Wednesday, 9 June 2021

किसी भी परिस्थिति में "सत्य" और "धर्म" पर सदा अडिग रहें ---

किसी भी परिस्थिति में "सत्य" और "धर्म" पर सदा अडिग रहें। जीवन में कैसी भी दुःख और कष्टों से भरी परिस्थिति हो, उसमें सत्य का त्याग न करें, और धर्म पर अडिग रहें। रामायण में भगवान श्रीराम और भगवती सीताजी; महाभारत ग्रंथ में वर्णित -- पांडवों-द्रोपदी, नल-दमयंती, व सावित्री-सत्यवान को प्राप्त हुए कष्ट यही सत्य सिखाते हैं कि जीवन के उद्देश्य "पूर्णता" को प्राप्त करने के लिए कष्ट उठाने ही पड़ते हैं।

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सोने को शुद्ध करने के लिए उसे तपाना पड़ता है, वैसे ही कष्ट, दुःख और पीड़ायें हमें अधिक समझदार बनाती हैं। व्यावहारिक जीवन में मैंने देखा है कि जिन लोगों ने अपने बचपन में अभाव और दुःख देखे, उन्होने जीवन में अधिक संघर्ष किया और प्रगति की। जिन को बचपन से ही सारे विलासिता के साधन मिले, वे जीवन में कुछ भी सार्थक नहीं कर पाये।
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"जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल।
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीडा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुख-सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान।" (जयशंकर प्रसाद)
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कष्ट और पीड़ाओं में ही व्यक्ति परमात्मा को याद करता है। ईश्वर-लाभ ऐसे ही सुख से बैठे-बैठाये नहीं मिलता। उसके लिए कठोर साधना करनी पड़ती है और कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। हम सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते रहें, चाहे कितने भी कष्ट उठाने पड़ें। अंत में ईश्वर की प्राप्ति तो निश्चित है ही। ॐ तत्सत् !!
१ मई २०२१

ज्ञान की प्राप्ति स्वयं की श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम से होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं ....

ज्ञान की प्राप्ति स्वयं की श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-संयम से होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं ....
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आचार्य शंकर के अनुसार श्रद्धा वह है जिसके द्वारा मनुष्य शास्त्र एवं आचार्य द्वारा दिये गये उपदेश से तत्त्व का यथावत् ज्ञान प्राप्त कर सकता है|
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः| ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति||४:३९||"
अर्थात् श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है| ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है||
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गीता के अनुसार समत्व ही ज्ञान है| समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है, और समत्व में स्थित व्यक्ति ही समाधिस्थ है|
भगवान कहते हैं .....
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय| सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते||२:४८||"
अर्थात हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है|
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भगवान फिर आगे कहते हैं ...
"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते| तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्||२:५०||"
अर्थात समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ| कर्मों में कुशलता योग है||
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योगसुत्रों में भगवान पातञ्जलि द्वारा बताए "योगः चित्तवृत्तिनिरोधः" और गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए "समत्वं योग उच्यते" में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि चित्तवृत्तिनिरोध से समाधि की प्राप्ति होती है जो समत्व ही है|
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"योगस्थ" होना क्या है ? .....
सारा कर्ताभाव जहाँ तिरोहित हो जाए, भगवान स्वयं ही एकमात्र कर्ता जहाँ हो जाएँ, जहाँ कोई कामना व आसक्ति नहीं हो, भगवान स्वयं ही जहाँ हमारे माध्यम से प्रवाहित हो रहे हों, मेरी समझ से वही योगस्थ होना है, और वही समत्व यानि समाधि में स्थिति है, और वही ज्ञान है|
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जो कुछ भी मुझे समझ में आया वही मैंने यहाँ लिख दिया| इस से आगे जो कुछ भी है उसे समझना मेरी अति-अति अल्प व सीमित बुद्धि द्वारा संभव नहीं है|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
०९ जून २०२०

