Thursday, 26 December 2019

जो चुनावों में वोट नहीं डालते वे हमारी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है .....

हमारी दुर्दशा के लिए मैं उन लोगों को जिम्मेदार मानता हूँ जो चुनावों में वोट नहीं डालते| उन लोगों के कारण ही हमारा लोकतंत्र विफल है| हिंदुओं में सिर्फ जो तथाकथित दलित वर्ग है, वह ही शत-प्रतिशत मतदान करता है| मुसलमान भी शत-प्रतिशत मतदान करते हैं| हिंदुओं में पचास प्रतिशत सवर्ण हिन्दू ही मतदान करते हैं, पचास प्रतिशत तो घर से बाहर ही नहीं निकलते| इसलिए सवर्ण हिंदुओं की कोई कीमत नहीं है|जिनके मत अधिक होते हैं, उनकी ही कद्र होती है| मुसलमानों का वोट बैंक है और दलितों का भी है, पर सवर्ण हिंदुओं का नहीं है|
लोकतंत्र मतदाताओं द्वारा, मतदाताओं के लिए, मतदाता का ही शासन होता है| राजनेताओं को भी इस बात का पता है कि सवर्ण हिंदुओं का कोई वोट बैंक नहीं है, इसलिए वे मुसलमानों का तुष्टीकरण करते है और दलितों की हर बात मान कर उनका आरक्षण बढ़ा देते हैं| सवर्ण हिन्दू सिर्फ शोर मचा कर ही रह जाते हैं| जब तक सवर्ण हिन्दू अपना वोट बैंक नहीं बढ़ाते तब तक उनकी कोई कद्र नहीं होगी|
कृपा शंकर
१० दिसंबर २०१९

मैं क्यों व कैसे जीवित हूँ? ......

मैं क्यों व कैसे जीवित हूँ? ......
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जन्म-मरण और जीवन .... ये सब मेरे वश में नहीं हैं| अब तक मैं यही सोचता था कि अनेक जन्मों के संचित कर्मफलों के प्रारब्ध को भोगने के लिए यह जीवन जी रहा हूँ| पर अब सारा परिदृश्य और धारणा बदल गई है| जिन्होंने इस समस्त सृष्टि की रचना की है वे माँ भगवती जगन्माता ही यह जीवन जी रही हैं| मेरे और इस संसार के मध्य की कड़ी .... ये सांसें हैं| यह जगन्माता का सबसे बड़ा उपहार है| जिस क्षण ये साँसें चलनी बंद हो जाएंगी, उसी क्षण इस संसार से सारे संबंध टूट जाएँगे|
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ये साँसें चल रही हैं जगन्माता के अनुग्रह से| इन दो साँसों के पीछे का रहस्य भी भगवती की कृपा से मुझे पता है कि कैसे प्राणशक्ति इस देह में प्रवेश कर संचारित हो रही है और कैसे उसकी प्रतिक्रया से ये साँसें चल रही हैं| ये सांस कोई क्रिया नहीं, प्राणशक्ति के संचलन की प्रतिक्रिया है| इस प्राण का स्त्रोत और अंत कहाँ है, यह रहस्य भी स्पष्ट है| जिस क्षण जगन्माता की प्राणशक्ति का यह संचलन रुक जाएगा, उसी क्षण ये साँसें भी रुक जाएँगी और यह देह निष्प्राण हो जाएगी|
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कई रहस्य हैं जो जगन्माता के अनुग्रह से ही अनावृत होते हैं| वे रहस्य रहस्य ही रहें तो ठीक है| आप सब को नमन| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
९ दिसंबर २०१९

जबतक हम प्रकाशमान हैं, पूरी समष्टि ही प्रकाशमान है ....

सारी सृष्टि का अंधकार मिलकर भी एक छोटे से दीपक के प्रकाश को नहीं बुझा सकता| चारों ओर से प्राप्त हो रहे नकारात्मक समाचारों को पढ़कर मन लगभग पक्का मान लेता है कि समय बुरा है, विश्व-देश-समाज की स्थिति बुरी है| किन्तु ऐसा नहीं है| भगवान वासुदेव सर्वत्र हैं, उन का ध्यान करो|
>>>>> जबतक हम प्रकाशमान हैं, पूरी समष्टि ही प्रकाशमान है <<<<<
अपने कूटस्थ चैतन्य को ज्योतिर्मय परमात्मा की दिव्य ज्योति से आलोकित रखें| जब भी समय मिले, अपने चैतन्य में ओंकार के रूप में निरंतर प्रवाहित हो रही परमात्मा की वाणी को सुनें| हम आलोकमय होंगे तो पूरी सृष्टि आलोकित होगी| ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
९ दिसंबर २०१९

हमारा युद्ध 'अधर्म' से है .....

