कभी भूल कर भी निराश न हों, परिस्थितियाँ सदा एक सी नहीं रहतीं ---
Thursday, 15 July 2021
कभी भूल कर भी निराश न हों, परिस्थितियाँ सदा एक सी नहीं रहतीं ---
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पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण जो लोग भगवान की भक्ति नहीं कर पा रहे हैं, वे निराश न हों, अगले जन्मों में उन्हें फिर से नया अवसर मिलेगा। घर-परिवार के लोगों की नकारात्मक सोच, गलत माँ-बाप के यहाँ जन्म, गलत पारिवारिक संस्कार और गलत वातावरण -- उन्हें कोई साधन-भजन नहीं करने देता। घर-परिवार के मोह के कारण ऐसे जिज्ञासु बहुत अधिक दुखी रहते हैं। इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में निश्चित ही उन्हें आध्यात्मिक प्रगति का एक नया अवसर मिलेगा।
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श्रद्धा और विश्वास रखो कि भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, यहीं पर हैं, और सर्वत्र हैं। मैं उनके हृदय में हूँ, और वे मेरे हृदय में हैं।
१६ जुलाई २०२०
भगवान के साथ सत्संग ---
सत्संग
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चतुर्मास के इस पावन समय में सत्संग और उपासना की खूब प्रेरणा मिल रही है| वर्तमान परिस्थितियों में भौतिक रूप से तो कहीं भी आने-जाने में असमर्थ हैं| भगवान सर्वत्र हैं, जहां भी उन्होनें रखा है वहाँ तो उन्हें आना ही पड़ेगा| आना क्या पड़ेगा? वे तो पहले से ही प्रत्यक्ष हृदय में आकर साकार रूप में बैठे हुए हैं| अतः अब बाहरी सत्संग की सारी कामना को नष्ट कर साक्षात् भगवान के साथ ही निरंतर सत्संग करेंगे| बाहरी सत्संग में अब कोई रुचि नहीं रही है|
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जब भी भगवान की याद आती है, तब चेतना, इस शरीर से परे अनंत विराटता में व्याप्त हो जाती है| इस देह का मैं एक साक्षीमात्र रह जाता हूँ| उस विराट अनंतता से भी परे एक दिव्य ज्योति है, जिसमें से एक दिव्य ध्वनि भी निःसृत हो रही है| वह अति अति अवर्णनीय दिव्य है| उस से भी परे जो परम आकर्षक अज्ञात अस्तित्व है वह ही मेरे ध्यान का विषय है| उस की अनुभूति ही परमशिव है, वह ही गुरु-तत्व है, और वह ही आत्म-तत्व है| वह ही मेरा इष्ट देव/देवी है| जो वह है, वह ही मैं हूँ| सारी सृष्टि मुझ में समाहित है, और मैं सारी सृष्टि में व्याप्त हूँ| ये चाँद-तारे, ये सारी आकाशगंगायें और जो कुछ भी सृष्ट और असृष्ट है, वह सब मैं ही हूँ| मेरे सिवाय किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है| बीच-बीच में कभी-कभी इस देह को भी इस भाव के साथ देख लेता हूँ कि मैं यह देह नहीं हूँ, यह देह तो लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक वाहन/साधन मात्र है|
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गुरु महाराज को नमन --- हे गुरु महाराज, आप के चरण-कमलों का ध्यान सहस्त्रार में सदा होता रहे| आप ही परमशिव हैं, आप ही वासुदेव हैं, आप ही परमात्म-तत्व हैं, और आप ही यह मैं है| मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है| जो आप हैं, वह ही मैं हूँ| ॐ ॐ ॐ ||
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ||"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
"ऊँ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै| तेजस्विना वधीतमस्तु मां विद्विषावहै || ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||"
गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ !!
जय गुरु !!
