पूरे विश्व में भारत को छोड़ कर क्या अन्य भी कोई देश धर्म-निरपेक्ष है? ---
Monday, 7 June 2021
पूरे विश्व में भारत को छोड़ कर क्या अन्य भी कोई देश धर्म-निरपेक्ष है? ---
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विश्व में लगभग ५७ मुस्लिम देश हैं, पर कोई भी धर्मनिरपेक्ष नहीं है| मध्य एशिया के देशों ने फिर से इस्लाम को स्वीकार कर लिया है| अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश, इन्डोनेशिया, मलयेशिया व ब्रुनेई मुस्लिम देश हैं| वहाँ किसी भी अन्य मत का प्रचार वर्जित है| कोई गैर-मुस्लिम किसी मुस्लिम लड़की से शादी नहीं कर सकता|
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यूरोप व अमेरिका के सभी देशों में शासक वर्ग सर्वप्रथम चर्च के प्रति वफादार है| रूस में रसियन ऑर्थोडॉक्स चर्च का शासन पर पूरी तरह दखल है| पूर्वी योरोप के देशों ने ईसाई मत अपना लिया है| फिलीपींस ईसाई देश है| चीन के लोग फिर से बौद्ध धर्म को अपनाने लगे हैं पर कुंगफुत्सीवाद यानि कन्फ्यूशियस (कुन फु) का प्रभाव अभी भी जनमानस पर सर्वाधिक है| कोरिया, जापान, विएतनाम, थाइलेंड, कंबोडिया, म्यांमार व श्रीलंका बौद्ध देश हैं|
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केवल भारत ही एकमात्र धर्मनिरपेक्ष (सेक्यूलर) देश है| भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है -- हिन्दू विरोध| जो हिन्दुओं को जितना अधिक बुरा बताता है वह उतना ही बड़ा धर्मनिरपेक्ष है| जो हिंदुहित की बात करता है वह सांप्रदायिक है| भारत में जब तक हिन्दू बहुमत है तभी तक यह धर्म-निरपेक्षता रहेगी| जिस दिन देश में हिन्दू 50% से कम हो जाएगा, भारत भी एक मुस्लिम देश हो जाएगा और हिंदुओं की वही स्थिति होगी जो पाकिस्तान और बांग्लादेश में है| पाकिस्तान में विभाजन के समय 23% हिन्दू थे जो अब 1% से भी कम हैं| बाकी के कहाँ गए? आसमान खा गया या धरती निगल गई?
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जून २०२०
Friday, 4 June 2021
इस छोटे से हृदय में वे कैसे समा जाते है?
भगवान तो बहुत विराट हैं, फिर वे इस छोटे से हृदय में कैसे समा जाते है? एक छोटी सी कटोरी लेकर महासागर से जल मांगने चला गया| महासागर ने कहा कि यह सारा जल तुम्हारा है, ले लो| कटोरी तो बहुत छोटी थी, किसी काम की नहीं थी, अतः फेंक दी| जल कैसे लें? आश्चर्य! सारा जल या तो इस छोटे से हृदय में भर गया, या फिर हृदय ही जल की एक बूंद बनकर उस महासागर में समा गया|
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अब सब कुछ खत्म हो गया है| सिर्फ भगवान वासुदेव ही सामने रह गए हैं|
४ जून २०२०
हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है -- परमात्मा की प्राप्ति ---
हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है ... परमात्मा की प्राप्ति .....
