Saturday, 10 May 2025

अनन्य भक्ति क्यों आवश्यक है? अनन्य भक्ति क्या होती है? ---

 अनन्य भक्ति क्यों आवश्यक है? अनन्य भक्ति क्या होती है? ---

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"अनन्य भक्ति" एक ऐसा विषय है जिसे एक सद्गुरु स्वयं अपने सामने बैठाकर अपने सुपात्र शिष्य को ठीक से समझा सकता है। इसे ठीक से समझ तो वे ही पायेंगे जिनको वेदान्त की भी थोड़ी-बहुत अनुभूतियाँ हैं। हम यह देह नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि और अनंतता हैं। हंसःयोग (अजपा-जप) में इसी का अभ्यास किया जाता है। गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- "अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥"
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अब प्रश्न उठता है कि अनन्य भाव क्या है?
भगवान मुझ से अन्य नहीं हैं, मैं उन की सर्वव्यापक अनंतता हूँ, और वे मेरे साथ एक हैं; मैं यह भौतिक देह नहीं, बल्कि भगवान की पूर्णता हूँ, -- यह अनन्य भाव है। जिन पर ईसाईयत का प्रभाव है, वे इसका अर्थ दूसरा लगायेंगे। वे कहेंगे कि सिर्फ श्रीकृष्ण ही उपास्य है और परमात्मा के अन्य अवतार या अन्य रूप उपास्य नहीं हैं। लेकिन यह गलत है।
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अनन्यभाव से युक्त होकर सर्वव्यापी परमदेव नारायण को आत्मरूप से जानते हुए उनका निरन्तर चिन्तन -- निष्काम अनन्य उपासना है। यहाँ "योगक्षेम" हमारा लक्ष्य नहीं है, वह तो एक side effect है। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है। यह भगवान का काम है, हमारा काम सिर्फ आत्म-समर्पण है।
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अन्य भक्तों का योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं, यह बात ठीक है, किन्तु जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा करते हैं। पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। क्योंकि वे जीने और मरने में अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रहते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।
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एक व्यक्ति यानि मनुष्य की चेतना में जो नारकीय जीवन मैं जी रहा हूँ, उसे जीने की मेरी बिल्कुल भी इच्छा नहीं है। अपने प्रारब्धवश ही यह जीवन जी रहा हूँ, अन्यथा मेरा सुख, शांति, सुरक्षा और प्रेम तो सिर्फ भगवान में है। स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं, यही मेरा सुख और आनंद है। भगवान की चेतना के बिना मैं मृत हूँ। भगवान की चेतना के बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।
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ॐ सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहै,
तेजस्विनावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
११ मई २०२३
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पुनश्च: --- गीता के तेरहवें अध्याय का ग्यारहवाँ श्लोक भी "अनन्य योग" और "अव्यभिचारिणी भक्ति" की महिमा बताता है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥"
११ मई २०२३

सनातन धर्म किसी को क्या दे सकता है?

 सनातन धर्म किसी को क्या दे सकता है?

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किसी को निःशुल्क चावल की बोरियाँ, मंहगी शराब, खूब भोग-विलास और यौन वासनाओं की असीम तृप्ति के लिए अनेक सुंदर युवतियाँ/युवक चाहिएँ, वे कहीं भी जाएँ, सनातन धर्म उनके लिए नहीं है।
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सनातन धर्म सिर्फ उनके लिए है जिन्हें जीवन में -- अभ्युदय (सर्वतोमुखी विकास, इष्ट लाभ, मनोरथ की सिद्धि, कल्याण) और -- निःश्रेयस (कष्टों/दुःखों से मुक्ति, मंगल और मोक्ष) चाहिए। मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण दिए हैं, जिन्हें धारण करना धर्म है।
सनातन धर्म है परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पाने की अभीप्सा।
धर्म के सूक्ष्म तत्वों को महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में बहुत सरल भाषा में समझाया गया है। ये ग्रंथ समझ में आने वाली भाषा में बाल्यावस्था/किशोरावस्था से ही बालक/बालिकाओं को उपलब्ध करवाने चाहियें।
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उपनिषदों में धर्म का ज्ञान भरा पड़ा है। जहाँ झूठ, कपट और छल है, वहाँ धर्म नहीं है। जहाँ धर्म नहीं है, वहाँ परमात्मा नहीं है। सनातन धर्म परमात्मा की खोज है।
सनातन धर्म कहता है कि मनुष्य एक शाश्वत आत्मा है, और अपने कर्मफलों को भोगने के लिए बार बार जन्म लेता है। यह संसार द्वन्द्वात्मक है, जहाँ सुख और दुःख दोनों मिले हुए हैं। सुखों की खोज दुःखों को जन्म देती है। अनेक जन्मों में अनेक योनियों में भटकता हुआ प्राणी फिर दुःखी होकर परमात्मा की ओर उन्मुख होता है। यहीं से जीवन में भक्ति का प्रादुर्भाव होता है। संक्षेप में यही सत्य सनातन धर्म है।
जहाँ धर्म है, वहीं जय है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ मई २०२३

