Friday, 2 May 2025

समष्टि मुझ से पृथक नहीं है, सूक्ष्म जगत की अनंतता, और सम्पूर्ण सृष्टि मेरे अस्तित्व का भाग है ---

समष्टि मुझ से पृथक नहीं है, (स्वयं भगवान विष्णु ही यह "मैं" बन गए हैं) सूक्ष्म जगत की अनंतता, और सम्पूर्ण सृष्टि मेरे अस्तित्व का भाग है ---

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मैं कोई पृथक इकाई नहीं हूँ, मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है, मैं सम्पूर्ण सृष्टि की अनंतता हूँ; सारा ब्रह्मांड मेरा शरीर है। कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म का चिंतन करते ही मेरुदंड उन्नत हो जाता है, दृष्टिपथ भ्रूमध्य की दिशा में स्थिर हो जाता है, और चेतना इस देह के ब्रह्मरंध्र से बाहर निकल कर सूक्ष्म जगत की अनंतता में विस्तृत हो जाती है। परमात्मा का वह अनंत ज्योतिर्मय विस्तार ही मेरा शरीर है। अनंतता के उस विस्तार से भी परे, एक परम आलोकमय जगत है जो मेरा वास्तविक लक्ष्य है। वह इस सृष्टि का भाग नहीं, सृष्टि उस का भाग है।
उसी के बारे में गीता में भगवान कहते हैं --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥१५:६॥
अर्थात् - उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है॥
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श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥" (मुण्डक २/२/११)
अर्थात् - वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, और चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है, तथा तारे बुझ जाते हैं; वहाँ ये विद्युत् भी नहीं चमकती, तब यह पार्थिव अग्नि भी कैसे जल पायेगी? जो कुछ भी चमकता है, वह उसकी आभा से अनुभासित होता है, यह सम्पूर्ण विश्व उसी के प्रकाश से प्रकाशित एवं भासित हो रहा है।
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परमात्मा की उपासना के समय सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि मेरे साथ एक होती है। उस समय मैं यह नश्वर शरीर नहीं, परमशिव के साथ एक होता हूँ। परमशिव से यही प्रार्थना है कि वे स्वयं को इस सृष्टि यानि मुझ में पूर्ण रूप से स्वयं को व्यक्त करें।
मेरी लौकिक प्रार्थना है कि भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियाँ पराभूत हों, और सम्पूर्ण भारत में सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ मई २०२३

Thursday, 1 May 2025

मैं द्वैत और अद्वैत -- दोनों की बातें करता हूँ, इससे कोई भ्रमित न हो। ये दोनों मनोभूमियाँ हैं, और दोनों ही सत्य हैं ---

 मैं द्वैत और अद्वैत -- दोनों की बातें करता हूँ, इससे कोई भ्रमित न हो। ये दोनों मनोभूमियाँ हैं, और दोनों ही सत्य हैं ---

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इस युग में अद्वैतवेदान्त के प्रणेता आचार्य गौड़पाद थे, जिन्होंने "मांडूक्यकारिका" नामक ग्रंथ लिखा है। स्वनामधन्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने अपने परमगुरु आचार्य गौड़पाद द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत का समर्थन करते हुए अपनी सर्वप्रथम टीका उनके ग्रंथ "मांडूक्यकारिका" पर लिखी थी।
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आचार्य शंकर स्वयं परम भक्त थे, और भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुंदरी (श्रीविद्या) की आराधना करते थे। ब्रहमसूत्रों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता की टीका के साथ साथ उन्होने "सौन्दर्यलहरी" नामक दिव्य ग्रंथ की रचना भी की है, जो तंत्र-विद्या के सर्वोत्तम ग्रन्थों में से एक है। आचार्य शंकर एक परम भक्त थे, इसलिए विभिन्न देवी-देवताओं की सबसे अधिक भक्तिमय स्तुतियाँ उन्होने लिखी हैं।
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नवीनतम गणनाओं के अनुसार आचार्य शंकर का जन्म जीसस क्राइस्ट से ५०८ वर्ष पूर्व हुआ था। उनका देहांत ४७४ BC में हुआ था। नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ का जन्म आचार्य शंकर से भी बहुत पहिले हुआ था।
अंग्रेजों ने भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए भारत का गलत इतिहास लिखवाया।
इस विषय पर एक बहुत बड़े शोध की आवश्यकता है। अंग्रेजों ने आचार्य शंकर का जन्म ईसा की आठवीं शताब्दी में, और गुरु गोरखनाथ जी का जन्म ईसा की ११वीं सदी में बताया है जो गलत है।
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श्रीविद्या कोई रुपया-पैसा कमाने की विद्या नहीं है। आचार्य शंकर जैसे महापुरुष, स्वामी करपात्री जैसे धर्म-सम्राट, व लगभग सभी विरक्त दंडी स्वामी जिसकी उपासना करते हों, क्या वह धन कमाने या आर्थिक समृद्धि की विद्या हो सकती है? अगस्त्य ऋषि और उनकी पत्नी लोपामुद्रा -- श्रीविद्या के उपासक थे। उन्हें इस का ज्ञान भगवान विष्णु के अवतार हयग्रीव ने दिया था। कालखंड में यह विद्या लुप्त हो गई थी जिसे योगियों ने पुनर्जीवित किया और आचार्य शंकर को इसमें दीक्षित किया। आचार्य शंकर ने इस पर "सौन्दर्य लहरी" नामक ग्रन्थ लिखा है। श्रीविद्या कुंडलिनी महाशक्ति के जागरण, सूक्ष्मदेह के मेरुदंडस्थ सभी चक्रों के भेदन, और परमशिव से उनके मिलन की विद्या है। "कुंडलिनी महाशक्ति" और "परमशिव" के मिलन को ही "योग" कहते हैं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ मई २०२४

