Saturday, 19 April 2025

मन को आत्मा में स्थित कर और कुछ भी चिंतन न करें ---

 

मन को आत्मा में स्थित कर और कुछ भी चिंतन न करें। यह भगवान का आदेश है। भगवान कहते हैं --
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"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥६:२४॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके॥
Renouncing every desire which imagination can conceive, controlling the senses at every point by the power of mind;
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"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
Little by little, by the help of his reason controlled by fortitude, let him attain peace; and, fixing his mind on the Self, let him not think of any other thing.
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"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥
When the volatile and wavering mind would wander, let him restrain it and bring it again to its allegiance to the Self.
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"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।6.29।।
अर्थात् -- योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है॥
He who experiences the unity of life sees his own Self in all beings, and all beings in his own Self, and looks on everything with an impartial eye;
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"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥६:३१॥"
अर्थात् -- जो पुरुष एकत्वभाव में स्थित हुआ सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझे भजता है, वह योगी सब प्रकार से वर्तता हुआ (रहता हुआ) मुझमें स्थित रहता है॥
The sage who realizes the unity of life and who worships Me in all beings, lives in Me, whatever may be his lot.
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१८ अप्रेल २०२५

मैं साँस नहीं ले रहा। स्वयं परमात्मा इस सारी सृष्टि के रूप में मेरे माध्यम से साँस ले रहे हैं ---

 मैं साँस नहीं ले रहा। स्वयं परमात्मा इस सारी सृष्टि के रूप में मेरे माध्यम से साँस ले रहे हैं।

(I am not breathing -- I am being breathed by the Divine).
यह देह परमात्मा का एक उपकरण है। परमात्मा अपने इस उपकरण से साँस ले रहे हैं। मेरा कुछ होना, यानि पृथकता का बोध -- एक भ्रम मात्र है। मैं और मेरे प्रभु -- एक हैं।
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परमात्मा के सभी रूपों में सबसे अधिक स्वभाविक आकर्षण भगवान श्रीकृष्ण का है। उनका आकर्षण इतना अधिक प्रबल है कि मैं स्वयं को रोक नहीं सकता। मैं ध्यान तो परमशिव का करता हूँ लेकिन अनुभूतियाँ सदा भगवान श्रीकृष्ण की होती हैं। शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक हैं।
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इस सृष्टि में जड़ हो या चेतन, सभी का धर्म होता है। सारी सृष्टि अपने सनातन नियमों से चल रही है। यहाँ अधर्म का कोई अस्तित्व नहीं है। जो कहता है कि मेरा कोई धर्म नहीं है, वह अपने स्वयं के विनाश को निमंत्रित कर रहा है, विनाश ही उसका धर्म है। यहाँ हर ऊर्जा कण, उसके प्रवाह, स्पंदन, व आवृति का धर्म है। प्राण और चेतना का भी धर्म है। धर्म ही समस्त सृष्टि और उसकी गतिशीलता के अस्तित्व का कारण है।
. "वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम्। देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्॥
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥" ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ हरिः ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर १९ अप्रेल २०२५