भगवान अपनी उपासना स्वयं ही करेंगे ---

 भगवान अपनी उपासना स्वयं ही करेंगे ---

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इस संसार में अनेक तरह के अनेक कष्ट हैं, उनके निवारणार्थ साधनाएँ भी अनेक हैं। लेकिन अपने स्वार्थ के लिए परमात्मा को कष्ट देना मैं उचित नहीं समझता। परमात्मा से कुछ भी नहीं चाहिए, कुछ उनको बापस ही देना है। अपना अन्तःकरण और सम्पूर्ण पृथकता का बोध उन्हें किसी भी तरह बापस लौटाना है।
वे सच्चिदानंद और सर्वस्व हैं। जो भी आराधना या उपासना उन्हें करनी है, वह वे स्वयं ही करेंगे। मैं तो उनका एक उपकरण निमित्त मात्र हूँ जिसका वे चाहे जैसे उपयोग करें।
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जिन भी उपासनाओं का मैं साक्षी हूँ, वे सब वैदिक हैं, जिन्हें वैदिक युग से तपस्वी करते आए हैं। उपनिषदों में व गीता में उनका उल्लेख है। मुझे उनमें कुछ भी नहीं जोड़ना है। बाकी सब परमात्मा की महिमा है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ मई २०२४

Friday, 9 May 2025

जिधर भी देखता हूँ, जहाँ तक भी मेरी कल्पना जाती है, वह सब मैं ही हूँ ---

जिधर भी देखता हूँ, जहाँ तक भी मेरी कल्पना जाती है, वह सब मैं ही हूँ। इस मैं के पीछे परमात्मा छिपे हुए हैं। वे भी कब तक छिपेंगे? वे अब और नहीं छिप सकते।

Reveal Thyself unto me. Thou and I art one.

"मैं" नहीं अब सिर्फ "तुम" हो और "तुम्ही" रहोगे। अब तक के सभी जन्म-जन्मान्तरों के सारे पाप-पुण्य, सारे अभाव और सारे छिद्र व सारी अच्छाइयाँ-बुराइयाँ सब तुम्हें समर्पित हैं। अब और कुछ भी नहीं चाहिए। अपनी उपस्थिति से हर कमी को दूर कर दो। कोई कामना या पृथकता का बोध अब और ना उत्पन्न हो। कोई प्रार्थना भी ना रहे। सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा प्रेम रहे। ९ मई २०२३

Wednesday, 7 May 2025

यदि भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनता है तो इस बात की पूरी संभावना है कि अगले बीस-तीस वर्षों में लगभग पूरा प्रबुद्ध पश्चिमी यूरोप, ईसाई रिलीजन को छोड़कर सनातन (हिन्दू) धर्म को अपना लेगा।

 

