Monday, 14 June 2021

फेसबुक के अनुभव ---

 फेसबुक के अनुभव .....

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फेसबुक पर आज से दो-चार वर्ष पहिले बहुत अच्छे-अच्छे गंभीर लेखक और पाठक हुआ करते थे| अब तो नगण्य हैं| मैं जुलाई २०११ में फेसबुक पर आया तब हिन्दी में लिखने का बिल्कुल भी अभ्यास नहीं था| फेसबुक पर ही कुछ साधु-संतों ने मुझे हिन्दी में लेख लिखने की प्रेरणा दी और खूब प्रोत्साहन दिया| उस समय मुझे हिन्दी के अधिक शब्दों का ज्ञान नहीं था| मैंने अपने हिन्दी के शब्दकोष को बढ़ाया और हिन्दी में लिखना आरंभ किया तो इतना मजा आया कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा| बहुत गंभीर आध्यात्मिक विषयों पर भी सहज रूप से लिखने लगा| शुरू-शुरू में कुछ भूलें हुईं पर किसी ने बुरा नहीं माना और खूब प्रोत्साहन दिया|
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सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि फेसबुक पर ही देश के अनेक विद्वानों, संतों और भक्तों से परिचय हुआ, जो अन्यथा नहीं हो सकता था| कुछ समूहों में धर्म और ज्ञान-विज्ञान पर खूब चर्चाएँ हुआ करती थीं, जिनसे बहुत कुछ सीखा| मैं सभी के नाम तो नहीं लिख सकता, पर दो-तीन नाम अवश्य लिखूँगा जिनसे परिचय फेसबुक पर ही हुआ था|
सबसे पहिला परिचय आचार्य सियारामदास नैयायिक से हुआ| उन्होने मुझे हिन्दी में लिखने की प्रेरणा दी और उनके व कुछ अन्य संतों के आशीर्वाद से मुझे लिखने में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई| वे रामानंदी वैष्णव संप्रदाय के बहुत बड़े आचार्य हैं|
दंडी स्वामी मृगेंद्र सरस्वती (सर्वज्ञ शंकरेंद्र) के आशीर्वाद से मुझे वेदान्त का व्यवहारिक ज्ञान हुआ| वेदान्त पर साहित्य तो खूब पढ़ा था पर कभी कोई प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं हुई थी| कई अनुत्तरित प्रश्न थे| उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और उनकी उपस्थिति मात्र से ही मुझे कई दिव्य अनुभूतियाँ हुईं जिनसे वेदान्त का व्यवहारिक ज्ञान हुआ और सारे संशय दूर हुए| वे एक सिद्ध पुरुष हैं|
भुवनेश्वर के श्री अरुण उपाध्याय जैसे अलौकिक विलक्षण परम विद्वान से परिचय तो फेसबुक पर ही हुआ था और दो बार उनसे मिलने का सौभाग्य भी मिला| वे चलते-फिरते ज्ञान के भंडार हैं| उनके जैसा कोई अन्य विद्वान मुझे आज तक नहीं मिला| वे पूर्व जन्म के कोई सिद्ध पुरुष हैं जिनका ज्ञान कई जन्मों का है|
भक्तों में इंदौर के स्वर्गीय श्री हेमंत मिश्र उच्च कोटि के शिवभक्त थे| वे समय समय पर बड़े-बड़े विशाल यज्ञ करवाया करते थे जिन में करोड़ों रुपयों का खर्च हुआ करता था| दो बार उनके साथ हवन करने का अवसर मुझे भी मिला है|
इंदौर के ही डॉ. सुमित शुक्ल और उनकी धर्मपत्नी डॉ.(श्रीमती) सुधि शुक्ल दोनों ही विलक्षण व्यक्तित्व के धनी और परम भक्त हैं| उनसे मेरा बहुत अच्छा प्रेम है|
और भी अनेक दिव्य विभूतियाँ हैं जिनसे परिचय फेसबुक पर ही हुया था| कुछ से मिलना भी हुआ और कुछ से नहीं| वे सब मेरे हृदय में हैं और उन्हें मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम समर्पित है|
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क्रिया और वेदान्त की साधना से मुझे अनेक लाभ हुए हैं| अपनी कमियों का पता चला है जिनमें से कुछ तो दूर हुई हैं, और बाकी बची हुई भी दूर हो जाएंगी| सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह हुई है कि कोई भी मुझसे दूर नहीं है| मैं अब किसी के अभाव को अनुभूत नहीं करता| परमात्मा में सभी मेरे साथ एक हैं| सारा ब्रह्मांड मेरा घर है और सारी सृष्टि मेरा परिवार| मैं सभी के साथ एक हूँ| कोई भी मुझसे पृथक नहीं है| क्रियायोग की साधना से प्राण-तत्व व आकाश-तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, और कूटस्थ-चैतन्य में स्थिति होती है| परमशिव का बोध भी बुद्धि से नहीं, ध्यान की अनुभूतियों से ही होता है|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन| ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ जून २०२०
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पुनश्च :--- प्रयागराज के स्वर्गीय पं. मिथिलेश द्विवेदी जी को भी मैं कभी नहीं भूल सकता| वे बड़ी प्रेरणात्मक बातें कहते थे और कभी निराश नहीं होने दिया| एक ही अफसोस रहा कि कभी उनसे मिलने का संयोग नहीं हुआ| उन्होंने अपनी हिन्दी भाषा में लिखी एक पुस्तक मुझे भेंट में दी थीं जो उच्च कोटि की साहित्यिक कृति है| वे एक भक्त और साहित्यकार थे| उर्दू भाषा पर भी उनका बहुत अच्छा अधिकार था| देवनागरी लिपि में लिखा उर्दू का एक लेख भी उन्होनें मुझे नेट पर ही भेजा था जिस से पता चला कि वे उर्दू के भी विद्वान थे| वे चाहे भौतिक देह में न हों पर मेरे हृदय में हैं|
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ओड़ीशा के ही भक्त श्री सोमदत्त शर्मा है जिनसे कई बार चलभाष पर ही सत्संग होता है|