"अव्यभिचारिणी भक्ति" का तात्पर्य क्या है?

 "अव्यभिचारिणी भक्ति" का तात्पर्य क्या है?

जहां तक मेरी स्मृति है, "अव्यभिचारिणी भक्ति" शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में दो बार किया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश दिया है, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था। उसका १६६वां श्लोक कहता है --
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते।
निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी॥"
(यहाँ "निर्विघ्ना" और "निश्चला" शब्दों का भी प्रयोग हुआ है)
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दूसरी बार भीष्म पर्व में महाभारत की रणभूमि में अर्जुन को गीता के भक्तियोग का उपदेश देते हुए किया है। गीता में भगवान कहते हैं --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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ईश्वर में अनन्य योग, यानि एकत्वरूप समाधि-योग से अव्यभिचारिणी भक्ति व्यक्त होती है। भगवान् वासुदेव से परे अन्य कोई भी नहीं है। वे ही हमारी परमगति हैं। विविक्तदेशसेवित्व -- एकान्त पवित्र देश में रहने का स्वभाव, तथा संस्कार-शून्य जनसमुदाय में अप्रीति। यहाँ विनयभावरहित संस्कारशून्य लोगों के समुदाय का नाम ही जनसमुदाय है। विनययुक्त संस्कारसम्पन्न मनुष्यों का समुदाय जनसमुदाय नहीं है। वह तो ज्ञानमें सहायक है।
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इस भक्ति को उपलब्ध होने पर भगवान के अतिरिक्त अन्य कहीं मन नहीं लगता। भक्ति में व्यभिचार वह है जहाँ भगवान के अलावा अन्य किसी से भी प्यार हो जाता है। भगवान हमारा शत-प्रतिशत प्यार माँगते हैं। हम जरा से भी इधर-उधर हो जाएँ तो वे चले जाते हैं। इसे समझना थोड़ा कठिन है। हम हर विषय में, हर वस्तु में भगवान की ही भावना करें, और उसे भगवान की तरह ही प्यार करें। सारा जगत ब्रह्ममय हो जाए। ब्रह्म से पृथक कुछ भी न हो। यह अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति है।
भगवान स्वयं कहते हैं --
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात - बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
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इस स्थिति को हम ब्राह्मी स्थिति (कूटस्थ-चैतन्य) भी कह सकते हैं, जिसके बारे में भगवान कहते हैं --
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥२:७१॥"
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात - जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है॥
हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थिति में यदि अन्तकाल में भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है॥
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व्यावहारिक व स्वभाविक रूप से यह अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति तब उपलब्ध होती है जब भगवान की परम कृपा से हमारी घनीभूत प्राण-चेतना कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्त्रार में प्रवेश कर जाती है| तब लगता है कि अज्ञान क्षेत्र से निकल कर ज्ञान क्षेत्र में हम आ गए हैं। सहस्त्रार से भी परे अन्य उच्चतर लोकों की और उनसे भी परे परमशिव की अनुभूतियाँ होती हैं। फिर ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय -- एक ही हो जाते हैं। उस स्थिति में हम कह सकते हैं -- "शिवोहम् शिवोहम्" या "अहं ब्रह्मास्मि"। फिर कोई अन्य नहीं रह जाता और हम स्वयं ही अनन्य हो जाते हैं॥
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जहाँ तक मेरा विवेक कहता है, यही अव्यभिचारिणी भक्ति है।
भगवान की अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति -- मेरा आदर्श है। यह बड़ी कठिन उपलब्धि है, जो बड़े भाग्य से भगवान की परम कृपा से ही प्राप्त होती है। भगवान के अतिरिक्त अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगे, इसे अव्यभिचारिणी भक्ति कहते हैं। मैं भगवान के साथ एक हूँ, और मेरे से (या भगवान से) अन्य कोई भी नहीं है -- इसे अनन्य भाव कहते हैं। अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति ही मेरा आदर्श है।
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सादर दण्डवत् प्रणाम !! ॐ नमो नारायण !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर बावलिया
२ मई २०२४

सफलता-असफलता, खोया-पाया, और कर्म-अकर्म ---

 (जिसे स्वयं सुधरने की आवश्यकता है, वह दूसरों को क्या सुधार सकता है?)

