Saturday, 24 May 2025

आज मीरपुर डे है, परन्तु न तो मेन स्ट्रीम मीडिया और न ही कोई पत्रकार व लेखक इसका उल्लेख करना चाहता है।

आज मीरपुर डे है, परन्तु न तो मेन स्ट्रीम मीडिया और न ही कोई पत्रकार व लेखक इसका उल्लेख करना चाहता है।
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इस मीरपुर डे का बैकग्राउंड यह है कि आज से 74 वर्ष पूर्व 25 नवंबर 1947 को जम्मू कश्मीर के मीरपुर जिले पर पाकिस्तान ने आक्रमण किया था और वहां रहने वाले 20,000 निहत्थे हिंदू और सिखों का नरसंहार कर दिया। वहां से बचकर केवल 2500 मीरपुर के निवासी किसी तरह से भूखे प्यासे कई दिनों तक पैदल चलकर जम्मू पहुंच सके थे।
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यह सब इसलिए हुआ क्योंकि पाकिस्तान ने मीरपुर के रहने वाले हिंदुओं व सिखों को चेतावनी दी थी कि यदि बचना चाहते हो तो अपने घर पर सफेद झंडा आत्मसमर्पण के चिन्ह के रूप में लगा देना, परंतु मीरपुर के निवासी हिंदुओं व् सिखों ने अपने घरों पर लाल झंडा फहरा कर यह संदेश दिया कि हम आत्मसमर्पण नहीं अपितु लड़ कर अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे।
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मीरपुर पर आक्रमण के लिए पाकिस्तान सरकार ने कबायलियों और पठानों के साथ एक समझौता किया था जिसका नाम था "ज़ेन और जार" समझौता, जिसका अर्थ था मीरपुर पर कब्जा करने के बाद वहां रहने वाले हिंदुओं व् सिखों की सारी संपत्ति जमीन और धन दौलत पाकिस्तान सरकार की होगी और वहां रहने वाली सभी हिंदू व सिख महिलाएं पठानों की सम्पत्ति होंगीं।
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आप जानते हैं हिंदुओं और सिखों को धोखा किसने दिया ?
मीरपुर निवासी हिंदुओं व् सिखों के मुस्लिम पड़ोसीयों ने, जो उसी वर्ष अगस्त में बंटवारे के बाद मीरपुर छोड़ कर पाकिस्तान चले गए और पाकिस्तान आर्मी को मीरपुर की भौगौलिक स्थिति, स्थानीय आबादी की पूरी जानकारी उपलब्ध करवाई, जिससे पाक आर्मी सफलतापूर्वक मीरपुर पर कब्जा कर उसे पाकिस्तान में मिला सके।
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क्या आप जानते हैं कि उस आक्रमण के समय हमारे देश के महान स्टेट्समैन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने क्या किया ?
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार ने मीरपुर के निवासियों की सहायता करने से मना कर दिया।नेहरू ने 20,000 हिंदुओं सिखों को पाकिस्तानी सेना और कबायलियों द्वारा मारे लुटे जाने के लिए छोड़ दिया, कबायलियों और पठानों द्वारा हजारों हिंदू और सिख बच्चियों, लड़कियों औरतों को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उन्हें उठा उठाकर पाकिस्तान ले जाने दिया। पाकिस्तानियों और कबायली पठानों से बचने के लिए मीरपुर में कई हिन्दू व सिख महिलाओं ने आत्महत्या तक कर ली थी।
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तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार यदि चाहती तो मीरपुर को पाकिस्तानीयों और कबायलियों से बचाने के लिए और वहां के नागरिकों की रक्षा के लिए इंडियन आर्मी को भेज सकते थे, किंतु नेहरू की कांग्रेस सरकार ने जान-बूझ कर ऐसा कुछ नहीं किया, जबकि उस समय मीरपुर से कुछ ही मील दूर झांगर में भारतीय सेना तैनात थी, परंतु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मीरपुर के हिंदू व सिखों को उनके हाल पर पाकिस्तानियों के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया।
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भारत देश के एक पूरे शहर पर कब्जा कर लिया गया।भारत के इस शहर मीरपुर की सम्पूर्ण पुरुष आबादी को 1 दिन में कत्ल कर दिया गया।उस शहर की सभी महिलाओं को अगवा कर लिया गया उनके संग यौन अपराध हुए उन हजारों महिलाओं को उठा कर ले जाया गया, परंतु भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार चटखारें लेकर मीरपुर के 20,000 हिंदू सिख पुरुषों के जनसंहार और हजारों हिन्दू व् सिख महिलाओं के बलात्कार और अपहरण का दृश्य मजे ले ले कर देखकर आनंदित होते रहे, मौन साध कर बैठे रहे, और उनकी सहायता हेतु सेना नहीं भेजी।
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1 दिन के अंदर ही पूरा मीरपुर कब्रिस्तान में बदल गया।सभी हिंदू व सिख पुरुषों को मार दिया गया। पुरुषों के सामने उनकी बेटियों बहुओं बहनों माओं, पत्नियों का बलात्कार किया गया और फिर उन महिलाओं के सामने ही उनके पुरुषों को मार दिया गया।इसके बाद सभी बच्चियों लड़कियों औरतों को उठा कर पाकिस्तान ले जाया गया केवल कुछ वृद्ध महिलाओं को जीवित छोड़ा गया।
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यह सब इसलिए हुआ क्योंकि नेहरू के नेतृत्व वाली तत्कालीन भारत सरकार ने जान-बूझ कर हिंदुओं व सिखों को मरने दिया,जबकी वहां के निवासी यह सोचकर बैठे थे कि भारत सरकार उनकी सुरक्षा हेतु सेना अवश्य भेजेगी और वे भारतीय सेना के संग कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ते हुए अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे।इसीलिए मीरपुर के हिंदूओं व सिखों ने आत्मसमर्पण के बदले अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने का निर्णय किया।
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विडंबना देखिए कि पाकिस्तान द्वारा मीरपुर में अंजाम दिए गए 20,000 निर्दोष हिंदुओं व् सिखों के उस नरसंहार का आज तक कहीं कोई उल्लेख नहीं होता, ना तो आज तक पाकिस्तान सरकार पाकिस्तानी सेना के मानवाधिकार उल्लंघनों और अपराधों की बात होती है, ना ही तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की भूमिका पर प्रश्न उठाए जाते हैं।
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मीरपुर आज भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है और कभी वहां रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं और सिखों का अब वहां 100% जातीय सफाया पाकिस्तान द्वारा किया जा चुका है।
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(श्री Aditya Narayan Jha Anal की वाल से साभार लिया हुआ) 

रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ती का एकमात्र सम्मानपूर्ण उपाय ---

 रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ती का एकमात्र सम्मानपूर्ण उपाय ---

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इस युद्ध की तुरंत समाप्ति का एकमात्र उपाय है -- सन २०१० से २०१४ तक यूक्रेन के लोकप्रिय राष्ट्रपति रहे विक्टर फेदोरोविच यानुकोवुच को दुबारा राष्ट्रपति बनाकर उनके राजनीतिक दल पर लगा प्रतिबंध हटा दिया जाये। उसके बाद स्थिति सामान्य होते ही चुनाव कराये जाएँ। ये यूक्रेन के चौथे राष्ट्रपति थे, जिन्हें अमेरिका और इंग्लैंड ने एक षडयंत्र द्वारा हटवाया, और झेलेंस्की नाम के एक विदूषक को राष्ट्रपति बनवाया।
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विक्टर फेदोरोविच यानुकोवुच ने इस समय रूस में राजनीतिक शरण ले रखी है। अमेरिका और इंग्लैंड ने उनकी हत्या का प्रयास भी अनेक बार किया है। रूस को यह युद्ध छेड़ने को तब बाध्य किया गया जब अमेरिका व इंग्लैंड द्वारा प्रशिक्षित यूक्रेन की नात्सी अजोव बटालियन ने यूक्रेन के रूसी भाषी नागरिकों का नर-संहार आरंभ कर दिया। छोटे छोटे माँ का दूध पीते रूसी बच्चों की भी हत्या की गई। क्रीमिया में अधिकाधिक ६% यूक्रेनी थे, बाकी रूसीभाषी थे। सोवियत संघ के राष्ट्रपति जब ख्रुश्चेव थे, जो स्वयं एक यूक्रेनियन थे, ने क्रीमीया यूक्रेन को दे दिया था। दोनेत्स्क और लुजांस्क भी यूक्रेन के रूसी भाषी क्षेत्र थे, जिन पर क्रीमीया सहित अब रूस ने बापस अपना अधिकार कर लिया है। सोवियत संघ के विखंडन तक कोई समस्या नहीं थी। एक षडयंत्र के अंतर्गत अमेरिका व इंग्लैंड द्वारा तुर्की के माध्यम से यूक्रेन में बहुत अधिक कोकीन लगातार भेजा गया, और यूक्रेन के लोगों को नशे का आदि बनाया गया। इस षडयंत्र का उद्देश्य था यूक्रेन के माध्यम से रूस को नष्ट कर वहाँ की भूमि का दोहन करना। यूक्रेन में अनेक जैविक प्रयोगशालाएँ खोली गईं जहाँ ऐसे जैविक अस्त्र बनाने का प्रयोग चल रहा था, जिनसे रूस में अनेक तरह की बीमारियाँ फैला कर रूस को नष्ट किया जा सके। रूस ने वे प्रयोगशालाएँ अब तो नष्ट कर दी हैं। अमेरिका की जनता को पता नहीं चले इसलिए रूस के समाचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। भारत की समाचार चैनलें बिक चुकी हैं और अमेरिका प्रायोजित समाचार दे रही हैं।
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इस विषय की पूरी पृष्ठभूमि मैं अपने पिछले लेखों में लिख चुका हूँ। एक बात को बार-बार लिखने का धैर्य और ऊर्जा मुझमें नहीं है।
कृपा शंकर
२४ मई २०२२
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पुनश्च :-- क्रीमीया का नाम एक तुर्क तातार मुसलमान के नाम पर पड़ा था। उसने यहाँ के स्थानीय लोगों की हत्या करने के उपरांत तातारों को यहाँ बसा दिया था। यह क्षेत्र सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) का भाग था, जिससे छीन कर रूस ने इस पर अपना अधिकार कर लिया था। इस पर इंग्लैंड और फ़्रांस ने मिलकर रूस से युद्ध भी किया था (क्रीमीया वार) जिसमें उनको कोई सफलता नहीं मिली। द्वितीय विश्व युद्ध में आक्रमणकारी जर्मन सेना का स्वागत तातार मुसलमानों ने किया था जिस से नाराज होकर स्टालिन ने तातार मुसलमानों को वहाँ से हटाकर रूस की मुख्य भूमि में बसा दिया और उनको 'तातारिस्तान' नाम का एक गणराज्य भी बना कर दे दिया। क्रीमीया में अब लगभग पूरी जनसंख्या रूसी भाषियों की है।
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सोवियत संघ का तानाशाह स्टालिन स्वयं भी रूसी नहीं था। वह जॉर्जिया का था, जो उस समय सोवियत संघ का भाग था।
२४ मई २०२२

