Friday, 16 May 2025

भगवान के साथ सत्संग और उपासना ---

 भगवान के साथ सत्संग और उपासना ---

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सामने भगवान श्रीकृष्ण अपनी शांभवी मुद्रा में बैठे हैं। खेचरी भी लगा रखी है। दृष्टिपथ भ्रूमध्य में, और दृष्टि अनंत कूटस्थ में। उनकी मनमोहक छवि अवर्णनीय है। देखकर रहा नहीं जा रहा है। मैं अपनी सारी चेतना के साथ कूदकर उनमें ही समाहित हो जाता हूँ।
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अब वे निरंतर मेरे हृदय (समर्पित अन्तःकरण -- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) में बिराजे हैं। मैं जब चलता हूँ तो वे मेरे साथ साथ चलते हैं, मैं सोता हूँ तो वे मेरे अन्तःकरण में ही सोते हैं। वे ही इन नासिकाओं से सांस ले रहे हैं, इन कानों से वे ही सुन रहे हैं, इस भौतिक हृदय में भी वे ही धडक रहे हैं।
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आगे की कुछ बातें परम गोपनीय हैं जो हर किसी को बताई नहीं जा सकतीं।
यही मेरा भगवान के साथ सत्संग है। आप सब भी मेरे साथ एक हैं। जब तक भगवान मेरे साथ हैं, सब कुछ मेरे साथ है। जब यह शरीर छूट जाएगा, तब उन्हीं के साथ रहूँगा। इस शरीर में आने पूर्व भी उन्हीं के साथ था। इस जन्म में माँ-बाप, भाई-बहिन, सगे-संबंधी, शत्रु-मित्र आदि वे ही बन कर आए; और उन सब से मिला प्रेम उन्हीं का प्रेम था। उनका और मेरा साथ शाश्वत है। वे ही समस्त विश्व हैं, और वे ही यह "मैं" बन गये हैं। यही मेरा नित्य नियमित सत्संग है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ मई २०२४

भगवान का इतना ऋण है कि उस से कभी उऋण नहीं हो सकता, सिर्फ समर्पित ही हो सकता हूँ, और कुछ भी मेरे बस में नहीं है.

 भगवान का इतना ऋण है कि उस से कभी उऋण नहीं हो सकता, सिर्फ समर्पित ही हो सकता हूँ, और कुछ भी मेरे बस में नहीं है.

भगवान की इस से बड़ी कृपा और क्या हो सकती है कि उन्होंने मुझे अपना उपकरण बनाया. वे ही मेरे माध्यम से स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं. इस ह्रदय में वे ही धड़क रहे हैं, इन फेफड़ों से वे ही साँसे ले रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, कानों से वे ही सुन रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे है, और इन हाथों से महाबाहू वे ही सारा कार्य कर रहे हैं. वास्तव में मैं तो हूँ ही नहीं, यह पृथकता का बोध एक मिथ्या आवरण है. सारा अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त अहंकार) व सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं. उनकी पूर्णता का बोध सदा बना रहे. ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मई २०१९

"पुरुषोत्तम योग" के आरंभिक ६ श्लोकों में योग-साधना के सारे सूत्र समाहित हैं ---

वैसे तो पूरी गीता ही योग शास्त्र है, लेकिन उसके १५ वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" के आरंभिक ६ श्लोकों में योग-साधना के सारे सूत्र समाहित हैं। लेकिन वे भगवान की कृपा से ही समझ में आ सकते हैं। उन्हें बौद्धिक रूप से समझने मात्र का ही नहीं, निज जीवन में अवतरित कीजिए।

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मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह सबसे पहिले दूसरों की कमी देखता है। मेरे में लाख कमियाँ होंगी, लेकिन उनसे किसी अन्य की कोई हानि नहीं होगी, अतः मेरी कमियों की चिंता छोड़ दें, उनके लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ, कोई अन्य नहीं। अपनी स्वयं की कमियों को दूर करने का प्रयास करें। मेरे में लाखों कमियाँ हैं, लेकिन मैं हर समय ईश्वर की चेतना में रहता हूँ, यही मेरा एकमात्र गुण है। मैं स्वयं को सदा ईश्वर के सन्मुख पाता हूँ। मेरी बुराई करने से मेरी बुराइयों के अतिरिक्त किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि देखना है तो ईश्वर में स्वयं को देखो।
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भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं कि "संसार से विरक्त हुए पुरुष को ही भगवान का तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं"। उनका युग दूसरा था। उस समय समाज में इतने अभाव और कष्ट नहीं थे, जितने अब हैं। इसलिए परमात्मा की कृपा भी इस युग में शीघ्र ही हो जाती है।
१६ मई २०२३

