Sunday, 4 July 2021

गुरु पूर्णिमा की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें ---

 गुरु पूर्णिमा की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें --- (४ जुलाई २०२०)

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"अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्| तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः||"
"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्, भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि||"
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मैं अपने गुरु महाराज को अपना सम्पूर्ण अस्तित्व समर्पित करता हूँ| मेरे पास अपना कहने को कुछ भी नहीं है| सब कुछ उन्हीं का है| तत्व रूप में वे मेरे कूटस्थ में नित्य निरंतर विराजमान हैं| वे कोई हाड़-मांस की देह नहीं, परमप्रेममय, नित्य नवीन आनंद, व सर्वव्यापी ज्योतिर्मय चैतन्य हैं| उनके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है|
"गुशब्दस्त्वन्धकार: स्यात् रूशब्दस्तन्निरोधक:| अन्धकारनिरोधित्वाद् गुरूरित्यभिधीयते||"
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प्रतीक रूप में गुरु-चरणों की या गुरु-पादुका की पूजा होती है| मैं गुरु-चरणों की पूजा .... सहस्त्रार में ध्यान द्वारा करता हूँ| ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता उनका विराट रूप है| उस अनंतता से भी परे का ज्योतिषांज्योतिर्मय आलोक जिसे मैं "परमशिव" कहता हूँ, वे स्वयं हैं| वे ही वासुदेव हैं, वे ही नारायण हैं, और वे ही मेरे आराध्य इष्ट देव हैं|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
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"वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं| देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुं||"
"वंशी विभूषित करान्नवनीर दाभात् , पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादरविंद नेत्रात् , कृष्णात परम किमपि तत्वमहंनजाने ||"
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने| प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मण हिताय च| जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"हरे मुरारे मधुकैटभारे, गोविन्द गोपाल मुकुंद माधव |
यज्ञेश नारायण कृष्ण विष्णु, निराश्रयं मां जगदीश रक्षः ||"
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"ऊँ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु | सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्विना वधीतमस्तु, मा विद्विषावहै ||" ऊँ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ||
ॐ तत्सत!! ॐ गुरु!! जय गुरु!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जुलाई २०२०
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पुनश्च :--- इस साल पांच महीने का चातुर्मास है| देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी के बीच के समय को चातुर्मास कहते हैं| इस बार आश्विन माह का अधिकमास है|

Thursday, 1 July 2021

मन में वासनात्मक विचार हैं तो भूल कर भी कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करें ---

मन में वासनात्मक विचार हैं तो भूल कर भी कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करें ...
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आध्यात्मिक प्रगति के लिए वासनाओं से ऊपर उठना होगा क्योंकि अन्धकार और प्रकाश कभी एक साथ नहीं रह सकते| जिन्हें वासनाओं की पूर्ति ही करनी है वे आध्यात्म को भूल जाएँ| जहाँ काम-वासना है वहाँ ब्रह्मचिंतन या परमात्मा पर ध्यान की कोई संभावना नहीं है| वासनात्मक जीवन जी रहे लोगों को भूल कर भी आज्ञाचक्र पर ध्यान नहीं करना चाहिए अन्यथा मस्तिष्क के विकृत होने यानि पागलपन की शत-प्रतिशत संभावना है| जो मैं लिख रहा हूँ वह आध्यात्मिक साधना के अपने निज अनुभव से लिख रहा हूँ, कोई हवा में तीर नहीं मार रहा|
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"जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम|
तुलसी कबहूँ होत नहिं, रवि रजनी इक ठाम||"
जहाँ काम-वासना है वहाँ "राम" नहीं हैं, जहाँ "राम" हैं वहाँ काम-वासना नहीं हो सकती| सूर्य और रात्री एक साथ नहीं रह सकते|
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मनुष्य की सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी है जिसमें प्राण-तत्व ऊपर-नीचे प्रवाहित होती रहती है| यह प्राण तत्व ही हमें जीवित रखता है| इस प्राण तत्व की अनुभूति हमें ध्यान साधना में होती है| जब काम वासना जागृत होती है तब यह यह प्राण प्रवाह मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्र तक ही सीमित रह जाता है, और सारी आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है| परमात्मा के प्रेम की अनुभूतियाँ हृदय से ऊपर के चक्रों में ही होती है, जिनमें विचरण कामवासना से ऊपर उठ कर ही हो सकता है| कामुकता से ऊपर उठकर ही मनुष्य परमात्मा की ओर अग्रसर हो सकता है| मन में वासनात्मक विचार हैं तो भूल कर भी कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करें|
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जो लोग काम वासनाओं की तृप्ति को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं वे अन्धकार और असत्य की शक्तियाँ हैं| उनका अनुसरण घोर अंधकारमय नारकीय लोकों में ले जाता है| ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ जुलाई २०२०
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पुनश्च:
वासनाओं से मुक्ति के लिए ...
आहार शुद्धि, अभ्यास, वैराग्य, स्वाध्याय, सत्संग, व कुसंग त्याग आवश्यक है.