आत्म-रक्षा हेतु हमें स्वयं में भी क्षत्रियत्व विकसित करना होगा ---

जो क्षति से त्राण करता है, वह क्षत्रिय है। राष्ट्र की रक्षा क्षत्रिय-धर्म ही करेगा। भारत में सभी क्षत्रियों को अपने साथ अपने अस्त्र-शस्त्र रखने की अनुमति हो, वैसे ही जैसे सिखों को कृपाण रखने की अनुमति है। क्षत्रियों ने ही राष्ट्र की रक्षा सदा ही की है। यह उनका धर्म है। क्षत्रियों को चाहिये कि वे धर्मरक्षार्थ अपने अस्त्र-शस्त्र सदा अपने साथ रखने का प्रावधान प्राप्त करें।

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हमारी (सारे हिंदु समाज की) दुर्दशा का मुख्य कारण हमारी कायरता है। इस कायरता को दूर करने का एकमात्र उपाय है -- भगवान श्रीराम का ध्यान। चिंतन, मनन, निदिध्यासन, ध्यान/उपासना द्वारा उन्हें निज जीवन में अवतरित करना होगा। हर क्षेत्र में हमें स्वयं राम बनना होगा। हमारा जीवन राममय हो। अन्य कोई उपाय नहीं है। भगवान को छल-कपट पसंद नहीं है। जो दूसरों के साथ छल करते हैं, उनका कोई पुण्य उनके काम नहीं आयेगा। उनका अपने परिवार सहित नर्कगामी होना सुनिश्चित है। .
सत्य-सनातन-धर्म और भारत की रक्षा करो, हे भगवन् !!
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

२५ मई २०२२

हमें (मुझे या किसी को भी) परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती, इसका एकमात्र कारण परमप्रेम (भक्ति), और सत्यनिष्ठा (sincerity & integrity) का अभाव है

 हमें (मुझे या किसी को भी) परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती, इसका एकमात्र कारण परमप्रेम (भक्ति), और सत्यनिष्ठा (sincerity & integrity) का अभाव है। अन्य कोई कारण नहीं है।

