्म प्राण शक्ति प्रवाहित हे रही है, उसके प्रति सजग रहें व अजपा-जप की साधना और नादानुसंधान करें| अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण प्रेम परमात्मा को दें| निश्चित रूप से कल्याण होगा|
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यह सच्चिदानंद परमात्मा की करुणा, कृपा और अनुग्रह है कि हमें उनकी याद आ रही है, और हमें उनसे परमप्रेम हो गया है| लिखने को तो बहुत कुछ है पर मेरा स्वास्थ्य इसकी अनुमति नहीं दे रहा है| फेसबुक पर भगवान की परम कृपा से मैं पिछले आठ-नौ वर्षों में हिन्दू राष्ट्रवाद और आध्यात्म पर सैंकड़ों लेख (दो हज़ार से भी अधिक) लिख चुका हूँ| अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, अतः लिखने में बड़ी कठिनाई होती है| अब कभी भगवान लिखवाएँगे तभी लिखूंगा, अन्यथा नहीं| जितना समय लेख लिखने में लगता है वह समय गुरुदेव भगवान श्रीहरिः के चरम-कमलों के ध्यान और उनकी स्मृति में ही बिताऊँगा| किसी भी तरह की किसी से कोई भी अपेक्षा नहीं है| भगवान ने इस जीवन में जितनी अत्यल्प और अति-अति सीमित क्षमता दी, उसकी सीमा में रहते हुए जितना भी संभव था वह किया और जो संकल्प पूर्ण नहीं हुए हैं वे अगले जन्मों में होंगे| किसी भी तरह की कोई मुक्ति या मोक्ष नहीं चाहिए| बार-बार जन्म हों, व हर जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो|
ॐ नमो भगवते वसुदेवाय| ॐ नमः शिवाय| हरिः ॐ तत्सत| ॐ ॐ ॐ||
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०२०
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पुनश्च :--- अभ्यास और वैराग्य की उपेक्षा न करें, अन्यथा यह जीवन यों ही व्यर्थ में बीत जाएगा| प्रमाद और दीर्घसूत्रता हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं जिनके आगे हम असहाय हो जाते हैं| महिषासुर हमारे अंतर में प्रमाद और दीर्घसूत्रता के रूप में अभी भी जीवित है, बाकी अन्य सारे शत्रु (राग-द्वेष रूपी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य) इसके पीछे पीछे चलते हैं| यह प्रमाद रूपी महिषासुर ही हमारी मृत्यु है| निरंतर प्रभु से प्रेम और उनके प्रेमरूप पर अनवरत ध्यान के अभ्यास और विषयों से वैराग्य द्वारा ही हम इन शत्रुओं पर विजय पा सकते हैं| हमारे चित्त में तमोगुण की प्रबलता होने पर निद्रा, आलस्य, निरुत्साह, प्रमाद आदि मूढ़ अवस्था के दोष उत्पन्न हो जाते हैं| रजोगुण की प्रबलता होने पर चित्त विक्षिप्त अर्थात् चञ्चल हो जाता है| इन दोनों प्रकार की बाधक वृत्तियों के प्रशमन के लिये अभ्यास तथा वैराग्य सर्वोत्तम साधन हैं| अभ्यास से तमोगुण की निवृत्ति और वैराग्य से रजोगुण की निवृत्ति होती है| वैराग्य से चित्त का बहिर्मुख प्रवाह रोका जाता है, व अभ्यास से आत्मोन्मुख प्रवाह स्थिर किया जा सकता है|

Thursday, 15 July 2021

कभी भूल कर भी निराश न हों, परिस्थितियाँ सदा एक सी नहीं रहतीं ---

कभी भूल कर भी निराश न हों, परिस्थितियाँ सदा एक सी नहीं रहतीं ---

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पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण जो लोग भगवान की भक्ति नहीं कर पा रहे हैं, वे निराश न हों, अगले जन्मों में उन्हें फिर से नया अवसर मिलेगा। घर-परिवार के लोगों की नकारात्मक सोच, गलत माँ-बाप के यहाँ जन्म, गलत पारिवारिक संस्कार और गलत वातावरण -- उन्हें कोई साधन-भजन नहीं करने देता। घर-परिवार के मोह के कारण ऐसे जिज्ञासु बहुत अधिक दुखी रहते हैं। इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में निश्चित ही उन्हें आध्यात्मिक प्रगति का एक नया अवसर मिलेगा।
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श्रद्धा और विश्वास रखो कि भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, यहीं पर हैं, और सर्वत्र हैं। मैं उनके हृदय में हूँ, और वे मेरे हृदय में हैं।
१६ जुलाई २०२०