Tuesday, 8 June 2021

भारत का भविष्य -- हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र ---

 भारत का भविष्य -- हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र ---

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भारत का उत्थान सूक्ष्मातिसूक्ष्म अदृश्य आध्यात्मिक दैवीय शक्तियों द्वारा ही होगा| वर्तमान कालचक्र ऊर्ध्वगामी है, अतः भारत अब और पददलित नहीं रह सकता| भारत अपने द्विगुणित परम वैभव को प्राप्त कर परम शक्तिशाली अखंड आध्यात्मिक हिन्दू राष्ट्र होगा, जहाँ की राजनीति सनातन धर्म होगी| यह अति शीघ्र निकट भविष्य में ही होने वाला है|
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(१) हिन्दू कौन है? ----
जिस भी व्यक्ति के अन्तःकरण में परमात्मा के प्रति प्रेम और श्रद्धा-विश्वास है, जो आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों के सिद्धान्त, व ईश्वर के अवतारों में आस्था रखता है, वह हिन्दू है, चाहे वह विश्व के किसी भी भाग में रहता है, या उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी है| हिन्दू माँ-बाप के घर जन्म लेने से ही कोई हिन्दू नहीं होता| हिन्दू होने के लिए किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है| स्वयं के विचार ही हमें हिन्दू बनाते हैं| आध्यात्मिक रूप से हिन्दू वह है जो हिंसा से दूर है| मनुष्य का लोभ और अहंकार ही हिंसा के जनक हैं| लोभ, और अहंकार से मुक्ति ही परमधर्म "अहिंसा" है| जो इस हिंसा से दूर है वह हिन्दू है|
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(२) हिन्दू राष्ट्र क्या है ---
हिन्दू राष्ट्र एक विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प और निजी मान्यता है| हिन्दू राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का एक समूह है जो स्वयं को हिन्दू मानते हैं, जिन की चेतना ऊर्ध्वमुखी है, जो निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करना चाहते हैं, चाहे वे विश्व में कहीं भी रहते हों|
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(३) भारत एक हिन्दू राष्ट्र है ----
क्योंकि यहाँ की संस्कृति हिन्दू है| संस्कृति वह होती है जिसका जन्म संस्कारों से होता है| भारत एक सांस्कृतिक इकाई है| "देश" और "राष्ट्र"..... इन दोनों में बहुत अधिक अन्तर है| "देश" एक भौगोलिक इकाई है, और "राष्ट्र" एक सांस्कृतिक इकाई| भारतीय संस्कृति कोई नाचने-गाने वालों की संस्कृति नहीं है, यह हर दृष्टि से महान आचरण व महान विचारों वाले व्यक्तियों की संस्कृति है|
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ॐ श्री परमात्मने नमः || ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
८ जून २०२०

Monday, 7 June 2021

पूरे विश्व में भारत को छोड़ कर क्या अन्य भी कोई देश धर्म-निरपेक्ष है? ---

 पूरे विश्व में भारत को छोड़ कर क्या अन्य भी कोई देश धर्म-निरपेक्ष है? ---

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विश्व में लगभग ५७ मुस्लिम देश हैं, पर कोई भी धर्मनिरपेक्ष नहीं है| मध्य एशिया के देशों ने फिर से इस्लाम को स्वीकार कर लिया है| अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश, इन्डोनेशिया, मलयेशिया व ब्रुनेई मुस्लिम देश हैं| वहाँ किसी भी अन्य मत का प्रचार वर्जित है| कोई गैर-मुस्लिम किसी मुस्लिम लड़की से शादी नहीं कर सकता|
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यूरोप व अमेरिका के सभी देशों में शासक वर्ग सर्वप्रथम चर्च के प्रति वफादार है| रूस में रसियन ऑर्थोडॉक्स चर्च का शासन पर पूरी तरह दखल है| पूर्वी योरोप के देशों ने ईसाई मत अपना लिया है| फिलीपींस ईसाई देश है| चीन के लोग फिर से बौद्ध धर्म को अपनाने लगे हैं पर कुंगफुत्सीवाद यानि कन्फ्यूशियस (कुन फु) का प्रभाव अभी भी जनमानस पर सर्वाधिक है| कोरिया, जापान, विएतनाम, थाइलेंड, कंबोडिया, म्यांमार व श्रीलंका बौद्ध देश हैं|
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केवल भारत ही एकमात्र धर्मनिरपेक्ष (सेक्यूलर) देश है| भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है -- हिन्दू विरोध| जो हिन्दुओं को जितना अधिक बुरा बताता है वह उतना ही बड़ा धर्मनिरपेक्ष है| जो हिंदुहित की बात करता है वह सांप्रदायिक है| भारत में जब तक हिन्दू बहुमत है तभी तक यह धर्म-निरपेक्षता रहेगी| जिस दिन देश में हिन्दू 50% से कम हो जाएगा, भारत भी एक मुस्लिम देश हो जाएगा और हिंदुओं की वही स्थिति होगी जो पाकिस्तान और बांग्लादेश में है| पाकिस्तान में विभाजन के समय 23% हिन्दू थे जो अब 1% से भी कम हैं| बाकी के कहाँ गए? आसमान खा गया या धरती निगल गई?
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जून २०२०

Friday, 4 June 2021

इस छोटे से हृदय में वे कैसे समा जाते है?

