Saturday, 14 June 2025

भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं।

भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है -- अधर्म-सापेक्षता। भारत की अस्मिता "सनातन-धर्म" है। भारत कोई भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं, एक जीवंत सूक्ष्म सत्ता है। वास्तव में सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है, और सनातन धर्म का पतन ही भारत का पतन है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।
रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ ही भारत के प्राण हैं। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो आश्वासन दिया है, उसी पर आस्था और श्रद्धा-विश्वास के कारण हम जीवित हैं। अन्यथा अब तक जीवित रहने का अन्य कोई कारण नहीं है।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४:७॥"
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥"
"जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥४:९॥"
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
९ जून २०२५

भगवान को हम कैसे जानें ?

 भगवान "है". उस "है" में स्थित हो कर ही हम भगवान को जान सकते हैं....

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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ....
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः|
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः||१०:२||
अर्थात् मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ|
भगवान ही देवों, महर्षियों व हम सब के मूल कारण हैं| इसलिए हम भगवान के प्रभव को नहीं जानते|
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हम भगवान को कैसे जानें ? क्योंकि उनको जानने की शक्ति किसी में भी नहीं है|
गीता में भगवान कहते हैं .....
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः| तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता||१४:४||
अर्थात् हे अर्जुन, नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ|
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अतः हम भगवान को कैसे जानें ? इसका उत्तर रामचरितमानस में है ....
"सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥"
भावार्थ:-वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते है||
सार की बात :-- भगवान की कृपा से ही हम भगवान को जान सकते हैं, अन्यथा नहीं| और कोई मार्ग नहीं है| भगवान की कृपा भी उनके प्रति परम प्रेम से होती है|
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कल मैनें एक लेख में लिखा था .....
संसार में कोई भी चीज "है" के बिना नहीं मिलती| मिठाई है, फल है, खाना है, ठण्ड है, गर्मी है, सुख है, दुःख है, फलाँ फलाँ व्यक्ति है, ..... हर चीज में "है" है| वैसे ही भगवान भी "है", यहीं "है", इसी समय "है", सर्वदा "है", और सर्वत्र "है"| यही "ॐ तत्सत्" "है"| हमेशा याद रखो कि भगवान हर समय हमारे साथ "है"| मेरे पास इसका पक्का सबूत है .... वह मेरी आँखों से देख रहा है, मेरे पैरों से चल रहा है, मेरे हाथों से काम कर रहा है, मेरे हृदय में धड़क रहा है, और मेरे मन से सोच रहा है| मेरा अलग से कुछ होना एक भ्रम है| वास्तव में वह ही है| इस से बड़ा सबूत और दूसरा कोई नहीं हो सकता| हे प्रभु, आप ही आप रहो| यह मैं होने का भ्रम नष्ट हो जाए|
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अजपा-जप में हम अन्दर जाती सांस के साथ "सो" और बाहर आती सांस के साथ "हं" का मानसिक जप करते हैं| और भाव करते हैं कि यह अनंत समष्टि हम ही हैं| वह यही "है" की साधना है| साथ साथ भीतर बज रही प्रणव की ध्वनि यानि अनाहत नाद को भी सुनते रहें|
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आप सब को सादर सप्रेम नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जून २०१८

(प्रश्न) : साधक कौन है?

 (प्रश्न) : साधक कौन है?

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(उत्तर) : साधक, साध्य और साधना --- ये तीनों स्वयं परमात्मा हैं। एकमात्र कर्ता वे ही हैं। हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। स्वयं में कर्ताभाव एक राक्षसी भाव है, जिसका कभी उदय न हो।
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एक अवस्था आती है जब साधक-भाव नष्ट हो जाता है। सब कुछ तो परमात्मा स्वयं हैं। अपनी साधना वे स्वयं कर रहे हैं। बस वे एक पल के लिए भी अंतर्दृष्टि से ओझल नहीं होते। अब कौन तो साधक है और कौन साध्य? कुछ समझ में नहीं आता। कुछ चाहिए भी नहीं।
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आध्यात्म में परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। संसार में लौकिक रूप से धर्म-अधर्म, शत्रु-मित्र, देवता और असुर हैं। संसार में हमारा व्यवहार शास्त्रों और विवेक से निर्देशित हो। हर समय परमात्मा के हृदय में रहो। सब सही होगा।
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हे प्रभु आपकी जय हो। मुझ में किसी कामना का जन्म ही न हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जून २०२५

हे राम आप सदा मेरी स्मृति में हो। आप सदा मेरे साथ रहें। मैं आपकी शरण में हूँ ---

 हे राम आप सदा मेरी स्मृति में हो। आप सदा मेरे साथ रहें। मैं आपकी शरण में हूँ।

"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥" (वाल्मिकी रामायण)
भावार्थ -- "जो कोई एक बार भी मेरी शरण में आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कहकर रक्षा की याचना करता है, मैं उसे सभी प्राणियों से अभय कर देता हूं, यह मेरा व्रत है॥"
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"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥९:२६॥"
भावार्थ --"जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ॥
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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
भावार्थ -- "हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥"
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"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
भावार्थ -- मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
भावार्थ -- यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
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"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
भावार्थ : -- हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥
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"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
भावार्थ -- (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
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आज उपरोक्त उपदेश मेरे ही स्मृति में मेरे ही माध्यम से व्यक्त होना चाहते थे।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ जून २०२५

भारत के बारे में भगवान से हमारी प्रार्थना है कि -- .