Thursday, 15 May 2025

क्या यह संसार नष्ट हो जाएगा, और दुबारा सृष्टि की रचना होगी? क्या दूसरे लोकों के अधिक उन्नत प्राणी आकर इस पृथ्वी पर अपना अधिकार कर लेंगे? ---

 क्या यह संसार नष्ट हो जाएगा, और दुबारा सृष्टि की रचना होगी? क्या दूसरे लोकों के अधिक उन्नत प्राणी आकर इस पृथ्वी पर अपना अधिकार कर लेंगे? ---

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कुछ भी हो सकता है। जो होगा वह ईश्वर की इच्छा से ही और हम सब के कल्याण के लिए ही होगा। आध्यात्मिक उपदेश और ज्ञान वहीं देना चाहिए जहाँ उनके प्रति श्रद्धा-विश्वास-निष्ठा और वास्तव में आवश्यकता हो। श्रोता की भी पात्रता होती है। जब उपस्थित समूह अपने दुराग्रह या अज्ञान से किसी मत विशेष या उसके प्रणेता को ही अंतिम मानते हैं, तब उनके मध्य अपनी विचारधारा की बात कहना एक मूर्खता मात्र है। अपनी बात वहीं कहनी चाहिए जहाँ श्रोताओं में सत्य को जानने की एक गूढ़ जिज्ञासा हो, न कि एक बौद्धिक अभिरुचि मात्र।
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धर्म और आध्यात्म -- बलशाली और समर्थवान व्यक्तियों के लिए हैं, शक्तिहीनों के लिए नहीं। बलहीन को परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती -- "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्‌ तपसो वाप्यलिङ्गात्‌।" (मुण्डकोपनिषद् ३/२/४)
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इस संसार ने मुझे आनंद का प्रलोभन दिया था, लेकिन मिला सिर्फ छल-कपट और झूठ। इसलिए सारी आस्थाएँ अब सब ओर से हटकर केवल ईश्वर में ही प्रतिष्ठित हो गई हैं। किसी भी तरह की कोई आकांक्षा नहीं रही है। किसी से किसी भी तरह की कोई अपेक्षा नहीं है। यह संसार यदि नष्ट हो जाये या दूसरे लोकों के प्राणी आकर इस पर अपना अधिकार भी कर लें तो मुझे कोई पीड़ा नहीं होगी।
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झंझावात में खड़े इस अकेले व्यक्ति की तरह मैं अकेला नहीं हूँ। यह अंधकार भी मेरे ही अस्तित्व का एक भाग है जिसके बिना सृष्टि नहीं चल सकती। पूरी सृष्टि अंधकार और प्रकाश का ही एक खेल है। मेरे साथ हर समय भगवान हैं, जिन से प्रेम ही मेरा अस्तित्व है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ मई २०२३

व्यवसायात्मिका बुद्धि के अभाव में आध्यात्मिक विफलता तो मिलती ही है, व्यक्तिव में विखंडन भी हो सकता है ---

 व्यवसायात्मिका बुद्धि के अभाव में आध्यात्मिक विफलता तो मिलती ही है, व्यक्तिव में विखंडन भी हो सकता है। पुष्पिता-वाणी से बच कर रहें ---

