Thursday, 1 May 2025

ब्रह्मशक्ति क्या है? यह जागृत कैसे हो?

 ब्रह्मशक्ति क्या है? यह जागृत कैसे हो?

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इसकी अनुभूति परमात्मा के गहन ध्यान में होती है। इसे शब्दों में व्यक्त करना इस समय तो मेरे लिए असंभव है, क्योंकि मैं अभी कक्षा प्रथम का ही विद्यार्थी हूँ, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए बहुत कुछ होना बाकी है। फिर भी थोड़ा-बहुत प्रयास करता हूँ।
यह सदाशिव परमात्मा की शक्ति है, जो कुंडलिनी के रूप में जागृत होकर हमें परमशिव के साथ एकाकार करती है। इसकी अनुभूति उस समय होती है जब हम सब तरह की कामनाओं/आकांक्षाओं/इच्छाओं से मुक्त होने लगते हैं।
जो जिज्ञासु इस विषय को समझना चाहते हैं, वे एक बार अपनी पूरी एकाग्रता व भक्ति से श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) का स्वाध्याय करें, और भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें। भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा ही हमारे अंतस के अंधकार को दूर कर, हमें ज्ञान प्रदान कर सकती है।
"वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम्। देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्॥"
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥"
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२५

जोधपुर की एक पुरानी स्मृति ---

 वैशाख शुक्ल ५ तदनुसार ३० अप्रेल २०१७ को आद्य शंकराचार्य जयंती पर मैं कांची कामकोटी पीठम् की जोधपुर शाखा में स्वामी मृगेंद्र सरस्वती जी का मेहमान था| वहाँ सभी से मुझे जो प्रेम और मान-सम्मान मिला उसके लिए मैं पूज्यपाद स्वामी जी और उनसे जुड़ी सभी दिव्यात्माओं का ह्रदय से आभारी हूँ|

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उस दिन वहाँ संपन्न हुए सभी धार्मिक कार्यक्रम भव्यतम थे जिनकी मैं अब कल्पना मात्र ही कर सकता हूँ| पूज्य स्वामी जी स्वयं साक्षात् शिव स्वरुप हैं और उनसे जुड़ी सभी आत्माएँ दिव्यतम हैं|
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जोधपुर के हरीश्चन्द्रेन्द्र यति, इंदौर से आये डा.सुमित शुक्ल, डा.सुधि शुक्ल, सागर से आये श्री नितिन शुक्ल, बलिया से आये डा.अश्विनी मिश्र, जोधपुर और आसपास से आये स्वामीजी के अनेक शिष्यों से पुनः मिलना एक सुखद अनुभव था| जोधपुर के प.अभिषेक जोशी जी से दूर का परिचय तो कई वर्षों से था पर मिलना पहली बार ही हुआ|
पिछली दो शिवरात्रियाँ स्वामीजी के सान्निध्य में उनके आशीर्वाद से मनाई हैं और गत सिंहस्थ कुम्भ में भी उन की कृपा से उनका सत्संग लाभ खूब मिला है|
व्यवहारिक वेदान्त की अनुभूतियाँ उनके सानिध्य में खूब होती हैं| यही उनके आध्यात्मिक चुम्बकत्व का आकर्षण है|
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आराध्य देव भगवान परमशिव को नमन जो सदा मेरे कूटस्थ में बिराजमान हैं, और आप सब के रूप में साकार हैं | ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
१ मई २०१७

जीवन बहुत छोटा है अतः कैसे इस का सदुपयोग किया जाए इस पर विचार करें

 "रामनाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार| तुलसी भीतर बाहिरऊ, जो चाहसि उजियार||"