सबसे अधिक महत्वपूर्ण है -- "आहार शुद्धि" ---

 सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ... "आहार शुद्धि" ...

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कुछ भी आहार ग्रहण करने से पूर्व विचार करना चाहिए कि यह भोजन जो हम खा रहे हैं वह भगवान को भोग लगाने के योग्य है या नहीं| भगवान को भोग लगाने के योग्य है तभी उसे खाना चाहिए| बिना भगवान को अर्पित किए बिना जो कुछ भी हम खाते हैं वह पाप का ही भक्षण है| वास्तव में हम जो कुछ भी खाते हैं, वह हम नहीं भगवान स्वयं वैश्वानर के रूप में ग्रहण करते हैं|
"अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः| प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्||१५:१४||
मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ||
पेट में जठराग्नि वैश्वानर है जो प्राण और अपान वायु से संयुक्त हुआ .... भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, और चोष्य .... चार प्रकार के अन्नों को पचाता है| वैश्वानर अग्नि खाने वाला है और सोम खाया जानेवाला अन्न है| भगवान भोजन को खाते ही नहीं, पचाते भी हैं|
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अन्न से ही हमारा मन निर्मित होता है ... ‘अन्नमयं हि सोम्य मनः’ इति अन्नेन हि मन आप्यायते| ‘हे सोम्य! यह मन अन्नमय है।’ इस श्रुति के अनुसार अन्न से ही मन का पोषण होता है| जैसा हमारा अन्न होगा वैसा ही हमारा मन होगा|
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‘आहार की शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, अन्तःकरण की शुद्धि से स्थिर स्मृति होती है| स्मृति की स्थिरता से समस्त बन्धनों से छुटकारा मिलता है|’ इस प्रकार श्रुतियों में ब्रह्म साक्षात्काररूप ज्ञान आहारशुद्धि के अधीन बतलाया गया है| ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः| स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः’|
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होम करते समय हविष्य का हवन करते हैं| उसी प्रकार भोजन का ग्रास मुख में रखते हुए भावना करो कि 'यह हविष्य है एवं पेट में स्थित जठराग्नि में इसका हवन कर रहा हूँ।'
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भोजन पवित्र स्थान में एवं पवित्र पात्रों में बनाया हुआ होना चाहिए| भोजन बनाने वाला व्यक्ति भी शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं प्रसन्न होना चाहिए| अशुद्ध भोजन से तृप्ति एवं शांति नहीं मिल सकती| मासिक धर्म में आयी हुई महिला को भोजन नहीं बनाना चाहिए| अधर्म से उपार्जित धन से प्राप्त हुआ भोजन भी पाप का भक्षण है| धन की पवित्रता भी आवश्यक है|
ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२ जुलाई २०२०

