Thursday, 15 May 2025

व्यवसायात्मिका बुद्धि के अभाव में आध्यात्मिक विफलता तो मिलती ही है, व्यक्तिव में विखंडन भी हो सकता है ---

 व्यवसायात्मिका बुद्धि के अभाव में आध्यात्मिक विफलता तो मिलती ही है, व्यक्तिव में विखंडन भी हो सकता है। पुष्पिता-वाणी से बच कर रहें ---

.
"एकाग्र चित्त के साथ-साथ दृढ़ निश्चयात्मक बुद्धि को ही व्यवसायात्मिका बुद्धि कहते है।" -- कल मैंने "व्यवसायात्मिका बुद्धि" विषय पर चर्चा छेड़ी थी। इसे अभी और आगे बढ़ाना है, क्योंकि इस शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में एक उद्देश्य विशेष के लिए किया है। वह उद्देश्य अभी पूरा नहीं हुआ है जिस पर प्रकाश डाले बिना मैं आगे नहीं बढ़ सकता।
.
बिना "व्यवसायात्मिका बुद्धि" के कोई भी साधक अपनी साधना में सफल नहीं हो सकता, चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसारिक। उपासना में सफलता के इस विषय पर भगवान ने और क्या क्या कहा है, उस पर प्रकाश डालते हैं। यह विषय बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।
.
दृढ़ निश्चय और एकाग्र चित्त से अभ्यास करने से ही आत्मसाक्षात्कार संभव है, अन्यथा व्यक्तित्व का विखंडन भी हो सकता है, जिसका परिणाम भयानक विनाश है। सामान्यत लोग असंख्य इच्छायें रखते हैं जो अनेक बार परस्पर विरोधी भी होती हैं। उन्हें पूर्ण करने में ही मन की सारी शक्ति व्यय होकर थक जाती है। थका हुआ मन ईश्वर का चिंतन नहीं कर सकता।
.
भगवान ने "पुष्पिता-वाणी" (पुष्पितां वाचं) से बचने को कहा है। पुष्पिता वाणी शास्त्रीय है लेकिन एक छल है। भगवान कहते हैं --
"यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥२:४२॥"
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥२:४३॥"
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥२:४४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ, अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं। इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है॥
कामनाओं से युक्त स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं॥
उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।
.
जो भी भोगों का प्रलोभन और आश्वासन देती हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने उन सब साधनाओं को "पुष्पिता वाणी" कहा है। ये सब भोगों को प्रदान करती हैं लेकिन इनसे परमात्मा नहीं प्राप्त होते। ये पुनर्जन्म का हेतु बनती हैं।
.
जो साधक भोग और ऐश्वर्य को ही पुरुषार्थ मान लेते हैं, उन की सांख्य और योग में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं हो सकती। यह भगवान श्रीकृष्ण का वचन है, मेरा नहीं।
अतः साधक सावधान ! भोग और ऐश्वर्य को अपना साध्य मत बना लेना। केवल परमात्मा के ही चरण-कमलों में समर्पण की अभीप्सा बनी रहे। इधर-उधर कहीं भी मत देखो। सामने परमात्मा हैं। दृष्टि-पथ उधर ही बना रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मई २०२४
.
पुनश्च: --- मैं भाग्यशाली हूँ कि भगवान ने मुझे याद किया। उनके श्रीचरणों में जब से सिर झुका है, झुका ही हुआ है। कभी उठा भी नहीं है और उठेगा भी नहीं।

माता कुमाता भी हो सकती है ---

माँ की स्तुति में हम कहते हैं कि माता कुमाता नहीं हो सकती, पुत्र कुपुत्र हो सकता है| पर मैं ऐसी माताओं को भी जानता हूँ जो अपनी संतानों, पति और भरे-पूरे परिवार को छोड़कर अपने किसी प्रेमी के साथ भाग जाती हैं|

ऐसी भी माताएँ हैं जो अपने पति और संतान की ह्त्या भी कर देती हैं, या अपने पति को आत्मह्त्या करने या घर छोड़कर भागने को विवश कर देती हैं| कई माताओं ने अपनी ससुराल को नर्क बना रखा है| हर माता महान नहीं होती है|
पूरे भारत में किसी भी जिले के पारिवारिक न्यायालय में जा कर देख लो, झूठे महिला अत्याचार और प्रताड़ित पतियों द्वारा दाखिल तलाक़ के मुक़दमें भरे पड़े हैं|
स्त्री और पुरुष की देह किसी भी आत्मा को अपने प्रारब्ध के कारण प्राप्त होती है| सबके अपने अपने कर्म हैं और सब का अपना अपना भाग्य|
फिर भी मैं सभी माताओं का सम्मान करता हूँ क्योंकि परमात्मा भी माता पहिले हैं फिर पिता|
ॐ ॐ ॐ ||
१५ मई २०१७

क्या हमारी अकर्मण्यता, पुरुषार्थहीनता, प्रमाद, और ईश्वर पर अत्यधिक अंध-निर्भरता आत्मघातक है?