यहाँ संत तुलसीदास जी ने बहुत ही सुन्दर बात कही है कि देह रूपी मंदिर के द्वार की देहरी पर रामनाम रुपी दीपक को जला देने से बाहर और भीतर चारों और उजियाला छा जाएगा| पर राम नाम रूपी दीपक को कब प्रज्जवलित किया जाए?
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कबीरदास जी ने कहा है --
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब| पल में परलय होएगी, बहुरी करोगे कब||"
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इस बारे में योगवाशिष्ठ का आदेश है .....
"अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो वृद्ध: सन किम् करिष्यसि| स्वगात्राण्यपि भाराय भवन्ति ही विपर्यये||"
अर्थात जो श्रेय कर्म है उसे आज से ही नहीं बल्कि अभी से ही करना आरम्भ करो| बुढ़ापे में भला कितना काम पूरा कर सकोगे? उस समय तो अपना शरीर ही तुम्हे भारी बोझा सा लगेगा तब तुम श्रेय साधना का अभ्यास करने के अनुपयुक्त हो जाओगे|
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मनुष्य कुछ दशाब्दियों के लिए यह देह धारण करता है| अनंत जीवन में इन दशाब्दियों का क्या महत्व है? जीवन बहुत छोटा है अतः कैसे इस का सदुपयोग किया जाए इस पर विचार करें|
कुछ लोग कहते हैं कि जब हाथ पैर काम करना बंद कर देंगे तब भगवान का नाम लेंगे| तब वे क्या सचमुच ऐसा कर पायेंगे? इस पर विचार करें|
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वर्षों पूर्व मैं एक बार मॉरिशस गया था| वहाँ अधिकाँश लोगों को भोजपुरी बोलते देखकर आश्चर्य हुआ| एक गाँव में अनेक लोग मेरे से मिलने आये| उन्होंने अपने पूर्वजों के बारे में बताया कि कैसे अँगरेज़ लोग धोखे से गिरमिटिया मजदूर बना कर उन्हें यहाँ ले आये और बापस जाने के सब मार्ग बंद कर दिए| सिर्फ राम नाम के भरोसे उन्होंने हाड-तोड़ मेहनत की और इस पथरीली धरा को कृषियोग्य और स्वर्ग बना दिया| उनका एकमात्र आश्रय राम का नाम ही था और वही उनका मनोरंजन था| यही हाल फिजी और वेस्ट इंडीज़ में गए भारतीयों का हुआ| राम का नाम सबसे बड़ा सहारा है|
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कृपाशंकर
१ मई २०१३

रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के सोयें ---

 रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के सोयेंगे, तो अगले दिन प्रातःकाल आपकी नींद भगवान की गोद में ही खुलेगी।

आप स्वयं को धन्य मानेंगे कि भगवान स्वयं ही आपको याद कर लेते हैं। यदि यही दिनचर्या बनी रहेगी तो मृत्यु के समय भी आप स्वयं को भगवान की गोद में ही पायेंगे।
समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है --- परमात्मा का निरंतर स्मरण !! रात्रि को सोने से पहिले और प्रातःकाल उठते ही परमात्मा का यथासंभव गहरे से गहरा ध्यान करें। परमात्मा एक प्रवाह हैं, जिन्हें स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दें। वे एक रस हैं, जिन का रसास्वादन निरंतर करते रहें। अपने हृदय का पूर्ण प्रेम और स्वयं को भी उन्हें समर्पित कर दें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
१ मई २०२१ .
पुनश्च: ---
निरंजन माला घट मे फिरे दिन रात
उपर आवे निचे जावे,स्वास स्वास चली जाय।
संसारी नर समझे नही रे,वृथा जन्म गमाय॥१॥
सोहंम मन्त्र जपे नित प्राणी,बिन जिव्हा बिन दाँत।
अष्ट पहर मे सोवत जागत,कबहु न पलक सकात॥२॥
सोहम हंसा हंसा सोहम बार बार उलटाय।
सतगुरु पुरा भेद बतावे,निश्चय मन ठहरात॥३॥
जो जोगी जन ध्यान लगावे,उठ सदा प्रभात।
ब्रह्मानंद परम पद पावे,बहुरी जन्म नही आय॥૪॥

निरंतर परमात्मा का चिंतन ही मेरा कर्म, भक्ति और ज्ञान है ---

निरंतर परमात्मा का चिंतन ही मेरा कर्म, भक्ति और ज्ञान है। इस जीवन में अब एकमात्र आकर्षण परमात्मा का ही रह गया है। किसी भी तरह के वाद-विवाद, दर्शन शास्त्र, और सिद्धांतों में अब कोई रुचि नहीं रही है। जब ईश्वर स्वयं सदा समक्ष हैं, तब अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।

मृत्यु के समय हम स्वयं को भगवान की गोद में ही पायेंगे । अब कैसी प्रार्थना? जिनके लिए प्रार्थना करते हैं, वे तो स्वयं यहाँ साक्षात् बिराजमान हैं। मैं उनके साथ एक हूँ। सारे भेद समाप्त हो गए हैं। दिन में २४ घंटे, सप्ताह में सातों दिन, सिर्फ आप ही आप रहें, मैं नहीं। रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान निमित्त भाव से कर के इस तरह सो जाएँ जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ की गोद में सो रहा है। अगले दिन प्रातःकाल उठेंगे, तब स्वयं को भगवान की गोद में ही पाएंगे। आप स्वयं को धन्य मानेंगे कि भगवान स्वयं ही आपको याद कर लेते हैं। यदि यही दिनचर्या बनी रहेगी तो मृत्यु के समय भी आप स्वयं को भगवान की गोद में ही पायेंगे।