 भगवान तो बहुत विराट हैं, फिर वे इस छोटे से हृदय में कैसे समा जाते है? एक छोटी सी कटोरी लेकर महासागर से जल मांगने चला गया| महासागर ने कहा कि यह सारा जल तुम्हारा है, ले लो| कटोरी तो बहुत छोटी थी, किसी काम की नहीं थी, अतः फेंक दी| जल कैसे लें? आश्चर्य! सारा जल या तो इस छोटे से हृदय में भर गया, या फिर हृदय ही जल की एक बूंद बनकर उस महासागर में समा गया|

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अब सब कुछ खत्म हो गया है| सिर्फ भगवान वासुदेव ही सामने रह गए हैं|

४ जून २०२०

हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है -- परमात्मा की प्राप्ति ---

 हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है ... परमात्मा की प्राप्ति .....

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परमात्मा की प्राप्ति हमें क्यों नहीं होती और वे कैसे प्राप्त हों? इसका जितना स्पष्ट वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में है उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं है| स्वाध्याय और पुरुषार्थ तो हमें स्वयं को ही करना होगा, कोई दूसरा इसे हमारे लिए नहीं कर सकता| हमें न तो किसी मध्यस्थ व्यक्ति को प्रसन्न करना है और न किसी मध्यस्थ व्यक्ति के पीछे पीछे भागना है| किसी भी तरह के वाद-विवाद में न पड़ कर अपना समय नष्ट न करें और उसका सदुपयोग परमात्मा के अपने प्रियतम रूप के नाम-जप और ध्यान में लगाएँ|
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कमर को सीधी कर के बैठें, भ्रूमध्य में जप और ध्यान करें| एकाग्रचित्त होकर उस ध्वनि को सुनते रहें जो ब्रह्मांड की ध्वनि है| हम यह देह नहीं है, परमात्मा की अनंतता हैं| अपनी सर्वव्यापकता पर ध्यान करें| फिर पाएंगे कि परमात्मा तो वहीं बैठे हैं, जहाँ पर हम हैं|
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः|९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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परमात्मा से "परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है| अपने "भौतिक व्यक्तित्व से मोह" हमारे "लोभ व अहंकार" को जगाकर हमें "हिंसक" बनाता है| स्वयं के भौतिक व्यक्तित्व की दासता और मोह हमें हिंसक बना देता है| इस व्यक्तित्व की दासता से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है ..... "परमात्मा से परम-प्रेम और समर्पण"| जब हम परमात्मा को "प्रेम" और "समर्पण" करते हैं तब वही "प्रेम" और "समर्पण" अनंत गुणा होकर हमें ही बापस मिलता है| तब हम "जीव" नहीं, स्वयं साक्षात "शिव" बन जाते हैं|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ अप्रेल २०२०

"वासुदेवः सर्वं इति" ---

 "वासुदेवः सर्वं इति" .....

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अत्यधिक भावुक हो कर भावविभोर व भावविह्वल होना मेरी एक कमजोरी है जिस पर नियंत्रण मेरे वश में नहीं है| अपनी इस कमजोरी को एक ईश्वर-प्रदत्त अवसर मानकर उसका सदुपयोग करना ही विवेक है| आजकल कुछ भी लिखना असंभव सा हो गया है| कुछ भी लिखते हैं या करते हैं तो भगवान वासुदेव की साकार छवि सामने आ जाती है| अब उन्हें निहारें या अन्य कोई काम करें? उन्हें निहारना ही अधिक प्रिय लगता है| पूरी सत्यनिष्ठा से यह अप्रिय सत्य लिख रहा हूँ कि मेरी सारी साधनायें छुट गई हैं| जो कुछ भी होता है या जो कुछ भी यदि कोई करता है, तो वे ही करते हैं, मैं नहीं| जब "वासुदेवः सर्वं इति" हो जाता है तब कोई भी साधना संभव ही नहीं रहती है| यह अपने आप में ही एक साधना बन जाती है| भगवान कहते हैं ....
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
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यह अनुभूति ईश्वर की परम कृपा से ही होती है| जब भगवान ने करुणावश इतनी बड़ी कृपा की है तो इसे क्यों नकारें? इस जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि ही मैं यही मानता हूँ| भगवान ने गीता के सातवें अध्याय में ही कहा है कि भोग-विलास की थोड़ी सी भी कामना जिनमें बाकी है उनसे वे भी दूर ही रहते हैं|
तेरहवें अध्याय में तो वे स्पष्ट कहते हैं ....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
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और कुछ भी लिखना अब संभव नहीं है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जून २०२०