१६ जुलाई २०२०
मैं और मेरे परम मित्र जीसस क्राइस्ट ---
(पुनर्प्रस्तुत). मैं और मेरे परम मित्र जीसस क्राइस्ट --- (भाग 2)
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यह किसी की निंदा या आलोचना नहीं हृदय की एक भावना व अनुभूति मात्र है| मेरी इन पंक्तियों से किसी की भावनाएँ आहत नहीं होनी चाहियें| मैं एक निष्ठावान हिन्दू हूँ पर किशोरावस्था से अब तक मैं जीसस क्राइस्ट का प्रशंसक भी रहा हूँ| जीसस की महिमा में मैंने फेसबुक पर तीन-चार लेख भी लिखे हैं| किशोरावस्था में ही न्यू टेस्टामेंट के सारे उपलब्ध चारों गोस्पेल पढ़ लिए थे, ओल्ड टेस्टामेंट तो बहुत बाद में पढ़ा| पर मैं कभी भी ईसाई पंथ से प्रभावित नहीं हुआ| जिस तरह से ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भारत में व समस्त विश्व में छल-कपट वअत्याचार किये उससे मुझे इस पंथ में कोई खूबी दृष्टिगत नहीं हुई| इसे मैं क्रिस्चियनिटी नहीं बल्कि चर्चियनिटी मानता हूँ| पर जीसस से मित्रता बनी रही क्योंकि मेरी दृष्टी में उन्होंने भारत में अध्ययन कर के मूल रूप से सनातन धर्म की शिक्षाओं का ही प्रचार किया था|
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आरम्भ में भारत से जितने भी सन्यासी हिन्दू धर्मप्रचार के लिए अमेरिका गए उन्हें अपनी बात कहने के लिए जीसस क्राइस्ट का सहारा लेना ही पड़ा, अन्यथा वहाँ उनकी बात कोई नहीं सुनता| यह एक तरह की मार्केटिंग थी| ओशो उर्फ़ आचार्य रजनीश ने अमेरिका में पहली बार खुलकर जीसस की आलोचना की तो उन्हें बहुत बुरी तरह अपमानित व प्रताड़ित कर के अमेरिका से भगा दिया गया| किसी भी अन्य देश ने उन्हें शरण नहीं दी, और बाध्य होकर उन्हें बापस भारत लौटना ही पड़ा|
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सन १९८२ ई.में मैंने नीदरलैंड से एक धातु की मूर्ति खरीदी थी जिसमें जीसस क्राइस्ट क्रॉस पर लटके हुए हैं| भारत के कई हिन्दू आश्रमों में भगवान श्री कृष्ण के साथ साथ जीसस क्राइस्ट का चित्र भी आपको पूजा की वेदी पर मिल जाएगा| रामकृष्ण मिशन के आश्रमों में तो माँ काली की मूर्ति के साथ मदर टेरेसा का चित्र लगा देखकर मैं बहुत अधिक आहत भी हुआ हूँ| यह पश्चिमी संस्कृति का भारत पर प्रभाव है|
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लेकिन आजकल मुझे अनुभूत हो रहा है कि जीसस क्राइस्ट एक काल्पनिक चरित्र हैं, जिनको सेंट पॉल नाम के एक पादरी ने परियोजित किया| इनकी कल्पना सेंट पॉल के दिमाग की उपज थी जो बाद में एक राजनीतिक व्यवस्था बन गयी| यूरोप के शासकों ने अपने उपनिवेशों व साम्राज्य का विस्तार करने के लिए ईसाईयत का प्रयोग किया| उनकी सेना का अग्रिम अंग चर्च होता था| रोम के सम्राट कांस्टेंटाइन द ग्रेट ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए ईसाईयत का सबसे आक्रामक प्रयोग किया| कांस्टेंटिनोपल यानि कुस्तुन्तुनिया उसी ने बसाया था जो आजकल इस्तांबूल के नाम से जाना जाता है| यूरोप का सब से बड़ा धर्मयुद्ध (ईसाइयों व मुसलमानों के मध्य) वहीं लड़ा गया था| कांस्टेंटाइन द ग्रेट एक सूर्योपासक था इसलिए उसी ने रविवार को छुट्टी की व्यवस्था की| उसी ने यह तय किया कि जीसस क्राइस्ट का जन्म २५ दिसंबर को हुआ, क्योंकी उन दिनों उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन २४ दिसंबर को होता था, और २५ दिसंबर को सबसे पहिला बड़ा दिन होता था| आश्चर्य की बात यह है कि ईसाई पंथ का यह सबसे बड़ा प्रचारक स्वयं ईसाई नहीं बल्कि एक सूर्योपासक था| अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए उसने ईसाईयत का उपयोग किया| मृत्यु शैय्या पर जब वह मर रहा था तब पादरियों ने बलात् उसका बपतिस्मा कर के उसे ईसाई बना दिया|
