Thursday, 15 July 2021

हिन्दू, हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्र क्या है? ---

 जो अन्य मतावलंबी हिन्दू बनना चाहते हैं, उन्हें हिन्दू धर्म में सप्रेम सादर स्वीकार कीजिए। विश्व में कहीं भी जो कोई स्वयं को हिन्दू मानता है, उसे हमें भी हिन्दू मानना चाहिये। जिन के पूर्वज हिन्दू थे और जिन्हें बलात् अपना धर्म छोड़ना पड़ा, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे घर-बापसी कर अपने पूर्वजों का धर्म स्वीकार करें। घर-बापसी करने वालों का स्वागत करना चाहिए।

हिन्दू, हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्र क्या है? ---
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(१) हिन्दू :-- जो भी व्यक्ति आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों व ईश्वर के अवतारों में आस्था रखता है, वह हिन्दू है, चाहे वह पृथ्वी के किसी भी भाग पर किसी भी देश में रहता है|
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(२) हिन्दुत्व :-- हिन्दुत्व एक ऊर्ध्वमुखी भाव है जो निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करता है| हिन्दुत्व है हिंसा से दूरी| मनुष्य का लोभ और अहंकार हिंसा हैं, जिनसे मुक्ति परमधर्म अहिंसा है|
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(३) हिन्दू राष्ट्र :-- 'हिन्दू राष्ट्र' ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करना चाहते हैं, चाहे वे पृथ्वी के किसी भी भाग में रहते हों|
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"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥"
"सर्वेषां मङ्गलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"
सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
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इन्हीं मंगलकामनओं के साथ आपका दिन मंगलमय हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ मई २०२१

वर्तमान परिस्थितियों में देश की एकमात्र समस्या है --- "सनातन धर्म" की रक्षा कैसे हो?" ---

 वर्तमान परिस्थितियों में देश की एकमात्र समस्या है --- "सनातन धर्म" की रक्षा कैसे हो?"

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इसके लिए सर्वप्रथम तो हमारे स्वयं के जीवन में सत्यनिष्ठा और परमात्मा की उपस्थिती हो, तभी हमारी प्रार्थना सुनी जायेगी, और तभी हमारा संकल्प साकार होगा। देश को तभी हम राष्ट्रविरोधियों के हाथों में जाने से बचा पायेंगे। अनेक संस्थाओं और व्यक्तियों ने इस कार्य हेतु अपनी कमर कस रखी है, और अपने-अपने हिसाब से कार्य कर रहे हैं।
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मेरी आस्था है कि आध्यात्मिक उपासना द्वारा हम एक ब्रहमशक्ति का प्राकट्य कर सकते हैं और भारत भूमि पर परमात्मा के अवतरण की भूमिका बना सकते हैं। मेरी यह सोच निज हृदय में परमात्मा और स्वधर्म के प्रति परमप्रेम के कारण है। एक गहन अभीप्सा भी है परमात्मा के साक्षात्कार की, और मेरा हृदय भी भक्ति से भरा पड़ा है। भगवान मुझे कभी भी निराश नहीं करेंगे। राष्ट्र की अस्मिता पर जब मर्मांतक प्रहार हो रहे हैं, तब धर्म और राष्ट्र की रक्षा करना हमारा सर्वोपरी दायित्व है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ मई २०२१

हमारी हर साँस उनके प्रति समर्पित हो ---

जिन की अनुकंपा से हम चैतन्य हैं, और जिन के प्रकाश से हमें स्वयं के होने का बोध है, वे ही हमारे परमप्रिय परमात्मा हैं, जिन का प्रेम हमें निरंतर मिल रहा है। हम उन को अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम दें, और उन की चेतना में आनंदमय रहें। परमप्रेम हमारा स्वभाव है, और आनंद उसकी परिणिती। मानसिक भावुकता से ऊपर उठें, और जब भी समय मिले, कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करते हुए आध्यात्म की परावस्था में रहें। हमारी हर सांस उनके प्रति समर्पित हो।
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परमात्मा की अनंतता हमारी देह है, और समस्त सृष्टि हमारा परिवार। यह संपूर्णता व विराटता -- भूमा-वासना है, जो सदा बनी रहे।
जो हम ढूँढ़ रहे हैं या जो हम पाना चाहते हैं, वह तो हम स्वयं हैं, -- यह वेदान्त-वासना है।
हम अनन्य हैं, हमारे से अन्य कोई नहीं है। यह -- अनन्य-योग है।
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गहराई में जाने के लिए वेदान्त के दृष्टिकोण से विचार कीजिए। भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता||
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
६ मई २०२१