Wednesday, 30 June 2021

हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरिः नाम ----

 हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरिः नाम ----

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लाख बाधाएँ आयें, पर हिम्मत मत हारो, लगे रहो| हम सभी का अन्तःकरण बार-बार भागकर अंधकार की ओर आकर्षित होता है जहाँ माया का साम्राज्य है| वहाँ सारे विकार, निराशा और धोखा ही धोखा है|
लेकिन साथ-साथ अंतर्रात्मा को एक शक्ति प्रकाश की ओर भी खींच रही है, जहाँ तृप्ति, आनंद और संतुष्टि है| हर व्यक्ति के चैतन्य में यह भयंकर द्वंद्व चल रहा है जो बड़ा दुःखदायी है|
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माया की दो शक्तियाँ हैं .... आवरण और विक्षेप| आवरण तो अज्ञान का पर्दा है जो सत्य को ढके रखता है| विक्षेप कहते हैं उस शक्ति को जो भगवान की ओर से ध्यान हटाकर संसार की ओर बलात् प्रवृत करती है| इस से मुक्त होना बड़ा कठिन है| दुर्गा सप्तशती में लिखा है ...
"ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा| बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति||"
बड़े बड़े ज्ञानियों को भी यह महामाया बलात् मोह में पटक देती है फिर सामान्य सांसारिक प्राणी तो हैं ही किस खेत की मूलीै?
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परब्रह्म परमात्मा की परम कृपा से ही हम माया से पार पा सकते हैं, निज बल से नहीं| इसके लिए पराभक्ति, सतत निरंतर अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता है| गीता में भगवान कहते हैं ...
"शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया| आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌||६:२५||
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌| ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌||६:२६||"
अर्थात् शनैः शनैः अभ्यास करता हुआ उपरति यानी वैराग्य/उदासीनता को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे|| यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस जिस विषय के लिए संसार में विचरता है, उस उस विषय से हटाकर इसे बार बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे|
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भगवान को पूर्ण रूप से हृदय में बैठाकर, प्रयास पूर्वक अन्य सब ओर से ध्यान हटाने का अभ्यास करें| किसी भी अन्य विचार को मन में आने ही न दें| पूर्ण रूप से मानसिक मौन का अभ्यास करें| स्वयं को ही देवता बनाना होगा, ‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’ ‘देवता होकर देवताका पूजन करे|’ परमात्मा को छोडकर अन्य सब प्रकार के चिंतन को रोकने का अभ्यास करना होगा| बाहरी उपायों में बाहरी व भीतरी पवित्रता का ध्यान रखना होगा, विशेषकर के भोजन सम्बन्धी| यह मार्ग "क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयोवदन्ति" वाला मार्ग है| अब जब इस तीक्ष्ण छुरे की धार वाले मार्ग का चयन कर ही लिया है तो पीछे नहीं हटना है| अनुद्विग्नमना, विगतस्पृह, वीतराग, और स्थितप्रज्ञ मुनि की तरह निर्भय होकर चलते ही रहना है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० जून २०२०

जो पूर्व जन्म में मेरे गुरु थे वे ही इस जन्म में भी मेरे गुरु हैं ----

 जो पूर्व जन्म में मेरे गुरु थे वे ही इस जन्म में भी मेरे गुरु हैं ---- (Dated ३० जून २०२१)