हम प्रेममय ही नहीं, स्वयं परमप्रेम बन जायें, हमारी साधना का यही उद्देश्य हो ---

--- "तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण" ---
हम प्रेममय ही नहीं, स्वयं परमप्रेम बन जायें, हमारी साधना का यही उद्देश्य हो --
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कभी-कभी मन में अनेक बार एक विचार उठता था कि श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वाधिक प्रिय शब्द कौन सा है। भगवान के लिए श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक शब्दों का प्रयोग हुआ है। लेकिन सबसे अधिक प्रिय शब्द जो मुझे लगा है, वह है --"कूटस्थ"। कूटस्थ कौन है? भगवान श्रीकृष्ण स्वयं "कूटस्थ" हैं। "कूटस्थ" एक अनुभूति है जो परमशिव का बोध कराती है। परमात्मा सर्वत्र हैं, लेकिन वे कहीं भी दिखायी नहीं देते, इसलिये वे "कूटस्थ" हैं।
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श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम, वेदान्त के ब्रह्म, और रामायण के श्रीराम -- एक ही हैं। उनमें कोई अंतर नहीं है।
इसकी अनुभूति ध्यान-साधना में होती है। पता नहीं क्या बात है, मैं परमात्मा के किसी भी रूप का ध्यान करूँ, अनुभूति मुझे श्रीकृष्ण के अनंत परम ज्योतिर्मय रूप की ही होती है, इसीलिए उनके लिए मुझे "कूटस्थ" शब्द सर्वाधिक प्रिय है। ज्योतिर्मय सच्चिदानंद भगवान श्रीकृष्ण की अनंत चेतना ही "कूटस्थ-चैतन्य" है। वे ही शांभवी मुद्रा में मेरे कूटस्थ में अपना ध्यान स्वयं कर रहे हैं।
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एक बार मन में एक विचार आया कि परमात्मा के अनेक रूपों के अनेक बीजमंत्र हैं, मेरे लिए कौन सा बीजमंत्र सर्वाधिक उपयुक्त है? उस समय मैं एक गाँव में एक महात्मा जी का सत्संग कर रहा था। उनसे मैंने कुछ भी नहीं पूछा, अचानक ही उन्होने मुझे गोपाल-सहस्त्रनाम का एक गुटका देकर उसका स्वाध्याय करने को कहा। गोपाल-सहस्त्रनाम खोलते ही सामने भगवान श्रीकृष्ण का बीजमंत्र दिखायी दिया। भगवती महाकाली और कामदेव का बीज भी वही है। सारे संशय मिट गये। देहरादून में कोलागढ़ रोड पर एक वयोवृद्ध ब्रह्मज्ञ महात्मा रहते थे, अब तो वे ब्रह्मलीन हो गये हैं। उन्होंने हिमालय में वर्षों तक खूब तपस्या की और भगवान का साक्षात्कार किया। उनसे सत्संग के लिए मेरा तीन बार देहरादून जाना हुआ था। फोन पर भी अनेक बार उनसे सत्संग हुआ। उन्होने मुझ पर कृपा कर के बिना पूछे ही एक बार साधना के अनेक रहस्य अनावृत कर दिये। उसके पश्चात कोई संशय नहीं बचा। अब मन में कोई प्रश्न उठता है तो उसका उत्तर श्रीमद्भगवद्गीता के स्वाध्याय से मिल जाता है। कोई संशय नहीं है।
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एक बहुत प्रबल आकर्षण है जो निरंतर बढ़ रहा है। मैं स्वयं को रोक नहीं सकता। हरिवंश राय बच्चन जी की एक प्रसिद्ध कविता है --
--- "तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण" ---।
इस जन्म में नहीं, तो अगले जन्म में ही सही। यह एक सतत/अनवरत प्रक्रिया है जो अनेक जन्मों तक चलती रहती है। एक न एक दिन पूर्ण तो होती ही है।
हरिः ॐ तत्सत् ॥
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२५

विवाह की संस्था लगभग नष्ट होने लगी है। प्रबुद्धजन इसे बचाने का प्रयास करें ---

विवाह की संस्था लगभग नष्ट होने लगी है। प्रबुद्धजन इसे बचाने का प्रयास करें --
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आजकल नव-विवाहितों के दाम्पत्य जीवन में बहुत अधिक तनाव रहने लगा है। इसका प्रमुख कारण पति-पत्नी दोनों की ओर से बहुत अधिक अपेक्षा है। दूसरा कारण देरी से यानि बढ़ी हुई आयु में विवाह करना है। बढ़ी हुई आयु में विचार परिपक्व हो जाते हैं, और सामंजस्य नहीं बैठता। फिर तनाव और कलह रहता है। लोग अच्छी आजीविका (Career) बनाने के चक्कर में देरी से विवाह करते हैं, जो गलत है। किसी भी परिस्थिति में युवती का विवाह २१ वर्ष तक की आयु में, और युवक का विवाह २५ वर्ष तक की आयु में हो जाना चाहिये। फिर अपनी आजीविका (career) विवाह के बाद बनाते रहो।
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आजकल विवश होकर पति-पत्नी और उन के घरवाले एक दूसरे को सुधारने के लिए अनेक अनुष्ठान और पूजा-पाठ करवाते हैं। उनसे कोई लाभ नहीं होता, केवल धन का अपव्यय होता है। ऐसा कोई मंत्र-तंत्र, अनुष्ठान या विद्या नहीं है जो किसी को अपने अनुकूल बना सके या सुधार सके। समाज में ठग लोग भरे पड़े हैं। दुःखी होकर पीड़ित व्यक्ति ऐसे ठगों के चक्कर में पड़ जाता है, और सब कुछ ठगा जाता है। यह आस्था का शोषण है।
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यदि पति-पत्नी में नहीं बनती तो आपसी सहमति से संबंध-विच्छेद कर लो और दूसरा विवाह कर लो। एक-दूसरे पर झूठे आरोप लगाने, और चरित्र-हनन से तो यही ठीक है। सरकार को भी चाहिए कि विवाह-विच्छेद (तलाक) के कानून सरल बना दे। आजकल तो परिस्थितियाँ बड़ी विकट हैं।
१९ अप्रेल २०२५

Friday, 18 April 2025

यह लेख मैं राष्ट्रहित में लिख रहा हूँ, इसमें कोई राजनीति नहीं है ....

