Monday, 12 May 2025

वर्तमान इज़राइल-फिलिस्तीन युद्ध का कारण और उसका समाधान ---

 वर्तमान इज़राइल-फिलिस्तीन युद्ध का कारण और उसका समाधान ---

.
कल से इज़राइल और फिलिस्तीन के मध्य वर्तमान युद्ध पर हजारों की संख्या में ट्वीट हो रहे हैं ट्वीटर पर, यूट्यूब पर पचासों वीडियो आ रहे हैं, टीवी चैनलों पर अनेक बकासुर योद्धा रौद्र रूप में भयंकर वाक्युद्ध कर रहे हैं, अनेक सनसनीखेज समाचार आ रहे हैं, लेकिन वास्तविकता को बताया नहीं जा रहा है। सत्य को जान बूझ कर छिपाया जा रहा है।
.
वर्तमान में जो युद्ध हो रहा है, वह ईरान का इज़राइल के विरुद्ध एक छद्म युद्ध है। इस समय फिलिस्तीन की औकात नहीं है कि वह इज़राइल से युद्ध कर सके, क्योंकि लगभग सभी अरब देशों ने फिलिस्तीन को सहायता देना बंद कर रखा है, और सभी अरब देशों ने इज़राइल से अपने संबंध सामान्य कर लिए हैं। पिछले एक वर्ष से फिलिस्तीन को शस्त्रों की आपूर्ति ईरान कर रहा है।
.
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के ऊपर नित्य लेख लिखने वाली गेटस्टोन इंस्टीट्यूट ने अपने आज के लेख में लिखा है ---
--- Were it not for Iran's financial and military aid, the Palestinian terrorist groups would not have been able to attack Israel with thousands of rockets and missiles.
In the past, Iran used its proxy in Lebanon, Hezbollah, to attack Israel. Iran is now using its Palestinian proxies to achieve its goal of eliminating Israel and killing Jews. This is a war not only between Israel and the Palestinian terrorist groups. Rather, it is a war waged by Iran against Israel. ---
उपरोक्त लेख को लिखने वाला भी एक प्रसिद्ध निष्पक्ष अरब पत्रकार है।
.
इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद सौ वर्ष पुराना हो गया है। इसका समाधान यही है कि फिलिस्तीन के पास जितनी जमीन है, उसी को अंतर्राष्ट्रीय सीमा मानकर फिलिस्तीन इस युद्ध को समाप्त घोषित कर दे, और आतंकवादी गतिविधियां पूरी तरह समाप्त कर दे। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समाधान नहीं है।
.
प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय हिन्दू सैनिकों को युद्ध में चारे की तरह झौंक कर ब्रिटेन ने तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) को हराकर, उसका विखंडन कर दिया था। युद्ध के दौरान ही जब फिलिस्तीन पर तुर्की का अधिकार था, अंग्रेजों ने भारतीय हिन्दू सिपाहियों को लेकर फिलिस्तीन पर हमला किया और फिलिस्तीन को यरूशलम के साथ अपने अधिकार में ले लिया। उस समय फिलिस्तीन में अल्पसंख्यक यहूदी और बहुसंख्यक अरब बसे हुए थे। दोनों के बीच तनाव तब शुरू हुआ जब मित्र राष्ट्रों के समुदाय ने यहूदी लोगों के लिए फिलिस्तीन में इज़राइल नाम का एक Home Land स्थापित करने का निर्णय किया।
.
यहूदियों की मान्यता के अनुसार फिलिस्तीन उनके पूर्वजों की पवित्र भूमि है, और अब यही उनका घर होना चाहिए। फिलिस्तीनी अरब भी इस्लाम आने से पूर्व यहूदी ही थे। लेकिन मुसलमान बनने के बाद वे यहूदियों से शत्रुता और घृणा रखने लगे। फिलिस्तीनी अरबों के लिए यह उनका देश था। सन १९२० से द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ती तक यूरोप में यहूदियों का भयंकर नर-संहार हुआ था, उस नर-संहार से बचे प्रायः सभी यहूदी भागकर अपनी एक मातृभूमि की चाह में फिलिस्तीन आ गए। सन १९४७ में संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलिस्तीन का विभाजन कर में उसे यहूदियों और अरबों के अलग-अलग राष्ट्रों में बाँटने का निर्णय हुआ, और यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय नगर बनाया गया। लेकिन अरब पक्ष ने इसको खारिज कर दिया।
.
इसके बाद की कहानी और युद्धों का तो सबको पता है। बड़ी भयंकर मारकाट और लड़ाइयाँ हुई हैं। उन्हें मैं लिखना नहीं चाहता। जो लिखने की बात है वह तो लिख दी है।
.
अब भविष्य में इज़राइल और ईरान में भयानक निर्णायक युद्ध होगा जिसमें या तो ईरान ही बचेगा या इज़राइल। यह विश्वयुद्ध का कारण होगा और महा भयंकर विनाश होगा। यह युद्ध भारत से दूर हो, यही मेरी प्रार्थना है।
कृपा शंकर
१२ मई २०२१

