Saturday, 7 June 2025

 "ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।

भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
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यह विष्णु सहस्त्रनाम का प्रथम मंत्र है जो इतना गहन है कि कोई भी विद्वान महात्मा चाहे तो लगातार कई घंटों तक इस पर प्रवचन दे सकता है। यहाँ भगवान को भूतभृत भी कहा गया है, जिस का अर्थ है समस्त प्राणियों का भरण-पोषण करने वाले। जिस तरह एक माँ एक शिशु को जन्म देकर उसका भरण-पोषण करती है, वैसे भी भगवान भी हम सब का भरण-पोषण करते हैं।
गीता में भगवान कहते हैं --
"उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१५:१७॥"
अर्थात् - परन्तु उत्तम पुरुष अन्य ही है, जो परमात्मा कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण (भरण-पोषण) करने वाला अव्यय ईश्वर है॥
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आचार्य रामानुज का एक शिष्य “भूतभृते नम” मंत्र से भगवान रंगनाथ की आराधना करता था। भगवान वेश बदल कर स्वयं उसे अपना प्रसाद उसके घर जाकर दे आया करते थे। ८ जून २०२४

मौन की आवश्यकता ---

मौन की आवश्यकता ---

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मौन होकर ही हमें परमात्मा की उपासना करनी चाहिए। गीता के दसवें अध्याय के अड़तीसवें मंत्र में भगवान ने स्वयं को गोपनीय भावों में मौन और ज्ञानवानों में ज्ञान बताया है -- "मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।"
इधर-उधर की फालतू बातों को त्यागकर मौन होकर ही हमें भगवान का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए।
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जैसे जैसे हम ज्ञान की गहराई में जाते हैं, दो तरह के तथ्य हमारे समक्ष आते हैं।
(१) सर्वप्रथम तो वे तथ्य सामने आते हैं जिन पर चर्चा, वाद-विवाद और विमर्श हो सकता है।
(२) तत्पश्चात् कुछ ऐसे तथ्य हमारे समक्ष आते हैं, जिन पर किसी भी तरह का कोई विमर्श नहीं हो सकता। वे निजानुभूतियाँ होती हैं, जिन की चर्चा हम किसी से करेंगे तो भी कोई उसे समझेगा नहीं, हमारी हँसी ही उड़ाएगा, और हमें मूर्ख समझेगा। वहाँ मौन ही रहना चाहिए।
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परमात्मा की अनुभूतियों की चर्चा सबसे अधिक पश्चिमी देशों के चर्च करते है, जो एक भावनात्मक उन्माद मात्र ही होता है; उसमें कोई सच्चाई नहीं होती। कोई पच्चीस-तीस वर्षों पुरानी बात है। कनाडा के वेंकूवर नगर में मैं एक महिला पादरी का व्याख्यान सुनने चला गया जिसके बारे में बताया गया था कि संगीत के साथ उसका व्याख्यान इतना अधिक भावुक और कारुणिक होता था कि सुनने वाले सब श्रौता रोने लगते थे। मैं स्वयं को जाँचने हेतु दृढ़ निश्चय कर के गया था कि मुझे कुछ नहीं होगा। लेकिन जब उसका संगीतमय प्रवचन आरंभ हुआ जो अत्यधिक भावुक और करुण रस में था, तो मैंने देखा कि उस हॉल में बैठे सभी लोगों की आँखों में आँसू थे। वह महिला सभी को आँखें पोंछने के लिए टिश्यू पेपर दे रही थी और जीसस क्राइस्ट की महिमा का बखान कर रही थी। बाद में उसने मेरे ऊपर भी पता नहीं क्या सम्मोहन किया कि मेरी भी आँखें आंसुओं से भर गयीं और मैं भी सम्मोहित हो कर होश खो बैठा। वह मेरे पास आई और बोली -- "बेटे, सिर्फ जीसस क्राइस्ट पर ही विश्वास करो, वह तुम्हारे सब दुःख दूर कर देगा।" यह कोई आसुरी सम्मोहन था जिसकी कोई काट उस समय मेरे पास नहीं थी।
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इसके विपरीत मैं भारत में हुये कुछ अनुभव बताना चाहूँगा। एक बार मैं एक योगी महात्मा से मिलने गया। उन दिनों जिज्ञासु भाव था और मन में अनेक प्रश्न थे। उनके समक्ष जाकर मैं मौन और ध्यानस्थ हो गया। सारे प्रश्न विस्मृत हो गए। कुछ देर बाद उन्होने बापस भेज दिया। दूसरे दिन मैंने एक कागज पर अनेक प्रश्न लिखे और उस कागज को अपनी कमीज की ऊपरी जेब में रखा और उन्हें पूछने फिर चला गया। वहाँ जाते ही मैं भूल गया कि मुझे कुछ पूछना है, और मैं शांत, मौन और ध्यानस्थ हो गया। मैं समझ गया कि ईश्वर संबंधी सब प्रश्नों के उत्तर मौन में ही हैं। इस तरह के अनुभव मुझे दो तीन और भी महात्माओं के साथ हुए हैं।
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मौन होकर ही हमें परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। इधर-उधर की फालतू बातों को त्यागकर मौन में ही भगवान का चिंतन और ध्यान करना चाहिये।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ जून २०२४