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चार दिन पश्चात् "गुरुपूर्णिमा" आ रही है| एक प्रबल आकर्षण गुरु-पादुका की पूजा और गुरु-चरणों पर निरंतर ध्यान करने का हो रहा है .....
"अनंत संसार समुद्र तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम् |
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्याम् नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्याम् ||"
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पूर्वजन्म की और इस जन्म की कुछ अलौकिक अति दिव्य स्पष्ट स्मृतियाँ और सूक्ष्म जगत के कुछ अनुभव हैं, जिन्होंने मुझे आध्यात्म पथ का पथिक बना दिया| उन पर किसी से चर्चा नहीं कर सकता| सार यह है कि गुरुलाभ पूर्वजन्म में हुआ था, लेकिन उसका फल इस जन्म में मिल रहा है| जो पूर्व जन्म में मेरे गुरु थे वे ही इस जन्म में भी मेरे गुरु हैं| सूक्ष्म जगत से वे निरंतर मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| उनके बराबर हितैषी कोई अन्य नहीं है| अब तो मैं उनके प्रति समर्पित होकर उनके साथ एक हूँ| गुरुकृपा का फल यही मिला कि गुरु-चरणों में आश्रय मिल गया, अब कहीं कोई भेद नहीं रहा है|
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हे कूटस्थ गुरु-रूप ब्रह्म आपको नमन है| मैं आपके साथ एक हूँ| आप ही मुझमें व्यक्त हो रहे हो|
"गुशब्दस्त्वन्धकार: स्यात् रूशब्दस्तन्निरोधक:| अन्धकारनिरोधित्वाद् गुरूरित्यभिधीयते||"
"ऊँ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु | सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्विना वधीतमस्तु, मा विद्विषावहै ||"
ऊँ शान्ति: शान्ति: शान्ति: || जय गुरु !!
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३० जून २०२०

Monday, 28 June 2021

शबद अनाहत बागा --- (संशोधित व पुनर्प्रेषित).

 

शबद अनाहत बागा ---    (संशोधित व पुनर्प्रेषित).
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जब राम नाम यानि प्रणव की अनाहत ध्वनी अंतर में सुनाई देना आरम्भ कर दे तब पूरी लय से उसी में तन्मय हो जाना चाहिए| सदा निरंतर उसी को पूरी भक्ति और लगन से सुनना चाहिए| भोर में मुर्गे की बाँग सुनकर हम जान जाते हैं कि अब सूर्योदय होने ही वाला है, वैसे ही जब अनाहत नाद अंतर में बांग मारना यानि सुनना आरम्भ कर दे तब सारे संशय दूर हो जाने चाहिएँ और जान लेना चाहिए कि परमात्मा तो अब मिल ही गए हैं| अवशिष्ट जीवन उन्हीं को केंद्र बिंदु बनाकर, पूर्ण भक्तिभाव से उन्हीं को समर्पित होकर व्यतीत करना चाहिए|
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कबीर दास जी के जिस पद की यह अंतिम पंक्ति है वह पूरा पद इस प्रकार है ---
"अवधूत गगन मंडल घर कीजै,
अमृत झरै सदा सुख उपजै, बंक नाल रस पीजै॥
मूल बाँधि सर गगन समाना, सुखमनि यों तन लागी।
काम क्रोध दोऊ भये पलीता, तहाँ जोगिनी जागी॥
