Sunday, 27 June 2021

अध्यापक, शिक्षक, आचार्य, प्राचार्य, उपाध्याय और गुरु -- इन सब में क्या अंतर है? ---

सनातन परंपरा में उपरोक्त सब में बहुत अधिक अंतर है| अपनी सीमित व अत्यल्प बुद्धि से कुछ-कुछ प्रकाश इस विषय पर डाल रहा हूँ| जितना मुझे ज्ञान है उतना सब कुछ लिख रहा हूँ, जो नहीं लिखा है उसका मुझको ज्ञान नहीं है|
.
(१) अध्यापक कौन है? :--- अध्यापक हमें सांसारिक विषयों का पुस्तकीय अध्ययन करवाता है, जिस से कोई प्रमाण-पत्र या डिग्री मिलती है| इसके बदले में वह नियोक्ता से वेतन लेता है, और गृह-शिक्षा (ट्यूशन) लेने वालों से शुल्क (ट्यूशन फीस) लेता है| इस पुस्तकीय ज्ञान से हमें कहीं नौकरी करने की या कुछ व्यवसाय करने की योग्यता आती है| इस से सांसारिक ज्ञान बढ़ता है और सांसारिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है| पुराने जमाने के अध्यापक अपने स्टूडेंट्स को जी-जान से पढ़ाते थे, और उनकी योग्यता बढ़ाने के लिए बहुत अधिक परिश्रम करते थे, आजकल यह देखने में नहीं आता|
.
(२) शिक्षक कौन है? :--- शिक्षक वह है जो हमें जीवन में उपयोग में आने वाली व्यवहारिक चीजों की शिक्षा देता है| सबसे बड़े और प्रथम शिक्षक तो माँ-बाप होते हैं| सिखाने के बदले में शिक्षक कोई आर्थिक लाभ नहीं देखता, सिर्फ सम्मान की अपेक्षा रखता है|
.
(३) आचार्य कौन है? :--- वास्तव में आचार्य एक स्थिति है| आचार्य अपने अति उच्च आचरण और अति उच्च चरित्र से अपने अर्जित ज्ञान की शिक्षा देता है| आचार्य के समीप जाते ही मन शांत हो जाता है और अपने आप ही कुछ न कुछ शिक्षा मिलने लगती है| उनके सत्संग से श्रद्धा उत्पन्न होती है|
आजकल तो आचार्य की डिग्री मिलती है जिसको पास करने वाले स्वयं को आचार्य लिखने लगते हैं| कॉलेजों के प्रोफेसरों को भी आचार्य कहा जाने लगा है|
ब्राह्मणों में जो श्रावणी-कर्म करवाते हैं, व यज्ञोपवीत आदि संस्कार करवाते हैं, उन्हें भी आचार्य कहा जाता है| यहाँ आचार्य एक पद और सम्मान होता है| यज्ञादि अनुष्ठानों को करवाने वाले ब्राह्मणों में जो प्रमुख होता है, उसे भी आचार्य कह कर संबोधित करते हैं| यह भी एक पद और सम्मान होता है|
जो मृतकों के कर्म करवाते हैं उन ब्राह्मणों में कोई हीन भावना न आए इसलिए उनको महाब्राह्मण, महापात्र या आचार्य-ब्राह्मण कहा जाता है| यह भी एक सम्मान है|
.
(४) प्राचार्य कौन हैं? :--- वास्तव में प्राचार्य उस आचार्य को कहते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि जिसे वह ज्ञान दे रहा है, वह उसे अपने आचरण में ला रहा है| आजकल तो कॉलेजों के प्रिंसिपलों को प्राचार्य कहा जाता है|
.
(५) उपाध्याय कौन हैं? :--- जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त की शिक्षा देते हैं, उन्हें उपाध्याय कहा जाता है| वे बदले में कोई धन नहीं मांगते पर शिक्षार्थी का दायित्व है कि वह उन्हें यथोचित यथासंभव धन, दक्षिणा के रूप में दे|
.
(६) गुरु कौन है? :--- जो हमें आत्मज्ञान यानि आध्यात्मिक ज्ञान देकर हमारे चैतन्य में छाए अंधकार को दूर करता है, वह गुरु होता है| जीवन में गुरु का प्रादुर्भाव तभी होता है जब हम में शिष्यत्व की पात्रता आती है| यथार्थ में गुरु एक तत्व होता है जो एक बार तो हाड़-मांस की देह में आता है, पर वह हाड़-मांस की देह नहीं होता| गुरु के आचरण व वचनों में कोई अंतर नहीं होता, यानि उनकी कथनी-करनी में कोई विरोधाभास नहीं होता| गुरु असत्यवादी नहीं होता| गुरु में कोई लोभ-लालच या अहंकार नहीं होता| गुरु की दृष्टि चेलों के धन पर नहीं होती| चेलों से वह कभी नहीं पूछता कि उनके पास कितना धन है| गुरु की दृष्टि चेलों की आध्यात्मिक प्रगति पर ही रहती है|
गुरु के उपदेशों का पालन ही गुरु-सेवा है| गुरु यदि शरीर में हैं, तो उनको किसी तरह का अभाव और पीड़ा न हो, इसका ध्यान तो रखना ही चाहिए| आजकल लोग गुरु के देह की या उनके चित्र या मूर्ति की पूजा करते हैं जो मेरे विचार से गलत है| पूजा गुरु-पादुका की होती है| गुरु-पादुका ....एक प्रतीक है गुरु के आचरण को अपने अन्दर में उतारने की| गुरु के शरीर-अवयव को पूजना गुरु के विचारों को मिटटी में मिलाना है|
"ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि||"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जून २०२०