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ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जिनसे किसी को आहत नहीं होना चाहिए| मुझे तो यही अनुभूत होता है कि जीसस क्राइस्ट का कभी जन्म ही नहीं हुआ था, और उनके बारे में लिखी गयी सारी कथाएँ काल्पनिक हैं| उनके जन्म का कोई प्रमाण नहीं है| यदि वे थे भी तो उनकी मूल शिक्षाएँ भगवान श्रीकृष्ण की ही शिक्षाएँ थीं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०१९
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पुनश्चः :----
जीसस क्राइस्ट के नाम पर ही योरोपीय साम्राज्य विस्तार के लिए वेटिकन के आदेश से वास्कोडिगामा को यूरोप के पूर्व में, और कोलंबस को पश्चिम में भेजा गया था|
यूरोप से गए ईसाईयों ने ही दोनों अमेरिकी महाद्वीपों के प्रायः सभी करोड़ों मनुष्यों की ह्त्या कर के वहाँ योरोपीय लोगों को बसा दिया| वहां के जो बचे-खुचे मूल निवासी थे उन्हें बड़ी भयानक यातनाएँ देकर ईसाई बना दिया गया| कालान्तर में यही काम ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में किया गया|
ईसाई पुर्तगालियों ने यही काम गोवा में किया| गोवा में यदि कुछ हिन्दू बचे हैं तो वे भगवान की कृपा से ही बचे हैं| ईसाई अंग्रेजों ने भी चाहा था सभी भारतवासियों की ह्त्या कर यहाँ सिर्फ अंग्रेजों को ही बसा देना| पर भगवान की यह भारत पर कृपा थी कि अंग्रेजों को इस कार्य में सफलता नहीं मिली| मुस्लिम शासकों ने अत्याचार करना ईसाई प्रचारकों से ही सीखा| ईसाइयों ने जितने अत्याचार और छल-कपट किया है उतना तो ज्ञात इतिहास में किसी ने भी नहीं किया|
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उपरोक्त लेख पर प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय की टिप्पणी :---
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"भगवान् कृष्ण के जीवन की कुछ कथाओं की नकल ईसा की कहानी में है। स्वयं कृष्ट (Christ) शब्द कृष्ण का अपभ्रंश है। उत्तरी गोलार्द्ध में मार्गशीर्ष मास में सबसे बड़ी रात होती है अतः इसे कृष्ण-मास कहते थे-मासानां मार्गशीर्षोऽहं (गीता, अध्याय १०)। कृष्णमास से क्रिसमस हुआ है। ४६ ईपू में जूलियस सीजर ने मिस्र के ज्योतिषियों की सलाह पर उत्तरायण आरम्भ से वर्ष आरम्भ करने का आदेश दिया। भारत में उस समय दिव्य दिन का आरम्भ होता है-इसका अनुवाद बड़ा दिन हो गया है। पर स्वयं सीजर के राज्य में लोगों ने उसका आदेश नहीं मान कर विक्रम संवत् १० के पौष मास के आरम्भ से उत्तरायण के ७ दिन बाद वर्ष आरम्भ किया। आदेश के अनुसार जो तिथि १ जनवरी होनी थी वह २५ दिसम्बर हो गयी तथा उसे दिव्य (बड़ा) दिन या कृष्णमास (Christmas) कहा गया। भगवान् कृष्ण द्वारा कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी थी, अतः कृष्ण होने के सन्देह में कंस ने ब्रज के सभी नवजात शिशुओं की हत्या करवा दी थी। यही कहानी ईसा मसीह के समय के राजा हेरोद के बारे में बनायी गयी, यद्यपि हेरोद के लिये ऐसा कोई कारण नहीं था। ईसा को जिस समय शूली पर चढ़ाने की कथा है, उस समय वहाँ रोमन शासन था तथा हेरोद की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी।"
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Note :---
श्री अरुण उपाध्याय जी से परिचय तो फेसबुक पर ही हुआ था, पर इन से सबसे पहली व्यक्तिगत भेंट जोधपुर के शंकराचार्य मठ (जो कांची कामकोटी पीठ से जुड़ा हुआ है) में हुई थी जहाँ हम दोनों ही दंडी स्वामी मृगेंद्र सरस्वती जी से मिलने आये हुए थे| इनसे दूसरी भेंट भुवनेश्वर में इनके निवास पर ही हुई| उस दिन वहाँ एक हड़ताल थी जिसके कारण कोई भी वाहन सड़क पर नहीं चल रहा था| पर भुवनेश्वर के एक युवा उद्योगपति श्री विवेक टीबड़ेवाल अपनी कार में कैसे भी जोखिम लेकर मुझे इनके घर तक छोड़ आये| बापस आने के लिए इन्होनें व्यवस्था कर दी थी| लगभग डेढ़ घंटों तक इनसे हुई वार्ता बहुत अधिक लाभदायी थी| इनसे हुई उपरोक्त दोनों भेंटों को मैं एक उपलब्धि मानता हूँ|
