Sunday, 9 January 2022

अखंड आध्यात्मिक साधना कैसे हो? ---

अखंड आध्यात्मिक साधना कैसे हो? ---
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अखंड आध्यात्मिक साधना (Unbroken Spiritual Meditation) सरल से भी सरल, और संभव से भी अधिक संभव है| इसमें कुछ भी जटिलता नहीं है| एक ही शर्त है कि हृदय में भगवान के प्रति परमप्रेम (Integral and absolute love for the Divine) और सत्यनिष्ठा (sincerity) हो| बस, और कुछ भी नहीं चाहिए| जिन में परमप्रेम और सत्यनिष्ठा नहीं है, उन्हें यह लेख पढ़ने की आवश्यकता नहीं है|
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इसमें आरंभ रात्रि के ध्यान से करना होगा| रात्रि को सोने से पूर्व परमात्मा का गहनतम ध्यान कर के निश्चिंत होकर सोयें, वैसे ही जैसे एक बालक अपनी माँ की गोद में सोता है| सिर के नीचे तकिया नहीं, जगन्माता का वरद हस्त हो| दूसरे दिन का प्रारम्भ परमात्मा के गहनतम ध्यान से करें| पूरे दिन अपना कार्य यथावत् सामान्य ढंग से करें| बस यही भाव रखें कि जो भी काम आप कर रहे हैं, वह काम आप नहीं, बल्कि आपके माध्यम से भगवान स्वयं कर रहे हैं| भगवान को कर्ता बनाओ, स्वयं कर्ता मत बनो| बार बार यही भाव रखें कि आपके हरेक कार्य को भगवान ही करते हैं, आप तो निमित्त मात्र हैं| भगवान ही आपके पैरों से चल रहे हैं, आँखों से देख रहे हैं, हाथों से काम कर रहे हैं, हृदय में धडक रहे हैं| आपके हर काम को भगवान ही कर रहे हैं|
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इस का लाभ यह होगा कि मृत्यु के समय भगवान ही आपको याद करेंगे| आपको उन्हें याद करने की चिंता नहीं करनी होगी| रात्रि में जब आप शयन कर रहे होंगे तब जगन्माता स्वयं जाग कर आप की रक्षा कर रही होगी|
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भगवान श्रीकृष्ण स्वयं भी हमें निमित्त मात्र बनने का आदेश देते हैं ---
"जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||"
अर्थात् इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो| ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं| हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो||
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भगवान ने अर्जुन को "सव्यसाचि" इसलिए कहा क्योंकि अर्जुन को दोनों हाथों से बाण चलाने का अभ्यास था| कूटस्थ हृदय में बिराजमान मेरे गुरु महाराज मुझे इसी समय यह उपदेश दे रहे हैं कि जब हमारी साँसें दोनों नासिकाओं से चल रही हों, उस समय हम भी सव्यसाचि हैं| जिस समय सांसें दोनों नासिकाओं से चल रही हों, वह साधना की सिद्धी का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है| उस समय कूटस्थ सूर्य-मण्डल में परमपुरुष भगवान श्रीहरिः का ध्यान करते हुये, सुषुम्ना के सब चक्रों में प्रवाहित हो रहे प्राण-प्रवाह के प्रति भी सजग रहो| (आगे की बातें व्यक्तिगत और गोपनीय हैं).
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सब को मेरा हार्दिक नमन !! सब का कल्याण हो !! 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२१