मेरे इष्ट कौन हैं? ---

 मेरे इष्ट कौन हैं? ---

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नारायण !! "मैं" जिन के प्रकाश से प्रकाशित हो रहा हूँ, मुझे जिनके द्वारा "मैं" का, मेरे होने का, मेरे स्वयं के अस्तित्व का, जो बोध हो रहा है, वे सच्चिदानंद ही परमशिव हैं, वे ही नारायण हैं, और वे ही परमब्रह्म हैं। वे ही मेरे इष्ट देवता हैं। मैं उनके साथ एक, उनकी ही अभिव्यक्ति हूँ। कहीं कोई भेद नहीं है। नारायण !! नारायण !! नारायण !!
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अब इस संसार में प्राप्त करने योग्य अन्य कुछ भी नहीं है। जब उन से परिचय हो गया है, जब उन्होने मुझे एक निमित्त मात्र बना दिया है, जिन की परम कृपा ने जन्म-जन्मांतरों के मेरे सारे पाप-कल्मष नष्ट कर दिये हैं, फिर अन्य और क्या चाहिए?
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ मई २०२१

"परमात्मा से पृथकता" हमारे सारे दुःखों का एकमात्र कारण है ---

 "परमात्मा से पृथकता" हमारे सारे दुःखों का एकमात्र कारण है ---

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हमारे दुःखों का एकमात्र कारण "परमात्मा से पृथकता" है, अन्य कोई कारण नहीं है। हमारे चारों और जो घटनाक्रम घटित होता है, उस से क्षोभ और क्रोध आना स्वाभाविक है, पर हमें स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए किसी भी प्रकार की उग्र प्रतिक्रया से बचना चाहिए। क्रोध आने से मस्तिष्क और शरीर को बहुत अधिक हानि होती है। क्रोध से मनुष्य के मस्तिष्क की कई कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं जिनका पुनर्निर्माण नहीं होता। साथ साथ यह उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदयरोगों को भी जन्म देता है। मनुष्य का विवेक भी क्रोध से नष्ट होने लगता है। अतः क्रोध पर नियंत्रण करने का अभ्यास हमें करना चाहिए। क्रोध -- नर्क का द्वार है। हमारे जीवन में असंतोष, पीड़ा और दुःख है, इसका स्पष्ट अर्थ है कि हमारे जीवन में किसी न किसी तरह की कोई कमी है। वह कमी सिर्फ परमात्मा की उपस्थिती का अभाव है, और कुछ नहीं। नित्य नियमित ध्यान साधना करें। सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !!
कृपा शंकर
२ मई २०२१

हम अपने परिजनों के असह्य कष्टों के साक्षी होने को बाध्य क्यों हैं? क्या दुःखों से मुक्त होने का कोई उपाय है?

 हम अपने परिजनों के असह्य कष्टों के साक्षी होने को बाध्य क्यों हैं? क्या दुःखों से मुक्त होने का कोई उपाय है?