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समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है -- परमात्मा का निरंतर स्मरण !! परमात्मा एक प्रवाह हैं, जिन्हें स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दें। वे एक रस हैं, जिन का रसास्वादन निरंतर करते रहें। अपने हृदय का पूर्ण प्रेम और स्वयं को भी उन्हें समर्पित कर दें। उनसे अन्य कोई है ही नहीं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ मई २०२२

भगवान से दूरी, और अहंकार हमें मनुष्य से असुर/राक्षस बना देता है ---

दूसरे एक स्थान पर मेरे एक मित्र हैं, जो किसी जमाने में भगवान के बहुत अच्छे भक्त और सज्जन व्यक्ति थे, लेकिन अब एक असुर/राक्षस (Monster) मात्र बन कर रह गये हैं। उनके अहंकार की अत्यधिक प्रबलता और भौतिक धन की प्रचूरता के अभिमान ने उन्हें मनुष्य से राक्षस बना दिया है।
मैंने उनकी सहायता का प्रयास किया लेकिन पूर्णतः विफल रहा। किसी तरह उनसे बच कर मैं ही बापस आ गया। अपने कर्मों के फल वे भुगत रहे हैं।
> परमात्मा के निरंतर स्मरण, चिंतन, मनन, जप, निदिध्यासन, और ध्यान, आदि के अतिरिक्त अन्य सब दायित्वों से स्वयं को कभी न कभी मुक्त कर लेना चाहिए। हम न तो किसी के बंधन में हैं, और न कोई अन्य हमारे बंधन में। हम परमात्मा में स्वतंत्र हैं, किसी भी तरह का कोई बंधन हम पर नहीं है। वास्तविक स्वतन्त्रता परमात्मा में ही है। >
"ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी॥
सूर श्याम मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥" १ मई १९२४

Wednesday, 30 April 2025

यह जीवन अब मुक्तावस्था में निरंतर ब्राह्मी-स्थिति में ही रहे (शिवो भूत्वा शिवं यजेत्) ---

 

यह जीवन अब मुक्तावस्था में निरंतर ब्राह्मी-स्थिति में ही रहे (शिवो भूत्वा शिवं यजेत्) --- . मैं नित्यमुक्त, बड़ी सत्यनिष्ठा से, अपने हृदय की बात कह रहा हूँ। जिन की समझ में आये उन का मंगल हो, और जिन की समझ में न आये उन का भी मंगल हो। बाल्यकाल से ही मैं एक गहन जिज्ञासु रहा हूँ जो अति उत्सुकता से अपने आसपास के घटनाक्रम का बहुत गहराई से अवलोकन करता है। जीवन में ऊँच-नीच, न्याय-अन्याय, और अच्छा-बुरा सब कुछ बहुत अधिक देखा है, और उससे बहुत कुछ सीखा भी है। मेरे भी अपने आदर्श हैं, और अपनी स्वयं की विचारधारा भी है। लेकिन मैं अपने चारों ओर छाई हुई असत्य और अंधकार की शक्तियों से बहुत ही अधिक पीड़ित रहा हूँ। उन्होंने मुझे बहुत अधिक दुःख दिया है। इनके पीछे क्या रहस्य है? मुझे नहीं पता। पिछले जन्मों के कर्मफल रहे होंगे। जीवन के इस संध्याकाल में अब कोई कामना या आकांक्षा नहीं रही है। अवशिष्ट जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, उसी की उपासना में यह जीवन व्यतीत हो जाये, ताकि जो भी हो वह मंगलमय हो।