इस संसार में हम एक देवता की तरह रहें, नश्वर मनुष्य की तरह नहीं ---

 इस संसार में हम एक देवता की तरह रहें, नश्वर मनुष्य की तरह नहीं ---

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हम जहाँ भी जाएँ, वहीं हमारे माध्यम से भगवान भी प्रत्यक्ष रूप से जायेंगे। हमारा अस्तित्व भगवान का अस्तित्व है, हमारा संकल्प भगवान का संकल्प है, और हमारे विचारों के पीछे भगवान की अनंत अथाह शक्ति है। भगवान का निरंतर स्मरण, उनके प्रति परमप्रेम और समर्पण -- यही हमारा स्वधर्म है, और यही सत्य-सनातन-धर्म है। सनातन धर्म कोई विचारधारा नहीं, एक महान परंपरा है, जो सृष्टि के आदि काल से है। जब भी जैसा भी समय मिले, एकांत में भगवान के सर्वाधिक कल्याणकारी, मंगलमय और प्रियतम रूप का खूब लम्बे समय तक गहनतम ध्यान करें। भगवान सर्वव्यापी और अनंत हैं, अतः हम उनकी सर्वव्यापी अनंतता पर ध्यान करें। हम यह नश्वर भौतिक देह नहीं हैं। हम भगवान की सर्वव्यापकता और अनंतता हैं। अपनी चेतना का विस्तार करें, और उसे भगवान की चेतना के साथ संयुक्त कर दें। भगवान स्वयं अनिर्वचनीय, नित्यनवीन, नित्यसजग, और शाश्वत आनंद हैं। आनंद का स्त्रोत प्रेम है। हम स्वयं परमप्रेममय बन जाएँ, व हमारी चेतना सर्वव्यापी और अनंत हो जाए। यह सबसे बड़ा योगदान है जो हम इस सृष्टि के रूपांतरण के लिए कर सकते हैं।
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समष्टि के कल्याण की प्रार्थना, स्वयं के कल्याण की ही प्रार्थना है। सम्पूर्ण समष्टि ही हमारी देह है, यह नश्वर भौतिक देह नहीं। इस भौतिक देह के अनाहत-चक्र और आज्ञा-चक्र के मध्य में विशुद्धि-चक्र के सामने का स्थान एक अति सूक्ष्म चुम्बकीय क्षेत्र है। अपने दोनों हाथ जोड़कर, भ्रूमध्य को दृष्टिपथ में रखते हुए, उस चुम्बकीय क्षेत्र में अपनी हथेलियों का तीव्र घर्षण करने से हमारी अँगुलियों में एक दैवीय ऊर्जा उत्पन्न होती है। उस दैवीय ऊर्जा को अपनी अँगुलियों में एकत्र कर, अपने दोनों हाथ ऊपर की ओर उठाकर, ॐ का उच्चारण करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्मांड में विस्तृत करते हुए छोड़ दें। वह ऊर्जा समष्टि का निश्चित रूप से कल्याण करती है। समष्टि का कल्याण ही हमारा कल्याण है, क्योंकि यह समष्टि ही हमारी वास्तविक देह है।
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अपने विचारों को पवित्र और शुद्ध रखें। हमारे सारे संकल्प शिव-संकल्प हों। किसी के अनिष्ट की कामना न करें। किसी के अनिष्ट की कामना से हमारा स्वयं का ही अनिष्ट होता है। अपनी चेतना को निरंतर आज्ञा-चक्र से ऊपर रखें, और सहस्त्रार के मध्य में रखने की साधना करें। रात्री को सोने से पूर्व भगवान का गहनतम ध्यान कर के सोयें, और दिन का प्रारम्भ भी भगवान के ध्यान से करें। सारे दिन भगवान की स्मृति बनाए रखें। कोई हमारे बारे में क्या कहता है और क्या सोचता है इसकी चिंता न करें, क्योंकि महत्त्व इसी बात का है कि भगवान की दृष्टि में हम क्या हैं। जो उन्नत साधक हैं वे इस भौतिक देह और सूक्ष्म जगत की अनंतता से भी परे दहराकाश में परमशिव का ध्यान करें। यह एक अनुभूति है जो गुरु की परम कृपा से ही होती है, किसी को समझाई नहीं जा सकती। इस संसार में हम एक देवता हैं, नश्वर मनुष्य नहीं। हम जहाँ भी हैं, भगवान भी वहीं हैं। हमारा अस्तित्व भगवान का अस्तित्व है। हम भगवान के साथ एक हैं। हमारे साथ भगवान की अनंत अथाह शक्ति है।
"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥" ॐ शांति शांति शांति॥
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत !
कृपा शंकर
९ जनवरी २०२२
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यह पृथ्वी हमें पाकर सनाथ है. जहाँ भी हम हैं, वहीं भगवान हैं. देवता हमें देखकर तृप्त व आनंदित होते हैं. हम भगवान के साथ एक हैं. जहाँ देखो वहीं हमारे ठाकुर जी बिराजमान हैं. कोई अन्य है ही नहीं, मैं भी नहीं. जय हो!
🌹🙏🕉🕉🕉🌹🙏

