Thursday, 8 July 2021

साधनाकाल के आरंभ में हमारा मेरुदंड ही हमारी पूजा की वेदी बन जाता है ---

 साधनाकाल के आरंभ में हमारा मेरुदंड ही हमारी पूजा की वेदी बन जाता है ---

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एक व्यक्तिगत और निजी अनुभव है| साधना के आरंभ काल में मन बहुत अधिक चंचल था और इधर-उधर खूब भागता था| बिल्कुल भी मन नहीं लगता था| किसी मित्र ने मुझे हनुमान जी के बारे में एक पुस्तक दी जो बड़ी अच्छी लगी| फिर मैंने एक प्रयोग किया| मानसिक रूप से हनुमान जी को पीठ पीछे खड़ा कर दिया| उनके हाथ में गदा भी थी| उनसे प्रार्थना की कि किसी फालतू विचार को मत आने देना, और मन भी इधर-उधर भागे तो भागने मत देना| साथ में हनुमान जी के बीजमंत्र का जप भी करता रहा| इस से बहुत अधिक फर्क पड़ा| फिर देखा कि हनुमान जी तो मेरुदंड के भीतर ही आ गए हैं| जब मैं साँस लेता तो हनुमान जी उड़ते हुए अपनी विजय-मुद्रा में मेरी कमर के नीचे से भीतर ही भीतर ऊपर उठते हुए खोपड़ी के ऊपर तक चले जाते, बड़ी शान से वहाँ कुछ देर रुकते, और जब मैं साँस छोड़ता तो कमर के भीतर ही भीतर नीचे आ जाते| धीरे-धीरे हनुमान जी का साकार रूप तो चला गया पर गहन रूप से उनका प्राण-तत्व, सुषुम्ना नाड़ी के भीतर स्थायी रूप से बस गया| इस से बड़ा लाभ मिला और कालांतर में यह प्राण-तत्व ही साधना का आधार बना|
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एक सत्संग में एक महात्मा जी ने एक दूसरी प्रभावशाली विधि भी बताई| उन्होने बताया कि ध्यान मुद्रा में गुदा का तनिक संकुचन कर मूलाधार पर मानसिक जप करें -- "लं", फिर तनिक ऊपर उठाकर स्वाधिष्ठान पर -- "वं", मणिपुर पर -- रं", अनाहत पर -- "यं", विशुद्धि पर -- "हं", आज्ञा पर -- "ॐ", और सहस्त्रार पर कुछ अधिक जोर से -- "ॐ"| कुछ पल भर रुककर विपरीत क्रम से जप करते हुए नीचे आइये| कुछ पल भर रुकिए और इस प्रक्रिया को सहज रूप से जितनी बार कर सकते हैं कीजिये| इस विधि से भी बड़ा लाभ हुआ|
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प्राण-तत्व द्वारा मेरुदंड में की जाने वाली साधनाओं के काल में आचार-विचार का शुद्ध होना बड़ा आवश्यक है, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि ही होती है| भगवान से उनके प्रेम के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरह की कामना ना करें| हृदय में जो प्रचंड अग्नि जल रही है उसे दृढ़ निश्चय और सतत् प्रयास से निरंतर प्रज्ज्वलित रखिए| आधे-अधूरे मन से किया गया कोई प्रयास सफल नहीं होगा| साधना निश्चित रूप से सफल होगी, चाहे यह देह रहे या न रहे ...... इस दृढ़ निश्चय के साथ साधना करें, आधे अधूरे मन से नहीं| परमात्मा का स्मरण करते करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन जीने से तो अच्छा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
८ जुलाई २०२०