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एक अभीप्सा है -- अव्यक्त को व्यक्त करने की। किसी भी तरह का कोई संशय या शंका नहीं है। प्रकृति की प्रत्येक शक्ति मेरा साथ देगी ऐसी मेरी दृढ़ आस्था, श्रद्धा और विश्वास है। परमात्मा मेरे साथ हैं जिनके समक्ष कोई असत्य का अंधकार नहीं टिक सकता। मैं सदा कूटस्थ चैतन्य में, यानि ब्राह्मी स्थिति में रहूँ, और मेरी चेतना परम प्रेममय होकर समष्टि के साथ एक होकर रहे।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
यह अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्म में होनेवाली स्थिति है, जहाँ सर्व कर्मों का संन्यास कर के केवल ब्रह्मरूप से स्थित हो जाना है। परमात्मा सब गुरुओं के गुरु हैं। उनसे प्रेम करो, सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे। हम भिक्षुक नहीं, परमात्मा के अमृत पुत्र हैं। मुझे सब में परमात्मा के ही दर्शन होते हैं। अतः सभी को मैं नमन करता हूँ।
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भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं --
"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैतिदिव्यं॥८:१०॥"
अर्थात - भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित कर के, फिर निश्छल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष को ही प्राप्त होता है|
आगे भगवान कहते हैं --
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृदय में स्थिर कर के फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित कर के, योग धारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है|
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निश्छल मन से स्मरण करते हुए भृकुटी के मध्य में प्राण को स्थापित करना और ॐकार का निरंतर जाप करना -- यह एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए हमें आज से इसी समय से अभ्यास करना होगा। उपरोक्त तथ्य के समर्थन में किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, भगवान का वचन तो है ही, और सारे उपनिषद्, शैवागम और तंत्रागम इसी के समर्थन में भरे पड़े हैं।
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ध्यान का अभ्यास करते करते चेतना सहस्त्रार पर या ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस शरीर से बाहर भी चली जाए तो चिंता न करें। जब तक प्रारब्ध में जीवन लिखा है, मृत्यु नहीं आने वाली। सहस्त्रार में तो गुरु महाराज के चरण कमल हैं। कूटस्थ केंद्र भी वहीं चला जाता है। वहाँ स्थिति मिल गयी तो गुरु चरणों में आश्रय मिल गया।
चेतना ब्रह्मरंध्र से बाहर निकल कर अनंत में या उस से भी परे रहने लगे तब तो और भी प्रसन्नता की बात है। वह विराटता ही तो "विराट पुरुष" है।
उस अनंतता से भी परे परमशिव की अनुभूति "पञ्चमुखी महादेव" के रूप में होती है। इस देह से बाहर दिखाई देने वाली ज्योति भी अवर्णनीय और दिव्यतम है। परमात्मा के प्रेम में मग्न रहें, फिर तो परमात्मा ही परमात्मा होंगे, न कि हम।
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खोपड़ी के पीछे का भाग मेरुशीर्ष (Medulla Oblongata) हमारी देह का सर्वाधिक संवेदनशील स्थान है जहाँ मेरुदंड की सभी नाड़ियाँ मष्तिष्क से मिलती हैं। इस भाग की कोई शल्यक्रिया नहीं हो सकती। हमारी सूक्ष्म देह में आज्ञाचक्र यहीं पर स्थित है। यह स्थान भ्रूमध्य के एकदम विपरीत दिशा में है। योगियों के लिए यह उनका आध्यात्मिक हृदय है। यहीं पर जीवात्मा का निवास है। इसके थोड़ा सा ऊपर ही शिखा बिंदु है, जहाँ शिखा रखते हैं। उस से ऊपर सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र है।
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गुरु की आज्ञा से शिवनेत्र होकर यानि बिना किसी तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासिकामूल के समीपतम लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी मुद्रा में या जीभ को बिना किसी तनाव के ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखते हुए, प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को अपने अंतर में सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का ध्यान-चिंतन नित्य नियमित करें। गुरु की कृपा से कुछ महिनों या वर्षों की साधना के पश्चात् विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। यह ब्रह्मज्योति और प्रणव की ध्वनि दोनों ही आज्ञाचक्र में प्रकट होती हैं, पर इस ज्योति के दर्शन भ्रूमध्य में प्रतिबिंबित होते हैं, इसलिए गुरु महाराज सदा भ्रूमध्य में ध्यान करने की आज्ञा देते हैं। ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के पश्चात् उसी की चेतना में सदा रहें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है। यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से एक है।
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दो बातें और कहना चाहता हूँ, जिन्हें बताने की भगवान से मुझे पूरी अनुमति है। आज अन्तःचेतना में स्वयं भगवान शिव ने दो बातें कहीं ---
एक तो उन्होंने कहा कि मुक्ति या मोक्ष की कामना ही मुक्ति और मोक्ष के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मुक्ति और मोक्ष की कामना है तब तक हम बंधन में हैं, तब न तो मुक्ति मिल सकती है और न ही मोक्ष।
दूसरी बात उन्होंने कही -- "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्।" अर्थात स्वयं शिव बनकर शिव की उपासना करो॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ तत्सत्। ॐ स्वस्ति। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
३० अप्रेल २०२३