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द्वैत-भाव की समाप्ति -- "समर्पण" है, और आत्म-तत्व में स्थिति -- ध्यान, उपासना, व उपवास है। भगवान सत्य-नारायण हैं। सत्यनिष्ठा से समर्पित हुआ जाये तो परमात्मा की उपासना और परमात्मा की प्राप्ति अति सरल है। सत्यनिष्ठा के अभाव से ही हम परमात्मा से दूर हैं। 'उपासना' का अर्थ है -- अपने इष्टदेव के समीप उपस्थिति या आसीन होना (आसन)।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥१२:३॥"
अर्थात् - "जो अपनी इन्द्रियों को वश में कर के अचिन्त्य, सर्वत्र परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सर्वत्र समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।"
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यहाँ भगवान श्री कृष्ण ने "उपासते" यानि उपासना शब्द का प्रयोग किया है।
आचार्य शंकर के अनुसार -- "उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बनाकर, उसके समीप पहुँचकर, तैलधारा के सदृश समानवृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थिर रहने को उपासना कहते हैं" (गीता १२:३ पर शंकर भाष्य)।
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एक बर्तन से दूसरे बर्तन में जब तेल डालते हैं तब तेल की धार टूटती नहीं है। वैसे ही अपने प्रेमास्पद परमात्मा का ध्यान निरंतर तेलधारा के समान अखंड होना चाहिए, यानि बीच-बीच में खंडित न हो। साथ-साथ यदि भक्ति यानि परमप्रेम भी हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और आगे के सारे द्वार भी स्वतः ही खुल जाते हैं। यही उपासना है।
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आपके समक्ष मिठाई रखी है तो मिठाई को चखिए, खाइये और उसका आनंद लें। उसके बखान में कोई आनंद नहीं है। भगवान सामने बैठे हैं, उनमें स्वयं को समर्पित कर दीजिये। बातों में कोई सार नहीं है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ मई २०२४

हिन्द महासागर में चागोस द्वीपसमूह व डिएगो गार्सिया द्वीप :--- .

 हिन्द महासागर में चागोस द्वीपसमूह व डिएगो गार्सिया द्वीप :---

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भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासंघ में ११६ अन्य देशों के साथ हिन्द महासागर में "चागोस द्वीपसमूह" से ब्रिटिश अधिकार हटाने और चागोस द्वीपसमूह मॉरिशस को सौंपने के प्रस्ताव का समर्थन किया है| अब ब्रिटेन को उपरोक्त द्वीप समूह छः महीनों के अन्दर अन्दर मॉरिशस को सौंपना ही चाहिये| इस विषय पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय पहले ही निर्णय दे चुका है| पर अपनी पुरानी दादागिरी की आदत के कारण ब्रिटेन शायद ही इन्हें खाली करे|
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अमेरिका ने भी दादागिरी से हिन्द महासागर में भूमध्य रेखा से नीचे डिएगो गार्सिया द्वीपों पर अधिकार कर के वहाँ अपना एक बहुत बड़ा सैनिक अड्डा बना रखा है| यह द्वीप भारत से सीधे नीचे है और अधिक दूर भी नहीं है, जहाँ से अमेरिकी बमवर्षक कभी भी भारत पर आक्रमण कर सकते हैं| यह द्वीप भी मॉरिशस का ही भाग है जिस पर पहिले पुर्तगालियों का अधिकार था, फिर फ़्रांस का, फिर ब्रिटेन का, अब अमेरिका का अधिकार है| सन १९६८ और १९७३ के मध्य में यहाँ के निवासियों को बलात् मॉरिशस और सेशल्स में भेज दिया गया था, उन्हें अब बापस आने की अनुमति नहीं है| अब तो वहाँ सिर्फ अमेरिकी सैनिक और कामकाज के सिलसिले में रह रहे अमेरिकी नागरिक ही रहते हैं| अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने और संयुक्त राष्ट्र संघ ने इन्हें भी बापस मॉरिशस को लौटाने को कह रखा है पर अमेरिका अपने इस विशाल सैनिक अड्डे को अपनी दादागिरी से कभी खाली नहीं करेगा|
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फ़्रांस ने भी मेडागास्कर के पूर्व में मॉरिशस के दक्षिण-पूर्व में १०९ नॉटिकल मील दूर रीयूनियन द्वीप पर अधिकार कर रखा है| वहां की जनसंख्या इस समय ८,६६,५०६ है| वहाँ की जनसंख्या में अनेक भारत से बहुत पहले मजदूरी के लिए बलात् ले जाए गए लोग भी हैं| यह भी मॉरिशस का ही भाग होना चाहिए|
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भारत के कभी अमेरिका से सम्बन्ध खराब हो जाएँ तो डिएगो गार्सिया का अमेरिकी सैनिक अड्डा ही भारत के लिए ख़तरा बन सकता है|
कृपा शंकर
२३ मई २०१९

भक्त साधक को कभी भी मार्गदर्शन का अभाव नहीं रहता| परमात्मा सदा उसका मार्गदर्शन और रक्षा करते हैं|