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परमात्मा की प्राप्ति हमें क्यों नहीं होती और वे कैसे प्राप्त हों? इसका जितना स्पष्ट वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में है उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं है| स्वाध्याय और पुरुषार्थ तो हमें स्वयं को ही करना होगा, कोई दूसरा इसे हमारे लिए नहीं कर सकता| हमें न तो किसी मध्यस्थ व्यक्ति को प्रसन्न करना है और न किसी मध्यस्थ व्यक्ति के पीछे पीछे भागना है| किसी भी तरह के वाद-विवाद में न पड़ कर अपना समय नष्ट न करें और उसका सदुपयोग परमात्मा के अपने प्रियतम रूप के नाम-जप और ध्यान में लगाएँ|
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कमर को सीधी कर के बैठें, भ्रूमध्य में जप और ध्यान करें| एकाग्रचित्त होकर उस ध्वनि को सुनते रहें जो ब्रह्मांड की ध्वनि है| हम यह देह नहीं है, परमात्मा की अनंतता हैं| अपनी सर्वव्यापकता पर ध्यान करें| फिर पाएंगे कि परमात्मा तो वहीं बैठे हैं, जहाँ पर हम हैं|
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः|९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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परमात्मा से "परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है| अपने "भौतिक व्यक्तित्व से मोह" हमारे "लोभ व अहंकार" को जगाकर हमें "हिंसक" बनाता है| स्वयं के भौतिक व्यक्तित्व की दासता और मोह हमें हिंसक बना देता है| इस व्यक्तित्व की दासता से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है ..... "परमात्मा से परम-प्रेम और समर्पण"| जब हम परमात्मा को "प्रेम" और "समर्पण" करते हैं तब वही "प्रेम" और "समर्पण" अनंत गुणा होकर हमें ही बापस मिलता है| तब हम "जीव" नहीं, स्वयं साक्षात "शिव" बन जाते हैं|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ अप्रेल २०२०
"वासुदेवः सर्वं इति" ---
"वासुदेवः सर्वं इति" .....
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अत्यधिक भावुक हो कर भावविभोर व भावविह्वल होना मेरी एक कमजोरी है जिस पर नियंत्रण मेरे वश में नहीं है| अपनी इस कमजोरी को एक ईश्वर-प्रदत्त अवसर मानकर उसका सदुपयोग करना ही विवेक है| आजकल कुछ भी लिखना असंभव सा हो गया है| कुछ भी लिखते हैं या करते हैं तो भगवान वासुदेव की साकार छवि सामने आ जाती है| अब उन्हें निहारें या अन्य कोई काम करें? उन्हें निहारना ही अधिक प्रिय लगता है| पूरी सत्यनिष्ठा से यह अप्रिय सत्य लिख रहा हूँ कि मेरी सारी साधनायें छुट गई हैं| जो कुछ भी होता है या जो कुछ भी यदि कोई करता है, तो वे ही करते हैं, मैं नहीं| जब "वासुदेवः सर्वं इति" हो जाता है तब कोई भी साधना संभव ही नहीं रहती है| यह अपने आप में ही एक साधना बन जाती है| भगवान कहते हैं ....
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
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यह अनुभूति ईश्वर की परम कृपा से ही होती है| जब भगवान ने करुणावश इतनी बड़ी कृपा की है तो इसे क्यों नकारें? इस जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि ही मैं यही मानता हूँ| भगवान ने गीता के सातवें अध्याय में ही कहा है कि भोग-विलास की थोड़ी सी भी कामना जिनमें बाकी है उनसे वे भी दूर ही रहते हैं|
तेरहवें अध्याय में तो वे स्पष्ट कहते हैं ....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
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और कुछ भी लिखना अब संभव नहीं है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जून २०२०
Tuesday, 1 June 2021
भगवान कहते हैं ..... यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ) ---
भगवान कहते हैं ..... यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ) ---
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"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः||१०:२५||
अर्थात् "मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ| मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ||"
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अग्नि पुराण के अनुसार ....."जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः| तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः||" इसका अर्थ है .... ‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश ..... इन दोनों प्रयोजनों को पूरा कराने वाली साधना को ‘जप’ कहते हैं|