अव्यभिचारिणी भक्ति --- (भाग २)

 अव्यभिचारिणी भक्ति --- (भाग २)

.
बहुत दिनों से अव्यभिचारिणी भक्ति पर पुनश्च लिखने की इच्छा थी। दो-तीन बार पूर्व में भी लिख चुका हूँ, उसी की लगभग पुनरावृति कर रहा हूँ। इसके बाद लिखने को कुछ और अवशेष रहता ही नहीं है। भक्तों ने भगवान को उपालंभ देते हुए उन्हें एक ईर्ष्यालु-प्रेमी कहा है, जिन्हें वे ही भक्त अच्छे लगते हैं जो उनकी रचनाओं को नहीं, बल्कि सिर्फ उन्हें ही प्रेम करते हैं। भक्तों के अनुसार भगवान हमसे हमारा शत-प्रतिशत प्रेम मांगते हैं। उन्हें ९९.९९% नहीं, बल्कि १००% प्रेम चाहिए। भगवान से पृथक, अन्य कहीं पर कभी भी हमारे प्रेम का किंचित भी होना -- भक्ति में व्यभिचार है। भगवान के अतिरिक्त अन्य कहीं पर किसी भी परिस्थिति में प्रेम का नहीं होना --अव्यभिचारिणी भक्ति है।
.
कल-परसों मैंने अनन्य भक्ति पर एक लेख लिखा था। गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमसे अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति मांगते हैं। अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति भगवान का एक बहुत बड़ा आशीर्वाद और भक्ति की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, जो अनेक जन्मों की साधना के उपरांत प्राप्त होती है। यह एक क्रमिक विकास, परमात्मा को उपलब्ध होने की अंतिम सीढ़ी, और उनकी परम कृपा है। इसके उपरांत वैराग्य का होना सुनिश्चित है।
.
गीता में भगवान कहते हैं --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
.
ईश्वर में अनन्य योग, यानि एकत्वरूप समाधि-योग से अव्यभिचारिणी भक्ति व्यक्त होती है। भगवान् वासुदेव से परे अन्य कोई भी नहीं है। वे ही हमारी परमगति हैं। विविक्तदेशसेवित्व -- एकान्त पवित्र देश में रहने का स्वभाव, तथा संस्कार-शून्य जनसमुदाय में अप्रीति। यहाँ विनयभावरहित संस्कारशून्य लोगों के समुदाय का नाम ही जनसमुदाय है। विनययुक्त संस्कारसम्पन्न मनुष्यों का समुदाय जनसमुदाय नहीं है। वह तो ज्ञानमें सहायक है।
.
इस भक्ति को उपलब्ध होने पर भगवान के अतिरिक्त अन्य कहीं मन नहीं लगता। भक्ति में व्यभिचार वह है जहाँ भगवान के अलावा अन्य किसी से भी प्यार हो जाता है। भगवान हमारा शत-प्रतिशत प्यार माँगते हैं। हम जरा से भी इधर-उधर हो जाएँ तो वे चले जाते हैं। इसे समझना थोड़ा कठिन है। हम हर विषय में, हर वस्तु में भगवान की ही भावना करें, और उसे भगवान की तरह ही प्यार करें। सारा जगत ब्रह्ममय हो जाए। ब्रह्म से पृथक कुछ भी न हो। यह अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति है।
भगवान स्वयं कहते हैं --
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात - बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
.
इस स्थिति को हम ब्राह्मी स्थिति (कूटस्थ-चैतन्य) भी कह सकते हैं, जिसके बारे में भगवान कहते हैं --
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥२:७१॥"
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात - जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है॥
हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थिति में यदि अन्तकाल में भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है॥
.
व्यावहारिक व स्वभाविक रूप से यह अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति तब उपलब्ध होती है जब भगवान की परम कृपा से हमारी घनीभूत प्राण-चेतना कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्त्रार में प्रवेश कर जाती है| तब लगता है कि अज्ञान क्षेत्र से निकल कर ज्ञान क्षेत्र में हम आ गए हैं। सहस्त्रार से भी परे ब्रह्मरंध्र का भेदन करने पर अन्य उच्चतर लोकों की और उनसे भी परे परमशिव की अनुभूतियाँ होती हैं। फिर ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय -- एक ही हो जाते हैं। उस स्थिति में हम कह सकते हैं -- "शिवोहम् शिवोहम्" या "अहं ब्रह्मास्मि"। फिर कोई अन्य नहीं रह जाता और हम स्वयं ही अनन्य हो जाते हैं॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१२ मई २०२३