विषयों के भोग में कोई पाप नहीं है, चिंतन और कामना में ही पाप है ---

विषयों के भोग में कोई पाप नहीं है, चिंतन और कामना में ही पाप है ---
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मैं जो लिख रहा हूँ, वह मेरा अनुभूतिजन्य सत्य है, कोई थोथी कल्पना या बुद्धि-विलास नहीं। मैं कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं कर रहा, बल्कि जीवन में जो भी अनुभूत किया है, वही अपनी अति-अति अल्प और अति-अति सीमित क्षमतानुसार लिखने का स्वभाविक प्रयास कर रहा हूँ। कई बार मुझे अपने पूर्व जन्म की स्मृतियाँ भी आ जाती हैं। पूर्व जन्मों के शत्रु और मित्र भी कई बार इस जन्म में मिले हैं, जिन्होंने मेरा खूब अहित और हित किया है। विगत के सारे संस्कारों से मुक्त होकर अब वर्तमान में जीना चाहता हूँ। सारे बंधनों से मुक्त हो कर जीवन के एकमात्र परम सत्य परमात्मा को जीवन में व्यक्त करने की अभीप्सा (एक अतृप्त प्यास और तड़प) है, जो तृप्त हो। जिसे हम अभीप्सा कहते हैं, वह एक स्वभाविक अतृप्त प्यास और तड़प है, कोई कामना नहीं।
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पुनर्जन्म एक सत्य है। इस शरीर की मृत्यु के समय जैसी भावना होती है वैसा ही अगला जन्म होता है। कर्मफलों का मिलना भी एक सत्य है, जिसे कोई नकार नहीं सकता। कर्मफलों को भोगने के लिए ही पुनर्जन्म होता है। कर्मफलों से मुक्त होने की एक विधि है, जो इतनी आसान नहीं है। उसमें समय लगता है। वह किसी कर्मकांड से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उपासना से सम्पन्न होती है।
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यह सबको पता होना चाहिए कि "कर्म" क्या हैं। हमारे विचार और भाव ही हमारे कर्म हैं, जो हमारे खाते में जुड़ते रहते हैं। जो कुछ भी हम सोचते हैं, वे ही हमारे कर्म हैं। यह सृष्टि द्वैत से बनी है| सृष्टि के अस्तित्व के लिए विपरीत गुणों का होना अति आवश्यक है। प्रकाश का अस्तित्व अन्धकार से है और अन्धकार का प्रकाश से। मनुष्य जैसा और जो कुछ भी सोचता है वह ही "कर्म" बनकर उसके खाते में जमा हो जाता है। यह सृष्टि हमारे विचारों से बनी है। हमारे विचार ही घनीभूत होकर हमारे चारों ओर व्यक्त हो रहे हैं। ये ही हमारे कर्मों के फल हैं।
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परमात्मा की सृष्टि में कुछ भी बुरा या अच्छा नहीं है। कामना ही बुरी है| भगवान श्रीकृष्ण के निम्न वचनों का स्वाध्याय कीजिये। --
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२:६२॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।२:६३॥"
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२:६४॥"
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।२:६५॥"
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।२:६६॥"
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।२:६७॥"
अर्थात् - विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है। वशीभूत अन्तःकरण वाला कर्मयोगी साधक रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है। ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधक की बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मा में स्थिर हो जाती है। जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्य की व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणता की भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? अपने-अपने विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से एक ही इन्द्रिय जिस मन को अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जल में नौका को वायु की तरह इसकी बुद्धि को हर लेता है।
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विषय मिलने पर विषय का प्रयोग आसक्ति को पैदा नहीं करेगा। परन्तु जब हम विषय को मन में सोचते हैं तो उसके प्रति कामना जागृत होगी। यह कामना ही हमारा "बुरा कर्म" है, और निष्काम रहना ही "अच्छा कर्म" है। हम बुराई बाहर देखते हैं, अपने भीतर नहीं। हम विषयों को दोष देते है| पर दोष विषयों में नहीं बल्कि उनके चिंतन में है।
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कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। उनसे ऊपर उठने का एक ही उपाय है, और वह है -- "निरंतर हरिः स्मरण।" सांसारिक कार्य भी करते रहो पर प्रभु को समर्पित होकर। इससे क्या होगा? भगवान कहते हैं --
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।१८:५८॥"
अर्थात् - मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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हम अपनी इस सृष्टि का रूपांतरण भी कर सकते हैं। चारों ओर की सृष्टि जो हमें जैसी भी दिखाई दे रही है वह हम सब के विचारों का ही घनीभूत रूप है। हम सब परमात्मा के अंश हैं, अतः हम जैसी भी कल्पना करते हैं, जैसी भी कामना करते हैं, व जैसे भी विचार रखते हैं, वे ही धीरे धीरे घनीभूत होते हैं, और वैसी ही सृष्टि का निर्माण होने लगता है। किसी के विचार अधिक शक्तिशाली होते हैं, किसी के कम। जिस के विचार अधिक शक्तिशाली होते हैं, वे इस सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अपना अधिक योगदान देते हैं। हम अपने चारों ओर के घटनाक्रमों, वातावरण और परिस्थितियों से प्रसन्न नहीं हैं और उनका रूपांतरण करना चाहते हैं तो निश्चित रूप से अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का प्रयास करें। आध्यात्मिक रूप से यह सृष्टि प्रकाश और अन्धकार का खेल है, वैसे ही जैसे सिनेमा के पर्दे पर जो दृश्य दिखाई देते हैं वे प्रकाश और अन्धकार के खेल हैं। अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान हम उस प्रकाश में वृद्धि द्वारा ही कर सकते हैं।
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इस विषय पर और अधिक लिखना मेरी सीमित और अल्प क्षमता से परे है। स्वयं को व्यक्त करने का यह मेरा स्वभाव है। सभी का मंगल हो।
ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
९ जनवरी २०२२