भगवान के साथ सत्संग ---

 

सत्संग
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चतुर्मास के इस पावन समय में सत्संग और उपासना की खूब प्रेरणा मिल रही है| वर्तमान परिस्थितियों में भौतिक रूप से तो कहीं भी आने-जाने में असमर्थ हैं| भगवान सर्वत्र हैं, जहां भी उन्होनें रखा है वहाँ तो उन्हें आना ही पड़ेगा| आना क्या पड़ेगा? वे तो पहले से ही प्रत्यक्ष हृदय में आकर साकार रूप में बैठे हुए हैं| अतः अब बाहरी सत्संग की सारी कामना को नष्ट कर साक्षात् भगवान के साथ ही निरंतर सत्संग करेंगे| बाहरी सत्संग में अब कोई रुचि नहीं रही है|
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जब भी भगवान की याद आती है, तब चेतना, इस शरीर से परे अनंत विराटता में व्याप्त हो जाती है| इस देह का मैं एक साक्षीमात्र रह जाता हूँ| उस विराट अनंतता से भी परे एक दिव्य ज्योति है, जिसमें से एक दिव्य ध्वनि भी निःसृत हो रही है| वह अति अति अवर्णनीय दिव्य है| उस से भी परे जो परम आकर्षक अज्ञात अस्तित्व है वह ही मेरे ध्यान का विषय है| उस की अनुभूति ही परमशिव है, वह ही गुरु-तत्व है, और वह ही आत्म-तत्व है| वह ही मेरा इष्ट देव/देवी है| जो वह है, वह ही मैं हूँ| सारी सृष्टि मुझ में समाहित है, और मैं सारी सृष्टि में व्याप्त हूँ| ये चाँद-तारे, ये सारी आकाशगंगायें और जो कुछ भी सृष्ट और असृष्ट है, वह सब मैं ही हूँ| मेरे सिवाय किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है| बीच-बीच में कभी-कभी इस देह को भी इस भाव के साथ देख लेता हूँ कि मैं यह देह नहीं हूँ, यह देह तो लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक वाहन/साधन मात्र है|
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गुरु महाराज को नमन --- हे गुरु महाराज, आप के चरण-कमलों का ध्यान सहस्त्रार में सदा होता रहे| आप ही परमशिव हैं, आप ही वासुदेव हैं, आप ही परमात्म-तत्व हैं, और आप ही यह मैं है| मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है| जो आप हैं, वह ही मैं हूँ| ॐ ॐ ॐ ||
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ||"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
"ऊँ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै| तेजस्विना वधीतमस्तु मां विद्विषावहै || ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||"
गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ !!
जय गुरु !!
१६ जुलाई २०२०

मैं और मेरे परम मित्र जीसस क्राइस्ट ---

 