यदि भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनता है तो इस बात की पूरी संभावना है कि अगले बीस-तीस वर्षों में लगभग पूरा प्रबुद्ध पश्चिमी यूरोप, ईसाई रिलीजन को छोड़कर सनातन (हिन्दू) धर्म को अपना लेगा। पूर्वी यूरोप में यह अब तक हो जाता, लेकिन पुराने मार्क्सवादी प्रभाव ने इसे रोक रखा है। यूरोप में ईसाई रिलीजन हासिए पर आ चुका है, वहाँ के लोगों की आस्था ईसाईयत से समाप्त हो चुकी है। यही स्थिति धीरे-धीरे दोनों अमेरिकी महाद्वीपों में भी हो जायेगी। बीस वर्ष बाद संस्कृत भाषा भी पूरे विश्व में अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाएगी, क्योंकि कम्प्यूटरों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ भाषा है। भारत का हिन्दू राष्ट्र बनना बहुत ही आवश्यक है।
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जिस दिन वर्तमान आधुनिक विज्ञान यह मान लेगा कि आत्मा शाश्वत है, पुनर्जन्म और कर्मफलों के सिद्धान्त सत्य हैं, उस दिन से सनातन धर्म का वैश्वीकरण होने लगेगा। मेरी तो अभी भी यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों, व ईश्वर के अवतारों को मानता है, वह हिन्दू है, चाहे वह पृथ्वी के किसी भी स्थान पर रहता है।
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मेरा यह विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प, और ईश्वर से प्रार्थना है कि भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हों, और भारत में छाया असत्य का अंधकार दूर हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
८ मई २०२१

परमात्मा कहाँ हैं? सभी को यहाँ उनका पूरा पता-ठिकाना बता रहा हूँ ---

मैं परमात्मा की प्रेरणा से परमात्मा की साक्षी में सत्य बोल रहा हूँ, और परमात्मा का पूरा पता-ठिकाना यहाँ सभी को बता रहा हूँ। इसे समझने के लिए सर्वप्रथम हमें अपनी चेतना में ज्ञान और विवेक की अग्नि को प्रज्ज्वलित करना होगा। जब हम किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सद्गुरु-प्रदत्त विधि से भ्रूमध्य में परमात्मा का ध्यान करते हैं, तब हमारे मेरु-दंड में एक घर्षण होता है, जो ज्ञान और विवेक की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है। वह अग्नि हमारे प्रारब्ध और संचित कर्मफलों को शनैः शनैः भस्म करने लगती है। यदि हम सत्यनिष्ठा से लगे रहेंगे तो एक अवस्था ऐसी भी आयेगी जब हमारे निज जीवन में परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। तभी हम परमात्मा को पूरी तरह समझ सकेंगे।

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कोई मेरी बात को माने या न माने, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। मैं केवल अनुरोध ही कर सकता हूँ कि इसी समय से हम स्वयं परमप्रेममय होकर परमात्मा के प्रेम की अग्नि में कूद पड़ें, और सर्वव्यापी निजात्मा में रमण करें। इस विषय को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम-योग व मोक्षसन्यास-योग को थोड़ा समझना होगा। यहाँ मैं अति अति संक्षेप में ही बता पाऊँगा।
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(१) "पुरुषोत्तम योग" में भगवान जब कहते हैं ---
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥१५:१५॥"
(अर्थात् -- "मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ॥")
(२) और "मोक्षसन्यास योग" में वे कहते हैं --
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥१८:६१॥"
(अर्थात् -- हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है॥)
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भगवान ने यह तो बता दिया कि वे हमारे हृदय में हैं, लेकिन यहाँ स्वभाविक रूप से एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि भगवान के मन में "हृदय" शब्द का क्या तात्पर्य है, जहाँ वे स्थित हैं? यदि हम "हृदय" शब्द का आध्यात्मिक अर्थ समझ सकते हैं, तो परमात्मा के पते-ठिकाने को भी समझ सकते हैं। यहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपना पता-ठिकाना बता रहे हैं।
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आध्यात्म में "हृदय" शब्द से तात्पर्य शरीर के अंग "हृदय" से नहीं है। यहाँ "हृदय" शब्द का अर्थ लाक्षणिक है, शाब्दिक नहीं। आध्यात्म में -- सर्वव्यापक परमात्मा की चेतना, और भक्ति, करुणा, धैर्य, क्षमा, उत्साह, स्नेह, कोमलता, शांति, प्रसन्नता, व उदारता जैसे दैवीय गुणों से सम्पन्न जागरूक मन को ही "हृदय" कहते हैं, जो आत्म-तत्व का अनुभव करने में सक्षम है। यही परमात्मा यानि ईश्वर का स्थायी पता-ठिकाना है।
चैतन्यस्वरूप सच्चिदानंद ब्रह्म का ध्यान अपने इस हृदय में करें, उनका केंद्र सर्वत्र है, परिधि कहीं भी नहीं। इस तरह हम सब परमात्मा के पते/ठिकाने पर पहुँच कर उनके साथ एक हो जायेंगे।
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जिनके हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम है, वे ही मेरे साथ रहें। अन्य सब मुझे विष की तरह छोड़ दें, क्योंकि मैं उनके किसी काम का नहीं हूँ।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ मई २०२५

