Tuesday, 7 January 2020

भारत एक हिन्दू राष्ट्र है क्योंकि यहाँ की संस्कृति हिन्दू है ....

भारत एक हिन्दू राष्ट्र है क्योंकि यहाँ की संस्कृति हिन्दू है| संस्कृति वह होती है जिसका जन्म संस्कारों से होता है| भारत एक सांस्कृतिक इकाई है| "देश" और "राष्ट्र"..... इन दोनों में बहुत अधिक अन्तर है| "देश" एक भौगोलिक इकाई है, और "राष्ट्र" एक सांस्कृतिक इकाई| भारतीय संस्कृति कोई नाचने-गाने वालों की संस्कृति नहीं है, यह हर दृष्टि से महान व्यक्तियों की संस्कृति है|
(१) हिन्दू कौन है ? :----
जिस भी व्यक्ति के अन्तःकरण में परमात्मा के प्रति प्रेम और श्रद्धा-विश्वास है, जो आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों के सिद्धान्त, व ईश्वर के अवतारों में आस्था रखता है, वह हिन्दू है, चाहे वह विश्व के किसी भी भाग में रहता है, या उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी है| हिन्दू माँ-बाप के घर जन्म लेने से ही कोई हिन्दू नहीं होता| हिन्दू होने के लिए किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है| स्वयं के विचार ही हमें हिन्दू बनाते हैं|
आध्यात्मिक रूप से हिन्दू वह है जो हिंसा से दूर है| मनुष्य के लोभ और राग-द्वेष व अहंकार ही हिंसा के जनक हैं| लोभ, राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति .... परमधर्म "अहिंसा" है| जो इस हिंसा (राग-द्वेष, लोभ व अहंकार) से दूर है वह हिन्दू है|
(२) हिन्दू राष्ट्र क्या है :----
हिन्दू राष्ट्र एक विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प और निजी मान्यता है| हिन्दू राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का एक समूह है जो स्वयं को हिन्दू मानते हैं, जिन की चेतना ऊर्ध्वमुखी है, जो निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करना चाहते हैं, चाहे वे विश्व में कहीं भी रहते हों|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०१९

Saturday, 28 December 2019

"हिन्दुत्व" और "हिन्दू राष्ट्र" पर मेरे विचार :-----

"हिन्दुत्व" और "हिन्दू राष्ट्र" पर मेरे विचार :-----
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हिन्दुत्व :---- जिस भी व्यक्ति के अन्तःकरण में परमात्मा के प्रति प्रेम और श्रद्धा-विश्वास है, जो आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों के सिद्धान्त, व ईश्वर के अवतारों में आस्था रखता है, वह हिन्दू है, चाहे वह विश्व के किसी भी भाग में रहता है, या उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी है| हिन्दू माँ-बाप के घर जन्म लेने से ही कोई हिन्दू नहीं होता| हिन्दू होने के लिए किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है| स्वयं के विचार ही हमें हिन्दू बनाते हैं|
आध्यात्मिक रूप से हिन्दू वह है जो हिंसा से दूर है| मनुष्य के लोभ और राग-द्वेष व अहंकार को ही मैं हिंसा मानता हूँ| लोभ, राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति .... परमधर्म "अहिंसा" है| जो इस हिंसा (राग-द्वेष, लोभ व अहंकार) से दूर है वह हिन्दू है|
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हिन्दू राष्ट्र :---- एक विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प और निजी मान्यता है| हिन्दू राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का एक समूह है जो स्वयं को हिन्दू मानते हैं, जिन की चेतना ऊर्ध्वमुखी है, जो निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करना चाहते हैं, चाहे वे विश्व में कहीं भी रहते हों|
कुछ व्यक्तियों की मान्यता है कि हिन्दू राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का एक समूह है जो भारतवर्ष को अपनी पुण्यभूमि मानता हो| मेरा उन से कोई विरोध नहीं है, पर उनके इस विचार से तो हिन्दू राष्ट्र सीमित हो जाता है| भारत से बाहर रहने वाले वे व्यक्ति जो स्वयं को हिन्दू मानते हैं, फिर हिन्दुत्व से दूर हो जाएँगे| अतः हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को हमें विस्तृत रूप देना होगा|
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उपरोक्त मेरे निजी व्यक्तिगत विचार हैं, अतः किसी को इन से बुरा मानने या आहत होने की आवश्यकता नहीं है| आप सब को नमन| ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२८ दिसंबर २०१९

सुख, शांति, सुरक्षा, आनंद, तृप्ति और संतुष्टि ....