Tuesday, 6 July 2021

मूल तत्व का अन्वेषण कैसे करें? वहाँ तक कैसे पहुँचें? ---

मूल तत्व का अन्वेषण कैसे करें? वहाँ तक कैसे पहुँचें? .....
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कोई मेरी बात का बुरा न माने, मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि संसार से विरक्त हुआ व्यक्ति ही परमात्मा के तत्व को समझ सकता है, मेरे जैसा कोई संसारी व्यक्ति नहीं| मैं अपने इस विचार पर दृढ़ हूँ| यह विषय हरिःकृपा से ही समझा जा सकता है| इसके लिए किन्हीं ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से ही मार्गदर्शन लेना पड़ेगा| फिर भी अपनी अति-अति अल्प और अति-अति सीमित बुद्धि से जो कुछ भी मामुली थोड़ा सा आभास है, उसे व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ|
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हमें एक न एक दिन अपने मूल में लौटना ही पड़ेगा| हम सब शाश्वत जीवात्मायें, परमात्मा के अंश हैं| जहाँ से हम आए हैं, उन परमात्मा में, हमें बापस लौटना ही पड़ेगा| परमात्मा ही मूल तत्व हैं, जहाँ से हम आए हैं| जब तक बापस न लौटेंगे, तब तक यही भटकाव चलता रहेगा| यह अवधि-चक्र सामान्यतः दस लाख वर्षों का होता है| पर हर मनुष्य-जीवन में नए-नए कर्मों की सृष्टि भी होती रहती है अतः उनका फल भुगतने के लिए इस अवधि-चक्र का विस्तार भी होता रहता है| छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय के आठवें खंड का मंत्र क्रमांक ४ हमें अपने मूल के अन्वेषण को कहता है| बृहदारण्यकोपनिषद में भी यह कहा गया है| अब प्रश्न यह उदित होता है कि हम अपने मूल में कैसे पहुंचे, और हमारा मूल कहाँ है?
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्| छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्||१५:१||"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः|
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके||१५:२||"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा|
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा||१५:३||"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः|
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी||१५:४||"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः|
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्||१५:५||"
अर्थात ..... श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है||
उस वृक्ष की शाखाएं गुणों से प्रवृद्ध हुईं नीचे और ऊपर फैली हुईं हैं; (पंच) विषय इसके अंकुर हैं; मनुष्य लोक में कर्मों का अनुसरण करने वाली इसकी अन्य जड़ें नीचे फैली हुईं हैं||
इस (संसार वृक्ष) का स्वरूप जैसा कहा गया है वैसा यहाँ उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि इसका न आदि है और न अंत और न प्रतिष्ठा ही है। इस अति दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्ग शस्त्र से काटकर ...
(तदुपरान्त) उस पद का अन्वेषण करना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष पुन: संसार में नहीं लौटते हैं। "मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है"||
जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं||
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गीता के १४वें अध्याय के तीन मंत्र भी इस विषय पर प्रकाश डालते हैं ....
"ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः| जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः||१४:१८||"
"नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति| गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति||१४:१९||"
"गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्| जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते||१४:२०||"
अर्थात ..... सत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च (लोकों को) जाते हैं; राजस पुरुष मध्य (मनुष्य लोक) में रहते हैं और तमोगुण की अत्यन्त हीन प्रवृत्तियों में स्थित तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं||
जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है||
यह देही पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म, मृत्यु, जरा और दु:खों से विमुक्त हुआ अमृतत्व को प्राप्त होता है||
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यह सारा खेल ही गुणों का है अतः भगवान दूसरे अध्याय में ही गुणों से परे जाने को कह देते हैं.....
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन| निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्||२:४५||"
अर्थात ..... हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व? नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित? योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो||
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श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की क्रिया-योग साधना हमें त्रिगुणातीत और सब कर्मफलों से मुक्त होने की विधि बताती है| इस विषय पर विस्तार से जानने के लिए "योगी कथामृत" (Autobiography of a Yogi)पुस्तक पढ़ें जिसके लेखक श्री श्री परमहंस योगानन्द हैं| यह पुस्तक किसी भी पुस्तकों की बड़ी दुकान से या on line भी मिल जाएगी| लाहिड़ी महाशय का साहित्य पहले बांग्ला भाषा में ही उपलब्ध था| अब धीरे धीरे हिन्दी में भी मिलना आरंभ हो गया है| सारी सूचना गूगल पर मिल जाएगी|
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मेरा अनुभव यह है कि जिन का रजोगुण प्रधान है, उन्हें अनाहतचक्र पर ध्यान करना चाहिए| जिन का सतोगुण प्रधान है उन्हें आज्ञाचक्र पर ध्यान करना चाहिए| जिन का तमोगुण प्रधान है, उन्हें ध्यान नहीं करना चाहिए| वे तमोगुण से ऊपर उठने के लिए शरणागत होकर भगवान से प्रार्थना करें और भगवान की साकार यानि सगुण आराधना करें| इस युग में हनुमान जी की भक्ति तुरंत फलदायी है| वे हनुमान जी की या भगवान शिव की शरणागत होकर पूजा-पाठ और स्तुति करें|
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मैंने जो लिखा है वह सिर्फ प्रेरणा ही दे सकता है, कोई ज्ञान नहीं| भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उन से बड़ा कोई गुरु नहीं है| मुझ अकिंचन को जो भी ज्ञान है वह उन्हीं का कृपा प्रसाद है| अतः शरणागत होकर उन से मार्गदर्शन की प्रार्थना करें| निश्चित रूप से उन की कृपा होगी|
ॐ तत्सत || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ जुलाई २०२०

