Wednesday, 14 July 2021

भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं ---

 भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं ---

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ज्ञान अनंत है, विद्याएँ अनंत हैं, शास्त्र अनंत हैं, साधनायें अनंत हैं, लेकिन बुद्धि अत्यल्प है, कुछ भी समझ में नहीं आता| अपने बस की बात नहीं है कुछ भी समझना| सब कुछ एक विशाल अरण्य की तरह है जिसमें मेरे जैसा अकिंचन जिज्ञासु खो जाता है| फिर बाहर निकालने का मार्ग ही नहीं मिलता| अतः समझने का प्रयास करना ही छोड़ दिया है| जो आवश्यक होगा वह भगवान स्वयं ही समझा देंगे|
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सिर्फ एक बात ही समझ में आती है कि भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं| मैं उनके हृदय में हूँ, और वे मेरे हृदय में हैं| इसके अलावा मुझ भी कुछ नहीं भी पता| अन्य कुछ जानने या पता करने की इच्छा भी नहीं है| भगवान को मैने अपने हृदय में क़ैद यानि गिरफ्तार कर लिया है| वे कितना भी ज़ोर लगा लें पर बाहर नहीं आ सकते| अब तो उन्हें नित्य मेरे साथ सत्संग करना ही पड़ेगा| वे मेरे ही बंदी और सतसंगी हैं| वे मेरे साथ बहुत अधिक प्रसन्न हैं, अतः मैं भी बहुत प्रसन्न हूँ| और कुछ नहीं चाहिए| हे भगवान, अब सब कुछ तुम संभालो| मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो, और सदा मेरे ही रहोगे| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२०

अनन्य-अव्यभिचारिणी-भक्ति ---

 अनन्य-अव्यभिचारिणी-भक्ति ....

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भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में दो बार, दो अलग-अलग स्थानों पर, दो सगे भाइयों को, "अव्यभिचारिणी भक्ति" का उपदेश दिया है| जिस के जीवन में यह "अव्यभिचारिणी भक्ति" फलीभूत हो जाये, उसे इसी जीवन में भगवान की प्राप्ति हो सकती है| ईश्वर प्राप्ति के लिए उसे और जन्म लेने की प्रतीक्षा, हो सकता है, नहीं करनी पड़े|
महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश देते हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था| उसका १६६वां श्लोक है...
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते| निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी||"
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महाभारत के भीष्म पर्व में भी कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में भगवान श्रीकृष्ण, अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को जो भगवद्गीता का उपदेश देते हैं, उसके १३वें अध्याय का ११वां श्लोक है ...
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||"
इसे भगवान ने अनन्ययोग कहा है, जिसके लिए अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्तवास के स्वभाव, और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि का होना बताया है|
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सत्यनिष्ठा पूर्वक भगवान के सिवा अन्य कुछ भी प्रिय न लगे, वह अव्यभिचारिणी भक्ति है| ऐसे नहीं कि जब सिनेमा अच्छा लगे तब सिनेमा देख लिया, नाच-गाना अच्छा लगे तब नाच-गाना कर लिया, गप-शप अच्छी लगे तब गप-शप कर ली; और भगवान अच्छे लगे तब भगवान की भक्ति कर ली| ऐसी भक्ति व्यभिचारिणी होती है| सिर्फ भगवान ही अच्छे लगें, भगवान के सिवा अन्य कुछ भी अच्छा न लगे, निरंतर भगवान का ही स्मरण रहे वह "अव्यभिचारिणी भक्ति" है| स्वयं में भगवान की धारणा कर के कि मेरे सिवा अन्य कोई नहीं है, मैं ही सर्वत्र और सर्वस्व हूँ, अनन्य भक्ति है| अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति, एकांतवास और कुसंग-त्याग को भगवान ने "अनन्य-योग" बताया है|
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मुझ भगवान वासुदेव (जो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त हैं) से परे अन्य कोई नहीं है| वे ही सर्वस्व हैं, इस प्रकार की निश्चित अविचल बुद्धि से भगवान का ध्यान और भजन करना चाहिए| साथ-साथ संस्कारों से शुद्ध किया हुआ एकान्त पवित्र स्थान भी हो जहां हिंसक जीव-जंतुओं का भय न हो| यह हमारा स्वभाव बन जाये| कुसंग का सर्वदा त्याग हो|
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यह अनन्य-योग भगवान श्रीकृष्ण को सर्वाधिक प्रिय है| जो उन को प्रिय है, वह ही हमें भी प्रिय होना चाहिए| विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण ही हमारे परमेष्ठी परात्पर परमगुरु हैं| हम सब उनको पूर्ण सत्यनिष्ठा से शरणागति द्वारा समर्पित हों| इस समर्पण में कोई कमी न हो|
हरिः ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२०
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पुनश्च: ----
उपरोक्त लेख पर प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय जी की टिप्पणी :--
"Arun Upadhyay यहां चारिणी का अर्थ चलने वाली है, उसमें ३ उपसर्ग लगा दिये हैं-अ, वि, अभि। अर्थात् किसी प्रकार छोड़ कर जाने वाली नहीं। तुलसीदास जी ने अनपायिनी शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ प्रवचनों में सुनता था-बिना पैर वाली भक्ति, जो राम को छोड़ कर कहीं नहीं जाय। श्रीसूक्त में अनपगामिनी का प्रयोग है, जो लक्ष्मी किसी अन्य स्थान नहीं जाये।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥
पाठभेद-(१) लक्ष्मीमलप-काशीकर, संस्कार भास्कर, (२) गामश्वान्-काशीकर, (३) लक्ष्मी तन्त्र में अनपगामिनीम् है, पर बाद में अनपायिनीयम् पाठ का प्रचलन लगता है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है- नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥ (सुन्दर काण्ड, ३३/१)
अर्थ-हे सर्वज्ञ अग्नि देव! स्थिर और अविनाशी लक्ष्मी को मेरे पास बुलाइये, जिसके आने के बाद मैं सोना, चान्दी, गायें, घोड़े आदि पशु समूह और अनुकूल पुत्र, हितैषी मित्र, निष्ठावान् दास आदि को प्राप्त करूँ।"
ॐ तत्सत्॥
१४ जुलाई २०२०