कोई अन्य नहीं आयेगा, सब कुछ हमें स्वयं को ही करना होगा ---

 कोई अन्य नहीं आयेगा, सब कुछ हमें स्वयं को ही करना होगा ---

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अन्य कोई नहीं आयेगा, सब कुछ हमें स्वयं को ही करना होगा। इस जन्म में नहीं तो अगले किसी जन्म में करना तो स्वयं को ही होगा। ईश्वर कोई ऊपर से उतर कर आने वाली वस्तु नहीं है, हमें स्वयं को ही ईश्वर बनना होगा। यही ईश्वर की प्राप्ति है। धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण भी स्वयं को ही करना होगा। भारत को हिन्दू राष्ट्र भी स्वयं को ही बनाना होगा।
लेकिन सारा कार्य एक निमित्त होकर करें, कर्ताभाव का अभिमान न आने पाये।
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परमात्मा के मार्ग में हमारे दो सबसे बड़े शत्रु हैं -- (१) प्रमाद (आलस्य), और (२) दीर्घसूत्रता (काम को आगे टालने की प्रवृति)।
प्रमाद, ही महिषासुर है। राग-द्वेष, अहंकार, संशय, और लोभ आदि के कारण ही हम भगवान से दूर हैं। अन्य कोई कारण नहीं है। समय हो गया है, उठो और ध्यान के आसन पर बैठकर गुरु-चरणों का ध्यान करो। अभी और इसी समय।
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जिस भौतिक विश्व में हम रहते हैं, उससे भी बहुत अधिक बड़ा एक सूक्ष्म जगत हमारे चारों ओर है, जिसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की सत्ताएँ हैं।
जितना हम अपनी दिव्यता की ओर अग्रसर होते हैं, सूक्ष्म जगत की नकारात्मक आसुरी शक्तियाँ उतनी ही प्रबलता से हम पर अधिकार करने का प्रयास करती हैं। उन आसुरी जगत की शक्तियों के प्रभाव से हम जीवन में कई बार न चाहते हुए भी एक पशु की तरह आचरण करने लगते हैं, और चाह कर भी पतन से बच नहीं पाते। ऐसी परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए?
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आग लगने पर कुआँ नहीं खोदा जा सकता, कुएँ को तो पहिले से ही खोद कर रखना पड़ता है। अपने समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में करें। लोभ, कामुकता, अहंकार, क्रोध, प्रमाद व दीर्घसूत्रता जैसी वासनायें हमें नीचे गड्ढों में गिराती हैं, जिन से बचने के किए हमें अपनी चेतना, विचारों, व चिंतन के स्तर को अधिक से अधिक ऊँचाई पर रखना चाहिए।
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रात्री को सोने से पहिले ईश्वर का कीर्तन, भजन, जप, और ध्यान आदि करके उसी तरह सोयें जैसे एक शिशु निश्चिंत होकर अपनी माँ की गोद में सोता है। प्रातःकाल उसी तरह उठें, जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद में निश्चिंत होकर उठता है। दिन का आरंभ भी ईश्वर के कीर्तन, भजन, जप, ध्यान आदि से करें। पूरे दिन परमात्मा को अपनी स्मृति में रखें। ईश्वर स्वयं ही हमारे माध्यम से सारे कार्य कर रहे हैं।
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आप सब को नमन !! मैं आप सब के साथ एक हूँ, एक क्षण के लिए भी पृथक नहीं हूँ।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
८ मई २०२४