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"एकाग्र चित्त के साथ-साथ दृढ़ निश्चयात्मक बुद्धि को ही व्यवसायात्मिका बुद्धि कहते है।" -- कल मैंने "व्यवसायात्मिका बुद्धि" विषय पर चर्चा छेड़ी थी। इसे अभी और आगे बढ़ाना है, क्योंकि इस शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में एक उद्देश्य विशेष के लिए किया है। वह उद्देश्य अभी पूरा नहीं हुआ है जिस पर प्रकाश डाले बिना मैं आगे नहीं बढ़ सकता।
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बिना "व्यवसायात्मिका बुद्धि" के कोई भी साधक अपनी साधना में सफल नहीं हो सकता, चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसारिक। उपासना में सफलता के इस विषय पर भगवान ने और क्या क्या कहा है, उस पर प्रकाश डालते हैं। यह विषय बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।
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दृढ़ निश्चय और एकाग्र चित्त से अभ्यास करने से ही आत्मसाक्षात्कार संभव है, अन्यथा व्यक्तित्व का विखंडन भी हो सकता है, जिसका परिणाम भयानक विनाश है। सामान्यत लोग असंख्य इच्छायें रखते हैं जो अनेक बार परस्पर विरोधी भी होती हैं। उन्हें पूर्ण करने में ही मन की सारी शक्ति व्यय होकर थक जाती है। थका हुआ मन ईश्वर का चिंतन नहीं कर सकता।
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भगवान ने "पुष्पिता-वाणी" (पुष्पितां वाचं) से बचने को कहा है। पुष्पिता वाणी शास्त्रीय है लेकिन एक छल है। भगवान कहते हैं --
"यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥२:४२॥"
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥२:४३॥"
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥२:४४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ, अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं। इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है॥
कामनाओं से युक्त स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं॥
उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।
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जो भी भोगों का प्रलोभन और आश्वासन देती हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने उन सब साधनाओं को "पुष्पिता वाणी" कहा है। ये सब भोगों को प्रदान करती हैं लेकिन इनसे परमात्मा नहीं प्राप्त होते। ये पुनर्जन्म का हेतु बनती हैं।
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जो साधक भोग और ऐश्वर्य को ही पुरुषार्थ मान लेते हैं, उन की सांख्य और योग में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं हो सकती। यह भगवान श्रीकृष्ण का वचन है, मेरा नहीं।
अतः साधक सावधान ! भोग और ऐश्वर्य को अपना साध्य मत बना लेना। केवल परमात्मा के ही चरण-कमलों में समर्पण की अभीप्सा बनी रहे। इधर-उधर कहीं भी मत देखो। सामने परमात्मा हैं। दृष्टि-पथ उधर ही बना रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मई २०२४
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पुनश्च: --- मैं भाग्यशाली हूँ कि भगवान ने मुझे याद किया। उनके श्रीचरणों में जब से सिर झुका है, झुका ही हुआ है। कभी उठा भी नहीं है और उठेगा भी नहीं।

माता कुमाता भी हो सकती है ---

माँ की स्तुति में हम कहते हैं कि माता कुमाता नहीं हो सकती, पुत्र कुपुत्र हो सकता है| पर मैं ऐसी माताओं को भी जानता हूँ जो अपनी संतानों, पति और भरे-पूरे परिवार को छोड़कर अपने किसी प्रेमी के साथ भाग जाती हैं|

ऐसी भी माताएँ हैं जो अपने पति और संतान की ह्त्या भी कर देती हैं, या अपने पति को आत्मह्त्या करने या घर छोड़कर भागने को विवश कर देती हैं| कई माताओं ने अपनी ससुराल को नर्क बना रखा है| हर माता महान नहीं होती है|
पूरे भारत में किसी भी जिले के पारिवारिक न्यायालय में जा कर देख लो, झूठे महिला अत्याचार और प्रताड़ित पतियों द्वारा दाखिल तलाक़ के मुक़दमें भरे पड़े हैं|
स्त्री और पुरुष की देह किसी भी आत्मा को अपने प्रारब्ध के कारण प्राप्त होती है| सबके अपने अपने कर्म हैं और सब का अपना अपना भाग्य|
फिर भी मैं सभी माताओं का सम्मान करता हूँ क्योंकि परमात्मा भी माता पहिले हैं फिर पिता|
ॐ ॐ ॐ ||
१५ मई २०१७

क्या हमारी अकर्मण्यता, पुरुषार्थहीनता, प्रमाद, और ईश्वर पर अत्यधिक अंध-निर्भरता आत्मघातक है?

 राष्ट्र पर आसन्न घोर संकट की आशंकाओं के संदर्भ में मेरा पहला प्रश्न :--- क्या हमारी अकर्मण्यता, पुरुषार्थहीनता, प्रमाद, और ईश्वर पर अत्यधिक अंध-निर्भरता आत्मघातक है?

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वर्तमान में मुझे लगता है कि हिन्दू समाज की स्थिति उस शुतुरमुर्ग की सी हो गई है जो सामने संकट को देखकर आँख बंद कर लेता है या अपना मुंह मिट्टी में छिपा लेता है। अपनी आत्मरक्षार्थ स्वयं कुछ करना नहीं चाहता और कहता है कि जैसी ईश्वर की इच्छा होगी वैसे ही होगा। क्या हम पुरुषार्थहीन और निर्वीर्य हो गए हैं? कोई कुछ आवाज उठाता है तो उसे सांप्रदायिक घोषित कर दिया जाता है?
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जिस तरह से हिंदुओं में हिन्दुत्व की चेतना, धर्म का ज्ञान, और जनसंख्या कम होती जा रही है, क्या हम अपने से अधिक बढ़ रहे अधर्मियों द्वारा भविष्य में मार तो नहीं दिये जाएँगे? इतिहास तो यही कहता है। कमजोर जाति को बलशील जाति सदा नष्ट कर देती है।
१५ मई २०२१