(पुनर्प्रस्तुत). मैं और मेरे परम मित्र जीसस क्राइस्ट ---  (भाग 2) 
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यह किसी की निंदा या आलोचना नहीं हृदय की एक भावना व अनुभूति मात्र है| मेरी इन पंक्तियों से किसी की भावनाएँ आहत नहीं होनी चाहियें| मैं एक निष्ठावान हिन्दू हूँ पर किशोरावस्था से अब तक मैं जीसस क्राइस्ट का प्रशंसक भी रहा हूँ| जीसस की महिमा में मैंने फेसबुक पर तीन-चार लेख भी लिखे हैं| किशोरावस्था में ही न्यू टेस्टामेंट के सारे उपलब्ध चारों गोस्पेल पढ़ लिए थे, ओल्ड टेस्टामेंट तो बहुत बाद में पढ़ा| पर मैं कभी भी ईसाई पंथ से प्रभावित नहीं हुआ| जिस तरह से ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भारत में व समस्त विश्व में छल-कपट वअत्याचार किये उससे मुझे इस पंथ में कोई खूबी दृष्टिगत नहीं हुई| इसे मैं क्रिस्चियनिटी नहीं बल्कि चर्चियनिटी मानता हूँ| पर जीसस से मित्रता बनी रही क्योंकि मेरी दृष्टी में उन्होंने भारत में अध्ययन कर के मूल रूप से सनातन धर्म की शिक्षाओं का ही प्रचार किया था|
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आरम्भ में भारत से जितने भी सन्यासी हिन्दू धर्मप्रचार के लिए अमेरिका गए उन्हें अपनी बात कहने के लिए जीसस क्राइस्ट का सहारा लेना ही पड़ा, अन्यथा वहाँ उनकी बात कोई नहीं सुनता| यह एक तरह की मार्केटिंग थी| ओशो उर्फ़ आचार्य रजनीश ने अमेरिका में पहली बार खुलकर जीसस की आलोचना की तो उन्हें बहुत बुरी तरह अपमानित व प्रताड़ित कर के अमेरिका से भगा दिया गया| किसी भी अन्य देश ने उन्हें शरण नहीं दी, और बाध्य होकर उन्हें बापस भारत लौटना ही पड़ा|
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सन १९८२ ई.में मैंने नीदरलैंड से एक धातु की मूर्ति खरीदी थी जिसमें जीसस क्राइस्ट क्रॉस पर लटके हुए हैं| भारत के कई हिन्दू आश्रमों में भगवान श्री कृष्ण के साथ साथ जीसस क्राइस्ट का चित्र भी आपको पूजा की वेदी पर मिल जाएगा| रामकृष्ण मिशन के आश्रमों में तो माँ काली की मूर्ति के साथ मदर टेरेसा का चित्र लगा देखकर मैं बहुत अधिक आहत भी हुआ हूँ| यह पश्चिमी संस्कृति का भारत पर प्रभाव है|
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लेकिन आजकल मुझे अनुभूत हो रहा है कि जीसस क्राइस्ट एक काल्पनिक चरित्र हैं, जिनको सेंट पॉल नाम के एक पादरी ने परियोजित किया| इनकी कल्पना सेंट पॉल के दिमाग की उपज थी जो बाद में एक राजनीतिक व्यवस्था बन गयी| यूरोप के शासकों ने अपने उपनिवेशों व साम्राज्य का विस्तार करने के लिए ईसाईयत का प्रयोग किया| उनकी सेना का अग्रिम अंग चर्च होता था| रोम के सम्राट कांस्टेंटाइन द ग्रेट ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए ईसाईयत का सबसे आक्रामक प्रयोग किया| कांस्टेंटिनोपल यानि कुस्तुन्तुनिया उसी ने बसाया था जो आजकल इस्तांबूल के नाम से जाना जाता है| यूरोप का सब से बड़ा धर्मयुद्ध (ईसाइयों व मुसलमानों के मध्य) वहीं लड़ा गया था| कांस्टेंटाइन द ग्रेट एक सूर्योपासक था इसलिए उसी ने रविवार को छुट्टी की व्यवस्था की| उसी ने यह तय किया कि जीसस क्राइस्ट का जन्म २५ दिसंबर को हुआ, क्योंकी उन दिनों उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन २४ दिसंबर को होता था, और २५ दिसंबर को सबसे पहिला बड़ा दिन होता था| आश्चर्य की बात यह है कि ईसाई पंथ का यह सबसे बड़ा प्रचारक स्वयं ईसाई नहीं बल्कि एक सूर्योपासक था| अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए उसने ईसाईयत का उपयोग किया| मृत्यु शैय्या पर जब वह मर रहा था तब पादरियों ने बलात् उसका बपतिस्मा कर के उसे ईसाई बना दिया|