Friday, 25 June 2021

"चित्तवृत्तिनिरोध" क्या होता है?

 

"चित्तवृत्तिनिरोध" क्या होता है?
.
मनुष्य की निम्न प्रकृति और उच्च प्रकृति ..... दोनों जब विपरीतगामी होती हैं, तब बड़ी पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न हो जाती है|आत्मा की अभीप्सा परमात्मा के लिए होती है, यह उच्च प्रकृति है जो परमात्मा की ओर खींचती है|
निम्न प्रकृति वासनाओं की ओर खींचती है| वासनायें चित्त का धर्म हैं| ये मनुष्य को परमात्मा से दूर ले जाती हैं| 

वासनाओं की ओर आकर्षण चित्त की स्वाभाविक वृत्ति है, जिस का निरोध कर उसे परमात्मा की ओर उन्मुख करने की साधना योगसाधना है| तभी इसे "चित्त वृत्ति निरोध:" कहते है|
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
२५ जून २०२०

Wednesday, 23 June 2021

श्रद्धा और विश्वास हो तो तभी हमारे पर भगवान की कृपा होती है ---

 

एक सत्य जो प्रत्यक्ष और व्यवहारिक रूप से मुझे बहुत देरी से समझ में आया, अब तो वह स्पष्ट हो गया है कि .....
हमें जो कुछ भी जीवन में मिलता है, (चाहे वह परमात्मा की कृपा ही क्यों न हो) ..... स्वयं की "श्रद्धा और विश्वास" से ही मिलता है, न कि किसी अन्य माध्यम से| श्रद्धा और विश्वास हो तो तभी हमारे पर भगवान की कृपा होती है| बाकी अन्य सब जैसे पीर-फकीर, कब्र-मकबरे, व महात्माओं के आशीर्वाद ... बहाने मात्र हैं| उनसे कुछ नहीं मिलता| श्रद्धा, विश्वास और समर्पण ... हमारी पात्रता के मापदंड हैं|
.
रामचरितमानस के मंगलाचरण में ही लिखा है ...
"भवानी शङ्करौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ| याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्||"
जिस श्रद्धा एवं विश्वास के बिना सिद्ध पुरुष भी अपने हृदय में स्थित ईश्वर के दर्शन नही कर पाते उन श्रद्धा रूपी पार्वती जी तथा विश्वास रूपी शंकर जी को प्रणाम करता हूँ|
.
गीता में भगवान कहते हैं ....
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः| ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति||४:३९||"
अर्थात श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है| ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है||
ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२४ जून २०२०

भगवान को पाने का एकमात्र मार्ग "भक्ति" है ---

 

भगवान को पाने का एकमात्र मार्ग "भक्ति" है ---
.
गीता में भगवान कहते हैं ...
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः| ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्||१८:५५||"
अर्थात् (उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ| (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है||
.
आचार्य शंकर व स्वनामधन्य अन्य अनेक आचार्यों ने उपरोक्त श्लोक पर बड़ी बड़ी टीकायें की हैं| गीता में कर्म, भक्ति व ज्ञान ... इन तीनों विषयों को बहुत अच्छी तरह समझाया गया है| मैं उन सभी आचार्यों की वंदना करता हूँ जिन्होनें गीता का संदेश जनमानस को समझाया|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
२४ जून २०२०

अहंकार व ब्रह्मभाव में क्या अंतर है?

 अहंकार व ब्रह्मभाव में क्या अंतर है?