मनवा जाइ दरीबै बैठा, मगन भया रसि लागा।
कहै कबीर जिय संसा नाँहीं, सबद अनाहद बागा॥"
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जब भी समय मिले एकांत में पवित्र स्थान में सीधे होकर बैठ जाएँ| दृष्टी भ्रूमध्य में हो, दोनों कानों को अंगूठे से बंद कर लें, छोटी अंगुलियाँ आँखों के कोणे पर और बाकि अंगुलियाँ ललाट पर| आरम्भ में अनेक ध्वनियाँ सुनाई देंगी| जो सबसे तीब्र ध्वनी है उसी को ध्यान देकर सुनते रहो| उसके साथ मन ही मन ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ या राम राम राम राम राम का मानसिक जाप करते रहो| ऐसी अनुभूति करते रहो कि मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्वनि के मध्य में यानि केंद्र में स्नान कर रहे हो| धीरे धीरे एक ही ध्वनी बचेगी उसी पर ध्यान करो और साथ साथ ओम या राम का निरंतर मानसिक जाप करते रहो| दोनों का प्रभाव एक ही है| कोहनियों के नीचे कोई सहारा लगा लो| कानों को अंगूठे से बंद कर के नियमित अभ्यास करते करते कुछ महीनों में आपको खुले कानों से भी वह प्रणव की ध्वनी सुनने लगेगी| यही नादों का नाद अनाहत नाद है|
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इसकी महिमा का वर्णन करने में वाणी असमर्थ है| धीरे धीरे आगे के मार्ग खुलने लगेंगे| प्रणव परमात्मा का वाचक है| यही भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की ध्वनि है जिससे समस्त सृष्टि संचालित हो रही है| इस साधना को वे ही कर पायेंगे जिन के ह्रदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम और सत्यनिष्ठा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
२८ जून २०१३
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पुनश्च :---
शबद अनाहत बागा ..... लेख में कुछ शब्द क्लिष्ट हैं, उनका अर्थ लिख रहा हूँ .....
{{ गगन मंडल में घर करने का अर्थ है अपनी चेतना को समष्टि में विस्तृत कर दें| हम यह देह नहीं बल्कि परमात्मा की सर्वव्यापकता और पूर्णता हैं| जो इस चेतना में स्थित हैं वे अवधूत हैं| इसी भाव में स्थित होकर ध्यान करें|
खेचरी मुद्रा में सहस्त्रार से रस टपकता है जो अमृत है| उसका पान कर योगी की देह को अन्न जल की आवश्यकता नहीं होती|
बंक नाल सुषुम्ना नाड़ी है जिसमें जागृत होकर कुण्डलिनी ऊर्ध्वमुखी होती है|
मूलबंध .... गुदा और जननेन्द्रियों का संकुचन करना है|
सर गगन समाना अर्थात मेरुदंड को उन्नत रखकर ठुड्डी भूमि के समानांतर रखना|
सुखमणि ... आनंद की अनुभूति|
पलीता यानि बारूद में विस्फोट के लिए लगाई आग्नि| काम क्रोध जल कर भस्म हो गए हैं|
जोगिणी जागी अर्थात् कुण्डलिनी जागृत हुई|
दरीबा फारसी भाषा में उस स्थान को कहते थे जहाँ अनमोल मोती बिकते थे| पर कालान्तर में उसे पान खाकर गपशप करने वाले सार्वजनिक स्थान को कहा जाने लगा|
अनाहत शब्द बाँग दे रहा है अतः अब ईश्वर प्राप्ति में कोई संशय नहीं है| }}