आज वैशाख शुक्ल पंचमी को आचार्य शंकर की २५३१ वीं जयंती है ----

आज वैशाख शुक्ल पंचमी को आचार्य शंकर की २५३१ वीं जयंती है। उनका जन्म जीसस क्राइस्ट से ५०८ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। इसी तरह उनका देहावसान जीसस क्राइस्ट से ४७४ वर्ष पूर्व हुआ था। दुर्भावना से पश्चिमी विद्वान् उनका जन्म ईसा के ७८८ वर्ष बाद होना बताते हैं, जो गलत है। शंकराचार्य मठों से उपलब्ध प्राचीनतम पांडुलिपियों, अन्य ग्रंथों में दिए विवरणों और ग्रहों की तत्कालीन स्थितियों के आधार पर उनकी सही जन्म तिथि की गणना भारतीय विद्वानों द्वारा दुबारा की गई थी।

उनकी जयंती पर उन को नमन एवं सभी सनातन धर्मावलम्बियों का अभिनन्दन॥
.
एक महानतम परम विलक्षण प्रतिभा जिसने कभी इस पृथ्वी पर विचरण कर सनातन धर्म का पुनरोद्धार किया था, के बारे में लिखने का मेरा यह प्रयास सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। आज वैशाख शुक्ल पञ्चमी को उनका जन्म मेरे जैसे उनकी परंपरा के सभी अनुयायियों के ह्रदय में हुआ है, अतः शिव स्वरुप भगवान भाष्यकार शङ्करभगवद्पादाचार्य को नमन, जिनकी परम ज्योति हमारे कूटस्थ में निरंतर प्रज्ज्वलित है।
.
मात्र सात वर्ष का एक संन्यासी बालक, गुरुगृह के नियमानुसार एक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने पहुँचा। उस ब्राह्मण के घर में भिक्षा देने के लिए अन्न का एक दाना तक नहीं था|। ब्राह्मण पत्नी ने उस बालक के हाथ पर एक आँवला रखा और रोते हुए अपनी विपन्नता का वर्णन किया। उसकी ऐसी अवस्था देखकर उस प्रेममूर्ति बालक का हृदय द्रवित हो उठा। वह अत्यंत आर्त स्वर में माँ लक्ष्मी का स्तोत्र रचकर उस परम करुणामयी से निर्धन ब्राह्मण की विपदा हरने की प्रार्थना करने लगा। उसकी प्रार्थना पर प्रसन्न होकर माँ महालक्ष्मी ने उस परम निर्धन ब्राह्मण के घर में सोने के आँवलों की वर्षा कर दी। जगत् जननी महालक्ष्मी को प्रसन्न कर उस ब्राह्मण परिवार की दरिद्रता दूर करने वाला वह बालक था -- ‘'शंकर'’, जो आगे चलकर जगत्गुरू शंकराचार्य के नाम से विख्यात हुआ।
.
आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को मालाबार प्रान्त (केरल) के कालड़ी गाँव में तैत्तिरीय शाखा के एक यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। बचपन में ही उनके पिता का देहान्त हो गया था। उस समय सारे भारत में नास्तिकता का बोलबाला था। उस नास्तिकता के प्रभाव को दूरकर उन्होंने वेदान्त और भक्ति की ज्योति से सारे देश को आलोकित कर दिया। सनातन धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने भारत में चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उस पर अपने चारों शिष्यों को आसीन किया।
.
एक बार आचार्य शंकर प्रातःकाल वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने गये तब देखा कि एक युवा महिला अपने मृत पति के अंतिम संस्कार के खर्च के लिए भिक्षा मांग रही थी। उसने अपने पति की मृत देह को घाट पर इस प्रकार लेटा रखा था कि कोई भी स्नान के लिए नीचे नहीं उतर पा रहा था। विवश शंकराचार्य ने उस महिला से अनुरोध किया कि हे माते, यदि आप कृपा करके इस शव को थोडा सा परे हटा दें तो मैं नीचे उतर कर स्नान कर सकूं। उस शोकाकुल महिला ने कोई उत्तर नहीं दिया। बार बार अनुनय विनय करने पर वह चिल्ला कर बोली कि इस मृतक को ही क्यों नहीं कह देते कि परे हट जाए।