Sunday, 4 July 2021

गुरु पूर्णिमा की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें ---

 गुरु पूर्णिमा की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें --- (४ जुलाई २०२०)

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"अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्| तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः||"
"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्, भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि||"
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मैं अपने गुरु महाराज को अपना सम्पूर्ण अस्तित्व समर्पित करता हूँ| मेरे पास अपना कहने को कुछ भी नहीं है| सब कुछ उन्हीं का है| तत्व रूप में वे मेरे कूटस्थ में नित्य निरंतर विराजमान हैं| वे कोई हाड़-मांस की देह नहीं, परमप्रेममय, नित्य नवीन आनंद, व सर्वव्यापी ज्योतिर्मय चैतन्य हैं| उनके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है|
"गुशब्दस्त्वन्धकार: स्यात् रूशब्दस्तन्निरोधक:| अन्धकारनिरोधित्वाद् गुरूरित्यभिधीयते||"
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प्रतीक रूप में गुरु-चरणों की या गुरु-पादुका की पूजा होती है| मैं गुरु-चरणों की पूजा .... सहस्त्रार में ध्यान द्वारा करता हूँ| ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता उनका विराट रूप है| उस अनंतता से भी परे का ज्योतिषांज्योतिर्मय आलोक जिसे मैं "परमशिव" कहता हूँ, वे स्वयं हैं| वे ही वासुदेव हैं, वे ही नारायण हैं, और वे ही मेरे आराध्य इष्ट देव हैं|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
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"वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं| देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुं||"
"वंशी विभूषित करान्नवनीर दाभात् , पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादरविंद नेत्रात् , कृष्णात परम किमपि तत्वमहंनजाने ||"
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने| प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मण हिताय च| जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"हरे मुरारे मधुकैटभारे, गोविन्द गोपाल मुकुंद माधव |
यज्ञेश नारायण कृष्ण विष्णु, निराश्रयं मां जगदीश रक्षः ||"
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"ऊँ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु | सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्विना वधीतमस्तु, मा विद्विषावहै ||" ऊँ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ||
ॐ तत्सत!! ॐ गुरु!! जय गुरु!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जुलाई २०२०
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पुनश्च :--- इस साल पांच महीने का चातुर्मास है| देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी के बीच के समय को चातुर्मास कहते हैं| इस बार आश्विन माह का अधिकमास है|

Thursday, 1 July 2021

मन में वासनात्मक विचार हैं तो भूल कर भी कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करें ---

मन में वासनात्मक विचार हैं तो भूल कर भी कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करें ...
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आध्यात्मिक प्रगति के लिए वासनाओं से ऊपर उठना होगा क्योंकि अन्धकार और प्रकाश कभी एक साथ नहीं रह सकते| जिन्हें वासनाओं की पूर्ति ही करनी है वे आध्यात्म को भूल जाएँ| जहाँ काम-वासना है वहाँ ब्रह्मचिंतन या परमात्मा पर ध्यान की कोई संभावना नहीं है| वासनात्मक जीवन जी रहे लोगों को भूल कर भी आज्ञाचक्र पर ध्यान नहीं करना चाहिए अन्यथा मस्तिष्क के विकृत होने यानि पागलपन की शत-प्रतिशत संभावना है| जो मैं लिख रहा हूँ वह आध्यात्मिक साधना के अपने निज अनुभव से लिख रहा हूँ, कोई हवा में तीर नहीं मार रहा|
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"जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम|
तुलसी कबहूँ होत नहिं, रवि रजनी इक ठाम||"
जहाँ काम-वासना है वहाँ "राम" नहीं हैं, जहाँ "राम" हैं वहाँ काम-वासना नहीं हो सकती| सूर्य और रात्री एक साथ नहीं रह सकते|
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मनुष्य की सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी है जिसमें प्राण-तत्व ऊपर-नीचे प्रवाहित होती रहती है| यह प्राण तत्व ही हमें जीवित रखता है| इस प्राण तत्व की अनुभूति हमें ध्यान साधना में होती है| जब काम वासना जागृत होती है तब यह यह प्राण प्रवाह मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्र तक ही सीमित रह जाता है, और सारी आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है| परमात्मा के प्रेम की अनुभूतियाँ हृदय से ऊपर के चक्रों में ही होती है, जिनमें विचरण कामवासना से ऊपर उठ कर ही हो सकता है| कामुकता से ऊपर उठकर ही मनुष्य परमात्मा की ओर अग्रसर हो सकता है| मन में वासनात्मक विचार हैं तो भूल कर भी कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करें|
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जो लोग काम वासनाओं की तृप्ति को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं वे अन्धकार और असत्य की शक्तियाँ हैं| उनका अनुसरण घोर अंधकारमय नारकीय लोकों में ले जाता है| ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ जुलाई २०२०
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पुनश्च:
वासनाओं से मुक्ति के लिए ...
आहार शुद्धि, अभ्यास, वैराग्य, स्वाध्याय, सत्संग, व कुसंग त्याग आवश्यक है.