योग की परम श्रेष्ठ विधि ---
योग की परम श्रेष्ठ विधि ---
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जिसे हम मनोरंजन कहते हैं, वह भगवान की आज्ञा का उल्लंघन, और नर्क का द्वार है, क्योंकि वह सिर्फ वासनाओं का चिंतन है। गीता में तो भगवान हम से हमारा मन मांगते हैं (यानि मनोनिग्रह का आदेश देते हैं) --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
अर्थात् -- "शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥"
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यही उपासना है और यही साधना है। भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने इसे --"एष योगस्य परमो विधिः" अर्थात्य "योग की परम श्रेष्ठ विधि" बताया है। वे कहते हैं -- शनैः शनैः अर्थात् सहसा नहीं, क्रम-क्रम से, धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा, उपरति (शांति) को प्राप्त कर, मन को आत्मा में स्थित करके, यानि यह सब कुछ आत्मा ही है, उस से अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। इस प्रकार मन को आत्मा में अचल करके अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह योगकी परम श्रेष्ठ विधि है।
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कर्ताभाव को त्याग कर, एक निमित्त मात्र बन कर, भगवान को समर्पित होना पड़ेगा, क्योंकि -- "मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व" -- दोनों साथ साथ नहीं हो सकते। जब मुमुक्षुत्व जागृत होता है तब शनैः शनैः कर्ताभाव और सब कामनाएँ नष्ट होने लगती हैं। भगवान ने जिसे "आत्मा" कहा है, वह आत्म-तत्व है, जिसे एक ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय सिद्ध आचार्य ही एक नए साधक को समझा सकता है।
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मैं आप सब का सेवक और आप सब के चरणों की धूल हूँ। आप सब को नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२१
"मनुष्य नाम की एक जाति ने कुछ लाख वर्ष तक इस पृथ्वी ग्रह पर निवास और राज्य किया था, फिर अपने लोभ और अहंकार के कारण वह जाति उसी तरह नष्ट हो गई जैसे कभी डायनासोर हुए थे।" ---
"मनुष्य नाम की एक जाति ने कुछ लाख वर्ष तक इस पृथ्वी ग्रह पर निवास और राज्य किया था, फिर अपने लोभ और अहंकार के कारण वह जाति उसी तरह नष्ट हो गई जैसे कभी डायनासोर हुए थे।" ---
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यह हो सकता है भविष्य में पृथ्वी पर राज्य करने वाली किसी मनुष्येतर अन्य जाति के इतिहास में पढ़ाया जाये। जिस तरह पृथ्वी पर कभी डायनासोर रहते थे, उन्हीं का राज्य था, फिर वे लुप्त हो गए। वैसे ही मनुष्य जाति भी लुप्त हो सकती है। हमारे से अधिक उन्नत दूसरे विज्ञानमय लोकों के प्राणी हैं, वे भी आकर इस पृथ्वी पर अधिकार और राज्य कर सकते हैं। मुझे कभी-कभी कुछ ऐसा लगता भी है।
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सन २०३० ई. से पेट्रोलियम तेल के कुएँ बहुत तेजी से सूखने आरंभ हो जाएँगे। तेल की कीमत अप्रत्याशित तरीके से बढ़ने लगेगी। इस बीच बचे-खुचे तेल पर अधिकार के लिए महाशक्तियाँ आपस में एक दूसरे से घातक युद्ध करेंगी। उनके बीच हुए युद्धों में ही अधिकांश मनुष्य जाति नष्ट हो जाएगी। वर्तमान पेट्रोलियम तेल उत्पादक देश तो जल कर भस्म हो जाएँगे।
अमेरिका और रूस आजकल अरब देशों में इतना हस्तक्षेप क्यों कर रहे हैं? उनका उद्देश्य तेल की लूट ही है।
सन २०५० ई. तक पृथ्वी से पेट्रोलियम तेल पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। पता नहीं फिर ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत क्या होगा?