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अतः सबसे बड़ा यज्ञ ... "जपयज्ञ' है| इस से बड़ा दूसरा कोई यज्ञ नहीं है| इसमें हम अपनी स्वयं की ही हवि शाकल्य बन कर, स्वयं ही श्रुवा बन कर, स्वयं की ही ब्रह्मरूप अग्नि में, स्वयं ही ब्रह्मरूप कर्ता बन कर हवन करते हैं| हमारा गन्तव्य भी ब्रह्म ही है|
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कोई भी साधना जितने सूक्ष्म स्तर पर होती है वह उतनी ही फलदायी होती है| जितना हम सूक्ष्म में जाते हैं उतना ही समष्टि का कल्याण कर सकते हैं| वाणी के चार क्रम हैं ----- परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी| जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण को बैखरी वाणी कहते हैं| उससे पूर्व मन में जो भाव आते हैं वह मध्यमा वाणी है| मन में भाव उत्पन्न हों, उससे पूर्व वे मानस पटल पर दिखाई भी दें वह पश्यन्ति वाणी है| और उससे भी परे जहाँ से विचार जन्म लेते हैं वह परा वाणी है|
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पश्यन्ति और परा में प्रवेश कर के ही हम समष्टि का वास्तविक कल्याण कर सकते हैं| जप के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वाणी का स्तर कैसा हो, इसे हर व्यक्ति अपने अपने स्तर पर ही समझ सकता है| हमारी चेतना सूक्ष्म देह में मेरुदंड के किस चक्र में है, उसी के अनुसार हमारे विचारों की सृष्टि होती है| यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं| अतः जप हमेशा आज्ञाचक्र से ऊपर ही अति सूक्ष्म स्तर पर करना चाहिए|
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साधनाकाल के आरंभ में जप वाणी द्वारा बोलकर ही होता है| फिर हरिःकृपा से शनैः शनैः आज्ञाचक्र से सहस्त्रार, फिर सहस्त्रार से ब्रह्मरंध्र, फिर ब्रह्मरंध्र से परे अनंत विस्तार में, और अनंत विस्तार से भी परे "परमशिव" में होता है| वहीं क्षीरसागर है जहाँ भगवान नारायण का निवास है| जब उनकी और भी अधिक कृपा होगी तब वे इस से से भी परे ले जाएँगे| परमात्मा की कृपा पर ही सब निर्भर है, स्वयं के प्रयासों पर नहीं| प्रयास भी वे ही करवाते हैं, और यथार्थ में करते भी वे स्वयं ही हैं|
गीता के निम्न श्लोकों को स्वयं को ही समझना होगा .....
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्| ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना||४:२४||"
"सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः| इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्||१८:६४||
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः| तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम||१८:७८||"
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हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! जय गुरु !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जून २०२०
पुनश्च: :--- भगवान श्रीकृष्ण ने ऐकाक्षर ब्रह्म ओंकार के अतिरिक्त अन्य किसी भी मंत्र के जप को नहीं बताया है|
क्या भ्रष्टाचार को तंत्र-मंत्र से समाप्त किया जा सकता है?
क्या भ्रष्टाचार को तंत्र-मंत्र से समाप्त किया जा सकता है?
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एक बहुत पुरानी स्मृति है सन १९७६ की| मुझे कुछ दिनों के लिए पूर्वी यूरोप के देश रोमानिया के कोन्स्तांजा (Constanta) नगर में जाना पड़ा था| उस समय जहाँ तक मैं समझता हूँ, इतना भ्रष्ट देश दुनियाँ में शायद ही कोई दूसरा होगा| भ्रष्टाचार ही वहाँ का शिष्टाचार था| लोगों की मजबूरी थी| वहाँ के कम्युनिष्ट तानाशाह निकोलाई चाउशेस्को और उसकी पत्नी एलेना ने देश का सारा धन तो लोगों से छीनकर अपने पास जमा कर रखा था और लोगों को मार्क्सवाद के नाम पर अपना गुलाम बना कर रखा था| किसी भी नागरिक में स्वाभिमान नहीं बचा था और देश की अधिकांश महिलाओं की तो बहुत ही बुरी गति थी|
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अब उपरोक्त घटना के १३ वर्ष बाद दिसंबर १९८९ की बात है| मैं पूर्वी यूरोप के ही मार्क्सवादी देश यूक्रेन गया हुआ था जो तब तक सोवियत संघ का ही भाग था| रूसी भाषा का उस समय तक अच्छा ज्ञान था (अब तो भूल गया हूँ) अतः भाषा की कोई कठिनाई नहीं थी| एक दिन वहाँ के टीवी पर समाचार देखा कि रोमानिया में मार्क्सवाद विरोधी क्रांति हो गई है, वहाँ का तानाशाह निकोलाई चाउशेस्को और उसकी पत्नी एलेना दोनों ही हेलिकॉप्टर से भाग रहे थे, लोगों ने नीचे से गोलियां चला कर हेलिकॉप्टर को नीचे गिरा दिया और दोनों को पहले तो पकड़ लिया, फिर पीट-पीट कर मार डाला|