शिव सहस्त्रनाम की महिमा ---

 यदि संभव हो तो श्रावण के इस पवित्र माह में भी, और सदा नित्य, भगवान शिव की उपासना, महर्षि तंडी द्वारा अवतरित परम सिद्ध स्तवराज "शिवसहस्त्रनाम" से भी करें| किसी भी पवित्र शिवालय में श्रद्धा-भक्ति से इसका मानसिक रूप से पाठ कर भगवान शिव को बिल्व-पत्र और जल अर्पित कर आराधना करें|

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यह कथा महाभारत के अनुशासन-पर्व के १५वें अध्याय में आती है...
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सत्ययुग में तंडी नामक ऋषि ने बहुत कठोर तपस्या और उपासना द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न किया| आशुतोष भगवान शिव की कृपा से तंडी ऋषि की ज्योतिष्मती और मधुमती प्रज्ञा जागृत हो गयी, व उन में शिव-तत्व का ज्ञानोदय हुआ| महर्षि तंडी को महादेव के दर्शन प्राप्त हुए और उन के हृदय में देवाधिदेव भगवान महादेव के एक हज़ार सिद्ध नाम स्वयं जागृत हो गए| महर्षि ने उन नामों को ब्रह्मा को बताया| ब्रह्मा ने स्वर्गलोक में उन नामों का प्रचार किया| महर्षि तंडी ने पृथ्वी पर उन नामों को सिर्फ महर्षि उपमन्यु को बताया| महर्षि उपमन्यु ने उस समय विद्यार्थी के रूप में आये अपने शिष्य भगवान श्रीकृष्ण को वे नाम बताये| भगवान श्रीकृष्ण ने वे नाम महाराजा युधिष्ठिर को बताये| इसका विषद बर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान वेदव्यास ने किया है|
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एक बार भगवान श्रीकृष्ण तपस्या करने हिमालय गए जहाँ उन्हें ब्रह्मर्षि उपमन्यु के दर्शन हुए| ब्रह्मर्षि उपमन्यु ने श्रीकृष्ण को लगातार आठ दिनों तक शिव रहस्य का वर्णन सुनाया| इसके बाद श्रीकृष्ण ने उन से गुरुमंत्र और दीक्षा ली| स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का कहना है ...
"दिनेSष्टमे तु विप्रेण दीक्षितोSहं यथाविधि|
दंडी मुंडी कुशी चीरी घृताक्तो मेखलीकृतः||"
अर्थात, हे युधिष्ठिर, अष्टम तिथि पर ब्राह्मण उपमन्यु ने मुझे यथाविधि दीक्षा प्रदान की| उन्होंने मुझे दंड धारण करवाया, मेरा मुंडन करवाया, कुशासन पर बैठाया, घृत से स्नान कराया, कोपीन धारण कराया तथा मेखलाबंधन भी करवाया|
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तत्पश्चात मैंने एक महीने भोजन में केवल फल लिये, दुसरे महीने केवल जल लिया, तीसरे महीने केवल वायु ग्रहण की, चतुर्थ एवम् पंचम माह एक पाँव पर ऊर्ध्ववाहू हो कर व्यतीत किये| फिर मुझे आकाश में सहस्त्र सूर्यों की ब्रह्म ज्योति दिखाई दी जिसमें मैंने शिव और पार्वती को बिराजमान देखा|
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शिव सहस्त्रनाम की महिमा ---
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ब्रह्मर्षि उपमन्यु की कृपा से मुझे शिवजी के जो एक सहस्त्र नाम मिले हैं, आज युधिष्ठिर मैं उन्हें तुम्हे सुनाता हूँ| ध्यान से सुनो| महादेव के ये सहस्त्र नाम समस्त पापों का नाश करते हैं और ये चारों वेदों के समान पवित्र हैं तथा उन्हीं के समान दैवीय शक्ति रखते हैं|
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विशेष :--- पूरा स्तोत्र १८२ श्लोकों में है| इन श्लोकों का नित्य किसी जागृत शिवालय में भक्तिपूर्वक मानसिक रूप से पाठ कर भगवान शिव की आराधना की जाये तो भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है|
जिज्ञासु साधक इसे सीधे महाभारत से उतार सकते हैं या गीताप्रेस गोरखपुर से मंगा सकते हैं| गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तक कोड संख्या १५९९, मूल्य मात्र ६ रूपये| नेट पर भी उपलब्ध है जिसे प्रिंट कर सकते हैं| नेट पर इस का हिन्दी अनुवाद भी मिल जाएगा| गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तक "शिव स्तोत्र रत्नाकर" में भी सब से अंत मे दिया हुआ है|
ॐ तत्सत्॥ ॐ नमःशिवाय॥
१४ जुलाई २०२०

