Sunday, 13 June 2021

सत्य सनातन धर्म और भारतवर्ष की सदा विजय हो ---

 सत्य सनातन धर्म और भारतवर्ष की सदा विजय हो ---

परमात्मा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत भूमि में हुई है, इसलिए सत्य सनातन हिन्दू धर्म -- भारत की अस्मिता है। परमात्मा को स्वयं में व्यक्त करने की अभीप्सा, और तदानुरूप सदाचरण -- सनातन हिन्दू धर्म है.
.
जो भी व्यक्ति -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल और पुनर्जन्म को मानता हो, व भगवान से अहैतुकी पूर्ण प्रेम करता हो, वह हिन्दू है; चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, या कहीं भी किसी भी परिवार में उसने जन्म लिया हो. हिन्दू कभी पतित नहीं हो सकता.
🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹

प्रश्न (१): भारत की एकमात्र समस्या और समाधान क्या है? प्रश्न (२): हमें भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती? .

 प्रश्न (१): भारत की एकमात्र समस्या और समाधान क्या है? प्रश्न (२): हमें भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती?

.
उत्तर (१): मेरी दृष्टि में भारत की एकमात्र और वास्तविक समस्या -- "राष्ट्रीय चरित्र" का अभाव है। अन्य सारी समस्याएँ सतही हैं, उनमें गहराई नहीं है। "राष्ट्रीय चरित्र" तभी आयेगा जब हमारे में सत्य के प्रति निष्ठा और समर्पण होगा। तभी हम चरित्रवान होंगे। इस के लिये दोष किसको दें? -- इसके लिए "धर्म-निरपेक्षता" की आड़ में बनाई हुई हमारी गलत शिक्षा-पद्धति और संस्कारहीन परिवारों से मिले गलत संस्कार ही उत्तरदायी हैं। देश की असली संपत्ति और गौरव उसके चरित्रवान सत्यनिष्ठ नागरिक हैं, जिनका निर्माण नहीं हो पा रहा है। कठोर प्रयासपूर्वक हमें भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था पुनर्स्थापित करनी होगी। यही एकमात्र उपाय है। मेरी दृष्टि में अन्य कोई उपाय नहीं है।
.
उत्तर (२). हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती, और आध्यात्मिक मार्ग पर हम सफल नहीं होते। इसका एकमात्र कारण --- "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है। अन्य कोई कारण नहीं है। बाकी सब झूठे बहाने हैं। हम झूठ बोल कर स्वयं को ही धोखा देते हैं। परमात्मा "सत्य" यानि सत्यनारायण हैं। असत्य बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और दग्ध वाणी से किये हुए मंत्रजाप व प्रार्थनाएँ निष्फल होती हैं। वास्तव में हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं। चाहते तो "मन्त्र वा साधयामि शरीरं वा पातयामि" यानि या तो मुझे भगवान ही मिलेंगे या प्राण ही जाएँगे; इस भाव से साधना करके अब तक भगवान को पा लिया होता। हमने कभी सत्यनिष्ठा से प्रयास ही नहीं किया। ज्ञान और अनन्य भक्ति की बातें वे ही समझ सकते हैं, जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है, उन्हें कर्मयोग ही समझ में आ सकता है, उस से अधिक कुछ नहीं। जिनमें तमोगुण प्रधान है, वे सकाम भक्ति से अधिक और कुछ नहीं समझ सकते। उनके लिये भगवान एक साधन, और संसार साध्य है। इन तीनों गुणों से परे तो दो लाख में कोई एक महान आत्मा होती है। हमें सदा निरंतर इस तरह के प्रयास करते रहने चाहियें कि हम तमोगुण से ऊपर उठ कर रजोगुण को प्राप्त हों, और रजोगुण से भी ऊपर उठकर सतोगुण को प्राप्त हों। दीर्घ साधना के पश्चात हम गुणातीत होने में भी सफल होंगे।
.
अब और कुछ लिखने को रहा ही नहीं है। आप सब बुद्धिमान हैं। मेरे जैसे अनाड़ी की बातों को पढ़ा, इसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ।
आप सब को सादर नमन !! ॐ तत्सत् !! 🔥🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹🔥
कृपा शंकर
१४ जून २०२१

आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी विफलताओं का एकमात्र कारण .... "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है|

 आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी विफलताओं का एकमात्र कारण .... "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है|

=
अन्य कोई कारण नहीं है| बाकी सब झूठे बहाने हैं| हम झूठ बोल कर स्वयं को ही धोखा देते हैं| परमात्मा "सत्य" यानि सत्यनारायण हैं| असत्य बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और दग्ध वाणी से किये हुए मंत्रजाप व प्रार्थनाएँ निष्फल होती हैं|
=
वास्तव में हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं| चाहते तो "मन्त्र वा साधयामि शरीरं वा पातयामि" यानि या तो मुझे भगवान ही मिलेंगे या प्राण ही जाएँगे, इस भाव से साधना करके अब तक भगवान को पा लिया होता| हमने कभी सत्यनिष्ठा से प्रयास ही नहीं किया|
=
सत्यनिष्ठा को ही भगवान श्रीकृष्ण ने "अव्यभिचारिणी भक्ति" कहा है| उन्होने "अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति", "एकांतवास" और "कुसङ्गत्याग" पर ज़ोर दिया है....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अर्थात अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि ||
=
अब और कुछ लिखने को रहा ही नहीं है| आप सब बुद्धिमान हैं| मेरे जैसे अनाड़ी की बातों को पढ़ा इसके लिए आभारी हूँ| आप सब को सादर नमन| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
१४ जून २०२०

जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै ---

 जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै ---

.
सूरदास जी के एक भजन की पंक्ति है -- "मेरो मन अनत कहां सुख पावै, जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै।"
कई बार महासागरों में चलने वाले बड़े-बड़े जलयानों पर कोई पक्षी आकर बैठ जाता है। जहाज के चलने के कुछ देर पश्चात वह बापस भूमि पर जाने के लिए उड़ान भरता है, लेकिन जाये तो जाये कहाँ? चारो ओर विराट जलराशि ही जलराशि को देखकर वह बापस जलयान पर ही आ जाता है।
वैसे ही हमारा मन है जो एक बार भगवान को समर्पित हो गया तो अन्यत्र कहीं भी सुख नहीं पाता। माया के आवरण और विक्षेप उसे बहुत अधिक मिथ्या प्रलोभन देकर भटकाते हैं, लेकिन कहीं भी उसे संतुष्टि नहीं मिलती, और भगवान श्रीहरिः के चरण कमलों में लौटने के लिए वह तड़प उठता है। उसे बापस आना ही पड़ता है।
.
यह मेरी ही नहीं उन सभी की कहानी है जो आध्यात्म मार्ग के पथिक हैं। वेदान्त-वासना जब एक बार जब हृदय में जागृत हो जाये तो वह अन्य किसी भी लौकिक वासना को अपने आसपास भी नहीं टिकने देती। अतः प्रातः उठते ही पूर्ण भक्ति पूर्वक ध्यान के आसन पर बैठकर गुरु-चरणों का ध्यान करो --
"रात गई, भोर है भई
जागो मेरे बच्चो जागो
बैठ ध्यान के आसन पर
ध्याओ गुरु चरण कमल तुम॥" (गुरु महाराज द्वारा रचित भजन का हिन्दी अनुवाद)
.
सहस्त्रार में दिखाई दे रही ज्योति ही गुरु महाराज के चरण-कमल है। कमर सीधी कर के पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाओ। दो तीन बार प्राणायाम कर के शरीर को शिथिल छोड़ दो, और कूटस्थ में गुरु-चरणों का ध्यान करते हुये गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र का खूब श्रवण, और हंसःयोग (अजपा-जप) का कुछ मिनटों तक अभ्यास करो। फिर नित्य की दैनिक दिनचर्या से निवृत होकर पुनश्च: उपासना करो। अपने बीजमंत्र को कभी न भूलो और निरंतर उसका मानसिक जप करते रहो। यह बीजमंत्र ही हमारा कवच है, जो हर प्रतिकूल परिस्थिति में हमारी रक्षा करेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२१
.
सूरदास जी का भजन :---
--------------------
"मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥
कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै।
परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥
जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै।
सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥"