Sunday, 27 June 2021

अध्यापक, शिक्षक, आचार्य, प्राचार्य, उपाध्याय और गुरु -- इन सब में क्या अंतर है? ---

सनातन परंपरा में उपरोक्त सब में बहुत अधिक अंतर है| अपनी सीमित व अत्यल्प बुद्धि से कुछ-कुछ प्रकाश इस विषय पर डाल रहा हूँ| जितना मुझे ज्ञान है उतना सब कुछ लिख रहा हूँ, जो नहीं लिखा है उसका मुझको ज्ञान नहीं है|
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(१) अध्यापक कौन है? :--- अध्यापक हमें सांसारिक विषयों का पुस्तकीय अध्ययन करवाता है, जिस से कोई प्रमाण-पत्र या डिग्री मिलती है| इसके बदले में वह नियोक्ता से वेतन लेता है, और गृह-शिक्षा (ट्यूशन) लेने वालों से शुल्क (ट्यूशन फीस) लेता है| इस पुस्तकीय ज्ञान से हमें कहीं नौकरी करने की या कुछ व्यवसाय करने की योग्यता आती है| इस से सांसारिक ज्ञान बढ़ता है और सांसारिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है| पुराने जमाने के अध्यापक अपने स्टूडेंट्स को जी-जान से पढ़ाते थे, और उनकी योग्यता बढ़ाने के लिए बहुत अधिक परिश्रम करते थे, आजकल यह देखने में नहीं आता|
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(२) शिक्षक कौन है? :--- शिक्षक वह है जो हमें जीवन में उपयोग में आने वाली व्यवहारिक चीजों की शिक्षा देता है| सबसे बड़े और प्रथम शिक्षक तो माँ-बाप होते हैं| सिखाने के बदले में शिक्षक कोई आर्थिक लाभ नहीं देखता, सिर्फ सम्मान की अपेक्षा रखता है|
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(३) आचार्य कौन है? :--- वास्तव में आचार्य एक स्थिति है| आचार्य अपने अति उच्च आचरण और अति उच्च चरित्र से अपने अर्जित ज्ञान की शिक्षा देता है| आचार्य के समीप जाते ही मन शांत हो जाता है और अपने आप ही कुछ न कुछ शिक्षा मिलने लगती है| उनके सत्संग से श्रद्धा उत्पन्न होती है|
आजकल तो आचार्य की डिग्री मिलती है जिसको पास करने वाले स्वयं को आचार्य लिखने लगते हैं| कॉलेजों के प्रोफेसरों को भी आचार्य कहा जाने लगा है|
ब्राह्मणों में जो श्रावणी-कर्म करवाते हैं, व यज्ञोपवीत आदि संस्कार करवाते हैं, उन्हें भी आचार्य कहा जाता है| यहाँ आचार्य एक पद और सम्मान होता है| यज्ञादि अनुष्ठानों को करवाने वाले ब्राह्मणों में जो प्रमुख होता है, उसे भी आचार्य कह कर संबोधित करते हैं| यह भी एक पद और सम्मान होता है|
जो मृतकों के कर्म करवाते हैं उन ब्राह्मणों में कोई हीन भावना न आए इसलिए उनको महाब्राह्मण, महापात्र या आचार्य-ब्राह्मण कहा जाता है| यह भी एक सम्मान है|
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(४) प्राचार्य कौन हैं? :--- वास्तव में प्राचार्य उस आचार्य को कहते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि जिसे वह ज्ञान दे रहा है, वह उसे अपने आचरण में ला रहा है| आजकल तो कॉलेजों के प्रिंसिपलों को प्राचार्य कहा जाता है|
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(५) उपाध्याय कौन हैं? :--- जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त की शिक्षा देते हैं, उन्हें उपाध्याय कहा जाता है| वे बदले में कोई धन नहीं मांगते पर शिक्षार्थी का दायित्व है कि वह उन्हें यथोचित यथासंभव धन, दक्षिणा के रूप में दे|
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(६) गुरु कौन है? :--- जो हमें आत्मज्ञान यानि आध्यात्मिक ज्ञान देकर हमारे चैतन्य में छाए अंधकार को दूर करता है, वह गुरु होता है| जीवन में गुरु का प्रादुर्भाव तभी होता है जब हम में शिष्यत्व की पात्रता आती है| यथार्थ में गुरु एक तत्व होता है जो एक बार तो हाड़-मांस की देह में आता है, पर वह हाड़-मांस की देह नहीं होता| गुरु के आचरण व वचनों में कोई अंतर नहीं होता, यानि उनकी कथनी-करनी में कोई विरोधाभास नहीं होता| गुरु असत्यवादी नहीं होता| गुरु में कोई लोभ-लालच या अहंकार नहीं होता| गुरु की दृष्टि चेलों के धन पर नहीं होती| चेलों से वह कभी नहीं पूछता कि उनके पास कितना धन है| गुरु की दृष्टि चेलों की आध्यात्मिक प्रगति पर ही रहती है|
गुरु के उपदेशों का पालन ही गुरु-सेवा है| गुरु यदि शरीर में हैं, तो उनको किसी तरह का अभाव और पीड़ा न हो, इसका ध्यान तो रखना ही चाहिए| आजकल लोग गुरु के देह की या उनके चित्र या मूर्ति की पूजा करते हैं जो मेरे विचार से गलत है| पूजा गुरु-पादुका की होती है| गुरु-पादुका ....एक प्रतीक है गुरु के आचरण को अपने अन्दर में उतारने की| गुरु के शरीर-अवयव को पूजना गुरु के विचारों को मिटटी में मिलाना है|
"ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि||"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जून २०२०