सुख, शांति, सुरक्षा, आनंद, तृप्ति और संतुष्टि .... मुझे परमात्मा के ध्यान में ही मिलती है, अन्यत्र कहीं भी नहीं| किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है| अतः अधिकाधिक समय पूर्ण समर्पित भाव से इसी दिशा में लगायेंगे| पूरा मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा से प्राप्त है, कोई अभाव नहीं है| सिर्फ स्वयं के प्रयासों में ही कमी है, अन्यत्र कहीं भी नहीं| इस कमी को भी पूरी लगन और निष्ठा से दूर करेंगे| मेरे चिंतन पर सबसे अधिक प्रभाव गीता, वेदान्त और योगदर्शन का है जो अपने आप में पूर्ण है|
(१) कर्मयोग :-- परमात्मा की अनुभूतियों की निरंतरता और उनके प्रकाश का विस्तार ही मेरा कर्मयोग है|
(२) ज्ञानयोग :-- कूटस्थ चैतन्य में स्थिति ही मेरा ज्ञानयोग है|
(३) भक्तियोग :-- परमप्रेम रूपी अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति ही मेरा भक्तियोग है|
अब बचा ही क्या है? ॐ ॐ ॐ
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०१९

मुमुक्षुत्व व फलार्थित्व ..... दोनों एक साथ नहीं हो सकते .....

मुमुक्षुत्व व फलार्थित्व ..... दोनों एक साथ नहीं हो सकते .....
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हमारे वश में कुछ भी नहीं है| जगन्माता स्वयम् ही अंगुली पकड़ कर ले जाएगी| सब तरह के भौतिक और मानसिक अहंकार को त्याग कर उन के शरणागत होना पड़ेगा| किसी भी तरह की हीनता का या श्रेष्ठता का भाव नहीं होना चाहिए| अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) उन्हें समर्पित करें| यही एकमात्र उपहार है जो हम भगवान को दे सकते हैं| निष्ठा और श्रद्धा होगी तो वे अंगुली थाम लेंगे|
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बाहरी नामों से उलझन में न पड़ें| जगन्माता भी वे हैं और पिता भी वे हैं, राधा भी वे है और कृष्ण भी वे हैं, सीता भी वे हैं और राम भी वे हैं| राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, नारायण आदि सब वे ही हैं| जहां तक मेरी निजी व्यक्तिगत दृष्टि जाती है, मेरे लिए साकार रूप में वे श्रीकृष्ण हैं तो निराकार रूप में परमशिव हैं| जैसी स्वयं की भावना है वैसे ही वे भी स्वयं को व्यक्त करते हैं .....
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||४:११)"
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जो भक्त जिस फल प्राप्ति की इच्छा से भगवान को भजते हैं, भगवान भी उन को उसी प्रकार भजते हैं| उन की कामना के अनुसार ही फल देकर उन पर अनुग्रह करते हैं| आचार्य शंकर के अनुसार एक ही व्यक्ति में मुमुक्षुत्व (मोक्ष की अभीप्सा) और फलार्थित्व (फल की कामना) दोनों एक साथ नहीं हो सकते| इसलिये जो फल की इच्छा वाले हैं उन्हें फल, व जो मुमुक्षु हैं, भगवान उन्हें मोक्ष प्रदान करते हैं| यह सब हमारे स्वयं पर निर्भर है कि हम भगवान से क्या चाहते हैं|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०१९

Friday, 27 December 2019

हमारे गरीब और लाचार हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन मत करो ....

हे ईसाई धर्म प्रचारको, आप लोग अपने मत में आस्था रखो पर हमारे गरीब और लाचार हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन मत करो| हमारे सनातन धर्म की निंदा और हम पर झूठे दोषारोपण मत करो|
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क्राइस्ट एक चेतना है -- श्रीकृष्ण चैतन्य या कूटस्थ चैतन्य| ईश्वर को प्राप्त करना हम सब का जन्मसिद्ध अधिकार है| सभी प्राणी ईश्वर की संतान हैं| जन्म से कोई भी पापी नहीं है| सभी अमृतपुत्र हैं परमात्मा के| मनुष्य को पापी कहना सबसे बड़ा पाप है| अपने पूर्ण ह्रदय से परमात्मा को प्यार करो|
सभी जीसस क्राइस्ट में आस्था वालों को क्रिसमस की शुभ कामनाएँ|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०१९