भगवान का सामान ---

मुझ में लाखों कमियाँ, दोष और बुराइयाँ हैं| पापों की एक बहुत मोटी गठरी भी मेरे सिर पर लदी हुई है| लेकिन मुझे इन से कोई शिकायत नहीं हैं, मैं प्रसन्न हूँ, क्योंकि यह भगवान का दिया हुआ सामान है; उनकी अमानत है, जो मुझे उन को बापस भी लौटानी है| मेरे पास और कुछ है भी नहीं, यही सामान मेरे पास है| ये ही मेरे पत्र-पुष्प हैं, खाली हाथ नहीं हूँ|

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अभी इस समय तो भगवान मेरे ही हृदय में छिपे हुए हैं, उनके बाहर आते ही उनका सामान उनको लौटा दूँगा; साथ-साथ स्वयं को भी उन्हीं के हवाले कर दूँगा, क्योंकि उनके सिवाय मेरा भी कोई ठिकाना नहीं है|
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जय हो, प्रभु श्रीहरिः! कब तक छिपोगे? एक न एक दिन तो सामने आना ही पड़ेगा| आपकी जय हो, साथ-साथ आपके सभी प्रेमियों की भी जय हो|
🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
९ जनवरी २०२१

Friday, 7 January 2022

यह सृष्टि नटराज का एक नृत्य मात्र है ---

 यह सृष्टि नटराज का एक नृत्य मात्र है ---

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गहराई से चिंतन किया जाए तो यह सृष्टि नटराज का एक नृत्य मात्र ही है जिसमें निरंतर ऊर्जा खण्डों और अणुओं का विखंडन और सृजन हो रहा है। जो बिंदु है वह प्रवाह बन जाता है, और प्रवाह बिंदु बन जाता है। ऊर्जा कणों की बौछार और निरंतर प्रवाह समस्त भौतिक सृष्टि का निर्माण कर रहे हैं। इन सब के पीछे एक परम चैतन्य है, और उसके भी पीछे एक विचार है। समस्त सृष्टि परमात्मा के मन का एक स्वप्न या विचार मात्र है। वह परम चेतना परमशिव हैं और नित्य नवीन सृष्टि का विखंडन और सृजन नटराज का नृत्य है।
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हमारे विचार ही घनीभूत होकर सृष्ट हो रहे हैं, क्योंकि हम परमात्मा के अंश हैं। हम सब के विचार ही इस सृष्टि का निर्माण कर रहे हैं। जैसे हमारे विचार होंगे वैसी ही यह सृष्टि होगी। यह सृष्टि जितनी विराट है, उतनी ही सूक्ष्म है। हर अणु अपने आप में एक ब्रह्मांड है। हम कुछ भी संकल्प या विचार करते हैं, उसका प्रभाव सृष्टि पर पड़े बिना नहीं रह सकता। इसलिए हमारा हर संकल्प शिव संकल्प हो, और हर विचार शुभ विचार हो।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जनवरी २०२२