 भारत के बारे में भगवान से हमारी प्रार्थना है कि --

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(१) भारत के सभी नागरिक सत्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, व उच्च चरित्रवान हों। दुष्ट प्रकृति के किसी आतताई का भारत में कोई अस्तित्व न हो।
(२) भारत माँ अपने द्विगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर विराजमान हो।
(३) भारत की जनसंख्या उतनी ही हो जितनी आवश्यक है। यहाँ का कोई भी नागरिक इस वसुंधरा पर भार न हो।
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हर हर महादेव !! उपरोक्त कार्य मनुष्यों के बल के नहीं हैं। सूक्ष्म जगत की दैवीय शक्तियों की सहायता लेनी ही पड़ेगी, जो लेंगे। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१४ जून २०२३

आप इसी जीवन में ईश्वर को प्राप्त करें ---

 

🌹 आप इसी जीवन में ईश्वर को प्राप्त करें, इसके अतिरिक्त मेरी रुचि अन्य किसी भी विषय में नहीं है। आप सब की आध्यात्मिक प्रगति हो, आपकी उपस्थिती, परमात्मा की उपस्थिती हो। आप जहाँ भी जायें, वह भूमि पवित्र हो जाये, जिस पर भी आपकी दृष्टि पड़े, वह धन्य हो जाये, जो भी आपके दर्शन करे वह निहाल हो जाये।
🌹 आप सांस लेते हो तो परमात्मा सांस लेता है। आपके माध्यम से परमात्मा ही यह जीवन जी रहे हैं। आप सबके साथ, यानि परमात्मा के साथ एक हैं, यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड आपका घर है, और यह सम्पूर्ण सृष्टि आपका परिवार।
🌹 वास्तविक प्रेम तो परमात्मा से ही होता है| परमात्मा का प्रेम प्राप्त हो जाए तो और पाने योग्य कुछ भी नहीं है| यह ऊँची से ऊँची और बड़ी से बड़ी उपलब्धि है| इससे बड़ा और कुछ भी नहीं है| प्रेम मिल गया तो सब कुछ मिल गया| प्रेम में सिर्फ देना ही देना होता है, लेना कुछ भी नहीं| लेने की भावना ही नष्ट हो जाती है| प्रेम उद्धार करता है क्योंकि प्रेम में कोई कामना या अपेक्षा नहीं होती| प्रेम में कोई भेद भी नहीं होता| भक्ति सूत्रों में परम प्रेम को ही भक्ति बताया गया है|
🌹 परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तु या प्राणी से राग आसक्ति है, प्रेम नहीं| आसक्ति में सिर्फ लेना ही लेना यानि निरंतर माँग और अपेक्षा ही रहती है| आसक्ति पतन करने वाली होती है| आसक्ति अपने सुख के लिए होती है, जब कि परमात्मा से प्रेम में कोई शर्त नहीं होती|
🌹 अंशुमाली मार्तंड भगवान भुवन-भास्कर अपना प्रकाश बिना शर्त हम सब को देते हैं, वैसे ही हम अपना सम्पूर्ण प्रेम पूरी समष्टि को दें। फिर पूरी समष्टि ही हमसे प्रेम करेगी। हमारा परमप्रेम ही परमात्मा की अभिव्यक्ति है।
ॐ स्वस्ति ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जून २०२१

हम इसी जीवन में ईश्वर को उपलब्ध हों, इसके अतिरिक्त मेरी रुचि अन्य किसी भी विषय में नहीं है ---

 हम इसी जीवन में ईश्वर को उपलब्ध हों, इसके अतिरिक्त मेरी रुचि अन्य किसी भी विषय में नहीं है ---

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अंशुमाली मार्तंड भगवान भुवन-भास्कर अपना प्रकाश बिना शर्त हम सब को देते हैं, वैसे ही हम अपना सम्पूर्ण प्रेम पूरी समष्टि को दें। फिर पूरी समष्टि भी हमसे प्रेम करेगी। हमारा परमप्रेम ही परमात्मा की अभिव्यक्ति है।
हम साँस लेते हैं, तो परमात्मा सांस लेता है। हमारे माध्यम से परमात्मा ही यह जीवन जी रहे हैं। हम सबके साथ, यानि परमात्मा के साथ एक हैं, यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड हमारा घर है, और यह सम्पूर्ण सृष्टि हमारा परिवार।
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परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तु या प्राणी से अनुराग आसक्ति है, प्रेम नहीं। आसक्ति में सिर्फ लेना ही लेना यानि निरंतर माँग और अपेक्षा ही रहती है। आसक्ति पतन करने वाली होती है। आसक्ति अपने सुख के लिए होती है, जब कि परमात्मा से प्रेम में कोई शर्त नहीं होती। परमात्मा से प्रेम में केवल समर्पण होता है।
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हम सब की आध्यात्मिक प्रगति हो, हमारी उपस्थिती, परमात्मा की उपस्थिती हो। हम जहाँ भी जायें, वह भूमि पवित्र हो जाये, जिस पर भी हमारी दृष्टि पड़े, वह धन्य हो जाये।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जून २०२५