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ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जिनसे किसी को आहत नहीं होना चाहिए| मुझे तो यही अनुभूत होता है कि जीसस क्राइस्ट का कभी जन्म ही नहीं हुआ था, और उनके बारे में लिखी गयी सारी कथाएँ काल्पनिक हैं| उनके जन्म का कोई प्रमाण नहीं है| यदि वे थे भी तो उनकी मूल शिक्षाएँ भगवान श्रीकृष्ण की ही शिक्षाएँ थीं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१९
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पुनश्चः :----
जीसस क्राइस्ट के नाम पर ही योरोपीय साम्राज्य विस्तार के लिए वेटिकन के आदेश से वास्कोडिगामा को यूरोप के पूर्व में, और कोलंबस को पश्चिम में भेजा गया था|
यूरोप से गए ईसाईयों ने ही दोनों अमेरिकी महाद्वीपों के प्रायः सभी करोड़ों मनुष्यों की ह्त्या कर के वहाँ योरोपीय लोगों को बसा दिया| वहां के जो बचे-खुचे मूल निवासी थे उन्हें बड़ी भयानक यातनाएँ देकर ईसाई बना दिया गया| कालान्तर में यही काम ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में किया गया|
ईसाई पुर्तगालियों ने यही काम गोवा में किया| गोवा में यदि कुछ हिन्दू बचे हैं तो वे भगवान की कृपा से ही बचे हैं| ईसाई अंग्रेजों ने भी चाहा था सभी भारतवासियों की ह्त्या कर यहाँ सिर्फ अंग्रेजों को ही बसा देना| पर भगवान की यह भारत पर कृपा थी कि अंग्रेजों को इस कार्य में सफलता नहीं मिली| मुस्लिम शासकों ने अत्याचार करना ईसाई प्रचारकों से ही सीखा| ईसाइयों ने जितने अत्याचार और छल-कपट किया है उतना तो ज्ञात इतिहास में किसी ने भी नहीं किया|
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उपरोक्त लेख पर प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय की टिप्पणी :---
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"भगवान् कृष्ण के जीवन की कुछ कथाओं की नकल ईसा की कहानी में है। स्वयं कृष्ट (Christ) शब्द कृष्ण का अपभ्रंश है। उत्तरी गोलार्द्ध में मार्गशीर्ष मास में सबसे बड़ी रात होती है अतः इसे कृष्ण-मास कहते थे-मासानां मार्गशीर्षोऽहं (गीता, अध्याय १०)। कृष्णमास से क्रिसमस हुआ है। ४६ ईपू में जूलियस सीजर ने मिस्र के ज्योतिषियों की सलाह पर उत्तरायण आरम्भ से वर्ष आरम्भ करने का आदेश दिया। भारत में उस समय दिव्य दिन का आरम्भ होता है-इसका अनुवाद बड़ा दिन हो गया है। पर स्वयं सीजर के राज्य में लोगों ने उसका आदेश नहीं मान कर विक्रम संवत् १० के पौष मास के आरम्भ से उत्तरायण के ७ दिन बाद वर्ष आरम्भ किया। आदेश के अनुसार जो तिथि १ जनवरी होनी थी वह २५ दिसम्बर हो गयी तथा उसे दिव्य (बड़ा) दिन या कृष्णमास (Christmas) कहा गया। भगवान् कृष्ण द्वारा कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी थी, अतः कृष्ण होने के सन्देह में कंस ने ब्रज के सभी नवजात शिशुओं की हत्या करवा दी थी। यही कहानी ईसा मसीह के समय के राजा हेरोद के बारे में बनायी गयी, यद्यपि हेरोद के लिये ऐसा कोई कारण नहीं था। ईसा को जिस समय शूली पर चढ़ाने की कथा है, उस समय वहाँ रोमन शासन था तथा हेरोद की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी।"
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Note :---
श्री अरुण उपाध्याय जी से परिचय तो फेसबुक पर ही हुआ था, पर इन से सबसे पहली व्यक्तिगत भेंट जोधपुर के शंकराचार्य मठ (जो कांची कामकोटी पीठ से जुड़ा हुआ है) में हुई थी जहाँ हम दोनों ही दंडी स्वामी मृगेंद्र सरस्वती जी से मिलने आये हुए थे| इनसे दूसरी भेंट भुवनेश्वर में इनके निवास पर ही हुई| उस दिन वहाँ एक हड़ताल थी जिसके कारण कोई भी वाहन सड़क पर नहीं चल रहा था| पर भुवनेश्वर के एक युवा उद्योगपति श्री विवेक टीबड़ेवाल अपनी कार में कैसे भी जोखिम लेकर मुझे इनके घर तक छोड़ आये| बापस आने के लिए इन्होनें व्यवस्था कर दी थी| लगभग डेढ़ घंटों तक इनसे हुई वार्ता बहुत अधिक लाभदायी थी| इनसे हुई उपरोक्त दोनों भेंटों को मैं एक उपलब्धि मानता हूँ|