 राष्ट्र पर आसन्न घोर संकट की आशंकाओं के संदर्भ में मेरा पहला प्रश्न :--- क्या हमारी अकर्मण्यता, पुरुषार्थहीनता, प्रमाद, और ईश्वर पर अत्यधिक अंध-निर्भरता आत्मघातक है?

.
वर्तमान में मुझे लगता है कि हिन्दू समाज की स्थिति उस शुतुरमुर्ग की सी हो गई है जो सामने संकट को देखकर आँख बंद कर लेता है या अपना मुंह मिट्टी में छिपा लेता है। अपनी आत्मरक्षार्थ स्वयं कुछ करना नहीं चाहता और कहता है कि जैसी ईश्वर की इच्छा होगी वैसे ही होगा। क्या हम पुरुषार्थहीन और निर्वीर्य हो गए हैं? कोई कुछ आवाज उठाता है तो उसे सांप्रदायिक घोषित कर दिया जाता है?
.
जिस तरह से हिंदुओं में हिन्दुत्व की चेतना, धर्म का ज्ञान, और जनसंख्या कम होती जा रही है, क्या हम अपने से अधिक बढ़ रहे अधर्मियों द्वारा भविष्य में मार तो नहीं दिये जाएँगे? इतिहास तो यही कहता है। कमजोर जाति को बलशील जाति सदा नष्ट कर देती है।
१५ मई २०२१

Tuesday, 13 May 2025

मूल रूप से यहूदियत, ईसाईयत और इस्लाम -- तीनों एक ही हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ( Prophet Abraham) की संताने हैं। इसलिए ये तीनों इब्राहिमी मज़हब (Abrahamic Religions) कहलाते हैं।

मूल रूप से यहूदियत, ईसाईयत और इस्लाम -- तीनों एक ही हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ( Prophet Abraham) की संताने हैं। इसलिए ये तीनों इब्राहिमी मज़हब (Abrahamic Religions) कहलाते हैं।

हज़रत इब्राहिम के बड़े बेटे हजरत इसाक ने यहूदी मज़हब चलाया था, जिनकी नस्ल में हज़रत ईसा (Jesus Christ) हुए, जिनसे ईसाई मज़हब चला।
हजरत इब्राहिम के छोटे बेटे हज़रत इस्माइल की नस्ल में पैगंबर मोहम्मद (सल्लाहो अलैहि वसल्लम) साहब हुए, जो इस्लाम के प्रमुख पैगंबर हैं।
अतः ये तीनों मज़हब मूल रूप से एक ही वंश के हैं।
.
इनका विवाद वर्चस्व के लिए तीन भाइयों के परिवारों के मध्य का खूनी विवाद है, और कुछ नहीं। आमने सामने एक टेबल पर बैठकर ये शांतिपूर्ण तरीके से अपने विवादों का समाधान करें।
.
पिछले वर्ष आज ही के दिन इज़राइल में एक घटना घटी थी जिस से पूरा विश्व स्तब्ध रह गया था। इज़राइली सेना पर भटके हुए फिलिस्तीनी नवयुवकों ने पत्थरबाजी की, उन सब भटके हुए नौजवानों को इजराइली सेना ने गोली से उड़ा दिया। पास ही की एक मस्जिद में हमास के भटके हुए नौजवान छिपे हुए थे। उस पूरी मस्जिद को ही बारूद से उड़ाकर वहाँ की सेना ने सभी को मार दिया। किसी को भी जीवित नहीं छोड़ा।
.
ऐसी घटनाएँ फिर न हों, आपस में अपने भाईचारे को बनाये रखें। यह हाथ जोड़कर सभी से प्रार्थना है।
१४ मई २०२२

भगवान श्रीहरिः के चरण कमलों में यदि आश्रय मिल जाये तो इस संसार में प्राप्त करने योग्य अन्य कुछ भी नहीं है ---

 भगवान श्रीहरिः के चरण कमलों में यदि आश्रय मिल जाये तो इस संसार में प्राप्त करने योग्य अन्य कुछ भी नहीं है। सब कुछ उन्हें समर्पित है। समस्त सृष्टि को उन्होंने धारण कर रखा है और पालन-पोषण कर रहे हैं। वे ही गुरुरूप ब्रह्म हैं, वे ही पारब्रह्म परमेश्वर, परमशिव, नारायण, वासुदेव और सर्वस्व हैं। उन से पृथक अन्य कुछ है ही नहीं। वे ही सर्वस्व हैं। वे स्वयं को अपनी पूर्णता में व्यक्त करें।

"ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥"

सब का साथ, सब का विकास ---

 सब का साथ, सब का विकास ---

.
अंधकार और प्रकाश कभी साथ-साथ नहीं रह सकते। अमृत में थोड़ा सा विष मिलाते ही पूरा अमृत, विष हो जाता है। अमृत का भी साथ, और विष का भी साथ -- किसी का विकास नहीं कर सकता। उसका परिणाम -- मृत्यु है।
.
चमचमाती भव्य साफ-सुथरी सड़कें, ऊँचे ऊँचे चमचमाते भवन, स्वच्छ सुन्दर कपड़े पहिने मनुष्य ही -- विकास के परिचायक नहीं हो सकते।
किसी भी देश की वास्तविक संपदा और विकास के परिचायक उस के उच्च-चरित्रवान, स्वाभिमानी, कार्यकुशल, राष्ट्रप्रेमी, परोपकारी, और धर्मपरायण सत्यनिष्ठ नागरिक होते हैं।
.
युवावस्था में मैंने अनेक देशों की यात्राएँ की हैं। एक बार तो पूरी पृथ्वी की परिक्रमा भी की थी। चीन की दीवार, मिश्र के पिरामिड, कनाडा का नियाग्रा फॉल, पनामा व स्वेज़ नहर, और विश्व के अनेक देशों के अनेक नगरों की भव्यता और दरिद्रता भी देखी है।
.
कुछ देशों की भव्य सड़कें, चमचमाती इमारतें और बाहरी वैभव देखकर बड़ा प्रभावित हुआ था। लेकिन इस के पीछे वहाँ के लोगों का कष्टमय जीवन, गरीबी, और निरंतर संघर्ष भी था, जो किसी को दिखाई नहीं देता।
जिस देश सं.रा.अमेरिका को हम विश्व का सर्वाधिक समृद्ध देश समझते हैं, वहाँ की समृद्धि ८ से १० प्रतिशत लोगों तक ही सीमित है। बाकी सब झूठा दिखावा है।
.
अब समय आ गया है, भारत में समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण, समयानुसार नए कठोर कानून, और न्यायिक व पुलिस व्यवस्था में सुधार हो। सभी के साथ समानता का व्यवहार हो। ये विकास-पुरुष से हमारी अपेक्षाएँ हैं।
.
मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि --- भगवत्-प्राप्ति, यानि आत्म-साक्षात्कार है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ मई २०२४

भगवान ने सब कुछ दिया है, लेकिन सांसारिक बुद्धि और सांसारिक विवेक नहीं दिया जिसका मुझे कोई अफसोस नहीं है ---

 भगवान ने सब कुछ दिया है, लेकिन सांसारिक बुद्धि और सांसारिक विवेक नहीं दिया। इसलिए इस संसार ने मुझे ठगा ही ठगा है

.
सांसारिक दृष्टि से मेरे इस भौतिक शरीर महाराज की आयु आधिकारिक रूप से ७७ वर्ष है। १९ मई २०२४ को मेरे विवाह की ५१ वीं वर्षगांठ है। इस शरीर महाराज से जुड़ी सभी इंद्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ अभी तक तो ठीक से अपना कार्य कर रही हैं। किसी भी तरह की मधुमेह या रक्तचाप से जुड़ी बीमारी नहीं है। भगवान ने सब कुछ दिया है, लेकिन सांसारिक बुद्धि और सांसारिक विवेक नहीं दिया। इसलिए इस संसार ने मुझे ठगा ही ठगा है। सब अपने अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं, और भोगेंगे।
.
इस भौतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि -- अन्तर्मन में जागृत परमात्मा से परम प्रेम है। अब से आगे का अवशिष्ट जीवन परमात्मा को पूरी तरह समर्पित है। मैं उन्हीं से मिलता-जुलता हूँ, उन्हीं से बात करता हूँ, जिनके मन में परमात्मा है। अन्य सारे संबंध एक दिखावा हैं। यथासंभव परमात्मा की चेतना में ही रहता हूँ, यही सबसे बड़ी सेवा है जो मैं समष्टि की कर सकता हूँ। इस जीवन की एकमात्र उपलब्धि परमात्मा का परमप्रेम है | अन्य सब दृष्टिकोणों से यह जीवन पूरी तरह विफल है। परमात्मा के सिवाय जीवन में कुछ भी अन्य प्राप्त नहीं किया। सब स्थानों पर विफलता ही विफलता मिली।
Let “Thy will be done.” (Not my will, but yours be done.)
.
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
.
"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् , पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् , कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
.
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ।
कृपा शंकर
१४ मई २०२४