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नारायण !! हम दिन रात एक करके हाडतोड़ परिश्रम करते हैं, ताकि हम पर आश्रित परिजन सुखी रहें। लेकिन उन पर आये हुए कष्टों के साक्षी होने को भी बाध्य हम होते हैं। इसका क्या कारण है? इस पर गंभीरता से विचार कर के मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि ---
प्रकृति हमें यह बोध कराना चाहती है कि -- "हम यह देह ही नहीं हैं, तब ये परिजन हमारे कैसे हुए?"
सब के अपने अपने प्रारब्ध हैं, सबका अपना अपना भाग्य है। सभी अपने कर्मों का फल भोगने को जन्म लेते हैं। पूर्व जन्मों के शत्रु और मित्र, अगले जन्मों में या तो एक ही परिवार या समाज में जन्म लेते हैं या फिर पुनश्चः आपस में मिल कर पुराना हिसाब किताब चुकाते हैं। यह बात सभी पर लागू होती है।
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इस संसार में कष्ट सब को है। किसी का कष्ट कम है, किसी का अधिक। जो लोग आध्यात्म मार्ग के पथिक हैं उनको तो ये कष्ट अधिक ही होते हैं। लेकिन हम अपनी ओर से हर परिस्थिति में पूर्ण सत्यनिष्ठा से धर्म के मार्ग पर अडिग रहें।
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गीता में भगवान हमें वीतराग और स्थितप्रज्ञ होने का उपदेश देते हैं। स्थितप्रज्ञ होकर ही हम सुख-दुःख से परे हो सकते हैं ---
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२:५६॥"
"यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५७॥"
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भ्रामरी गुफा (साधना में प्रवेश) के द्वार पर, विक्षेप व आवरण (माया के दो रूप) नाम की दो राक्षसियाँ, और प्रमाद-दीर्घसूत्रता (आलस्य और कार्य को आगे के लिए टालने की प्रवृत्ति), राग-द्वेष-अहंकार नाम के राक्षस बैठे हैं। ये बड़े कष्टदायी हैं। बार-बार हमें चारों खाने चित्त गिरा देते हैं। ये कभी नहीं हटते, स्थायी रूप से यहीं रहते हैं। कैसे भी इन से मुक्त होकर भ्रामरी गुफा में प्रवेश करना ही है। परमात्मा को शरणागति द्वारा समर्पित होने का निरंतर प्रयास व प्रभु के प्रति प्रेम, प्रेम, प्रेम, परम प्रेम और परमात्मा का अनुग्रह ही हमारी रक्षा कर सकता है। अन्य कोई उपाय नहीं है। गीता में सारा मार्गदर्शन है। स्वाध्याय और साधना का कष्ट तो स्वयं को ही उठाना पड़ेगा। फेसबुक पर पढ़कर ही किसी को ब्रह्मज्ञान नहीं मिल सकता। ब्रह्मज्ञान की लिंक और सोर्स सब स्वयं की अंतर्रात्मा में है। मार्गदर्शन ही लेना है तो किसी सिद्ध ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य के चरणों में बैठकर बड़ी विनम्रता से लें। ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२ मई २०२१

वीतरागता ही मुक्ति है ---

 वीतरागता ही मुक्ति है ---

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पाशों में बद्ध पशु, पिंजरे में बंद पक्षी, बैलगाडी में जुड़े बैल, और हमारे में क्या अंतर है? क्या हम उस बैल की तरह हैं जो बैलगाड़ी में जुड़ा हुआ है; और जिनको हम प्रियजन कहते हैं वे डंडे से मार-मार कर उसे हाँक रहे हैं? हम उनकी मार खाकर और उनकी इच्छानुसार चलकर बहुत प्रसन्न हैं, और इसे अपना कर्त्तव्य मान रहे हैं|
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स्वतंत्रता अपना मूल्य माँगती हैं, वह निःशुल्क नहीं होती| जीवन में जो कुछ भी मूल्यवान है उसकी कीमत चुकानी पडती है| बंधन में बंधना कोई दुर्भाग्य नहीं है, दुर्भाग्य है ..... मुक्त न होने का प्रयास करना| गुलाम होकर जन्म लेना कोई दुर्भाग्य नहीं है, पर गुलामी में मरना वास्तव में दुर्भाग्य है| पराधीन मनुष्य कभी मुक्ति का आनंद नहीं ले सकता|
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वास्तविक स्वतन्त्रता सिर्फ परमात्मा में ही है, अन्यत्र कहीं नहीं| किसी दूसरे को दोष देने का कोई लाभ नहीं है| अपने दुःखों के जिम्मेदार हम स्वयं हैं...
"सुखस्य दु:खस्य न कोऽपि दाता, परो ददाति इति कुबुद्धिरेषा |
अहं करोमि इति वृथाभिमान:, स्वकर्मसूत्रै: ग्रथितोऽहि लोक: ||
-- आध्यात्म रामायण
कोई किसी को सुख या दुःख नहीं दे सकता, सिर्फ एक कुबुद्धि ही यह सोचता है कि दूसरे मुझे दुःख या सुख दे रहे हैं| कर्ताभाव भी एक व्यर्थ का अभिमान है, इस लोक में सब अपने कर्मफलों से बँधे हुए हैं|
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राग-द्वेष, लोभ और अहंकार से मुक्त व्यक्ति वीतराग कहलाता है| वीतराग व्यक्ति सब तरह के कर्मफलों से मुक्त है| उस पर कोई बंधन नहीं है| इसकी भी कीमत, उपासना, सत्संग, स्वाध्याय, ध्यान आदि की साधना के रूप में चुकानी पड़ती है| मृत्यु से पूर्व इस देह में ही हम स्वतंत्र बनें और स्वतन्त्रता में ही देह-त्याग करें| उपनिषदों और गीता में इस विषय पर ज्ञान भरा पड़ा है|
शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ जुलाई २०२०