Wednesday, 12 March 2025

भगवान से प्रार्थना करना क्या आवश्यक है? ---

 भगवान से प्रार्थना करना क्या आवश्यक है? ---

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भगवान तो हमारे हृदय में हैं। विचारों के उदय होने से पूर्व ही उन्हें पता होता है कि हम क्या सोचने वाले हैं। अतः क्या प्रार्थना करना आवश्यक है?
उपरोक्त प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है। फिर भी आज भगवान से दो प्रार्थनाएँ हैं -
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(१) मुझसे किसी भी प्रकार का कोई प्रज्ञा-अपराध न हो।
(२) जिन भी नकारात्मक परिस्थितियों में भगवान ने मुझे रखा है, उनकी नकारात्मकता से प्रेमाग्नि की प्रज्ज्वलित आभा कम न हो। किसी भी तरह की कामना/आकांक्षा का अंतःकरण में जन्म ही न हो।
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मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए। मुझमें हिमालय से भी बड़ी-बड़ी लाखों कमियाँ हैं, जिन्हें मैं कभी दूर नहीं कर सकता। किसी भी तरह के रूप-गुण का सौंदर्य मुझमें नहीं है। अपना सर्वस्व यथावत् उन्हें समर्पित है। वे मुझे मेरे सभी अवगुणों के साथ स्वीकार करें। कोई गुण भूलवश यदि मुझमें हो तो उसे भी वे स्वीकार करें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१3 मार्च २०२४

गीता के आत्म-संयम योग का सत्संग और स्वाध्याय ---

 गीता के आत्म-संयम योग का सत्संग और स्वाध्याय : भगवान कहते हैं ....

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यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||
भावार्थ : परमात्मा को प्राप्त करके वह योग में स्थित मनुष्य परम आनन्द को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है।
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तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्| स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा||६:२३||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये कि दृड़-विश्वास के साथ योग का अभ्यास करते हुए सभी सांसारिक संसर्ग से उत्पन्न दुखों से बिना विचलित हुए योग समाधि में स्थित रहकर कार्य करे।
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सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः| मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ||६:२४||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये मन से उत्पन्न होने वाली सभी सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण-रूप से त्याग कर और मन द्वारा इन्द्रियों के समूह को सभी ओर से वश में करे।
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शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया| आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ||६:२५||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये क्रमश: चलकर बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करता हुआ मन को आत्मा में स्थित करके, परमात्मा के चिन्तन के अलावा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करे।
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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ | ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ||६:२६||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी आत्मा में ही स्थिर करे।
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ | उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ||६:२७||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य का मन जब परमात्मा में एक ही भाव में स्थिर रहता है और जिसकी रज-गुण से उत्पन्न होने वाली कामनायें भली प्रकार से शांत हो चुकी हैं, ऎसा योगी सभी पाप-कर्मों से मुक्त होकर परम-आनन्द को प्राप्त करता है।
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः| सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते||६:२८||
भावार्थ : इस प्रकार योग में स्थित मनुष्य निरन्तर योग अभ्यास द्वारा सभी प्रकार के पापों से मुक्त् होकर सुख-पूर्वक परब्रह्म से एक ही भाव में स्थिर रहकर दिव्य प्रेम स्वरूप परम-आनंद को प्राप्त करता है।
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सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि| ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः||६:२९||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य सभी प्राणीयों मे एक ही आत्मा का प्रसार देखता है और सभी प्राणीयों को उस एक ही परमात्मा में स्थित देखता है, ऎसा योगी सभी को एक समान भाव से देखने वाला होता है।
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||
भावार्थ : जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
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सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः| सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||६:३१||
भावार्थ : योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है |
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन| सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः||६:३२||
भावार्थ : हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणीयों को देखता है, सभी प्राणीयों के सुख और दुःख को भी एक समान रूप से देखता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये।
१२ मार्च २०१९