आचार्य शंकर ने कहा कि हे माते, यह मृतक देह स्वतः कैसे हट सकती है? इसमें प्राण थोड़े ही हैं। इस पर वह युवा स्त्री बोली कि हे संत महाराज, ये आप ही तो हैं जो सर्वत्र यह कहते फिरते हैं कि इस शक्तिहीन जग में केवल ब्रह्म का ही एकाधिकार चलता है। एक निष्काम, निर्गुण और त्रिगुणातीत ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, सब माया है। एक सामान्य महिला से इतने गहन तत्व की बात सुनकर आचार्य जड़वत हो गए। क्षण भर पश्चात् देखा कि वह महिला और उसके पति का शव दोनों ही लुप्त हो गए हैं। स्तब्ध आचार्य शंकर इस लीला का भेद जानने के लिए ध्यानस्थ हो गए। ध्यान में वे तुरंत समझ गए कि इस अलौकिक लीला की नायिका अन्य कोई नहीं स्वयं महामाया अन्नपूर्ण थीं। यह भी उन्हें समझ में आ गया कि इस विश्व का आधार यही आदिशक्ति महामाया अपने चेतन स्वरुप में है। इस अनुभूति से आचार्य भावविभोर हो गए। उन्होंने वहीं महामाया अन्नपूर्णा स्तोत्र की रचना की। उसके एक पद का अनुवाद निम्न है ---
"हे माँ यदि समस्त देवी देवताओं के स्वरूपों का अवलोकन किया जाए तो कुछ न कुछ कमी अवश्य दृष्टिगोचर होगी। यहाँ तक कि स्वयं ब्रह्मा भी प्रलयकाल की भयंकरता से विव्हल हो जाते हैं। किन्तु हे माँ चिन्मयी एक मात्र आप ही नित्य चैतन्य और नित्य पूर्ण है।"
.
आदि शंकराचार्य के बारे में सामान्य जन में यही धारणा है कि उन्होंने सिर्फ अद्वैतवाद या अद्वैत वेदांत को प्रतिपादित किया। पर यह सही नहीं है। अद्वैतवादी से अधिक वे एक भक्त थे, और उन्होंने भक्ति को अधिक महत्व दिया। अद्वैतवाद के प्रतिपादक तो उनके परम गुरु ऋषि गौड़पाद थे, जिन्होनें 'माण्डुक्यकारिका' ग्रन्थ की रचना की। आचार्य गौड़पाद ने माण्डुक्योपनिषद पर आधारित अपने ग्रन्थ मांडूक्यकारिका में जिन तत्वों का निरूपण किया उन्हीं का शंकराचार्य ने विस्तृत रूप दिया। अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदन करने हेतु शंकराचार्य ने सबसे पहिले माण्डुक्यकारिका पर भाष्य लिखा। आचार्य गौड़पाद श्रीविद्या के भी उपासक थे।
.
शंकराचार्य के गुरु योगीन्द्र गोविन्दपाद थे जिन्होंने पिचासी श्लोकों के ग्रन्थ 'अद्वैतानुभूति' की रचना की। उनकी और भगवान पातंजलि की गुफाएँ पास पास ओंकारेश्वर के निकट नर्मदा तट पर घने वन में हैं। वहाँ आसपास और भी गुफाएँ हैं जहाँ अनेक सिद्ध संत तपस्यारत हैं। पूरा क्षेत्र तपोभूमि है। राजाधिराज मान्धाता ने यहीं पर शिवजी के लिए इतनी घनघोर तपस्या की थी कि शिवजी को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना पड़ा जो ओंकारेश्वर कहलाता है।
अपने 'विवेक चूडामणि' ग्रन्थ में शंकराचार्य कहते हैं ---
"भक्ति प्रसिद्धा भव मोक्षनाय नात्र ततो साधनमस्ति किंचित्।"