हमारा युद्ध 'अधर्म' से है| हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारा भ्रष्ट आचरण है| हमारे भ्रष्ट आचरण के कारण ही पर्यावरण का प्रदूषण है| हमारी सारी समस्याओं के पीछे हमारा लोभ और अहंकार है| यह लोभ और अहंकार ही हिंसा की जननी है| हर कदम पर हमें घूसखोरी, बेईमानी, मिलावट, ठगी, झूठ, कपट, कुटिलता, परस्त्री/पुरुष व पराए धन की कामना ..... आदि दिखाई दे रही है, यह सत्य पर असत्य की विजय है|
अब मेरी आस्था सिर्फ परमात्मा में ही रह गई है, इस संसार से मैं निराश हूँ| आजकल लोग भगवान से प्रार्थना भी अपने झूठ, कपट और बेईमानी में सिद्धि के लिए करते हैं| लोग धर्म की बड़ी बड़ी बातें करते हैं, पर अधर्म एक शिष्टाचार बन गया है| भारत की सबसे बड़ी समस्या और असली युद्ध अधर्म से है, जिसे हम ठगी, भ्रष्टाचार, घूसखोरी और बेईमानी कहते हैं| अन्य समस्यायें गौण हैं| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ दिसंबर २०१९

गीता जयंती पर सभी को शुभ कामनाएँ, अभिनंदन व नमन ....

गीता जयंती पर सभी को शुभ कामनाएँ, अभिनंदन व नमन ....
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गीता की सैंकड़ों टीकाएँ हैं| हर टीकाकार ने अपने अपने दृष्टिकोण व मान्यताओं के अनुसार गीता जी की अलग अलग टीका की है| किन्हीं भी दो टीकाओं में समानता नहीं है| गीता का ज्ञान देते समय भगवान श्रीकृष्ण के मन में क्या था यह तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही बता सकते हैं| हम उनकी कृपा के पात्र बनें और उन्हीं की चेतना में रहें| गीता का ज्ञान हमें प्रत्यक्ष भगवान श्रीकृष्ण से ही प्राप्त हो| हम इस योग्य बनें|
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गीता पर मुझे सबसे प्रिय तो शंकर भाष्य है| फिर उसके बाद श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की परंपरा में ..... भूपेन्द्रनाथ सान्याल, स्वामी प्रणवानन्द, व परमहंस स्वामी योगानन्द की लिखी टीकायें पसंद हैं| लखनऊ के रामतीर्थ प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित गीता की टीका भी बहुत ही अच्छी है| इन के अलावा भी दस-बारह विद्वानों की लिखी टीकाओं का अवलोकन किया है जो मेरे पास हैं|
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अब किसी भी टीका या भाष्य के स्वाध्याय की कोई अभिलाषा नहीं है| प्रत्यक्ष परमात्मा के साक्षात्कार की ही अभीप्सा है|
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अपना कर्ताभाव यदि हम भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दें और स्वयं एक निमित्त मात्र बन कर उपासना करें तो सब कुछ समझ में आ जाएगा| यदि हम इस रथ का सारथी स्वयं भगवान पार्थसारथी को बनायेंगे तो वे स्वयं ही हमारे स्थान पर रथी बन जाएँगे, और शनैः शनैः यह रथ भी वे ही बन जाएँगे| दूसरे शब्दों में इस नौका के कर्णधार भी वे हैं, और यह नौका भी वे ही हैं| इस विमान के पायलट भी वे हैं और यह विमान भी वे ही हैं|
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ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !
कृपा शंकर
८ दिसंबर २०१९

बिना परमात्मा की चेतना के यह शरीर भी इस पृथ्वी पर एक भार ही है .....