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अब तो सूचना प्रोद्योगिकी इतनी विकसित हो चुकी है कि पृथ्वी पर कहीं कुछ भी होता है तो तुरंत पता चल जाता है। वह जमाना लौट कर बापस नहीं आ सकता जब लाखों लुटेरे आते थे, और अनेक सभ्यताओं को नष्ट कर करोड़ों लोगों का नर-संहार और लूट कर चले जाते थे। उन्होने ऐसे पंथ भी बना लिए थे जो उनके आक्रमण की भूमिका तैयार करते, और उनके अनैतिक राज्य को कायम भी रखते। सारी सूचना प्रोद्योगिकी -- उपग्रहों की संचार व्यवस्था पर निर्भर है। उपग्रहों को नष्ट कर दिये जाने की स्थिति में वह भी धराशायी हो जाएगी।
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वर्तमान विकास काल में सत्य तो अब छिपाया नहीं जा सकेगा। जब सत्य का बोध होगा तो मनुष्य के सोच-विचार भी बदलेंगे। अगले बीस वर्षों के बाद का युग दूसरा ही होगा। हमारे से अधिक उन्नत और सत्यनिष्ठ दूसरे विज्ञानमय लोकों के मनुष्य जैसे ही लगते प्राणी भी आकर पृथ्वी पर अधिकार और राज्य कर सकते हैं। वैसे भी अब समय आ गया है कि इस पृथ्वी पर से झूठ-कपट व अधर्म का राज्य समाप्त हो, और धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा हो। भगवान किसी न किसी रूप में तो यह काम करेंगे ही। मनुष्य जाति अपने उद्देश्य में विफल रही है। मनुष्यों की स्वयं से ही आस्था समाप्त हो रही है।
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चीनियों की सोच है कि इस पृथ्वी पर से उनके अतिरिक्त अन्य सब लोग नष्ट हो जायें, सिर्फ चीनी ही बचें। इसीलिए उन्होने विश्व के अन्य सभी देशों को नष्ट करने के लिए जैविक अस्त्र के रूप में विषाणुओं को फैलाया जिन से कोरोना महामारी फैली और लाखों लोग मरे। ऐसी ही सोच जिहादियों, क्रूसेडरों और अन्य भी अनेक गोपनीय पश्चिमी दानव समाजों की है, जो चाहते हैं कि सिर्फ उन्हीं के आदमी जीवित रहें, बाकी के या तो नष्ट हो जाएँ या गुलाम होकर रहें। विश्व में इतने सारे रासायनिक और नाभिकीय आणविक अस्त्र है जो इस पृथ्वी ग्रह को सैंकड़ों बार नष्ट कर सकते हैं। उनका प्रयोग जब होगा तब शायद ही कोई मनुष्य इस पृथ्वी पर जीवित बचे। बड़े भयानक युद्ध हो सकते हैं, पृथ्वी के संसाधनों पर अधिकार के लिए, जिनसे मनुष्य जाति पूरी तरह नष्ट हो सकती है।
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मेरी बात को लोग अभी तो एक गल्प समझेंगे, लेकिन इसके घटित होने की पूरी संभावना है। वह दिन देखने के लिए मैं जीवित नहीं रहूँगा, पर यह दृश्य सूक्ष्म जगत से अवश्य देखूंगा।
२५ मई २०२१
भारत में निश्चित रूप से धर्म की पुनर्स्थापना व वैश्वीकरण होगा, और अधर्म का नाश होगा ---
कोई माने या न माने, लेकिन यह परम सत्य है कि --- भारत में निश्चित रूप से धर्म की पुनर्स्थापना व वैश्वीकरण होगा, और अधर्म का नाश होगा। दुष्ट प्रकृति के लोगों का विनाश और सज्जनों की रक्षा होगी। भारत का सत्य व धर्मनिष्ठ अखंड आध्यात्मिक राष्ट्र बनना भी तय है। सनातन धर्म ही यहाँ की राजनीति होगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा। हमारे जीवन में चाहे कितने भी अभाव और छिद्र हों, उनकी पूर्ति परमात्मा करेंगे।