-- "साधना का आरम्भ भी भक्ति से होता है और उसका चरम उत्कर्ष भी भक्ति में ही होता है|"
भक्ति और ज्ञान दोनों एक ही हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में इतने सुन्दर भक्ति पदों की रचनाएँ की हैं जो अति दिव्य और अनुपम हैं। उनमे भक्ति की पराकाष्ठा है। इतना ही नहीं परम ज्ञानी के रूप में उन्होंने ब्रह्म सूत्रों, उपनिषदों और गीता पर भाष्य लिखे हैं जो अनुपम हैं।
.
यदि भगवान भाष्यकार आदि शंकराचार्य तत्कालीन विकृत हो चुके नास्तिक बौद्ध मत का खंडन करके सनातन धर्म की पुनर्स्थापना नहीं करते तो आज भारत, भारत नहीं होता, बल्कि एक पूर्णरूपेण इस्लामिक देश होता। इस्लाम का प्रतिरोध भारत इसी लिए कर पाया क्योंकि यहाँ सनातन धर्म पुनर्स्थापित हो चुका था। बौद्धों ने अपना सिर कटा लिया या धर्मान्तरित हो गए पर इस्लाम की धार का प्रतिरोध नहीं कर पाए। पूरा मध्य एशिया (जहां उज्बेकिस्तान से मुग़ल आक्रान्ता आये थे और भारत पर राज्य किया), तुर्किस्तान सहित बौद्ध मतानुयायी हो गया था। वहाँ के मुसलमान पहिले हिन्दू थे, फिर बौद्ध बने। बौद्ध मत में अनेक विकृतियाँ आ गयी थीं, और उसके अनुयायी अत्यधिक अहिंसक और बलहीन हो गए थे।
.
जब इस्लाम का जन्म हुआ तब इस्लाम की आक्रामक धार इतनी तीक्ष्ण थी कि १०० वर्ष के भीतर भीतर पूरा अरब (जो हिन्दू था), बेबीलोन (वर्तमान इराक, कुवैत), पश्चिम एशिया -- यमन से लेबनान तक, उत्तरी अफ्रीका (सोमालिया, इथियोपिया, जिबूती, सूडान, मिश्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मोरक्को), मध्य एशिया के सारे देश (ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अज़र्बेजान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान आदि), रूस के तातारिस्तान, देगिस्तान व् चेचेनिया आदि प्रदेश और पूरा फारस (वर्त्तमान ईरान) इस्लाम की पताका के अंतर्गत आ गए थे।
.
लेकिन इस्लाम की आंधी एक लगभग सहस्त्र वर्ष राज्य कर के भी भारत को नष्ट नहीं कर पाई, क्योंकि यहाँ सनातन धर्म के अनुयायियों द्वारा भक्ति मार्ग के आन्दोलन द्वारा हर प्रकार के विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध हुआ।
मौलाना हाली ने दुःख प्रकट करते हुए लिखा था ---
"वो दीने हिजाजी का बेबाक बेड़ा
निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा
मज़ाहम हुआ कोई खतरा न जिसका
न अम्मां में ठटका, न कुलज़म में झिझका
किए पै सिपर जिसने सातों समंदर
वो डुबा दहाने में गंगा के आकर॥"
यानी इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा, वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां की संस्कृति से हुआ तो वह गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया॥
.
मेरी दृष्टी में भगवान भाष्यकार शङ्करभगवद्पादाचार्य महानतम और दिव्यतम प्रतिभा थे जिन्होंने ढ़ाई हजार वर्षों पूर्व इस धरा पर विचरण किया। सनातन धर्म की रक्षा ऐसे ही महापुरुषों से हुई है। धन्य है यह भारतभूमि जिसने ऐसी महान आत्माओं को जन्म दिया।
.
ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय !
कृपा शंकर
१२ मई २०२४