धन्य हैं वे सब, जिनका भार स्वयं भगवान उठा लेते हैं ---

धन्य हैं वे सब, जिनका भार स्वयं भगवान उठा लेते हैं ---
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यह सर्दियों का मौसम भगवान की उपासना केलिए सर्वश्रेष्ठ है। प्रकृति भी शांत है, न तो पंखा चलाना पड़ता है, ओर न कूलर; अतः उनकी आवाज़ नहीं होती। कोई व्यवधान नहीं है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठते ही प्रकृति में जो सन्नाटे की आवाज सुनाई देती है, उसी को आधार बनाकर भगवान के नाम को मानसिक रूप से जपते रहो। जैसे एक अबोध बालक अपनी माँ की गोद में बैठकर स्वयं को सुरक्षित अनुभूत करता है, वैसे ही अपने भाव-जगत में, परमात्मा की गोद में बैठकर एक निमित्त मात्र बन कर उपासना करो। सारा श्रेय और सारा फल भगवान को अर्पित कर दो।
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हमें कुछ नहीं करना है। जो करना है, वह भगवान ही करेंगे। रात्री को भगवान की गोद में ही सोएँ, और प्रातःकाल उन्हीं की गोद से उठें। सारे दिन यही भाव रखें कि सारा कार्य हमारे माध्यम से भगवान स्वयं कर रहे हैं। इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, कानों से वे ही सुन रहे हैं, इन हाथों से वे ही कार्य कर रहे हैं, और इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इस हृदय में वे ही धड़क रहे हैं, और इन नासिकाओं से वे ही सांसें ले रहे हैं। भगवान अपनी सारी सृष्टि का संचालन कर रहे हैं, वे जब हमारा भार उठा लेंगे तो हमें और क्या चाहिए?
आप सब में भगवान को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जनवरी २०२२
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यह सर्दियों का मौसम भगवान की उपासना केलिए सर्वश्रेष्ठ है। प्रकृति भी शांत है, न तो पंखा चलाना पड़ता है, ओर न कूलर; अतः उनकी आवाज़ नहीं होती। कोई व्यवधान नहीं है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठते ही प्रकृति में जो सन्नाटे की आवाज सुनाई देती है, उसी को आधार बनाकर भगवान के नाम को मानसिक रूप से जपते रहो। जैसे एक अबोध बालक अपनी माँ की गोद में बैठकर स्वयं को सुरक्षित अनुभूत करता है, वैसे ही अपने भाव-जगत में, परमात्मा की गोद में बैठकर एक निमित्त मात्र बन कर उपासना करो। सारा श्रेय और सारा फल भगवान को अर्पित कर दो।
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हमें कुछ नहीं करना है। जो करना है, वह भगवान ही करेंगे। रात्री को भगवान की गोद में ही सोएँ, और प्रातःकाल उन्हीं की गोद से उठें। सारे दिन यही भाव रखें कि सारा कार्य हमारे माध्यम से भगवान स्वयं कर रहे हैं। इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, कानों से वे ही सुन रहे हैं, इन हाथों से वे ही कार्य कर रहे हैं, और इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इस हृदय में वे ही धड़क रहे हैं, और इन नासिकाओं से वे ही सांसें ले रहे हैं। भगवान अपनी सारी सृष्टि का संचालन कर रहे हैं, वे जब हमारा भार उठा लेंगे तो हमें और क्या चाहिए?
आप सब में भगवान को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जनवरी २०२२