Monday, 12 July 2021

कूटस्थ चैतन्य ---

 कूटस्थ चैतन्य ---.

शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीपतम लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करते रहें| विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी|

ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में रहें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है|

आज्ञाचक्र ही योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं| आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर होता है, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है| आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष के ऊपर खोपड़ी के मध्य में पीछे की ओर है| यही जीवात्मा का निवास है|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

१३ जुलाई २०२०

परमशिव ---

 परमशिव ---


यह शब्द "परमशिव" मुझे अत्यधिक प्रिय है, पता नहीं क्यों? परमात्मा के लिए मैं या तो गीता के "वासुदेव" (समान रूप से सर्वत्र व्याप्त) शब्द का प्रयोग करता हूँ, या तंत्र और शैवागमों के शब्द "परमशिव" का| तत्वरूप में दोनों एक ही हैं, केवल शाब्दिक अर्थ पृथक-पृथक हैं| परमशिव का शाब्दिक अर्थ होता है ..... परम कल्याणकारी| परमशिव एक अनुभूति है जो तब होती है जब हमारे प्राणों की गहनतम चेतना (जिसे तंत्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कहते हैं) सहस्त्रार चक्र और ब्रह्मरंध्र का भी भेदन कर परमात्मा की अनंतता में और उससे भी परे विचरण कर बापस लौट आती है| परमात्मा की वह अनंतता ही "परमशिव" है, जिसका ध्यान परम कल्याणकारी है| यह मुझ बुद्धिहीन अकिंचन को गुरुकृपा से ही समझ में आया है| गुरु के उपदेश और आदेश से ध्यान भी उस अनंतता का ही होता है, जो "परमशिव" है|
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परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति पर ही हमें पूरा ध्यान देना चाहिए| शास्त्र हमें दिशा और प्रेरणा देते हैं पर अनुभूति तो उपासना में "परमशिव" की परमकृपा से ही होती है| उनकी परमकृपा होने पर सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है| "परमशिव" शब्द का प्रयोग तंत्रागमों में तो आचार्य शंकर ने "सौन्दर्य लहरी" ग्रंथ में, और शैवागमों में कश्मीर शैव दर्शन के आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन में किया है|
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स्वनामधन्य आचार्य शंकर अपने ग्रंथ "सौंदर्य लहरी" में लिखते हैं ...
"सुधा सिन्धोर्मध्ये सुरविटपवाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणि गृहे|
शिवाकारे मञ्चे परमशिव पर्यङ्क निलयम्, भजन्ति त्वां धन्यां कतिचन चिदानन्द लहरीम्||"
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प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय के अनुसार अनाहत चक्र में कल्पवृक्ष के नीचे शिव रूपी मञ्च है| उसका पर्यङ्क परमशिव है| आकाश में सूर्य से पृथ्वी तक रुद्र, शनि कक्षा (१००० सूर्य व्यास तक सहस्राक्ष) तक शिव, उसके बाद १ लाख व्यास दूर तक शिवतर, सौर मण्डल की सीमा तक शिवतम है| आकाशगंगा में सदाशिव तथा उसके बाहर विश्व का स्रोत परमशिव है जिसने सृष्टि के लिये सङ्कल्प किया|
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एक शब्द "सदाशिव" है जिसका शाब्दिक अर्थ तो है सदा कल्याणकारी और नित्य मंगलमय| पर यह भी एक अनुभूति है जो विशुद्धि चक्र के भेदन के पश्चात होती है| ऐसे ही एक "रूद्र" शब्द है जिस में ‘रु’ का अर्थ है .... दुःख, तथा ‘द्र’ का अर्थ है .... द्रवित करना या हटाना| दुःख को हरने वाला रूद्र है| दुःख का भी शाब्दिक अर्थ है .... 'दुः' यानि दूरी, 'ख' यानि आकाश तत्व रूपी परमात्मा| परमात्मा से दूरी ही दुःख है और समीपता ही सुख है| रुद्र भी एक अनुभूति है जो ध्यान में गुरुकृपा से ही होती है|