मैं एक सलिल-बिन्दु हूँ तो आप महासागर हो -----

मैं एक सलिल-बिन्दु हूँ तो आप महासागर हो -----
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मैं नहीं चाहता कि मैं किसी पर भार बनूँ ..... न तो जीवन में और न ही मृत्यु में| मैं नित्य मुक्त हूँ| मेरे परमप्रिय परमात्मा की इच्छा ही मेरा जीवन है| मेरा आदि, अंत और मध्य ..... सब कुछ परमात्मा स्वयं हैं| यह शरीर-महाराज रूपी पिंड भी परमात्मा को अर्पित है| मेरे सारे बुरे-अच्छे कर्मफल, पाप-पुण्य, और सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हैं| मुझे कोई उद्धार नहीं चाहिए| उद्धार तो कभी का हो चुका है| कोई किसी भी तरह की मुक्ति भी नहीं चाहिए, क्योंकि मैं तो बहुत पहिले से ही नित्यमुक्त हूँ|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्| आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः||६:५||
अर्थात मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध: पतन नहीं करना चाहिये; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है||
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श्रुति भगवती कहती है ..... "एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्नि: सलिले संनिविष्ट:| तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेSयनाय||"
इस ब्रह्मांड के मध्य में जो एक ..... >>> "हंसः" <<< यानि एक प्रकाशस्वरूप परमात्मा परिपूर्ण है; जल में स्थितअग्नि: है| उसे जानकर ही (मनुष्य) मृत्यु रूप संसार से सर्वथा पार हो जाता है| दिव्य परमधाम की प्राप्ति के लिए अन्य मार्ग नही है||
(यह संभवतः अजपा-जप की साधना है जिसका निर्देश कृष्ण यजुर्वेद के श्वेताश्वतरोपनिषद में दिया हुआ है)
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गुरुकृपा से इस सत्य को को समझते हुए भी यदि मैं अपने बिलकुल समक्ष परमात्मा को समर्पित न हो सकूँ तो मेरा जैसा अभागा अन्य कोई नहीं हो सकता| हे प्रभु, मैं तो निमित्तमात्र आप का एक उपकरण हूँ| इसमें जो प्राण, ऊर्जा, स्पंदन, आवृति और गति है, वह तो आप स्वयं ही हैं| मैं एक सलिल-बिन्दु हूँ तो आप महासागर हो| मैं जो कुछ भी हूँ वह आप ही हो| ॐ ॐ ॐ ||
ॐ तत्सत् |
कृपा शंकर
२३ दिसंबर २०१९

जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन 25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है? ....।

जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन 25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है?
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जीसस क्राइस्ट के जन्म दिवस का कोई प्रमाण नहीं है, बाइबल की किसी भी पुस्तक में उनके जन्मदिवस का उल्लेख नहीं है| ईसा की तीसरी शताब्दी तक जीसस का जन्मदिवस नहीं मनाया जाता था| जहाँ तक प्रमाण मिलते हैं 336 AD से इसकी मान्यता के पीछे रोमन सम्राट कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट की भूमिका है| उनका जन्म 27 फरवरी 272 AD को सर्बिया में हुआ था, और उनकी मृत्यु 22 मई 337 AD को निकोमीडिया में हुई| वे सूर्य के उपासक थे और जिस मत को मानते थे उसे Pagan कहा जाता था जिसका अर्थ है 'मूर्तिपूजक'| उन्होने ईसाई मत का प्रयोग अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया, और कोन्स्टेंटिनपोल (कुस्तुनतुनिया) (वर्तमान इस्तांबूल जो तुर्की में है) को 324 AD में बसाया| वे पहले रोमन शासक थे जिन्हें ईसाई बनाया गया था| 'दा विंसी कोड' के अनुसार जब वे मर रहे थे और अपनी मृत्यु शैया पर असहाय थे तब पादरियों ने बलात् उन का बपतिस्मा कर दिया| उन दिनों पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में 24 दिसंबर वर्ष का सबसे छोटा दिन होता था (अब 21दिसंबर), और 25 दिसंबर (अब 22 दिसंबर) से दिन बड़े होने प्रारम्भ हो जाते थे| सूर्योपासक होने के नाते कोन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने यह तय किया कि 25 दिसंबर को ही जीसस क्राइस्ट का जन्मदिन मनाया जाये क्योंकि 25 दिसंबर से बड़े दिन होने प्रारम्भ हो जाते हैं| तभी से 25 दिसंबर को क्रिसमिस मनाई जाती है|
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25 दिसंबर के बारे में दूसरी मान्यता यह है कि उस दिन रोम के मूर्तिपूजक श्रद्धालु लोग 'शनि' (Saturn) नाम के देवता की आराधना करते थे| शनि को कृषि का देवता माना जाता था| उसी दिन फारस के लोग "मित्र" (Mithra) नाम के देवता की आराधना करते थे जिसे प्रकाश का देवता माना जाता था| अतः तत्कालीन पादरियों ने यह तय किया इसी दिन को यदि जीसस का जन्मदिन भी मनाया जाये तो रोमन और फारसी लोग इसे तुरंत स्वीकार कर लेंगे| इस आधार पर ईसाईयत को रोम का आधिकारिक मत और 25 दिसम्बर को आधिकारिक रूप से जीसस क्राइस्ट का जन्म दिन मनाया जाने लगा|
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संयुक्त राज्य अमेरिका में सन 1870 ई.तक क्रिसमिस को एक ब्रिटिश परंपरा मान कर नहीं मनाया जाता था| सन 1870 ई.से इसे आधिकारिक रूप से मनाया जाने लगा| 24 दिसंबर की पूरी रात श्रद्धालु लोग जागकर क्रिसमस के भजन गाते हैं जिन्हें Christmas carols कहते हैं| स्पेन और पुर्तगाल की परंपरा में इसे नाच गा कर मनाते हैं| भारत में पुर्तगालियों का प्रभाव रोमन कैथॉलिकों पर अधिक है विशेषकर गोआ और मुंबई में| इसलिए इस त्योहार को शराब पी कर और नाच गा कर मनाया जाता है| 25 दिसंबर को क्रिसमस की पार्टी में टर्की नाम के एक पक्षी का मांस और शराब परोसी जाती है| इस दिन एक-दूसरे को खूब उपहार भी दिये जाते हैं| सैंटा क्लोज वाली कहानी तो कपोल कल्पित और बच्चों को बहलाने वाली है| यह स्कैंडेनेवियन देशों जहाँ बर्फ खूब पड़ती है से आरंभ हुई परंपरा है|
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मेरी मान्यता :--- मेरी मान्यता है कि भगवान के भजन का कोई न कोई तो बहाना चाहिए ही| मैं विशुद्ध शाकाहारी हूँ और कोई नशा नहीं करता इसलिए कोई नशा या मांसाहार का तो प्रश्न ही नहीं है| इस दिन यथासंभव भगवान का खूब ध्यान और भजन करेंगे| मैं मानता हूँ कि जीसस क्राइस्ट ने भारत में रहकर शिक्षा ग्रहण की और सनातन धर्म की शिक्षाओं का ही फिलिस्तीन में प्रचार किया जहाँ आध्यात्मिक रूप से अज्ञान रूपी अंधकार ही अंधकार था| उन की शिक्षायें समय के साथ विकृत हो गईं| क्रिश्चियनिटी वास्तव में कृष्णनीति है| जब उन्हें शूली पर चढ़ाया गया तब वे मरे नहीं थे| उन्हें बचा लिया गया और वे अपने कबीले के साथ भारत आ गये| कश्मीर के पहलगाँव में उन्होने देह-त्याग किया| उनकी माँ मरियम का देहांत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मरी नाम के स्थान पर हुआ था जहाँ उन की कब्र भी है और उन के नाम पर ही उस स्थान का नाम 'मरी' है| 'दा विंसी कोड' के अनुसार उन की पत्नी मार्था और पुत्री सारा को यहूदी लोग सुरक्षित रूप से फ्रांस ले गये थे, जहाँ उन की मजार की एक संप्रदाय विशेष ने रक्षा की जिन्हें बाद में एक दूसरे संप्रदाय ने मरवा दिया|
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सार की बात यह है कि उन्होने भगवान श्रीकृष्ण की ही शिक्षा का ही प्रसार किया| इस दिन मेरे अनेक मित्र 12 घंटे भगवान का ध्यान करेंगे| अतः मैं भी पूरा प्रयास करूंगा उनका साथ देने में| आप सब मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें|
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात्, पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात्, कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि ||"
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"कस्तुरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकणम् |
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि |
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ||"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ दिसंबर २०१९