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भगवान की पूर्ण कृपा होगी, अवश्य होगी, लेकिन यह तभी होगी जब हम अपने सारे राग-द्वेष, लोभ-अहंकार, व दंभ का उन्हें पूर्ण समर्पण कर देंगे। भगवान को भी हमारी -- सत्यनिष्ठा, स्थितप्रज्ञता, वीतरागता, और परमप्रेम -- अच्छे लगते हैं। ये गुण जिनमें हैं, वे इस पृथ्वी पर चलते-फिरते देवता है। पृथ्वी इनको पाकर सनाथ है, जहाँ भी इनके पैर पड़ते हैं, वह भूमि पवित्र और धन्य हो जाती है। ऐसे लोगों की सात पीढ़ियाँ स्वतः ही मुक्त हो जाती हैं।
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जिनमें छल, झूठ, कपट, और दंभ भरा पड़ा है वे कालनेमी इस पृथ्वी पर नर-पिशाच और राक्षस हैं। उन के दर्शन हो जाना भी पाप है। भगवान ऐसे दुष्ट असुरों से हमारी रक्षा करें। दुष्ट प्रकृति के लोग स्वयम् तो नर्कगामी होते ही हैं, अपनी सात पीढ़ियों व कुल को भी नर्क में ले जाते हैं।
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जहाँ पर भगवान हैं, वहाँ पर कोई अभाव और छिद्र नहीं रह सकता, पूर्णता ही पूर्णता होगी। भगवान की पसंद ही हमारी पसंद होनी चाहिए। अब और विलंब न करें। अलंकारिक शब्दजाल में न फँसें। भगवान की परम कृपा हमारी रक्षा कर सकती है, अन्यथा यह असंभव है। पात्रता होने पर भगवान स्वयं अपने भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ मई २०२१
आज्ञाचक्र से ऊपर का भाग -- अवधान का भूखा है ---
(संशोधित व पुनर्प्रस्तुत).
आज्ञाचक्र से ऊपर का भाग -- अवधान का भूखा है ---
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कमर सीधी हो, और ठुड्डी -- भूमि के समानान्तर हो तो भ्रूमध्य के ठीक सामने पीछे की ओर खोपड़ी में आज्ञाचक्र है, जहाँ मेरुशीर्ष (Medulla) में मेरुदंड की सभी नसें मस्तिष्क से मिलती हैं। दोनों कानों के मध्य खोपड़ी के ऊपर की ओर, मध्य का स्थान ब्रह्मरंध्र है, वहीं सहस्त्रार है। मानसिक भटकाव से मुक्ति के लिए हमें अपनी चेतना को सदा आज्ञाचक्र से ऊपर रखने और परमात्मा के ध्यान का नित्य नियमित अभ्यास करना होगा। सारी सांसारिक व्यस्तताओं के मध्य, जब भी याद आये, अपनी चेतना को आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य परा-सुषुम्ना में ले आयें, और वहीं पर केन्द्रित होकर सारे कार्य करें। जब भूल जायें, तब याद आते ही फिर परा-सुषुम्ना में आ जायें। योगियों के लिए आज्ञाचक्र ही उन का आध्यात्मिक हृदय है, जहाँ पर जीवात्मा का निवास है। इसके थोड़ा सा ऊपर ही शिखा बिंदु है जहाँ शिखा रखते हैं।
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गुरु की आज्ञा से शिवनेत्र होकर यानि बिना किसी तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासिकामूल के समीपतम लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी, और आज्ञाचक्र में चेतना को स्थिर कर, खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को अपने अंतर में सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का ध्यान-चिंतन नित्य नियमित करना चाहिये। गुरुकृपा से कुछ महिनों या वर्षों की साधना के पश्चात् विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। यह ब्रह्मज्योति और प्रणव की ध्वनि दोनों ही आज्ञाचक्र में प्रकट होती हैं, लेकिन इस ज्योति के दर्शन भ्रूमध्य में प्रतिबिंबित होते हैं, इसलिए गुरु महाराज आरंभ में सदा भ्रूमध्य में ध्यान करने की आज्ञा देते हैं। ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के पश्चात् उसी की चेतना में सदा रहें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है। यह योगमार्ग की उच्चतम उपलब्धियों में से एक है।
