Thursday, 7 November 2024
"स्थितप्रज्ञ होकर हम ब्राह्मीस्थिति को प्राप्त हों" --
हाइफा (इज़राइल) की भारतीय सेना द्वारा मुक्ति ---
इज़राइल की भूमि (फिलिस्तीन) प्रथम विश्व युद्ध तक सल्तनत-ए-उस्मानिया (तुर्की) के आधीन थी। इज़राइल को स्वतन्त्रता २६ वर्षीय कुँवर मेजर दलपत सिंह शेखावत के नेतृत्व में जोधपुर लांसर्स (जोधपुर की सेना) ने तुर्की की सेना को २३ सितंबर १९१८ को हराकर दिलाई थी। इज़राइल इसका अहसान मानता है। उस समय भारत पर अंग्रेजों का राज था, अतः इसका सारा श्रेय अंग्रेजों ने ले लिया।
Wednesday, 18 September 2024
भगवान के प्रति हम कैसे समर्पित हों? ---
भगवान के प्रति समर्पित होना एक उच्चतम स्थिति है, भागवत में जिसके उदाहरण जड़भरत हैं। उनकी स्थिति उच्चतम थी। समर्पण के लिए वीतराग होना आवश्यक है। एक वीतराग व्यक्ति ही भगवान के प्रति समर्पित हो सकता है। वीतरागता ही वैराग्य है। भगवान श्रीकृष्ण हमें 'स्थितप्रज्ञ मुनि' होने का आदेश देते हैं जिसके लिए भगवान को समर्पित तो होना ही पड़ता है। भगवान कहते हैं --
नर्क, स्वर्ग, सदगति, दुर्गति, मुक्ति, मोक्ष और पुनर्जन्म ---
नर्क, स्वर्ग, सदगति, दुर्गति, मुक्ति, मोक्ष और पुनर्जन्म --- ये सब हमारे अपने स्वयं के कर्मों पर निर्भर हैं| वास्तव में इन का कोई महत्व भी नहीं है| जीवन में एकमात्र महत्व --परमात्मा का है, जिन्हें हम अपना सर्वस्व अर्पित कर दें| परमात्मा से प्रेम और समर्पण से ही सदगति हो सकती है, न कि किसी कर्मकांड से| अपना स्वयं का किया हुआ सत्कर्म ही काम आता है| हमारा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) ही पिंड है, जिसे परमात्मा को अर्पण कर देना ही पिंडदान और सच्चा श्राद्ध है| अपना अन्तःकरण पूर्ण रूप से परमात्मा को सौंप दें| इस के लिए हमें सत्यनिष्ठा से परमात्मा की उपासना करनी पड़ेगी|
गणेश जी ओंकार रूप हैं ---
यह बात मैंने आज तक बहुत अधिक गोपनीय रखी थी और आज तक किसी को भी नहीं बतायी थी। भगवान गणेश जी की प्रेरणा से ही आज इसे लिख रहा हूँ। नित्य अपनी व्यक्तिगत साधना से पूर्व, मैं गणेश जी का साकार रूप में मूलाधारचक्र में जप और ध्यान करता हूँ। इससे मुझे एक अवर्णनीय अति दिव्य अनुभूति होती है, जिसे व्यक्त करने में मैं असमर्थ हूँ।
पितर, पितृलोक व अर्यमा ---
सूक्ष्म देह जब स्थूल देह को त्याग कर चली जाती है, तब वह अपना एक पृथक अस्तित्व बनाये रखती है, जिसे "पितर" कहते हैं। वास्तव में यह प्रेतात्मा ही होती हैं। ये प्रेतात्माएँ एक साथ जिस लोक विशेष में रहती हैं, उसे "पितृलोक" कहा जाता है।
नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत वीरा ---
जिस चेतना में आज ब्रह्ममुहूर्त में उपरोक्त शब्द ध्यान में आये, उस चेतना में किसी भी तरह के विचारों को व्यक्त करने हेतु शब्द रचना संभव ही नहीं है। फिर भी एक विशेष प्रयोजन हेतु भगवान के अनुग्रह से उपरोक्त पंक्ति ध्यान में आयी। यह भगवान का अनुग्रह ही था क्योंकि -- "दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥"