Thursday, 10 April 2025

🌹🌹 *घास का तिनका*🌹🌹

 

🌹🌹 *घास का तिनका*🌹🌹
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रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक हमने हमारे ग्रंथो को सिर्फ पढ़ा, समझने की कोशिश नहीं की।
रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी। यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ।
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रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ? रावण बोला- जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी। रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता ! रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो, क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है? रावण के इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी आँखों से आसुओं की धार बह पड़ी।
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इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ,तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया। *प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर में मिठास बनी रहे। इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।
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माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर से सब देख रही थी। ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया, जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें? ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा 'अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा'। लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी
के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया। फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था। आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना। आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।
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इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।
*तृण धर ओट कहत वैदेही*
*सुमिरि अवधपति परम् सनेही*
*यही है उस तिनके का रहस्य* ! इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही !
ऐसी विशलहृदया थीं हमारी जानकी माता !
🙏🏽🌹*जय हो प्रभु श्री राम जी की*🌹🙏🏽.
११ अप्रेल २०२०

अब से हम असली "उपवास" करेंगे, नकली नहीं।

 अब से हम असली "उपवास" करेंगे, नकली नहीं। "उपवास" किसे कहते हैं? ---

"उपवास" का अर्थ भूखा रहना, या दिखावे के लिए दो तीन घंटे बिना खाना खाये रहना नहीं है। उप का अर्थ है -- समीप, वास का अर्थ है -- निवास। उपवास का अर्थ है -- "आत्मा के पास निवास करना"। आत्मतत्व में स्थिति ही -- उपवास है, जिसे अधर्मसापेक्ष यानी धर्मनिरपेक्ष लोग सात जन्म में भी नहीं समझ सकते।
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आत्मा तो व्यापक है सब में एक जैसा है फिर उसके पास निवास कैसे किया जाये? उपवास करने वाला कौन है? कौन किस के साथ उपवास कर रहा है?
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द्वैत बुद्धि से उपवास नहीं हो सकता। इसे समझने के लिए अद्वैत में जाना होगा।
ध्यान और उपासना भी अद्वैत बुद्धि में ही होंगी। ध्यान करने वाला कौन ? हमारा मन ही मन का ध्यान करता है, और कहते हैं कि हम परमात्मा का ध्यान करते हैं। वास्तव में ध्यान, उपासना, और उपवास --- भगवान अपने स्वयं का ही करते हैं।

११ अप्रेल २०२१ 

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत २०७८, तदानुसार १३ अप्रेल २०२१ को आने वाले -- नव-संवत्सर व बासंतिक-नवरात्र की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएँ !!

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत २०७८, तदानुसार १३ अप्रेल २०२१ को आने वाले --
नव-संवत्सर व बासंतिक-नवरात्र की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएँ !!
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मेरे मानस में अनेक शिव-संकल्प, शुभ-विचार और अति-आकर्षक व अति-प्रिय बुद्धि-विलास की बहुत सारी अलंकृत बातें भरी पड़ी हैं। पूरे विश्व के वर्तमान घटनाक्रम के प्रति भी मैं संवेदनशील हूँ। लेकिन इस समय वर्तमान में यह सब कुछ गौण हो गया है। इन का कोई महत्व नहीं है।
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जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण है -- कूटस्थ में भगवान परमशिव का ध्यान। यह जीवन उसी के लिए समर्पित है। अनेक अनुभूतियाँ और उपलब्धियाँ हैं, जिन का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे गोपनीय ही रहें तो ठीक हैं। यह बासंतिक नवरात्र, आध्यात्मिक-साधना के लिए ही समर्पित है।
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कर्ता तो जगन्माता स्वयं हैं, जो मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में कुंडलिनी-महाशक्ति के रूप में अनुभूत होकर स्वयं ही परमशिव को समर्पित हो रही हैं। एक दूसरे परिप्रेक्ष्य में साकार रूप में एकमात्र छवि वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की ही समक्ष आती है, जिन के सिवाय कोई अन्य इस पूरी सृष्टि में है ही नहीं। पूरी सृष्टि उन में, और वे पूरी सृष्टि में समाहित हैं। अपने परम ज्योतिर्मय रूप में वे पद्मासन में बैठे हुये अपने स्वयं का ही ध्यान कर रहे हैं। उनका कूटस्थ-विग्रह -- अक्षर-ब्रह्म प्रणव, सर्वत्र गूंज रहा है। कूटस्थ सूर्य-मण्डल में वे ही परमपुरुष हैं, जिन के अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं। कई बार लगता है कि भगवती महाकाली स्वयं ही साधना कर के उस का फल श्रीकृष्ण को अर्पित कर रही हैं।
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गुरुकृपा निश्चित रूप से फलीभूत हुई है, जिस के कारण आगे का मार्ग प्रशस्त हुआ है। गुरु-रूप-ब्रह्म मुझ अकिंचन पर करुणावश अपनी परम कृपा कर के मेरा आत्म-समर्पण स्वीकार करें| ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! जय गुरु !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर

११ अप्रेल २०२१ 

सर्वव्यापी भगवान स्वयं ही यह "मैं" बन कर, अपनी उपासना कर रहे हैं ---

 सर्वव्यापी भगवान स्वयं ही यह "मैं" बन कर, अपनी उपासना कर रहे हैं। भगवान स्वयं को इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड व सारे जड़ और चेतन के रूप में व्यक्त कर रहे हैं। मैं यह शरीर नहीं, सर्वव्यापक अनंत सर्वस्व परमात्मा के साथ एक हूँ। मैं साँस लेता हूँ तो सारा ब्रह्मांड साँसें लेता है। सम्पूर्ण सृष्टि मेरे साथ-साथ भगवान का ध्यान कर रही है। कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है। सम्पूर्ण सृष्टि का अस्तित्व ही मेरा अस्तित्व है।

ॐ सहनाववतु सहनोभुनक्तु सहवीर्यंकरवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदँ पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते | ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०२३

हम भगवान को उपलब्ध क्यों नहीं होते? ---

हम भगवान को उपलब्ध क्यों नहीं होते? ---
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"सत्यनिष्ठा का अभाव" - एकमात्र कारण है जिससे हम भगवान को उपलब्ध नहीं हो पाते। अन्य कोई कारण नहीं है। मेरी आयु ७६ वर्ष की हो गई है। विश्व के अनेक देशों का भ्रमण इस जीवन में किया है। पृथ्वी के चारों ओर की एक परिक्रमा भी की है। जीवन में अनेक तरह के लोगों से मिलना हुआ है। अपने पूरे जीवनकाल में अंगुलियों पर गिनने योग्य दस-बारह मुमुक्षु ही ऐसे मिले हैं जिनके हृदय में भगवान को उपलब्ध होने की घोर अभीप्सा थी।
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वास्तव में हम भगवान को नहीं, बल्कि सांसारिक धन-दौलत, ऐश्वर्य, और सांसारिक सफलताओं को पाना चाहते हैं। अपने अहंकार की तृप्ति के लिए भक्ति का झूठा दिखावा करते हैं। अपनी मानसिक कल्पना और झूठे शब्द जाल से हम स्वयं को ठग रहे हैं। हमने भगवान को साधन बना रखा है, पर साध्य तो संसार ही है। हम भगवान को पाना ही नहीं चाहते। उदाहरण के लिए दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए विद्यार्थी दिन रात एक कर देते हैं, हाड़तोड़ परिश्रम करते हैं, तब जाकर दसवीं उत्तीर्ण होती है। पर जीवन की जो उच्चतम उपलब्धी भगवान हैं, उन्हें हम सिर्फ ऊँची ऊँची बातों के शब्दजाल से ही प्राप्त करना चाहते हैं।
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प्राचीन भारत की संस्कृति में भगवान यानि ब्रह्म को पाने का ही लक्ष्य जीवन में हुआ करता था। प्राचीन भारत में सम्मान हुआ तो ब्रह्मज्ञों का ही हुआ। जीवात्मा का उद्गम जहाँ से हुआ है, वहाँ अपने स्त्रोत में बापस तो जाना ही पड़ेगा, चाहे लाखों जन्म और लेने पड़ें। तभी जीवन चक्र पूर्ण होगा। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बहुत सारा सद्साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है। अनेक संत महात्मा हैं जो निष्ठावान मुमुक्षुओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं। अतः और लिखने की आवश्यकता नहीं है। जब हृदय में अहैतुकी परम प्रेम और सत्यनिष्ठा होती है तब भगवान स्वयं मार्गदर्शन करते हैं। शिष्य में पात्रता होने पर सद्गुरु का आविर्भाव स्वतः ही होता है।
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जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति अवश्य होती है। वैसे ही जब भी हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान करते हैं तो उनके अनुग्रह की प्राप्ति अवश्य होती है। परमात्मा को पाने का मार्ग है अहैतुकी (Unconditional) परमप्रेम। प्रेम में कोई माँग नहीं होती, मात्र शरणागति और समर्पण होता है। प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण हो तो और कुछ भी नहीं चाहिए। सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है।
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अपने प्रेमास्पद भगवान का ध्यान निरंतर तेलधारा के सामान होना चाहिये। प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं। जो लोग सेवानिवृत है उन्हें तो अधिक से अधिक समय नामजप, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में बिताना चाहिए| सांसारिक नौकरी में अपना वेतन प्राप्त करने के लिए दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है। व्यापारी की नौकरी तो चौबीस घंटे की होती है। कुछ समय भगवान की नौकरी भी करनी चाहिए| जब जगत मजदूरी देता है तो भगवान क्यों नहीं देंगे? उनसे मजदूरी तो माँगनी ही नहीं चाहिए| माँगना ही है तो सिर्फ उनका प्रेम; प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं। प्रेम को ही मजदूरी मान लीजिये। एक बात का ध्यान रखें -- मजदूरी उतनी ही मिलेगी जितनी आप मेहनत करोगे। बिना मेहनत के मजदूरी नहीं मिलेगी। इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पडती है।
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को बारम्बार प्रणाम। आप सब की जय हो।
ॐ तत्सत् !
कृपाशंकर