सफलता-असफलता, खोया-पाया, और कर्म-अकर्म ---
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अब तक जितनी भी असफलता और सफलता मिली, जो खोया और जो पाया, -
वह सब श्रीकृष्ण-समर्पण॥ भूत, भविष्य और वर्तमान - सब श्रीकृष्ण-समर्पण॥ किसी ने मेरे साथ कुछ किया, या मैंने किसी के साथ कुछ किया, वह सब भी -- श्रीकृष्ण समर्पण॥ अब मैं न तो किसी बंधन में हूँ, और न कोई आकांक्षा है। किसी को मेरी बात अच्छी लगे तो पढ़े, अन्यथा Block कर दें। मैं ज्ञाननिष्ठ, स्थितप्रज्ञ, परब्रह्म परमात्मा के साथ एक हूँ।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।2.55।।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2.56।।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.57।।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.58।।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2.64।।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।2.65।।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।2.71।।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।2.72।।
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हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है॥
कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है? तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है॥
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है? आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है॥
क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।
आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रसाद) प्राप्त करता है।।
प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।।
(संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ?
सब प्रणियों के लिए जो रात्रि है? उसमें संयमी पुरुष जागता है और जहाँ सब प्राणी जागते हैं? वह (तत्त्व को) देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है॥
जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष॥
जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित? ममभाव रहित और निरहंकार हुआ विचरण करता है? वह शान्ति प्राप्त करता है॥
हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
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Lord Shri Krishna replied:
When a man has given up the desires of his heart and is satisfied with the Self alone, be sure that he has reached the highest state.
The sage, whose mind is unruffled in suffering, whose desire is not roused by enjoyment, who is without attachment, anger, or fear - take him to be one who stands at that lofty level.
He who wherever he goes is attached to no person and to no place by ties of flesh; who accepts good and evil alike, neither welcoming the one nor shrinking from the other - take him to be one who is merged in the Infinite.
He who can withdraw his senses from the attraction of their objects, as the tortoise draws his limbs within its shell - take it that such a one has attained Perfection.
When a man dwells on the objects of sense, he creates an attraction for them; attraction develops into desire, and desire breeds anger.
Anger induces delusion; delusion, loss of memory; through loss of memory, reason is shattered; and loss of reason leads to destruction.
But the self-controlled soul, who moves amongst sense objects, free from either attachment or repulsion, wins eternal Peace.
Having attained Peace, he becomes free from misery; for when the mind gains peace, right discrimination follows.
Correct discrimination is not for those who cannot concentrate. Without concentration, there cannot be meditation; he who cannot meditate must not expect peace; and without peace, how can anyone expect happiness?
The saint is awake when the world sleeps, and he ignores that for which the world lives.
He attains Peace, into whom desires flow as rivers into the ocean, which though brimming with water remains ever the same; not he whom desire carries away.
He attains Peace, gives up desire, moves through the world without aspiration, possesses nothing he can call his own, and is free from pride.
This is the Brahmic seat (eternal state), O son of Pritha. Attaining to this, none is deluded. Being established therein, even at the end of life, one attains oneness with Brahman.
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ॐ तत्सत् ॥
२ मई २०२४

मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि सम्पूर्ण विश्व में सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा हो, और भारत से असत्य का अंधकार सदा के लिए दूर हो।

मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि सम्पूर्ण विश्व में सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा हो, और भारत से असत्य का अंधकार सदा के लिए दूर हो।

नित्य प्रातः दो घंटे, और रात्रि को दो घंटे, जो श्रद्धालु हैं, वे भगवान का ध्यान करें। जिन्हें ध्यान का अभ्यास नहीं है, वे जपयोग करें। ध्यान अपने आप ही होने लगेगा। आप भगवान को सदा अपने साथ पायेंगे। जिनके पास समय है, वे सप्ताह में एक दिन, कम से कम आठ घंटे भगवान का ध्यान करें।

