Friday, 25 August 2017

भगवान श्रीकृष्ण मेरे प्राण हैं ......

भगवान श्रीकृष्ण मेरे प्राण हैं ......
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भगवान श्रीकृष्ण परम तत्व हैं| उनकी प्रशंसा या महिमा का बखान करने की मुझमें कोई योग्यता नहीं है| मैं तो उन्हें सदा अपने प्राणों में पाता हूँ| वे ही मेरे प्राण हैं, इससे अधिक कुछ कहने की मुझमें सामर्थ्य नहीं है|
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आचार्य मधुसुदन सरस्वती ने उनकी स्तुति इन शब्दों में की है .....
"वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् | पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् ||
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् | कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ||"
जिनके करकमल वंशी से विभूषित हैं, जिनकी नवीन मेघकी-सी आभा है, जिनके पीत वस्त्र हैं, अरुण बिम्बफल के समान अधरोष्ठ हैं, पूर्ण चन्द्र के सदृश्य सुन्दर मुख और कमल के से नयन हैं, ऐसे भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर अन्य किसी भी तत्व को मैं नहीं जानता ||
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भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में जितना साहित्य लिखा गया है उतना भगवान के अन्य किसी भी रूप पर नहीं लिखा गया है | वे हमारे हृदय में, हमारी चेतना में निरंतर रहें, इससे अधिक कुछ भी लिखना अभी तो असंभव है |  वे तो मेरे प्राण हैं |
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ

भवसागर को गोते लगाए बिना पार करें :----

भवसागर को गोते लगाए बिना पार करें :----
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श्रुति भगवती कहती हैं .....
"प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते | अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ||
–मुण्डकोपनिषद्,२/२/४.
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प्रणव रूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण चढ़ाकर ब्रह्म रूपी लक्ष्य को बेधना है | बाण सीधा अपने लक्ष्य को बेधता है, इधर उधर कहीं भी नहीं जाता | वैसे ही अपने लक्ष्य परमात्मा की ओर ही पूर्ण तन्मयता से अग्रसर होना है, इधर-उधर कहीं भी नहीं देखना है |
See nothing, look at nothing but your goal ever shining before you.
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कठोपनिषद में भी लिखा है कि आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है, जिसके आलोक से निगूढ़ आत्मतत्व का साक्षात्कार होता है|
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श्रीमद्भगवद्गीता में भी ओंकार को एकाक्षर ब्रह्म कहा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||


२३ अगस्त २०१७

महाजनो येन गतः सः पन्थाः ......

महाजनो येन गतः सः पन्थाः  ......
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श्रुतिर्विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् |
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः सः पन्थाः || -- महाभारत
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अर्थ - वेद और धर्मशास्त्र अनेक प्रकारके हैं । कोई एक ऐसा मुनि नहीं है जिनका वचन प्रमाण माना जाय । अर्थात श्रुतियों, स्मृतियों और मुनियोंके मत भिन्न-भिन्न हैं । धर्मका तत्त्व अत्यंत गूढ है - वह साधारण मनुष्योंकी समझसे परे है । ऐसी दशामें, महापुरूषोंने अथवा अधिकतर श्रेष्ठ लोगोंने जिस मार्गका अनुकरण किया हो, वहीं धर्मका मार्ग है, उसीको आचरणमें लाना चाहिए ।
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मैं तो मेरे गुरुपथ का अनुगामी हूँ | संसार रूपी महाभय से रक्षा करने वाले, ब्रह्मज्ञान द्वारा मोक्षप्रदाता सदगुरु महाराज आप की जय हो | आप ने हृदय में जिज्ञासा उत्पना की और मुमुक्षु बना दिया | आप ही परमशिव हैं | आप की कोई भी सेवा करने में मैं अक्षम हूँ अतः आपको प्रणाम ही कर पा रहा हूँ | आपके श्रीचरणों में बारम्बार प्रणाम है | मेरे सारे गुण-अवगुण आपको समर्पित हैं | और मेरे पास है ही क्या ? मेरी कोई सामर्थ्य नहीं है | जो कुछ भी है वह आप की परम कृपा ही है |

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२२ अगस्त २०१७

भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा व्यवस्था थी .....

भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा व्यवस्था थी .....
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अंग्रेजी राज्य एक आसुरी राक्षस राज था| कुटिल दुष्ट अंग्रेजों ने भारत की प्राचीन शिक्षा और कृषि व्यवस्था को नष्ट कर दिया| देश के हर गाँव में गुरुकुल थे जहाँ निःशुल्क शिक्षा सभी को उपलब्ध थी|

अंग्रेजों ने सन १८५८ ई.में एक क़ानून बनाकर सारे गुरुकुलों पर प्रतिबन्ध लगा दिया, ब्राह्मण आचार्यों की हत्याएँ करवा दीं, बचे खुचों का सब कुछ छीन कर उन्हें दरिद्र बनाकर भगा दिया| वे इस योग्य भी नहीं रहे कि अपनी संतानों को शिक्षित कर सकें| गुरुकुलों को जलाकर नष्ट कर दिया गया| ब्राह्मणों से उनके ग्रन्थ छीन लिए गए| ग्रंथों को प्रक्षिप्त यानि उनमें मिलावट कर दी गयी| आर्य आक्रमण का कपोल कल्पित झूठा इतिहास रचा गया| ब्राह्मणों के विरुद्ध झूठा इतिहास लिखा गया|

स्वतंत्रता के पश्चात भी अंग्रेजों के मानस पुत्रों का ही राज्य रहा| वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था के कारण ही हमारी अस्मिता, राष्ट्रीय चरित्र और नैतिकता समाप्तप्राय है|

ॐ  तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२२ अगस्त २०१७

दृढ़ निश्चयपूर्वक परमात्मा को समर्पण ......