Friday, 6 June 2025

भजन गायकी और कथावाचन एक व्यवसाय/व्यापार है जिसका लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना है ---

 हम लोग भजन गायकों और कथावाचकों को पूज्य/पूज्या संत मान लेते हैं, यह हमारी बहुत बड़ी भूल है| भजन गायकी और कथावाचन एक व्यवसाय/व्यापार है जिसका लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना है| कई पुरुष और लड़कियाँ कथावाचक बन जाती हैं और उन के परिवार के लोग करोड़ों में खेलने लगते हैं|

अज्ञानतावश श्रौताओं में उन के पैर छूने, आशीर्वाद लेने, उन से दीक्षा लेने और उन पर चढ़ावा चढ़ाने की होड़ लग जाती है| यह गलत है|
इन भजन गायकों और कथावाचकों का अहंकार भी बहुत अधिक प्रबल होता है| कोई इन्हें कुछ कह दे तो ये उस का अपमान करने में देर नहीं लगाते|
७ जून २०२०

अगर कोई बात समझ में नहीं आए, या जिसे समझना हमारी बौद्धिक क्षमता से परे हो तो उसको वहीं छोड़ देना चाहिये ---

अगर कोई बात समझ में नहीं आए, या जिसे समझना हमारी बौद्धिक क्षमता से परे हो तो उसको वहीं छोड़ देना चाहिये। जितना और जो भी समझ में आ सके, वही ठीक है| अपनी विद्वता के अहंकार प्रदर्शन के लिए ऊंची ऊंची बातें करना भी गलत है| वही बोलना चाहिए जो सामने वाले के समझ में आ सके| . देहरादून में कोलागढ़ रोड़ पर एक बहुत बड़े संत-महात्मा रहते थे जिनका नाम स्वामी ज्ञानानन्द गिरि था| वे वास्तव में परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए एक बहुत ही महान संत थे| उनसे मुझे तीन बार सत्संग लाभ मिला| मैंने उनसे निवेदन किया कि मुझे बहुत सारी बातें समझ में नहीं आतीं क्योंकि इतनी बौद्धिक मुझमें क्षमता नहीं है| उन्होने उत्तर दिया कि "भगवान है" बस इतना ही समझ लेना पर्याप्त है| बाकी जो आवश्यक होगा वह भगवान स्वयं समझा देंगे| (वे स्वामी आत्मानन्द गिरि के शिष्य थे| स्वामी आत्मानन्द गिरि, स्वामी योगानन्द गिरि के शिष्य थे| स्वामी योगानन्द गिरि कालांतर में परमहंस योगानन्द के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए|)

७ जून २०२०

मेरे पास कहीं भी जाने को अब कोई स्थान इस सृष्टि में नहीं बचा है ---

 मेरे पास कहीं भी जाने को अब कोई स्थान इस सृष्टि में नहीं बचा है।

कहाँ जाएँ? वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण पद्मासन लगाकर शांभवी मुद्रा में हर समय सर्वत्र बिराजमान हैं। सारा विश्व, सारी सृष्टि वे स्वयं हैं। उनसे परे कुछ भी नहीं है। पूरी सृष्टि में उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं, केवल वे ही वे हैं। एकमात्र खाली स्थान उनके हृदय में है, जहाँ अपना डेरा मैंने लगा रखा है। और कोई स्थान खाली नहीं है। समर्पण के सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं है। श्रीकृष्ण को छोड़कर कुछ है भी तो नहीं। वही तो सर्वमय, सर्वरूप हैं। जब वे स्वयं सम्मुख है, दृष्टि में दूसरा रूप कैसे आ सकता है?
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥"
७ जून २०२३

क्या "नमक का मूल्य" (नमकहलाली) "समाज और राष्ट्र के हित" से अधिक था?