 यह लेख मैं राष्ट्रहित में लिख रहा हूँ, इसमें कोई राजनीति नहीं है ....

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कश्मीर घाटी के वे लोग जो भारत के विरोध में हर अवसर पर और हर स्थान पर भारत विरोधी नारेबाजी और प्रदर्शन कर रहे हैं, संभवतः पाकिस्तान अधिकृत गुलाम कश्मीर की वास्तविकता से परिचित नहीं है| उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि बाकी के पाकिस्तान के क्या हाल हैं|
भारत से बाहर मेरा अनेक देशों में अनेक पाकिस्तानियों से मिलना और विचार-विमर्श हुआ है और पाकिस्तान की मानसिकता को मैं खूब अच्छी तरह समझता हूँ| यहाँ मैं कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ|
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पाकिस्तान में पंजाबी पाकिस्तानी सबसे अधिक दबंग और प्रभावशाली हैं| वे अपने सामने अन्य पाकिस्तानियों को कुछ भी नहीं समझते| पाकिस्तान की राजनीति में, सेना में और प्रशासन में उन्हीं का दबदबा है और वे अन्य प्रान्त के लोगों को बड़ी हीन दृष्टी से देखते हैं| आपस की बोलचाल में वे पंजाबी भाषा का ही प्रयोग करते हैं|
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भारत से गए लोगों की वहाँ कोई कद्र नहीं है, उनको मुहाजिर कहा जाता है और बड़ी नीची निगाह से देखा जाता है| पंजाबी लोग तो उन्हें अपने पास बैठाना भी पसंद नहीं करते|
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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों को पंजाबी पाकिस्तानियों द्वारा आतंकित कर के और बहुत डरा धमका कर रखा हुआ है| वहां के कश्मीरियों के पास अपनी व्यथा व्यक्त करने के लिए कोई मंच नहीं है|
पाकिस्तान के सारे आतंकी प्रशिक्षण केंद्र गुलाम कश्मीर में हैं| उन आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों को चलाने वाले सारे पंजाबी पाकिस्तानी हैं|
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गुलाम कश्मीर में कोई विकास का कार्य नहीं हुआ है| बेरोजगार लोगों के लिए आतंकी बन जाना एक मजबूरी है| कश्मीरी लोग यदि पाकिस्तान में चले भी जाते हैं तो जीवन भर रोयेंगे| उनको यहाँ जो सुख सुविधा मिल रही है वह वहाँ एक दुःस्वप्न मात्र होगी| उनको वहाँ पाकिस्तानी पंजाबियों का गुलाम बनकर जीवन भर रहना होगा|
और भी कई बाते हैं, पर विस्तार भय से अधिक नहीं लिख रहा|
तथाकथित शांतिप्रिय भटके हुए कश्मीरी लोगों को भगवान सद्बुद्धि दे|
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पुनश्चः :....
श्रीनगर को सम्राट अशोक ने बसाया था|
जब चीनी यात्री ह्वैंसान्ग भारत आया था तो उसने कश्मीर में ढाई हज़ार से अधिक बौद्ध मठों का होना बताया था|
कश्मीरी शैव दर्शन वास्तविक कश्मीरियत है, इसका जन्म और विकास कश्मीर में ही हुआ|
पूरा कश्मीर अतीत में वैदिक शिक्षा का केंद्र रहा है|
आज से सात सौ वर्ष पूर्व तक कश्मीर में शत प्रतिशत हिन्दू थे| बौद्ध भी हिंदुत्व के ही भाग थे|
जब मंगोलों के आक्रमण मध्य एशिया पर हुए तब मध्य एशिया के अनेक मुसलमान शरणार्थी के रूप में कश्मीर में आये जिन्हें वहाँ के हिन्दू राजाओं ने शरण दी और आगे का इतिहास राजतरंगिनी में लिखा है|
आज जो कश्मीर के हिन्दुओं पर बीत रही है कल को वैसा ही योरोप में होगा| .
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आजकल योरोप में जो शरणार्थी जा रहे हैं वह योरोप पर एक ज़िहादी आक्रमण है| जो भारत के हिन्दू कश्मीरियों पर बीती है वही योरोप के मूल निवासियों पर बीतने वाली है| वह दिन दूर नहीं है जब पूरे योरोप पर इस्लामी शासन होगा|
यह कोई कल्पना नहीं एक वास्तविकता है|
१९ अप्रेल २०१६