शरणागति और समर्पण का मार्ग ही श्रेष्ठतम है ---

 शरणागति और समर्पण का मार्ग ही श्रेष्ठतम है .....

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वर्तमान काल में आध्यात्मिक योग-साधना के लिए भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताया हुआ शरणागति व समर्पण का मार्ग ही सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ है| इसमें कर्म, भक्ति और ज्ञान .... तीनों ही आ जाते है| यदि प्रबल बौद्धिक जिज्ञासा और समझने की क्षमता है तो उपनिषदों का स्वाध्याय कीजिये| जहाँ परमप्रेम और स्वभाविक अभीप्सा हैं, वहीं शरणागति द्वारा समर्पण की संभावना है| किसी भी तरह की आकांक्षा, कामना या अपेक्षा तुरंत भटका देगी|
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वर्तमान समय में पातंजलि ऋषि के नाम पर हठयोग के जो आसन-प्राणायाम आदि सिखाये जाते हैं, वे हठयोग के हैं, जिनका वर्णन पातंजलि योग-दर्शन में कहीं भी नहीं है| अतः उनके लिए पातंजलि ऋषि का नाम लेना असत्य का प्रचार और गलत बात है| हठयोग के आचार्य तो गुरु गोरखनाथ और घेरण्ड मुनि हैं|
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हठयोग के तीन ग्रंथ हैं .... (१) शिव संहिता, (२) घेरण्ड संहिता (३) हठयोग प्रदीपिका|
शिव-संहिता और हठयोग-प्रदीपिका ..... नाथ संप्रदाय के ग्रंथ हैं| शिव-संहिता के रचयिता गुरु मत्स्येंद्रनाथ को माना जाता है जो गोरखनाथ के गुरु थे| हठयोगप्रदीपिका के रचयिता गुरु गोरखनाथ के शिष्य स्वात्मारामनाथ को माना जाता है|
घेरंड-संहिता के रचयिता घेरंड मुनि हैं| यह ज्ञान उन्होने अपने शिष्य चंड कपाली को दिया था|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार योग का अर्थ है ....
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय| सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते||२:४८||"
अर्थात् हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो| यह समभाव ही योग कहलाता है||
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आचार्य शंकर के अनुसार हमें जीवन का हर कार्य केवल ईश्वर के लिये करना चाहिए| यह भावना भी नहीं होनी चाहिए कि "ईश्वर मुझपर प्रसन्न हों"| इस आशारूप आसक्ति को भी छोड़ कर, फलतृष्णारहित कर्म किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि से उत्पन्न होने वाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है, और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्ति का न होना) असिद्धि है| ऐसी सिद्धि और असिद्धि में भी सम होकर, अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म करना चाहिए| यही जो सिद्धि और असिद्धि में समत्व है इसीको योग कहते हैं।
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तंत्र शास्त्रों के अनुसार योग साधना का उद्देश्य परम शिवभाव को प्राप्त करना है|
भगवान वासुदेव को नमन !!
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"वसुदेव सुतं देवं, कंस चाणूर मर्दनं| देवकी परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगत्गुरुम्||"
"वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् | पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् || पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् | कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जून २०२०

Sunday, 13 June 2021

सत्य सनातन धर्म और भारतवर्ष की सदा विजय हो ---

 सत्य सनातन धर्म और भारतवर्ष की सदा विजय हो ---

परमात्मा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत भूमि में हुई है, इसलिए सत्य सनातन हिन्दू धर्म -- भारत की अस्मिता है। परमात्मा को स्वयं में व्यक्त करने की अभीप्सा, और तदानुरूप सदाचरण -- सनातन हिन्दू धर्म है.
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जो भी व्यक्ति -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल और पुनर्जन्म को मानता हो, व भगवान से अहैतुकी पूर्ण प्रेम करता हो, वह हिन्दू है; चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, या कहीं भी किसी भी परिवार में उसने जन्म लिया हो. हिन्दू कभी पतित नहीं हो सकता.
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प्रश्न (१): भारत की एकमात्र समस्या और समाधान क्या है? प्रश्न (२): हमें भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती? .

 प्रश्न (१): भारत की एकमात्र समस्या और समाधान क्या है? प्रश्न (२): हमें भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती?

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उत्तर (१): मेरी दृष्टि में भारत की एकमात्र और वास्तविक समस्या -- "राष्ट्रीय चरित्र" का अभाव है। अन्य सारी समस्याएँ सतही हैं, उनमें गहराई नहीं है। "राष्ट्रीय चरित्र" तभी आयेगा जब हमारे में सत्य के प्रति निष्ठा और समर्पण होगा। तभी हम चरित्रवान होंगे। इस के लिये दोष किसको दें? -- इसके लिए "धर्म-निरपेक्षता" की आड़ में बनाई हुई हमारी गलत शिक्षा-पद्धति और संस्कारहीन परिवारों से मिले गलत संस्कार ही उत्तरदायी हैं। देश की असली संपत्ति और गौरव उसके चरित्रवान सत्यनिष्ठ नागरिक हैं, जिनका निर्माण नहीं हो पा रहा है। कठोर प्रयासपूर्वक हमें भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था पुनर्स्थापित करनी होगी। यही एकमात्र उपाय है। मेरी दृष्टि में अन्य कोई उपाय नहीं है।
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उत्तर (२). हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती, और आध्यात्मिक मार्ग पर हम सफल नहीं होते। इसका एकमात्र कारण --- "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है। अन्य कोई कारण नहीं है। बाकी सब झूठे बहाने हैं। हम झूठ बोल कर स्वयं को ही धोखा देते हैं। परमात्मा "सत्य" यानि सत्यनारायण हैं। असत्य बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और दग्ध वाणी से किये हुए मंत्रजाप व प्रार्थनाएँ निष्फल होती हैं। वास्तव में हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं। चाहते तो "मन्त्र वा साधयामि शरीरं वा पातयामि" यानि या तो मुझे भगवान ही मिलेंगे या प्राण ही जाएँगे; इस भाव से साधना करके अब तक भगवान को पा लिया होता। हमने कभी सत्यनिष्ठा से प्रयास ही नहीं किया। ज्ञान और अनन्य भक्ति की बातें वे ही समझ सकते हैं, जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है, उन्हें कर्मयोग ही समझ में आ सकता है, उस से अधिक कुछ नहीं। जिनमें तमोगुण प्रधान है, वे सकाम भक्ति से अधिक और कुछ नहीं समझ सकते। उनके लिये भगवान एक साधन, और संसार साध्य है। इन तीनों गुणों से परे तो दो लाख में कोई एक महान आत्मा होती है। हमें सदा निरंतर इस तरह के प्रयास करते रहने चाहियें कि हम तमोगुण से ऊपर उठ कर रजोगुण को प्राप्त हों, और रजोगुण से भी ऊपर उठकर सतोगुण को प्राप्त हों। दीर्घ साधना के पश्चात हम गुणातीत होने में भी सफल होंगे।
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अब और कुछ लिखने को रहा ही नहीं है। आप सब बुद्धिमान हैं। मेरे जैसे अनाड़ी की बातों को पढ़ा, इसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ।
आप सब को सादर नमन !! ॐ तत्सत् !! 🔥🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹🔥
कृपा शंकर
१४ जून २०२१

आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी विफलताओं का एकमात्र कारण .... "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है|

 आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी विफलताओं का एकमात्र कारण .... "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है|

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अन्य कोई कारण नहीं है| बाकी सब झूठे बहाने हैं| हम झूठ बोल कर स्वयं को ही धोखा देते हैं| परमात्मा "सत्य" यानि सत्यनारायण हैं| असत्य बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और दग्ध वाणी से किये हुए मंत्रजाप व प्रार्थनाएँ निष्फल होती हैं|
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वास्तव में हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं| चाहते तो "मन्त्र वा साधयामि शरीरं वा पातयामि" यानि या तो मुझे भगवान ही मिलेंगे या प्राण ही जाएँगे, इस भाव से साधना करके अब तक भगवान को पा लिया होता| हमने कभी सत्यनिष्ठा से प्रयास ही नहीं किया|
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सत्यनिष्ठा को ही भगवान श्रीकृष्ण ने "अव्यभिचारिणी भक्ति" कहा है| उन्होने "अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति", "एकांतवास" और "कुसङ्गत्याग" पर ज़ोर दिया है....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अर्थात अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि ||
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अब और कुछ लिखने को रहा ही नहीं है| आप सब बुद्धिमान हैं| मेरे जैसे अनाड़ी की बातों को पढ़ा इसके लिए आभारी हूँ| आप सब को सादर नमन| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
१४ जून २०२०

जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै ---

 जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै ---

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सूरदास जी के एक भजन की पंक्ति है -- "मेरो मन अनत कहां सुख पावै, जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै।"
कई बार महासागरों में चलने वाले बड़े-बड़े जलयानों पर कोई पक्षी आकर बैठ जाता है। जहाज के चलने के कुछ देर पश्चात वह बापस भूमि पर जाने के लिए उड़ान भरता है, लेकिन जाये तो जाये कहाँ? चारो ओर विराट जलराशि ही जलराशि को देखकर वह बापस जलयान पर ही आ जाता है।
वैसे ही हमारा मन है जो एक बार भगवान को समर्पित हो गया तो अन्यत्र कहीं भी सुख नहीं पाता। माया के आवरण और विक्षेप उसे बहुत अधिक मिथ्या प्रलोभन देकर भटकाते हैं, लेकिन कहीं भी उसे संतुष्टि नहीं मिलती, और भगवान श्रीहरिः के चरण कमलों में लौटने के लिए वह तड़प उठता है। उसे बापस आना ही पड़ता है।
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यह मेरी ही नहीं उन सभी की कहानी है जो आध्यात्म मार्ग के पथिक हैं। वेदान्त-वासना जब एक बार जब हृदय में जागृत हो जाये तो वह अन्य किसी भी लौकिक वासना को अपने आसपास भी नहीं टिकने देती। अतः प्रातः उठते ही पूर्ण भक्ति पूर्वक ध्यान के आसन पर बैठकर गुरु-चरणों का ध्यान करो --
"रात गई, भोर है भई
जागो मेरे बच्चो जागो
बैठ ध्यान के आसन पर
ध्याओ गुरु चरण कमल तुम॥" (गुरु महाराज द्वारा रचित भजन का हिन्दी अनुवाद)
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सहस्त्रार में दिखाई दे रही ज्योति ही गुरु महाराज के चरण-कमल है। कमर सीधी कर के पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाओ। दो तीन बार प्राणायाम कर के शरीर को शिथिल छोड़ दो, और कूटस्थ में गुरु-चरणों का ध्यान करते हुये गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र का खूब श्रवण, और हंसःयोग (अजपा-जप) का कुछ मिनटों तक अभ्यास करो। फिर नित्य की दैनिक दिनचर्या से निवृत होकर पुनश्च: उपासना करो। अपने बीजमंत्र को कभी न भूलो और निरंतर उसका मानसिक जप करते रहो। यह बीजमंत्र ही हमारा कवच है, जो हर प्रतिकूल परिस्थिति में हमारी रक्षा करेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२१
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सूरदास जी का भजन :---
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"मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥
कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै।
परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥
जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै।
सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥"

धर्म-अधर्म, कर्म, भक्ति, और ज्ञान ---

 धर्म-अधर्म, कर्म, भक्ति, और ज्ञान .....