दृढ़ निश्चयपूर्वक परमात्मा को समर्पण ......
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नदी का विलय जब महासागर में हो जाता है तब नदी का कोई नाम-रूप नहीं रहता, सिर्फ महासागर ही महासागर रहता है | वैसे ही जीवात्मा जब परमात्मा में समर्पित हो जाती है, तब जीवात्मा का कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता, सिर्फ परमात्मा ही परमात्मा रहते हैं |
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मनुष्य देह सर्वश्रेष्ठ साधन है परमात्मा को पाने का | मृत्यु देवता हमें इस देह से पृथक करें उस से पूर्व ही निश्चयपूर्वक पूरा यत्न कर के हमें परमात्मा को समर्पित हो जाना चाहिए | समय और सामर्थ्य व्यर्थ नष्ट न करें |
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||


२१ अगस्त २०१७

दो दृष्टिकोण :---

दो दृष्टिकोण :---
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(१) पता नहीं पिछले जन्मों में क्या बुरे कर्म किये थे जो इस असत्य, अन्धकार और अन्याय से भरे संसार में रहने को बाध्य हैं |

(२) पिछले जन्मों में निश्चित रूप से कोई अच्छे कर्म किये थे जो भगवान ने इस संसार में सदा रक्षा की है और अपने हृदय का प्रेम दिया है |
कौन सा दृष्टिकोण अच्छा है ? इसका निर्णय आप करें |
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सारे प्रश्नों के उत्तर, सारी शाश्वत जिज्ञासाओं का समाधान, पूर्ण संतुष्टि, पूर्ण आनंद और सभी समस्याओं का निवारण ...... सिर्फ और सिर्फ परमात्मा में हैं |
अपनी चेतना को सदा भ्रूमध्य में रखो और निरंतर परमात्मा का स्मरण करो | अपने हृदय का सम्पूर्ण प्रेम उन्हें दीजिये | पूरा मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा करेंगे |

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

२१ अगस्त २०१७

भक्ति और आस्था का संगम ........

भक्ति और आस्था का संगम ........
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(१) ढाई हज़ार फीट की ऊँचाई पर स्थित बाबा मालकेत की २४ कौसीय परिक्रमा पूरे राजस्थान में होने वाली सबसे बड़ी परिक्रमा है जो राजस्थान के झुंझुनूं जिले की अरावली पर्वत माला के लोहार्गल तीर्थ से संत महात्माओं के नेतृत्व में ठाकुर जी की पालकी के साथ गोगा नवमी (भाद्रपद कृष्ण नवमी) के दिन आरम्भ होकर भाद्रपद अमावस्या के दिन लोहार्गल तीर्थ में ही बापस आकर समाप्त हो जाती है| इस सात दिवसीय चौबीस कौसीय परिक्रमा में हर वर्ष सात से नौ लाख श्रद्धालु पूरे भारत से आकर भाग लेते हैं| इस वर्ष लगभग आठ लाख श्रद्धालुओं ने इस पदयात्रा परिक्रमा में भाग लिया| अमावस्या के दिन लोहार्गल में हज़ारों श्रद्धालु और एकत्र हो जाते हैं| सभी श्रद्धालु अमावस्या के दिन लोहार्गल तीर्थ के सूर्य कुंड में स्नान कर अपने अपने घरों को बापस चले जाते हैं| कहते हैं महाभारत युद्ध के पश्चात् इसी दिन पांडवों ने जब यहाँ सूर्यकुंड में स्नान किया तो भीम की लोहे की गदा गल गयी थी जिससे इस तीर्थ का नाम लोहार्गल पड़ा| अरावली पर्वत माला की घाटियों में यह यात्रा अति मनोरम होती है| अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ पदयात्रियों की हर सुविधा का ध्यान रखती हैं| आज सोमवती अमावस्या के दिन इस पर्व का विशेष महत्व था|
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(२) आज भाद्रपद अमावस्या के दिन ही सभी सती मंदिरों में मुख्य आराधना होती है| झुंझुनू के विश्व प्रसिद्ध श्रीराणीसती दादीजी के मंदिर में भी मुख्य आराधना इसी दिन होती है| ये सभी सतियाँ वीरांगणाएँ थीं जिन्होंने धर्मारक्षार्थ युद्धभूमि में युद्ध किया और स्वयं प्रकट हुए अपने तेज से सती हुईं|
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(३) आज भाद्रपद अमावस्या के दिन ही मध्याह्न काल में ६९ वर्ष पूर्व इस "शरीर महाराज" का जन्म झुंझुनूं में हुआ था| इस "शरीर महाराज" ने इस कथन को चरितार्थ किया ..... "आया था किस काम को, तु सोया चादर तान"| जाग बहुत देर से हुई; हुई तो भी बहुत सारे दुःस्वप्नों के साथ| फिर क्या हुआ ? .... "बाना पहिना सिंह का, चला भेड़ की चाल", ..... ऐसे ही जीवन व्यर्थ चला गया ..... "आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"| अब वह दुःस्वप्न बीत गया है, देरी से ही सही यह ग़ाफिल जाग चुका है| आगे प्रकाश ही प्रकाश है| कहीं कोई निराशा नहीं है| जिनका कभी जन्म ही नहीं हुआ उनका आश्रय मिला है| वहाँ कोई मृत्यु नहीं , कोई भय नहीं है|
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आप सब को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!


२१ अगस्त २०१७