भगवान से परमप्रेम की अवस्था में हम जो कुछ भी करेंगे वह अच्छा ही होगा ---

 भगवान से परमप्रेम की अवस्था में हम जो कुछ भी करेंगे वह अच्छा ही होगा ---

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जिस प्रकार सूखी लकड़ी के दो टुकड़ों के लगातार घर्षण से अग्नि प्रज्ज्वलित होकर उस लकड़ी को जला देती है, वैसे ही भक्तिपूर्वक किया हुआ साधन ज्ञानाग्नि को उद्दीप्त कर अज्ञानरूपी ईंधन को भस्म कर देता है| स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी बापस आत्मा में ही स्थिर करते रहना चाहिए|

जब हम परमात्मा की चेतना में होते हैं, तब हमारे माध्यम से परमात्मा जो भी कार्य करते हैं, वह पुण्य होता है।
जब हम राग-द्वेष, लोभ और अहंकार के वशीभूत होकर कुछ भी कार्य करते हैं, वह पाप होता है।
१२ मार्च २०२० 

हमारा लक्ष्य परमात्मा है, उन्हीं की उपासना करें ---

हमारा लक्ष्य परमात्मा है। उन्हीं की उपासना करें। सारा मार्गदर्शन उपनिषदों व गीता में है। उनको पाने की पात्रता विकसित करें। पात्रता होने पर परमात्मा स्वयं आयेंगे। उनको पाने का कोई लघुमार्ग (Short Cut) नहीं है। परमात्मा से कम किसी भी उपलब्धि के लिए समय नष्ट न करें। हमारे में चाहे लाख कमियाँ हों, वे भी उन्हें ही समर्पित कर दें। अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम उन्हें दें। वे कहीं दूर नहीं हैं, निकटतम से भी अधिक निकट हैं। हमारा लक्ष्य सदा हमारे समक्ष रहे।

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१२ मार्च २०२२

Tuesday, 11 March 2025

सनातन धर्म ही भारत की राजनीति, और हम सब का जीवन भी होगा ---

 सनातन धर्म ही भारत की राजनीति, और हम सब का जीवन भी होगा ---

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कोई मेरी बात सुने या न सुने, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जिस दिन सनातन धर्म ही भारत की राजनीति होगा। सनातन धर्म ही भारत की राजनीति हो सकता है। धर्म-विहीन राजनीति विकृतियों को जन्म देने वाली होती है। सनातन धर्म ही हमारा स्वधर्म भी है।
हमारा स्वधर्म है -- निज जीवन में परमात्मा से परमप्रेम, परमात्मा को पाने की अभीप्सा और परमात्मा की यथासंभव पूर्ण अभिव्यक्ति।
पाप और पुण्य क्या है? --- जब हम परमात्मा की चेतना में होते हैं, तब हमारे माध्यम से परमात्मा जो भी कार्य करते हैं, वह पुण्य होता है। जब हम राग-द्वेष, लोभ और अहंकार के वशीभूत होकर कुछ भी कार्य करते हैं, वह पाप होता है।
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हमारे जीवन में परमात्मा से परमप्रेम पूर्ण रूप से व्यक्त हो। इससे अतिरिक्त अन्य कोई भाव सार्थक नहीं है। हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध परमात्मा से है। जन्म से पूर्व भी उन्हीं से संबंध था और मृत्यु के पश्चात भी उन्हीं से रहेगा। यह भगवान का प्रेम ही था जो हमें माँ-बाप, भाई-बहिन, सगे-सम्बन्धियों और मित्रों के माध्यम से प्राप्त हुआ। यह एक मायावी भ्रम है कि कोई अपना-पराया है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी परमात्मा से ही सम्बन्ध है। गुरू भी एक निश्चित भावभूमि तक ले जा कर छोड़ देता है, आगे की यात्रा तो स्वयं को ही करनी पडती है। फिर न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य, एकमात्र परमात्मा ही सब कुछ है। सारे सम्बन्ध एक भ्रम मात्र हैं।
हे महापुरुष, मैं आपके चरणों की वंदना करता हूँ। मैं आपके साथ एक हूँ। आपकी जय हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ मार्च २०२३

भगवान के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, हम वही बन जाते हैं ---

 भगवान के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, हम वही बन जाते हैं ---