यह संसार भगवान का है, जिसे चलाने की जिम्मेदारी भगवान की है। हम तो निमित्त मात्र हैं। हमारे माध्यम से भगवान अपनी उपासना स्वयं कर रहे हैं। हमारी हर साँस भगवान के गहनतम ध्यान में ही व्यतीत हो। वास्तव में वे ही हमारे माध्यम से साँसें ले रहे हैं। कोई भी संशय हो तो उसका निराकरण भगवान से करें। उनसे नित्य बात करें, और जो भी पूछना हो वह प्रत्यक्ष उनसे ही पूछें।

भगवान के उन सभी रूपों की मैं वंदना करता हूँ, जिन्होंने आतताइयों के संहार के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं।
मैं सम्पूर्ण सृष्टि के साथ एक हूँ, मुझसे अन्य कुछ भी नहीं है। सम्पूर्ण सृष्टि के रूप में भगवान अपनी उपासना स्वयं कर रहे हैं।
धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।
रां रामाय नमः !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! कृपा शंकर २ मई २०२३

हम यह देह ही नहीं हैं, तब ये परिजन हमारे कैसे हुए? -----

 हम यह देह ही नहीं हैं, तब ये परिजन हमारे कैसे हुए? ---

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हम अपने परिजनों के असह्य कष्टों के साक्षी होने को बाध्य होते हैं, क्योंकि प्रकृति हमें यह बोध कराना चाहती है कि ---- "हम यह देह ही नहीं हैं, तब ये परिजन हमारे कैसे हुए?" सब के अपने अपने प्रारब्ध हैं, सबका अपना अपना भाग्य है। सभी अपने कर्मों का फल भोगने को जन्म लेते हैं। पूर्व जन्मों के शत्रु और मित्र, अगले जन्मों में या तो एक ही परिवार या समाज में जन्म लेते हैं या फिर पुनश्चः आपस में मिल कर पुराना हिसाब किताब चुकाते हैं। यह बात सभी पर लागू होती है।
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इस संसार में कष्ट सब को है। किसी का कष्ट कम है, किसी का अधिक। जो लोग आध्यात्म मार्ग के पथिक हैं उनको तो ये कष्ट अधिक ही होते हैं। लेकिन हम अपनी ओर से हर परिस्थिति में पूर्ण सत्यनिष्ठा से धर्म के मार्ग पर अडिग रहें। गीता में भगवान हमें वीतराग और स्थितप्रज्ञ होने का उपदेश देते हैं। स्थितप्रज्ञ होकर ही हम सुख-दुःख से परे हो सकते हैं ---
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२:५६॥"
"यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५७॥"
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२ मई २०२२

स्वयं परमात्मा ही हमारी रक्षा कर सकते हैं, पर उनके प्रति समर्पित तो हमें ही होना होगा .....

 स्वयं परमात्मा ही हमारी रक्षा कर सकते हैं, पर उनके प्रति समर्पित तो हमें ही होना होगा .....

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कभी कभी तो लगता है कि परमात्मा की माया उनकी एक मुस्कान मात्र है, पर यह प्रश्न भी उठता है कि हम इस संसार में इतने सारे कष्टों के साक्षी होने को बाध्य क्यों हैं? जिन भी आत्माओं से हमारा जुड़ाव होता है, उनके कष्ट हमें विचलित कर देते हैं|
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कभी लगता है कि जब हम यह देह ही नहीं हैं तो कौन हमारा परिजन है? सब के अपने अपने प्रारब्ध हैं, सबका अपना अपना भाग्य है| सभी अपने कर्मों का फल भोगने को जन्म लेते हैं| पूर्व जन्मों के शत्रु और मित्र अगले जन्मों में या तो एक ही परिवार या समाज में जन्म लेते हैं या फिर पुनश्चः आपस में एक दूसरे से मिलते हैं, और पुराना हिसाब किताब चुकाते हैं| यह बात सभी पर लागू होती है| किसी का कष्ट कम है, किसी का अधिक, कष्ट तो सब को है|
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आध्यात्म मार्ग के पथिकों को कष्ट कुछ अधिक ही होते हैं| "विक्षेप" व "आवरण" नाम की राक्षसियाँ, और "राग", "द्वेष" व "अहंकार" नाम के महा असुर, भयावह कष्ट देते हैं| इनसे बचने का प्रयास करते हैं तो ये अपने अनेक भाई-बंधुओं सहित आकर बार बार हमें चारों खाने चित गिरा ही देते हैं| ये कभी नहीं हटते, स्थायी रूप से यहीं रहते हैं| इनके साथ संघर्ष करते है तो ये हमें अपनी बिरादरी में ही मिला लेने का प्रयास करते हैं|
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स्वयं परमात्मा ही हमारी रक्षा कर सकते हैं| उनके प्रति हम शरणागत हैं| समर्पित होने के लिए और कर ही क्या सकते हैं?
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ मई २०१८