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कूटस्थ में परमात्मा सदा हमारे साथ हैं। हम सदा कूटस्थ चैतन्य में रहें। कूटस्थ में समर्पित होने पर गीता में बताई हुई ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है, जिसमें हमारी चेतना परम प्रेममय होकर समष्टि के साथ एक हो जाती है। हम फिर परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं। परमात्मा सब गुरुओं के गुरु हैं। उनसे प्रेम करो, सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे। हम भिक्षुक नहीं हैं, परमात्मा के अमृत पुत्र हैं। एक भिखारी को भिखारी का ही भाग मिलता है, पुत्र को पुत्र का। पुत्र के सब दोषों को पिता क्षमा तो कर ही देते हैं, साथ साथ अच्छे गुण कैसे आयें इसकी व्यवस्था भी कर ही देते हैं।
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भगवान गीता में कहते हैं ---
"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैतिदिव्यं॥१८:१०॥"
अर्थात भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित कर के, फिर निश्छल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष को ही प्राप्त होता है।
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आगे भगवान कहते हैं ---
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१८:१२॥"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥१८:१३॥"
अर्थात सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृदय में स्थिर कर के फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित कर के, योग धारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है।
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पढने में तो यह सौदा बहुत सस्ता और सरल लगता है कि जीवन भर तो मौज मस्ती करेंगे, फिर मरते समय भ्रूमध्य में ध्यान कर के ॐ का जाप कर लेंगे तो भगवान बच कर कहाँ जायेंगे? उनका तो मिलना निश्चित है ही। पर यह सौदा इतना सरल नहीं है। देखने में जितना सरल लगता है उससे हज़ारों गुणा कठिन है। इसके लिए अनेक जन्म जन्मान्तरों तक अभ्यास करना पड़ता है, तब जाकर यह सौदा सफल होता है। यहाँ पर महत्वपूर्ण बात है निश्छल मन से स्मरण करते हुए भृकुटी के मध्य में प्राण को स्थापित करना और ॐकार का निरंतर जाप करना, एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए हमें आज से इसी समय से अभ्यास करना होगा। उपरोक्त तथ्य के समर्थन में किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, भगवान का वचन तो है ही, और सारे उपनिषद्, शैवागम और तंत्रागम इसी के समर्थन में भरे पड़े हैं।
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ध्यान का अभ्यास करते करते चेतना सहस्त्रार पर चली जाए तो चिंता न करें। सहस्त्रार तो गुरु महाराज के चरण कमल हैं, कूटस्थ केंद्र भी वहीं चला जाता है। वहाँ स्थिति मिल गयी तो गुरु चरणों में आश्रय मिल गया। चेतना ब्रह्मरंध्र से परे अनंत में भी रहने लगे, तब तो और भी प्रसन्नता की बात है। वह विराटता ही तो विराट पुरुष है। वहाँ दिखाई देने वाली ज्योति भी अवर्णनीय और दिव्यतम है। परमात्मा के प्रेम में मग्न रहें। वहाँ तो परमात्मा ही परमात्मा हैं, न कि हम।
ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२० मई २०२१
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