बिना परमात्मा की चेतना के यह शरीर भी इस पृथ्वी पर एक भार ही है .....
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चैतन्य में सिर्फ परमात्मा हों| उनके किस रूप की उपासना करें इसका निर्णय उपासक स्वयं करे| सब रूप उन्हीं के हैं व सारी सत्ता भी उन्हीं की है| परमात्मा से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो| किसी भी तरह की निरर्थक टीका-टिप्पणी वालों से कोई मतलब न हो, और न ही आत्म-घोषित ज्ञानियों से| तरह तरह के लोग मिलते हैं, जो एक नदी-नाव का संयोग मात्र है, उससे अधिक कुछ भी नहीं| भूख-प्यास, सुख-दुःख, शीत-उष्ण, हानि-लाभ, मान-अपमान और जीवन-मरण ..... ये सब इस सृष्टि के भाग हैं जिनसे कोई नहीं बच सकता| इनसे हमें प्रभावित भी नहीं होना चाहिए| ये सब सिर्फ शरीर और मन को ही प्रभावित करते हैं| देह और मन की चेतना से ऊपर उठने के सिवा कोई अन्य विकल्प हमारे पास नहीं है| चारों ओर छाए अविद्या के साम्राज्य से हमें बचना है और सिर्फ परमात्मा के सिवाय अन्य किसी भी ओर नहीं देखना है| नित्य आध्यात्म में ही स्थित रहें, यही हमारा परम कर्तव्य है| स्वयं साक्षात् परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं, कुछ भी हमें नहीं चाहिए| यह शरीर रहे या न रहे इसका भी कोई महत्व नहीं है| बिना परमात्मा के यह शरीर भी इस पृथ्वी पर एक भार ही है|
७ दिसंबर २०१९

रहस्यों का रहस्य .....

रहस्यों का रहस्य .....
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यह सारी सृष्टि परमात्मा परमशिव और पराशक्ति की कल्पना, अभिव्यक्ति और एक खेलमात्र है| सारी लीला वे ही खेल रहे हैं| हम तो उन के एक उपकरण और निमित्त मात्र हैं| जो भी दायित्व हमें परमात्मा ने दिया है वह हमें अपने पूर्ण मनोयोग से परमात्मा को ही कर्ता मानकर करना चाहिए| आधे-अधूरे मन से कोई काम न करें| हर काम पूरा मन लगाकर यथासंभव पूर्णता से करें| हमारे किसी भी कार्य में प्रमाद और दीर्घसूत्रता न हो| परमात्मा को स्वयं के माध्यम से कार्य करने दें|अपनी आध्यात्मिक साधना भी निमित्त मात्र होने के भाव से करें| भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है ....
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||"
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अपने माध्यम से सारा कार्य परमात्मा को करने दें| एक अकिंचन साक्षी की तरह रहें, उस से अधिक कुछ भी नहीं| महासागर के जल की एक बूंद, जो प्रचंड विकराल लहरों की साक्षी है, महासागर से मिलकर स्वयं भी महासागर हो सकती है| नारायण नारायण नारायण !
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हर जीव की देह के भीतर एक परिक्रमा-पथ है जिस पर प्राण-तत्व के रूप में वे जगन्माता भगवती स्वयं विचरण कर रही हैं| इस प्राण-तत्व ने ही सारी सृष्टि को चैतन्य कर रखा है| जिस जीव के परिक्रमा-पथ पर प्राण-तत्व अवरुद्ध या रुक जाता है, उसी क्षण उस की देह निष्प्राण हो जाती है|
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हर जीवात्मा परमशिव का ही एक अव्यक्त रूप है, जिसे एक न एक दिन क्रमशः व्यक्त होकर परमशिव में ही मिल जाना है| यही चौरासी का चक्र है| वे परमशिव हमारे ज्योतिर्मय अनंताकाश में सर्वव्यापी सूर्यमण्डल के मध्य में देदीप्यमान हैं| हम उनके साथ नित्यमुक्त और एक हैं पर इस लीलाभूमि में उनसे बिछुड़े हुए हैं|
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"जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।
तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।"
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"आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।
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धर्मस्य तत्वम् निहितं गुहायाम्, धर्म का तत्व तो निविड़ अगम्य गुहाओं में छिपा हुआ है, पर जगन्माता उसे करुणावश सुगम भी बना देती है| सुगम ही नहीं, उसे स्वयं प्रकाशित भी कर देती हैं| यह उनका अनुग्रह है| यह अनुग्रह सभी पर हो|
आप सब परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं| आप सब को नमन!
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०१९