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निरंतर भगवान की चेतना में रहें। उन्हें एक क्षण के लिए भी न भूलें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही उनका स्मरण आरंभ कर दें।
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥८:६॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥" (गीता)
अर्थात् -- इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
अर्थात् -- सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ॥
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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गुरु तत्व, आत्म-तत्व, और परमात्मा एक हैं। इनमें कोई भेद नहीं है। हम स्वयं को भगवान से पृथक मानते हैं, तो पृथक हैं, एक मानते हैं तो एक हैं। वास्तव में स्वयं में, गुरु में और भगवान में कोई भेद नहीं होता। हम भगवान के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, हम वही बन जाते हैं।
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गीता के पंद्रहवें अध्याय का प्रथम श्लोक ही यदि समझ में या जाए तो सारी दुविधा दूर हो जाती है --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
अर्थात् -- श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है॥
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परमात्मा का ध्यान करते करते एक दिन मेरी सारी चेतना ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस शरीर से बाहर निकल गई, और एक ऐसे सूक्ष्म लोक में पहुँच गई जहाँ आलोक ही आलोक था। कहीं कोई अंधकार नहीं था। लेकिन पाया कि वह लोक तो बहुत नीचे है, उसके ऊपर भी अनंत ब्रह्मांड है। फिर यह एक नित्य की दिनचर्या ही बन गई कि ध्यान इस शरीर से बाहर अनंत ब्रह्मांड में ही होने लगा। चेतना इस देह से बाहर निकल जाती और अनंत ब्रह्मांड में विस्तृत हो जाती। उस अनंतता का ध्यान करते करते एक दिन एक ब्रह्मज्योति के दर्शन हुए जिससे सारे संशय दूर हो गए। वह अनंत ब्रह्मज्योति ही एक श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र में परिवर्तित हो गई। उस पञ्चकोणीय नक्षत्र को ही मैं "परमशिव" और "पञ्चमुखी महादेव" कहता हूँ, वही मेरा उपास्य है। यही वह ऊर्ध्वमूलस्थ ज्योतिषाम्ज्योति है, जिसके बारे में भगवान ने कहा है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।"
श्रुति भगवती भी कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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आचार्य शंकर के अनुसार संसार से विरक्त हुए व्यक्ति को ही भगवत् तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं। संसार रूपी वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सबका कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त माया-शक्ति युक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है। वही इसका मूल है। भगवान की कृपा से ही यह समझा जा सकता है।
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हारिये न हिम्मत, बिसारिए न हरिःनाम। जितना भी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार लगे रहो। चाहे संसार छूट जाए, लेकिन भगवान न छूटें। अभी से आरंभ कर अंत समय तक भगवान की चेतना में लगे रहो।
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कीटक नाम का एक साधारण सा कीड़ा भँवरे से डर कर कमल के फूल में छिप जाता है। भँवरे का ध्यान करते करते वह स्वयं भी भँवरा बन जाता है। वैसे ही हम भी निरंतर परमशिव का ध्यान करते करते स्वयं परमशिव बन सकते हैं। भगवान के लिये एक बेचैनी, तड़प और घनीभूत प्यास बनाए रखें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ मार्च २०२३

किसी ने पूछा है कि मेरा क्या सिद्धांत/सत्संग/नियम व मत है?

 किसी ने पूछा है कि मेरा क्या सिद्धांत/सत्संग/नियम व मत है?

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निजात्मा में रमण, निजात्मा से परमप्रेम, और निजात्मा को समर्पण ही मेरा स्वधर्म है। इस से परे मुझे कुछ भी नहीं पता। मुझमें कोई रूप-गुण या सौंदर्य नहीं है। सारा सौंदर्य आत्मा का है।
इस से अतिरिक्त मेरा कोई सिद्धांत/नियम/मत नहीं है। मैं सभी में स्वयं को, व स्वयं में सभी को पाता हूँ। मेरे आराध्य ही यह समस्त विश्व बन गये हैं। मुझे निमित्त बना कर अपनी साधना वे स्वयं करते हैं।
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यह मेरा अंतिम उत्तर है। तमाशबीनों को अवरुद्ध (Block) कर दिया जाएगा। इस विषय पर और कुछ नहीं लिखूंगा।
ओम् तत्सत्!!
कृपा शंकर
11 मार्च 2024