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हमारे स्वनामधन्य महान आचार्यों को ध्यान में जो प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ हुईं उनके आधार पर ही उन्होंने गहन दर्शन शास्त्रों की रचना की| हमारा जीवन अति अल्प है, पता नहीं कौन सी सांस अंतिम हो, अतः अपने हृदय के परमप्रेम को जागृत कर यथासंभव अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में ही व्यतीत करना चाहिए| वे जो ज्ञान करा दें वह ही ठीक है, और जो न कराएँ वह भी ठीक है| उन परमात्मा को ही मैं 'परमशिव' के नाम से ही संबोधित करता हूँ ..... यही परमशिव शब्द का रहस्य है| उन परमशिव का भौतिक स्वरूप ही शिवलिंग है जिसमें सब का लीन यानि विलय हो जाता है, जिस में सब समाहित है|
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अंत में जगत्गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को नमन करता हूँ जिन से बड़ा गुरु कोई अन्य नहीं है| उन का कथन है ...
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
गुरु महाराज को नमन, जिनकी कृपा से मेरे जैसा अकिंचन बुद्धिहीन भी शास्त्रों की चर्चा करने लगता है| ॐ तत्सत्||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२०

Friday, 9 July 2021

भगवान् की जाति क्या है? भगवान् का वर्ण क्या है? भगवान् का घर कहाँ है? ---

 

भगवान् की जाति क्या है? भगवान् का वर्ण क्या है? भगवान् का घर कहाँ है?
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ये सब महत्वहीन प्रश्न हैं| पर एक बात तो है कि जो कुछ भी परमात्मा का है ---- सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमता आदि आदि आदि उन सब पर मेरा भी जन्मसिद्ध अधिकार है| मैं उनसे पृथक नहीं हूँ| जो भगवान की जाति है, वह ही मेरी जाति है| जो उनका घर है वह ही मेरा घर है| जो उनकी इच्छा है वह ही मेरी इच्छा है|
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भगवान को समर्पित होने पर सबसे पहिले तो हम जाति-विहीन हो जाते हैं, फिर वर्ण विहीन हो जाते हैं, घर से भी बेघर हो जाते हैं, देह की चेतना भी छुट जाती है और मोक्ष की कामना भी नष्ट हो जाती है|
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विवाह के बाद कन्या अपनी जाति, गौत्र और वर्ण सब अपने पति की जाति, गौत्र और वर्ण में मिला देती है| पति की इच्छा ही उसकी इच्छा हो जाती है| वैसे ही परमात्मा को समर्पित होने पर अपना कहने को कुछ भी नहीं बचता, सब कुछ उसी का हो जाता है| 'मैं' और 'मेरापन' भी समाप्त हो जाता है| सब कुछ 'वह' ही हो जाता है|
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हे प्रियतम, तुम महासागर हो तो मैं जल की एक बूँद हूँ जो तुम्हारे में मिलकर महासागर ही बन जाती है|
तुम एक प्रवाह हो तो मैं एक कण हूँ जो तुम्हारे में मिलकर विराट प्रवाह बन जाता है|
तुम अनंतता हो तो मैं भी अनंत हूँ|
तुम सर्वव्यापी हो तो मैं भी सदा तुम्हारे साथ हूँ|
जो तुम हो वह ही मैं हूँ|
मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है|
जब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता तो तुम भी मेरे बिना नहीं रह सकते| जितना प्रेम मेरे ह्रदय में तुम्हारे प्रति है, उससे अनंत गुणा प्रेम तो तुम मुझे करते हो| तुमने मुझे प्रेममय बना दिया है|
जहाँ तुम हो वहीँ मैं हूँ, जहाँ मैं हूँ वहीँ तुम हो| मैं तुम्हारा अमृतपुत्र हूँ, तुम और मैं एक हैं|
ॐ तत्सत् शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१० जुलाई २०२०