साधना में अनुकूलता, भगवान का अनुग्रह है ---

साधना में अनुकूलता, भगवान का अनुग्रह है (अजपा-जप) ---
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अपने चारों ओर के वातावरण को अनुकूल बनाने का प्रयास तो स्वयं को ही करना पड़ेगा, फिर भगवान की कृपा ही अनुकूलता के रूप में आती है| श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम कहते हैं --
"नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो| सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो||
करनधार सदगुर दृढ़ नावा| दुर्लभ साज सुलभ करि पावा||"
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ|
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ||"
अर्थात् "यह मनुष्य का शरीर भवसागर से तरने के लिए बेड़ा (जहाज) है| मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है| सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेने वाले) हैं| इस प्रकार दुर्लभ (कठिनता से मिलने वाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपा से सहज ही) उसे प्राप्त हो गए हैं| जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागर से न तरे, वह कृतघ्न और मंद बुद्धि है और आत्महत्या करने वाले की गति को प्राप्त होता है||"
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सन्मुख का अर्थ होता है--सामने| सामने कौन सी वायू बह रही है? जो साँस दोनों नासिकाओं से बह रही है, वह ही सन्मुख मरुत है, और वह ही भगवान की कृपा है| ध्यान किस का करते हैं? गुरु महाराज का| ध्यान कौन करते हैं? गुरु महाराज| गुरु महाराज स्वयं ही अपना स्वयं का ध्यान कर रहे हैं| गुरु कौन हैं? गुरु तत्व हैं| वे ध्यान किस का कर रहे हैं? अपने गुरुत्व यानि अपनी विराटता का| हम कौन है? एक साक्षी निमित्त मात्र| हम माध्यम बनकर, कर्ताभाव से मुक्त होकर, गुरु महाराज को कर्ता बनाकर उन्हें अपने गुरुत्व का ध्यान करते हुए देखने के साक्षी बनें, और उन के साथ एक हों| यहाँ अपना अहंकार उन्हें समर्पित कर दिया जाता है| उनके प्रति समर्पित होकर उन के साथ एक बनें| भगवान की जो विराटता है, जो उन का अनंत विस्तार है, वही हम हैं| एक तरह से यह अपना स्वयं का ही ध्यान है|
"सोSहं"|| भीतर जाती हुई साँस के साथ मानसिक रूप से सोSSSSSSSS, और बाहर आती हुई साँस के साथ हंSSSSSS का मानसिक जप करें| "ह" संहार बीज है, और "सः" सृष्टि बीज| यह साधना हंसःयोग यानि हंसयोग है| वेदों में इसे "हंसवतीऋक" कहा गया है| है के साथ जो बिन्दु है, वह समस्त सृष्टि में व्याप्त राम का नाम यानि ओंकार है {तस्य वाचक: प्रणव: (योगदर्शन, १.२७)}
सोSहं का उल्टा यदि करें, यानि हंसः, तो यह हंस-गायत्री कहलाता है| महत्व दोनों का एक ही है| समस्त सृष्टि में व्याप्त राम के नाम या ॐ की ध्वनि को साथ-साथ सुनते रहें, और यह साधना करते रहें| इस साधना को "अजपा-जप" कहते हैं| साधनाकाल में कमर सदा सीधी रहे, और दृष्टि भ्रूमध्य में रहे| यह साधना भगवान को समर्पित होकर करें, अन्यथा दोष लगता है|
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मैं जब यह साधना करता हूँ, तो पाता हूँ कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही मेरे स्थान पर अपना स्वयं का ध्यान कर रहे हैं| मैं कोई ध्यान नहीं करता, ध्यान तो भगवान श्रीकृष्ण ही अपना स्वयं का करते हैं| मैं तो केवल निमित्त मात्र हूँ| यह बहुत ही दुर्लभ साधन है जो निश्चित रूप से हमें परमात्मा की प्राप्ति कराता है|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च| वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्||१५:१५||"
अर्थात् मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ| मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है| समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ||"
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एक गहन अभीप्सा हो, प्रचंड इच्छा शक्ति हो, और ह्रदय में परम प्रेम हो, तो भगवान को पाने से कोई भी विक्षेप या आवरण की मायावी शक्ति नहीं रोक सकती| जो सबके हृदय में हैं, उनकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं हो सकती पर अन्य कोई इच्छा नहीं रहनी चाहिये| हमारा समर्पण सिर्फ भगवान के प्रति है, किसी अन्य के प्रति नहीं| सब का मंगल हो| सब को नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! 🌹🙏🕉 🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
झूञ्झुणू (राजस्थान)
८ जनवरी २०२१
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पुनश्च: --- श्रीरामचरितमानस के अनुसार (उत्तरकाण्ड में चौपाई क्रमांक ७.११८ से) ---
'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत्‌ कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है||
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।।
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।।
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।।
छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।।
कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।।
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।।
जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।।
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।।
बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।"