मैं परमशिव हूँ। शिवोहं शिवोहं ॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ ॐ ॐ !!

 मैं परमशिव हूँ। शिवोहं शिवोहं ॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ ॐ ॐ !!

.
अपनी पूर्णता यानि परमशिवत्व में जागृति ही जीवन है, कोई खोज नहीं। परम शिवत्व ही हमारी शाश्वत जिज्ञासा और गति है। हमारे पतन का एकमात्र कारण हमारे मन का लोभ और गलत विचार हैं। जिसे हम खोज रहे हैं वह तो हम स्वयं ही हैं।
.
जीवन में यदि किसी से मिलना-जुलना ही है तो अच्छी सकारात्मक सोच के लोगों से ही मिलें, अन्यथा परमात्मा के साथ अकेले ही रहें। हम परमात्मा के साथ हैं तो सभी के साथ हैं, और सर्वत्र हैं।
.
भगवान ने हमें विवेक दिया है, जिसका उपयोग करते हुए अपनी वर्तमान परिस्थितियों में जो भी सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, वह कार्य निज विवेक के प्रकाश में करें।
.
सदा यह भाव रखें कि यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही विस्तार, और मेरा ही संकल्प है। जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, और जो कुछ भी दृष्टि से परे हैं, वह सब मैं हूँ। मैं सम्पूर्ण अस्तित्व और उसकी पूर्णता हूँ। मैं परमशिव हूँ। शिवोहं शिवोहं ॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ ॐ ॐ !!
.
निर्वाण षटकम् ---
मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं, न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु: चिदानंद रूपः शिवोहम् शिवोहम् ||१||
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः, न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः |
न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु, चिदानंदरूप: शिवोहम् शिवोहम् ||२||
न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ, मदों नैव मे नैव मात्सर्यभावः |
न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानंदरूप: शिवोहम् शिवोहम् ||३|
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं, न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः |
अहम् भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता, चिदानंद रूप: शिवोहम् शिवोहम् ||४||
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:, पिता नैव मे नैव माता न जन्म |
न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं, चिदानंद रूप: शिवोहम् शिवोहम् ||५||
अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो, विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:, चिदानंद रूप: शिवोहम् शिवोहम् ||६||
(इति श्रीमद जगद्गुरु शंकराचार्य विरचितं निर्वाण-षटकम् सम्पूर्णं)
१२ मई २०२४

Saturday, 10 May 2025

अनन्य भक्ति क्यों आवश्यक है? अनन्य भक्ति क्या होती है? ---

 अनन्य भक्ति क्यों आवश्यक है? अनन्य भक्ति क्या होती है? ---

.
"अनन्य भक्ति" एक ऐसा विषय है जिसे एक सद्गुरु स्वयं अपने सामने बैठाकर अपने सुपात्र शिष्य को ठीक से समझा सकता है। इसे ठीक से समझ तो वे ही पायेंगे जिनको वेदान्त की भी थोड़ी-बहुत अनुभूतियाँ हैं। हम यह देह नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि और अनंतता हैं। हंसःयोग (अजपा-जप) में इसी का अभ्यास किया जाता है। गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- "अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥"
.
अब प्रश्न उठता है कि अनन्य भाव क्या है?
भगवान मुझ से अन्य नहीं हैं, मैं उन की सर्वव्यापक अनंतता हूँ, और वे मेरे साथ एक हैं; मैं यह भौतिक देह नहीं, बल्कि भगवान की पूर्णता हूँ, -- यह अनन्य भाव है। जिन पर ईसाईयत का प्रभाव है, वे इसका अर्थ दूसरा लगायेंगे। वे कहेंगे कि सिर्फ श्रीकृष्ण ही उपास्य है और परमात्मा के अन्य अवतार या अन्य रूप उपास्य नहीं हैं। लेकिन यह गलत है।
.
अनन्यभाव से युक्त होकर सर्वव्यापी परमदेव नारायण को आत्मरूप से जानते हुए उनका निरन्तर चिन्तन -- निष्काम अनन्य उपासना है। यहाँ "योगक्षेम" हमारा लक्ष्य नहीं है, वह तो एक side effect है। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है। यह भगवान का काम है, हमारा काम सिर्फ आत्म-समर्पण है।
.
अन्य भक्तों का योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं, यह बात ठीक है, किन्तु जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा करते हैं। पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। क्योंकि वे जीने और मरने में अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रहते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।
.
एक व्यक्ति यानि मनुष्य की चेतना में जो नारकीय जीवन मैं जी रहा हूँ, उसे जीने की मेरी बिल्कुल भी इच्छा नहीं है। अपने प्रारब्धवश ही यह जीवन जी रहा हूँ, अन्यथा मेरा सुख, शांति, सुरक्षा और प्रेम तो सिर्फ भगवान में है। स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं, यही मेरा सुख और आनंद है। भगवान की चेतना के बिना मैं मृत हूँ। भगवान की चेतना के बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।
.
ॐ सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहै,
तेजस्विनावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
११ मई २०२३
.
पुनश्च: --- गीता के तेरहवें अध्याय का ग्यारहवाँ श्लोक भी "अनन्य योग" और "अव्यभिचारिणी भक्ति" की महिमा बताता है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥"
११ मई २०२३