Thursday, 8 July 2021

साधनाकाल के आरंभ में हमारा मेरुदंड ही हमारी पूजा की वेदी बन जाता है ---

 साधनाकाल के आरंभ में हमारा मेरुदंड ही हमारी पूजा की वेदी बन जाता है ---

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एक व्यक्तिगत और निजी अनुभव है| साधना के आरंभ काल में मन बहुत अधिक चंचल था और इधर-उधर खूब भागता था| बिल्कुल भी मन नहीं लगता था| किसी मित्र ने मुझे हनुमान जी के बारे में एक पुस्तक दी जो बड़ी अच्छी लगी| फिर मैंने एक प्रयोग किया| मानसिक रूप से हनुमान जी को पीठ पीछे खड़ा कर दिया| उनके हाथ में गदा भी थी| उनसे प्रार्थना की कि किसी फालतू विचार को मत आने देना, और मन भी इधर-उधर भागे तो भागने मत देना| साथ में हनुमान जी के बीजमंत्र का जप भी करता रहा| इस से बहुत अधिक फर्क पड़ा| फिर देखा कि हनुमान जी तो मेरुदंड के भीतर ही आ गए हैं| जब मैं साँस लेता तो हनुमान जी उड़ते हुए अपनी विजय-मुद्रा में मेरी कमर के नीचे से भीतर ही भीतर ऊपर उठते हुए खोपड़ी के ऊपर तक चले जाते, बड़ी शान से वहाँ कुछ देर रुकते, और जब मैं साँस छोड़ता तो कमर के भीतर ही भीतर नीचे आ जाते| धीरे-धीरे हनुमान जी का साकार रूप तो चला गया पर गहन रूप से उनका प्राण-तत्व, सुषुम्ना नाड़ी के भीतर स्थायी रूप से बस गया| इस से बड़ा लाभ मिला और कालांतर में यह प्राण-तत्व ही साधना का आधार बना|
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एक सत्संग में एक महात्मा जी ने एक दूसरी प्रभावशाली विधि भी बताई| उन्होने बताया कि ध्यान मुद्रा में गुदा का तनिक संकुचन कर मूलाधार पर मानसिक जप करें -- "लं", फिर तनिक ऊपर उठाकर स्वाधिष्ठान पर -- "वं", मणिपुर पर -- रं", अनाहत पर -- "यं", विशुद्धि पर -- "हं", आज्ञा पर -- "ॐ", और सहस्त्रार पर कुछ अधिक जोर से -- "ॐ"| कुछ पल भर रुककर विपरीत क्रम से जप करते हुए नीचे आइये| कुछ पल भर रुकिए और इस प्रक्रिया को सहज रूप से जितनी बार कर सकते हैं कीजिये| इस विधि से भी बड़ा लाभ हुआ|
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प्राण-तत्व द्वारा मेरुदंड में की जाने वाली साधनाओं के काल में आचार-विचार का शुद्ध होना बड़ा आवश्यक है, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि ही होती है| भगवान से उनके प्रेम के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरह की कामना ना करें| हृदय में जो प्रचंड अग्नि जल रही है उसे दृढ़ निश्चय और सतत् प्रयास से निरंतर प्रज्ज्वलित रखिए| आधे-अधूरे मन से किया गया कोई प्रयास सफल नहीं होगा| साधना निश्चित रूप से सफल होगी, चाहे यह देह रहे या न रहे ...... इस दृढ़ निश्चय के साथ साधना करें, आधे अधूरे मन से नहीं| परमात्मा का स्मरण करते करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन जीने से तो अच्छा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
८ जुलाई २०२०