जो स्वयं से पृथक है, उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। जो स्वयं के साथ एक है, वही मुझे स्वीकार्य है ---

 जो स्वयं से पृथक है, उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। जो स्वयं के साथ एक है, वही मुझे स्वीकार्य है।

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भगवान का जो भी रूप मेरे साथ एक है वही मुझे स्वीकार्य है, मैं उसी के प्रति समर्पित हूँ। भगवान कभी भी मुझ से दूर नहीं थे, इस जन्म से पूर्व भी मेरे साथ एक थे, और इस भौतिक शरीर की मृत्यु के बाद भी मेरे साथ एक रहेंगे। इस जन्म में वे ही माँ-बाप, सगे-संबंधी, शत्रु-मित्र और परिचित-अपरिचित के रूप में आये। मुझे किसी से भी जो भी प्रेम मिला है, वह भगवान का ही प्रेम था। वे हर समय मेरे साथ एक हैं। उनका साथ शाश्वत है। वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं। जब हम सर्वात्मभाव से एकता को देखते हैं, तब हम परमात्मा के साथ एक हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में उनका शाश्वत वचन है ---
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर १९ अप्रेल २०२५

Thursday, 17 April 2025

ईश्वर की प्राप्ति मेरा धंधा (व्यवसाय) है ---

 ईश्वर की प्राप्ति मेरा धंधा (व्यवसाय) है। इस व्यवसाय में कुछ मिलता नहीं है, जो कुछ भी पास में है, वह भी छीन लिया जाता है। इस धंधे में जो पड़ गया उससे कुछ भी अपेक्षा करना बेकार है।

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ईश्वर बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे अपने प्रेमी से शत-प्रतिशत समर्पण मांगते हैं, उससे कम कुछ भी नहीं। अपने से पृथक कुछ भी चिंतन को श्रीमद्भगवद्गीता में उन्होंने व्यभिचार की संज्ञा दी है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
(Unswerving devotion to Me, by concentration on Me and Me alone, a love for solitude, indifference to social life;)
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भगवान क्या कहते हैं, इसे समझने के लिए इससे पूर्व के तीन श्लोकों को समझना भी अनिवार्य है ---
"अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥१३:९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"आसक्तिर्णभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१३:१०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥"
Humility, sincerity, harmlessness, forgiveness, rectitude, service of the Master, purity, steadfastness, self-control;
"इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷"
Renunciation of the delights of sense, absence of pride, right understanding of the painful problem of birth and death, of age and sickness;
"आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता॥"
Indifference, non-attachment to sex, progeny or home, equanimity in good fortune and in bad;
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महाभारत के अनुशासन-पर्व के १५वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को महर्षि तंडी कृत शिव-सहस्त्रनाम का उपदेश दिया है, उसमें भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उल्लेख किया है। यह उपदेश भगवान श्रीकृष्ण को महर्षि उपमन्यु से मिला था।
यहाँ केवल श्रीमद्भगवद्गीता की ही चर्चा करेंगे
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परमात्मा का आकर्षण बड़ा प्रबल है। बुद्धि इसे नहीं समझ सकती। उनकी अनुभूति इतनी दिव्य है कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती। यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं; अतः इस पर चर्चा केवल मुमुक्षुओं से ही की जा सकती है। जिज्ञासु जन इस विषय का व्यावहारिक अनुसंधान करें। जो सिर्फ बुद्धि द्वारा ही समझना चाहते हैं, उन्हें भी बौद्धिक संतुष्टि तो मिलेगी ही। इस विषय को विस्तार से समझने के लिए शंकर भाष्य और अन्य भी दो-तीन भाष्यों का स्वाध्याय करें व भगवान से प्रार्थना और उन का ध्यान करें। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ अप्रेल २०२५