सनातन धर्म किसी को क्या दे सकता है?

 सनातन धर्म किसी को क्या दे सकता है?

.
किसी को निःशुल्क चावल की बोरियाँ, मंहगी शराब, खूब भोग-विलास और यौन वासनाओं की असीम तृप्ति के लिए अनेक सुंदर युवतियाँ/युवक चाहिएँ, वे कहीं भी जाएँ, सनातन धर्म उनके लिए नहीं है।
.
सनातन धर्म सिर्फ उनके लिए है जिन्हें जीवन में -- अभ्युदय (सर्वतोमुखी विकास, इष्ट लाभ, मनोरथ की सिद्धि, कल्याण) और -- निःश्रेयस (कष्टों/दुःखों से मुक्ति, मंगल और मोक्ष) चाहिए। मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण दिए हैं, जिन्हें धारण करना धर्म है।
सनातन धर्म है परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पाने की अभीप्सा।
धर्म के सूक्ष्म तत्वों को महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में बहुत सरल भाषा में समझाया गया है। ये ग्रंथ समझ में आने वाली भाषा में बाल्यावस्था/किशोरावस्था से ही बालक/बालिकाओं को उपलब्ध करवाने चाहियें।
.
उपनिषदों में धर्म का ज्ञान भरा पड़ा है। जहाँ झूठ, कपट और छल है, वहाँ धर्म नहीं है। जहाँ धर्म नहीं है, वहाँ परमात्मा नहीं है। सनातन धर्म परमात्मा की खोज है।
सनातन धर्म कहता है कि मनुष्य एक शाश्वत आत्मा है, और अपने कर्मफलों को भोगने के लिए बार बार जन्म लेता है। यह संसार द्वन्द्वात्मक है, जहाँ सुख और दुःख दोनों मिले हुए हैं। सुखों की खोज दुःखों को जन्म देती है। अनेक जन्मों में अनेक योनियों में भटकता हुआ प्राणी फिर दुःखी होकर परमात्मा की ओर उन्मुख होता है। यहीं से जीवन में भक्ति का प्रादुर्भाव होता है। संक्षेप में यही सत्य सनातन धर्म है।
जहाँ धर्म है, वहीं जय है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ मई २०२३

भगवान अपनी उपासना स्वयं ही करेंगे ---

 भगवान अपनी उपासना स्वयं ही करेंगे ---

.
इस संसार में अनेक तरह के अनेक कष्ट हैं, उनके निवारणार्थ साधनाएँ भी अनेक हैं। लेकिन अपने स्वार्थ के लिए परमात्मा को कष्ट देना मैं उचित नहीं समझता। परमात्मा से कुछ भी नहीं चाहिए, कुछ उनको बापस ही देना है। अपना अन्तःकरण और सम्पूर्ण पृथकता का बोध उन्हें किसी भी तरह बापस लौटाना है।
वे सच्चिदानंद और सर्वस्व हैं। जो भी आराधना या उपासना उन्हें करनी है, वह वे स्वयं ही करेंगे। मैं तो उनका एक उपकरण निमित्त मात्र हूँ जिसका वे चाहे जैसे उपयोग करें।
.
जिन भी उपासनाओं का मैं साक्षी हूँ, वे सब वैदिक हैं, जिन्हें वैदिक युग से तपस्वी करते आए हैं। उपनिषदों में व गीता में उनका उल्लेख है। मुझे उनमें कुछ भी नहीं जोड़ना है। बाकी सब परमात्मा की महिमा है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ मई २०२४