जिससे हमारा सर्वतोमुखी सम्पूर्ण विकास हो, और सब तरह के दुःखों से मुक्ति मिले, वही धर्म है| जो इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता वह धर्म नहीं, अधर्म है| धर्म ही "अभ्यूदय और निःश्रेयस की सिद्धि" है|
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मेरा सौभाग्य है कि मेरा जन्म भारत में हुआ| जो कुछ भी मैं लिख पा रहा हूँ वह तभी संभव हुआ है क्योंकि मैं भारत में जन्मा हूँ| भारत पर भगवान की बड़ी कृपा है| इस भूमि पर अनेक महान आत्माओं ने समय समय पर जन्म लिया है और श्रुतियों, स्मृतियों, व आगम शास्त्रों के माध्यम से धर्म के तत्व को समझाया है| भारत से बाहर या अन्य किसी संस्कृति में यह नहीं हो सकता था|
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रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने रामकथा के माध्यम से जन सामान्य को धर्म की शिक्षा दे दी| रामकथा को ही पढ़ते या सुनते रहने से भक्ति जागृत हो जाती है और एक सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी समझ जाता है कि धर्म और अधर्म क्या है| उनका समय अति विकट था, भारत में सनातन धर्म पर अधर्मियों द्वारा बड़े भयावह भीषण आक्रमण, अत्याचार व जन-संहार हो रहे थे, और जन-सामान्य की आस्था डिग रही थी| उस अति विकट समय में धर्म-रक्षा हेतु इस महान ग्रंथ की रचना कर के उन्होने हम सब पर बड़े से बड़ा उपकार किया और धर्म की रक्षा की| इस ग्रंथ ने देश में उस समय एक प्रचंड ऊर्जा, साहस और प्राणों का संचार किया था|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सिर्फ तीन विषयों .... कर्म, भक्ति और ज्ञान, की चर्चा की है, कोई अन्य विषय नहीं छेड़ा है| इन तीन विषयों की चर्चा में ही धर्म के सारे तत्व को लपेट लिया है, कुछ भी बाहर नहीं छोड़ा है| लेकिन साथ साथ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की बात भी कह दी है कि जिस व्यक्ति में जैसा गुण प्रधान है उसे वैसा ही समझ में आयेगा| अंततः वे शरणागति व समर्पण द्वारा तीनों गुणों व धर्म-अधर्म से भी परे जाने का उपदेश देते हैं| यही गीता का सार है|
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अब अंत में थोड़ी सी अति अति लघु चर्चा तंत्र और योग पर करूँगा क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक ही है, और वह है ..... "आत्मानुसंधान"| यथार्थ में आत्मानुसंधान यानि आत्मज्ञान ही सनातन धर्म है|
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तंत्र मूल रूप से शिव और शक्ति के मध्य के पारस्परिक संवाद हैं| जैसे श्रीराधा और श्रीकृष्ण में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं, वैसे ही शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं| शक्ति, शिव से ही प्रकट होती है और शिव से प्रश्न करती है| शिव, शक्ति को उत्तर देते हैं और शक्ति जब शिव के उत्तरों से संतुष्ट हो जाती है तब प्रसन्न होकर बापस शिव में ही विलीन हो जाती है|
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वैसे तत्व रूप में शिव और विष्णु में भी कोई भेद नहीं है| दोनों एक ही हैं| जो भेद दिखाई देता है वह हमारी अज्ञानता के कारण है|
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जैसा मुझे समझ में आया है उसके अनुसार तंत्र शास्त्रों का सार है कि मनुष्य की सूक्ष्म देह में अज्ञान की तीन ग्रंथियाँ हैं ... ब्रह्मग्रंथि (मूलाधारचक्र में), विष्णुग्रंथि (अनाहतचक्र में) और रुद्रग्रन्थि (आज्ञाचक्र में)| जब तक इन ग्रंथियों का भेदन नहीं होता तब तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती| इन ग्रंथियों के भेदन और अपने परम लक्ष्य आत्मज्ञान को प्राप्त करने की विधि ही योगशास्त्र है| इस से अधिक लिखने की क्षमता मुझमें इस समय नहीं है|
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अब किसी भी तरह के कोई उपदेश अच्छे नहीं लगते, उनमें रुचि अब और नहीं रही है| परमात्मा की परमकृपा से तत्व की बात जब समझ में आने लगती है तब और कुछ भी अच्छा नहीं लगता, सारे भेद भी समाप्त होने लगते हैं| भगवान का साकार या निराकार जो भी रूप है वह जब हृदय में प्रतिष्ठित हो जाता है तब वही सब कुछ बन जाता है|
आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२०