सबसे अधिक महत्वपूर्ण है -- "आहार शुद्धि" ---

 सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ... "आहार शुद्धि" ...

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कुछ भी आहार ग्रहण करने से पूर्व विचार करना चाहिए कि यह भोजन जो हम खा रहे हैं वह भगवान को भोग लगाने के योग्य है या नहीं| भगवान को भोग लगाने के योग्य है तभी उसे खाना चाहिए| बिना भगवान को अर्पित किए बिना जो कुछ भी हम खाते हैं वह पाप का ही भक्षण है| वास्तव में हम जो कुछ भी खाते हैं, वह हम नहीं भगवान स्वयं वैश्वानर के रूप में ग्रहण करते हैं|
"अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः| प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्||१५:१४||
मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ||
पेट में जठराग्नि वैश्वानर है जो प्राण और अपान वायु से संयुक्त हुआ .... भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, और चोष्य .... चार प्रकार के अन्नों को पचाता है| वैश्वानर अग्नि खाने वाला है और सोम खाया जानेवाला अन्न है| भगवान भोजन को खाते ही नहीं, पचाते भी हैं|
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अन्न से ही हमारा मन निर्मित होता है ... ‘अन्नमयं हि सोम्य मनः’ इति अन्नेन हि मन आप्यायते| ‘हे सोम्य! यह मन अन्नमय है।’ इस श्रुति के अनुसार अन्न से ही मन का पोषण होता है| जैसा हमारा अन्न होगा वैसा ही हमारा मन होगा|
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‘आहार की शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, अन्तःकरण की शुद्धि से स्थिर स्मृति होती है| स्मृति की स्थिरता से समस्त बन्धनों से छुटकारा मिलता है|’ इस प्रकार श्रुतियों में ब्रह्म साक्षात्काररूप ज्ञान आहारशुद्धि के अधीन बतलाया गया है| ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः| स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः’|
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होम करते समय हविष्य का हवन करते हैं| उसी प्रकार भोजन का ग्रास मुख में रखते हुए भावना करो कि 'यह हविष्य है एवं पेट में स्थित जठराग्नि में इसका हवन कर रहा हूँ।'
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भोजन पवित्र स्थान में एवं पवित्र पात्रों में बनाया हुआ होना चाहिए| भोजन बनाने वाला व्यक्ति भी शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं प्रसन्न होना चाहिए| अशुद्ध भोजन से तृप्ति एवं शांति नहीं मिल सकती| मासिक धर्म में आयी हुई महिला को भोजन नहीं बनाना चाहिए| अधर्म से उपार्जित धन से प्राप्त हुआ भोजन भी पाप का भक्षण है| धन की पवित्रता भी आवश्यक है|
ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२ जुलाई २०२०