मनुष्य मौज-मस्ती करता है सुख की खोज में| यह सुख की खोज, अचेतन मन में छिपी आनंद की ही चाह है| सांसारिक सुख की खोज कभी संतुष्टि नहीं देती, अपने पीछे एक पीड़ा की लकीर छोड़ जाती है| आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं सिर्फ ..... भगवान के ध्यान में| भगवान ही आनंद हैं, परम प्रेम जिनका द्वार है| सभी जीवों पर उनकी अपार परम कृपा हो| उनकी परम कृपा हम सब पर है इसी लिए हम जीवित हैं|

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भगवान की भक्ति करते-करते उन का ध्यान भी स्वतः ही होने लगता है| जब भी आवश्यकता होती है, भगवान अपने भक्त का मार्गदर्शन करते हैं| भगवान का ध्यान करते करते उनकी कृपा से भ्रूमध्य में ब्रहमज्योति के दर्शन होने लगते हैं तब उस ज्योतिर्मय ब्रह्म का ही ध्यान करना चाहिए| एक ध्वनी भी सुनाई देने लगती है जो किसी शब्द का प्रयोग नहीं करती| उस ध्वनि के साथ-साथ गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र या प्रणव का जप करते-करते उस में तन्मय हो जाना चाहिए| उस ध्वनि को ही अनाहत नाद कहते हैं| उस ज्योतिर्मय ब्रह्म और नाद की चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है जिसकी परिणिति गीता में बताई हुई ब्राह्मी स्थिति में होती है|
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प्राण ऊर्जा का घनीभूत होकर मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी के छः चक्रों में ऊर्ध्वगमन, कुंडलिनी जागरण कहलाता है| यह योगमार्ग की साधना है| कूटस्थ का स्थान भी धीरे धीरे भ्रूमध्य से सहस्त्रार में चला जाता है| फिर धीरे धीरे चेतना में विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगती हैं, तब यह लगता है कि हम यह देह नहीं परमात्मा की अनंतता हैं| फिर उस अनंतता का ही ध्यान करना चाहिए| वह ज्योति और ध्वनि भी धीरे धीरे उस अनंतता से परे चले जाती हैं और एक पंचकोणीय नक्षत्र के दर्शन होने लगते हैं| यह एक बहुत ही उच्च स्थिति है| जो सर्वत्र समभाव में व्याप्त हैं वे भगवान वासुदेव हैं| वे ही परमशिव हैं, और वे ही नारायण हैं|
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भक्त साधक को कभी भी मार्गदर्शन का अभाव नहीं रहता| परमात्मा सदा उसका मार्गदर्शन और रक्षा करते हैं| एकमात्र आवश्यकता है भगवान के प्रति परमप्रेम और उन्हें पाने की अभीप्सा| बाकी सारा काम भगवान का है| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ मई २०२०

सत्संग क्या है? सत्संग का मापदंड क्या है?

सत्संग की महिमा तो बहुत सुनी है, पर सत्संग क्या है? सत्संग का मापदंड क्या है कि हम सत्संग कर रहे हैं या समय ही नष्ट कर रहे हैं? सत्संग का अर्थ है सत्य का संग| एकमात्र सत्य .... "परमात्मा" है| जहाँ पर, जिस की उपस्थिती में, परमात्मा का आभास परमप्रेम (भक्ति) और परमात्मा के आनंद के रूप में स्पष्टतः होता है, वही सत्संग है, अन्यथा समय की बर्बादी है|

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महात्मा वह ही है जिस की उपस्थिती में हम परमात्मा के आनंद और भक्ति से भर जाएँ| महात्मा का अर्थ है जो महत् तत्व यानि परमात्मा की सर्वव्यापकता से जुड़ा है| जिस के संग से भगवान की भक्ति जागृत हो जाये और भगवान की अनुभूति होने लगे उसी का संग करना चाहिए|
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जो भगवान से दूर ले जाये वह कुसंग है, जिसका त्याग सर्वदा करना चाहिए|
भक्ति सूत्रों में नारद जी कहते हैं ... दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः||४३|| अर्थात दुसंग सर्वदा त्याज्य है|
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात्||४४|| अर्थात (कुसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवं सर्वनाश का कारण है||
संत तुलसीदास जी कहते हैं ... "जाके प्रिय न राम बैदेही| तजिये ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम स्नेही||"
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अतः सावधान रहें कि कहीं सत्संग के नाम पर हम कुसंग तो नहीं कर रहे हैं|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || ॐ नमः शिवाय || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२४ मई २०२०