११ अप्रेल २०२३ 

अनेक जन्मों से संचित पुण्य कर्मफलों का जब उदय होता है तब भगवान की भक्ति जागृत होती है ---

अनेक जन्मों से संचित पुण्य कर्मफलों का जब उदय होता है तब भगवान की भक्ति जागृत होती है। भगवान जिन पर कृपा करते हैं, उनका मार्गदर्शन भी करते हैं, इधर-उधर भटकने नहीं देते। हमारे में एक चुम्बकत्व है, वह चुम्बकत्व ही हमारे सारे कार्य करेगा। हम सिर्फ अपने समर्पण की पूर्णता पर ध्यान दें।

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कुछ पाने की आकांक्षा एक सूक्ष्म अहंकार मात्र है। जो पाया जाता है, वह खोया भी जाता है। पाने को अब कुछ भी नहीं है। किसी भी तरह की कोई कामना नहीं हो। मेरी हरेक सोच, हर विचार, और हर कार्य भारत की अस्मिता की रक्षा व राष्ट्रहित में ही होगा। मेरे विचारों में स्पष्टता और दृढ़ता है, व कोई संशय नहीं है। मुझे मेरी कमियों का भी पता है, जिनसे ऊपर उठने का प्रयास कर रहा हूँ। ईश्वर मेरी सहायता अवश्य करेंगे। अन्य किसी से कोई अपेक्षा नहीं है। ईश्वर से संवाद हेतु अब शब्दों की आवश्यकता नहीं रही है।
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भगवती के तेज को बिना उनकी परम कृपा के सहन नहीं कर सकते। भगवती से प्रार्थना करेंगे कि वे अपने तेज को सहने की शक्ति हमें प्रदान करें। अपनी माता से अपेक्षा बहुत अधिक होती है। हमारी तो एकमात्र और अंतिम प्रार्थना है कि वे परम कृपा कर के अपने देवत्व का विलय हमारे अस्तित्व में कर दें, और इतनी शक्ति हमें प्रदान करें कि उनके देवत्व को हम धारण कर सकें। .
इस जीवन में मैंने खूब स्वाध्याय और चिंतन-मनन किया है। अतः इस जीवन में मुझे और ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ भी अब तक सीखा है वह पर्याप्त है परमात्मा को प्राप्त करने के लिए। अतः मुझे कोई उपदेश/परामर्श आदि न भेजें। मंगलमय शुभ कामनायें। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! ४ अप्रेल २०२५

साधना में सबसे बड़ी बाधा ही हमारे मन की चंचलता है ---

 साधना में सबसे बड़ी बाधा ही हमारे मन की चंचलता है ---

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गीता के छठे अध्याय "आत्मसंयम योग" में मन पर नियंत्रण रखने के लिए भगवान भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के आत्म-संयम योग (अध्याय ६) में एक बात कही है जो वयोवृद्ध और युवा सभी साधकों के लिये अमूल्य और अनुपम है। जैसे जैसे इस शरीर की आयु बढ़ती है वैसे वैसे ही हमारा मन चंचल होता जाता है। साधना में सबसे बड़ी बाधा ही हमारे मन की चंचलता है। सब से बड़ी आध्यात्मिक समस्या है कि हम अपने चंचल मन पर पूर्ण नियंत्रण कैसे करें।
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गीता के छठे अध्याय के चार श्लोक (२३, २४, २५, और २६) बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं, जिनका स्वाध्याय बार बार करना चाहिये। भगवान ने इसी विषय पर बहुत सुंदर उपदेश दिया है जिस का स्वाध्याय एक बार फिर गहरायी से करें। धन्यवाद !! ॐ तत्सत् !!
७ अप्रेल २०२५