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सबसे बड़ा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब सोवियत संघ ने इस घटना का समर्थन किया| यह मेरे तब तक के जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य था| मैं उसी समय समझ गया कि मार्क्सवाद का अंत आ चुका है और सोवियत संघ भी बिखर सकता है|
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उससे पहिले सन १९६८ की एक घटना याद आ गई| उस समय मैं सोवियत रूस में एक प्रशिक्षण के लिए गया हुआ था| अक्तूबर १९६८ में हंगरी में मार्क्सवाद विरोधी क्रांति हो गई थी तब ४ नवंबर १९६८ को रूसी सेना ने हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट और अन्य नगरों पर अपने टैंकों से भयंकर आक्रमण किया और अगले ६ दिनों में २५०० से अधिक हङ्गेरियन क्रांतिकारियों को मार कर बापस मार्क्सवादी सत्ता को स्थापित किया| लगभग दो लाख हङ्गेरियन देश छोड़कर भाग गए और ७०० से अधिक सोवियत सैनिक भी मारे गए|
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रोमानिया में मार्क्सवादी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह और सोवियत संघ द्वारा उसका समर्थन ..... एक महान प्रतिक्रांति थी जो विश्व से मार्क्सवाद के अंत की शुरुआत थी| सौभाग्य से मैं भी इसका साक्षी था|
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लोग कहते हैं कि रोमानिया के कुछ कबीलों की महिलाओं को तंत्र-मंत्र का ज्ञान था जो दिन रात वहाँ की भ्रष्ट सरकार और व्यवस्था को बदलने के लिए कुछ अभिचार कर्म किया करती थीं| कई वर्षों की साधनाओं के उपरांत उनके अभिचार कर्म सिद्ध हुए और वहाँ की भ्रष्ट व्यवस्था धराशायी हुई| यह सुनी हुई बात है| इस विषय पर श्री नरेश आर्य जी ने एक वीडियो और पोस्ट भी डाली थी जिसका लिंक नीचे कॉमेंट बॉक्स में है|
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भारत में भी अभिचार कर्म .... वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारन जानने वाले बहुत लोग होंगे| मैं क्षमायाचना सहित पूछना चाहता हूँ कि क्या भारत के सारे तांत्रिक, मांत्रिक, अघोरी सब मिलकर कोई ऐसा अनुष्ठान कर सकते हैं जो भारत के भीतर और बाहर के सब शत्रुओं का नाश कर सके? मैं अनाड़ी आदमी हूँ, इसलिए ये सब लिख रहा हूँ| आप सब को नमन !
कृपा शंकर
१ जून २०२०
Sunday, 30 May 2021
राग-द्वेष से रहित होकर ही हम प्रसन्न और स्वस्थ रह सकते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है .....
राग-द्वेष से रहित होकर ही हम प्रसन्न और स्वस्थ रह सकते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है .....
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भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते| सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते||२:६२||"
अर्थात विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है| आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है||
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"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः| स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति||२:६३||"
अर्थात क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम| स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है||
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"रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्| आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति||२:६४||"
अर्थात आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रसादम्) (प्रसादः प्रसन्नता स्वास्थ्यम्) प्राप्त करता है||
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"प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते| प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते||२:६५||"
अर्थात प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है||
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"नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना| न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्||२:६६||"
अर्थात (संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ?
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राग-द्वेष से मुक्त होने का उपाय भी बड़े स्पष्ट रूप से गीता में बताया गया है| अतः गीता का नित्य स्वाध्याय करें|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
३० मई २०२०
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