 

क्या "नमक का मूल्य" (नमकहलाली) "समाज और राष्ट्र के हित" से अधिक था?
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जिन्ना का जिन्न तो अब बोतल में बंद है, कभी बाहर नहीं निकल सकता। भारत की रक्षा सदा से क्षत्रियों ने की है, उन्होंने ही समाज और राष्ट्र के हित में सबसे अधिक त्याग और बलिदान दिये हैं। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि क्या "नमक का मूल्य" (नमकहलाली) "समाज और राष्ट्र के हित" से अधिक था?
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तुर्क (मुगल) आक्रांताओं की सेना में सारे मुस्लिम ही नहीं होते थे। आधे से अधिक तो भाड़े के हिन्दू सिपाही होते थे। ऐसे ही अंग्रेजों की सेना में लगभग सारे सिपाही भारत के ही भाड़े के हिन्दू और मुस्लिम सिपाही थे। उनकी निष्ठा (वफादारी) भारतीय समाज व राष्ट्र के प्रति न होकर, भाड़ा (तनखा या वेतन) देने वाले के प्रति ही होती थी। चाहे समाज और राष्ट्र नष्ट हो जाये, पर नमकहरामी नहीं होनी चाहिए। लगता है यही उनकी सोच थी। उस समय राष्ट्र और समाज की चेतना नहीं थी, यही विदेशी सत्ताओं की सफलताओं, और हमारी विफलताओं का कारण था। फिर भी भारत कभी भी पराधीन नहीं हुआ। विदेशियों का शासन भारतीय राजाओं के साथ संधि करके ही स्थापित हुआ। भारत सदा स्वाधीन था, और सदा स्वाधीन रहेगा।
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तुर्क और अंग्रेज़ दोनों ही लुटेरे थे। वे भारत को लूटने आये और सत्तासीन हो गए। तत्कालीन साहित्य और राजनीतिक स्थिति यही कहती है कि -- भूमिचोर ही भूप बन गए। सबसे दुःखद बात तो यह है कि तुर्कों और अंग्रेजों के पक्ष में भाड़े के हिन्दू ही लड़ रहे थे। अंग्रेजों ने जमींदारी प्रथा लागू की। हिन्दू जमींदार ही अपने हिन्दू किसानों का खून चूस कर अंग्रेजों की तिजोरी भर रहे थे। भारत के तुर्क (मुगल) और अंग्रेज आक्रांताओं की फौज भाड़े के भारतीयों की ही फौज थी।
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अभी भी गद्दारों की कमी भारत में नहीं है। लेकिन समाज और राष्ट्र की चेतना वाले नागरिक बहुमत में हैं, इसीलिए हम सुरक्षित हैं। जिस दिन सेकुलर कौमनष्ट और जिहादी लोग सत्ता में आ गए, उस दिन से फिर भारत को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करना होगा। अब राष्ट्रभक्ति का महत्व, नमक की कीमत से अधिक है।
७ जून २०२३

ईरान की वर्तमान विचित्र स्थिति और विश्व युद्ध का खतरा --

 ईरान की वर्तमान विचित्र स्थिति और विश्व युद्ध का खतरा -- (अति अति महत्वपूर्ण लेख, जिसका निश्चित प्रभाव भारत पर पड़ेगा)

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बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम (بِسْمِ ٱللَّٰهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ)॥ कल एक समाचार था कि ईरान ने ध्वनि की गति से १५ गुणा अधिक तीब्र गति से चलने वाली हाईपरसोनिक मिसाइल बना ली है। वहाँ की स्थिति बड़ी विचित्र है। वहाँ शिया मुल्ले-मौलवियों की सरकार है जो शिया शरीयत के अनुसार शासन चलाती है। वहाँ के मुल्ले-मौलवियों ने अपने मज़हब की बड़ी से बड़ी कसम खा रखी है कि जिस दिन भी उनके पास क्षमता होगी, वे इज़राइल को नष्ट कर के लालसागर में फेंक देंगे। वहाँ के मौलवियों ने यह भी कह रखा है कि जिस दिन वे अणु बम बना लेंगे, सबसे पहला निशाना इज़राइल को बनाएँगे। अब वे अणुबम बनाने के बहुत समीप हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या इज़राइल शांत बैठेगा?
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ईरान के अधिकांश (लगभग ९०%) लोगों ने इस्लाम को मानसिक रूप से त्याग दिया है। वे इस्लामी कानूनों का उपयोग सिर्फ बहु-विवाह और तलाक के लिए करते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए हिजाब आवश्यक है, अन्यथा जेल में डाल कर उनकी हत्या तक कर दी जाती है। घर में हिजाब कोई महिला नहीं पहिनती। कोई महिला नमाज़ नहीं पढ़ती। पूरे ईरान में ८०,ooo से अधिक मस्जिदें बंद हो चुकी हैं, क्योंकि वहाँ कोई नमाज़ नहीं पढ़ता।
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अंतिम बात यह कह कर इस लेख को समाप्त करता हूँ कि यदि ईरान में मुल्ला-मौलवियों का ही राज रहा तो इज़राइल से युद्ध और महाविनाश तय है। किसी तरह यदि मुल्ला-मौलवियों का राज हट जाये तो ईरान उस क्षेत्र का सर्वाधिक विकसित देश होगा।
होरमुज जलडमरूमध्य में नौकानयन होते रहना, भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
७ जून २०२३