.
स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना अहंकार है| शरीर के धर्म हैं ..... भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि| मन का धर्म है राग-द्वेष, मद यानि घमंड आदि| चित्त का धर्म है वासनाएँ| प्राणों का धर्म है शक्ति और बल| इन सब को अपना समझना अहंकार है|
.
ब्रह्मभाव एक अनुभूति का विषय है जिसे सिर्फ सात्विक बुद्धि से ही समझा जा सकता है| परमात्मा सर्वव्यापक हैं| उनकी सर्वव्यापकता के साथ एक होने का बोध ..... ब्रह्मभाव है| यह अनुभूति गहन ध्यान में सभी साधकों को होती है|
.
आत्मा का धर्म है ... परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम (भक्ति)| यही हमारा सही धर्म है| जब परमात्मा के प्रति भक्ति जागृत होती है, तब अभीप्सा का जन्म होता है| यहीं से आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ होता है| भगवान तब गुरु रूप में मार्गदर्शन भी करते हैं, और अनुभूतियों के द्वारा हमें प्रोत्साहित भी करते हैं| उन अनुभूतियों के पश्चात ही हम ..... शिवोंहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ..... कह सकते हैं| यह कोई अहंकार की यात्रा (Ego trip) नहीं बल्कि हमारा वास्तविक अंतर्भाव होता है| अहं ब्रह्मास्मि यानि मैं ब्रह्म हूँ यह कहना अहंकार नहीं है| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२३ जून २०२०

Monday, 21 June 2021

समय का सबसे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता है? ---

 समय का सबसे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता है? ---

.
कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है| मन में हर समय निरर्थक विचार आते रहते हैं, यह अवसाद-ग्रस्तता का मुख्य कारण है| इस मामले में मैंने देखा है कि जो लोग आस्तिक और भक्त हैं उन्हें यह टाइम-पास वाली समस्या नहीं है, वे स्वयं को अपने मानसिक जप से इतना अधिक व्यस्त रखते हैं कि उनके मन में कोई फालतू विचार ही नहीं आता| मुझे जीवन में कुछ ऐसे भक्त भी मिले हैं जो अपने इष्ट देवी/देवता के बीज-मंत्र की जब तक एक-सौ मालायें नहीं फेर लेते तब तक स्वयं को कोई भोजन नहीं देते| कुछ संप्रदायों में उनके बहुत लंबे गुरु-मंत्र की सौलह मालायें एक दिन में फेरना अनिवार्य हैं| अतः वे दिन-रात इसी में लगे ही रहते हैं|
.
जो सत्यनिष्ठ भक्त होते हैं वे तो अपने मन को कभी खाली रहने नहीं देते, हर समय अपने इष्ट देवी/देवता के मंत्र का मानसिक जप करते ही रहते हैं| सोते-जागते हर समय मानसिक रूप से उनके अपने गुरुमंत्र का जाप चलता ही रहता है| ऐसे लोग कभी अवसाद-ग्रस्त नहीं होते और आत्म-हत्या जैसा घटिया विचार तो उनके दिमाग में आता ही नहीं है| भगवान का भक्त कभी आत्म-हत्या नहीं करता| कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी आस्था से सारे दुःख-कष्ट-पीड़ाएँ सहन कर लेता है|
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||"
.
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञों में जप-यज्ञ बताया है| अतः हर समय निरंतर सांसारिक काम के साथ-साथ यह जप-यज्ञ चलता रहे| इस से मन को बड़ा आनंद मिलेगा| कहा जाता है कि जप यज्ञ अत्यन्त कठिन एवं गुरूमुखगम्य है| पर श्रद्धा और विश्वास हो तो हम निष्काम भाव से मंत्र जप कर सकते हैं| भगवान श्रीकृष्ण से बड़ा कोई अन्य गुरु नहीं है| अतः सिर्फ उन की ही सुनेंगे|
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः||१०:२५||"
अर्थात् -- महर्षियोंमें भृगु और वाणियों-(शब्दों-) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ| सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ|
.
सभी को शुभ कामनायें और नमन !! हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२०

Friday, 18 June 2021

जब भी भगवान का स्मरण होता है ---

जब भी भगवान का स्मरण होता है, तब स्वतः ही मन इतना अधिक शांत, प्रेममय व आनंदमय हो जाता है कि उस स्थिति से बाहर आने का मन ही नहीं करता| लेकिन भगवान की माया अति प्रबल है जो विक्षेप उत्पन्न कर ही देती है|

एक न एक दिन तो करुणावश भगवान भी अपना अनुग्रह कर के अपनी माया के आवरण व विक्षेप से मुक्त कर ही देंगे| आज नहीं तो कल यह होना ही है, अतः कोई चिंता नहीं है| भगवान का काम ही है अनुग्रह करना| वे नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? अन्य कोई विकल्प भी नहीं है| सारे तो वे ही हैं, और सब कुछ भी वे ही हैं|
भक्ति और श्रद्धा-विश्वास से सत्यनिष्ठापूर्वक भगवान के ध्यान से शरणागति व समर्पण का भाव उत्पन्न होता है, और चित्त समभाव में अधिष्ठित होने लगता है| उस समय इतनी अधिक शांति मिलती है कि किसी भी तरह की शब्द रचना बड़ी दुरूह हो जाती है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जून २०२०