Wednesday, 30 June 2021

हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरिः नाम ----

 हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरिः नाम ----

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लाख बाधाएँ आयें, पर हिम्मत मत हारो, लगे रहो| हम सभी का अन्तःकरण बार-बार भागकर अंधकार की ओर आकर्षित होता है जहाँ माया का साम्राज्य है| वहाँ सारे विकार, निराशा और धोखा ही धोखा है|
लेकिन साथ-साथ अंतर्रात्मा को एक शक्ति प्रकाश की ओर भी खींच रही है, जहाँ तृप्ति, आनंद और संतुष्टि है| हर व्यक्ति के चैतन्य में यह भयंकर द्वंद्व चल रहा है जो बड़ा दुःखदायी है|
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माया की दो शक्तियाँ हैं .... आवरण और विक्षेप| आवरण तो अज्ञान का पर्दा है जो सत्य को ढके रखता है| विक्षेप कहते हैं उस शक्ति को जो भगवान की ओर से ध्यान हटाकर संसार की ओर बलात् प्रवृत करती है| इस से मुक्त होना बड़ा कठिन है| दुर्गा सप्तशती में लिखा है ...
"ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा| बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति||"
बड़े बड़े ज्ञानियों को भी यह महामाया बलात् मोह में पटक देती है फिर सामान्य सांसारिक प्राणी तो हैं ही किस खेत की मूलीै?
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परब्रह्म परमात्मा की परम कृपा से ही हम माया से पार पा सकते हैं, निज बल से नहीं| इसके लिए पराभक्ति, सतत निरंतर अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता है| गीता में भगवान कहते हैं ...
"शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया| आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌||६:२५||
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌| ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌||६:२६||"
अर्थात् शनैः शनैः अभ्यास करता हुआ उपरति यानी वैराग्य/उदासीनता को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे|| यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस जिस विषय के लिए संसार में विचरता है, उस उस विषय से हटाकर इसे बार बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे|
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भगवान को पूर्ण रूप से हृदय में बैठाकर, प्रयास पूर्वक अन्य सब ओर से ध्यान हटाने का अभ्यास करें| किसी भी अन्य विचार को मन में आने ही न दें| पूर्ण रूप से मानसिक मौन का अभ्यास करें| स्वयं को ही देवता बनाना होगा, ‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’ ‘देवता होकर देवताका पूजन करे|’ परमात्मा को छोडकर अन्य सब प्रकार के चिंतन को रोकने का अभ्यास करना होगा| बाहरी उपायों में बाहरी व भीतरी पवित्रता का ध्यान रखना होगा, विशेषकर के भोजन सम्बन्धी| यह मार्ग "क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयोवदन्ति" वाला मार्ग है| अब जब इस तीक्ष्ण छुरे की धार वाले मार्ग का चयन कर ही लिया है तो पीछे नहीं हटना है| अनुद्विग्नमना, विगतस्पृह, वीतराग, और स्थितप्रज्ञ मुनि की तरह निर्भय होकर चलते ही रहना है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० जून २०२०

जो पूर्व जन्म में मेरे गुरु थे वे ही इस जन्म में भी मेरे गुरु हैं ----

 जो पूर्व जन्म में मेरे गुरु थे वे ही इस जन्म में भी मेरे गुरु हैं ---- (Dated ३० जून २०२१)

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चार दिन पश्चात् "गुरुपूर्णिमा" आ रही है| एक प्रबल आकर्षण गुरु-पादुका की पूजा और गुरु-चरणों पर निरंतर ध्यान करने का हो रहा है .....
"अनंत संसार समुद्र तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम् |
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्याम् नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम् ||"
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पूर्वजन्म की और इस जन्म की कुछ अलौकिक अति दिव्य स्पष्ट स्मृतियाँ और सूक्ष्म जगत के कुछ अनुभव हैं, जिन्होंने मुझे आध्यात्म पथ का पथिक बना दिया| उन पर किसी से चर्चा नहीं कर सकता| सार यह है कि गुरुलाभ पूर्वजन्म में हुआ था, लेकिन उसका फल इस जन्म में मिल रहा है| जो पूर्व जन्म में मेरे गुरु थे वे ही इस जन्म में भी मेरे गुरु हैं| सूक्ष्म जगत से वे निरंतर मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| उनके बराबर हितैषी कोई अन्य नहीं है| अब तो मैं उनके प्रति समर्पित होकर उनके साथ एक हूँ| गुरुकृपा का फल यही मिला कि गुरु-चरणों में आश्रय मिल गया, अब कहीं कोई भेद नहीं रहा है|
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हे कूटस्थ गुरु-रूप ब्रह्म आपको नमन है| मैं आपके साथ एक हूँ| आप ही मुझमें व्यक्त हो रहे हो|
"गुशब्दस्त्वन्धकार: स्यात् रूशब्दस्तन्निरोधक:| अन्धकारनिरोधित्वाद् गुरूरित्यभिधीयते||"
"ऊँ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु | सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्विना वधीतमस्तु, मा विद्विषावहै ||"
ऊँ शान्ति: शान्ति: शान्ति: || जय गुरु !!
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३० जून २०२०