धर्म-अधर्म, कर्म, भक्ति, और ज्ञान ---

 धर्म-अधर्म, कर्म, भक्ति, और ज्ञान .....

जिससे हमारा सर्वतोमुखी सम्पूर्ण विकास हो, और सब तरह के दुःखों से मुक्ति मिले, वही धर्म है| जो इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता वह धर्म नहीं, अधर्म है| धर्म ही "अभ्यूदय और निःश्रेयस की सिद्धि" है|
.
मेरा सौभाग्य है कि मेरा जन्म भारत में हुआ| जो कुछ भी मैं लिख पा रहा हूँ वह तभी संभव हुआ है क्योंकि मैं भारत में जन्मा हूँ| भारत पर भगवान की बड़ी कृपा है| इस भूमि पर अनेक महान आत्माओं ने समय समय पर जन्म लिया है और श्रुतियों, स्मृतियों, व आगम शास्त्रों के माध्यम से धर्म के तत्व को समझाया है| भारत से बाहर या अन्य किसी संस्कृति में यह नहीं हो सकता था|
.
रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने रामकथा के माध्यम से जन सामान्य को धर्म की शिक्षा दे दी| रामकथा को ही पढ़ते या सुनते रहने से भक्ति जागृत हो जाती है और एक सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी समझ जाता है कि धर्म और अधर्म क्या है| उनका समय अति विकट था, भारत में सनातन धर्म पर अधर्मियों द्वारा बड़े भयावह भीषण आक्रमण, अत्याचार व जन-संहार हो रहे थे, और जन-सामान्य की आस्था डिग रही थी| उस अति विकट समय में धर्म-रक्षा हेतु इस महान ग्रंथ की रचना कर के उन्होने हम सब पर बड़े से बड़ा उपकार किया और धर्म की रक्षा की| इस ग्रंथ ने देश में उस समय एक प्रचंड ऊर्जा, साहस और प्राणों का संचार किया था|
.
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सिर्फ तीन विषयों .... कर्म, भक्ति और ज्ञान, की चर्चा की है, कोई अन्य विषय नहीं छेड़ा है| इन तीन विषयों की चर्चा में ही धर्म के सारे तत्व को लपेट लिया है, कुछ भी बाहर नहीं छोड़ा है| लेकिन साथ साथ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की बात भी कह दी है कि जिस व्यक्ति में जैसा गुण प्रधान है उसे वैसा ही समझ में आयेगा| अंततः वे शरणागति व समर्पण द्वारा तीनों गुणों व धर्म-अधर्म से भी परे जाने का उपदेश देते हैं| यही गीता का सार है|
.
अब अंत में थोड़ी सी अति अति लघु चर्चा तंत्र और योग पर करूँगा क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक ही है, और वह है ..... "आत्मानुसंधान"| यथार्थ में आत्मानुसंधान यानि आत्मज्ञान ही सनातन धर्म है|
.
तंत्र मूल रूप से शिव और शक्ति के मध्य के पारस्परिक संवाद हैं| जैसे श्रीराधा और श्रीकृष्ण में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं, वैसे ही शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं| शक्ति, शिव से ही प्रकट होती है और शिव से प्रश्न करती है| शिव, शक्ति को उत्तर देते हैं और शक्ति जब शिव के उत्तरों से संतुष्ट हो जाती है तब प्रसन्न होकर बापस शिव में ही विलीन हो जाती है|
.
वैसे तत्व रूप में शिव और विष्णु में भी कोई भेद नहीं है| दोनों एक ही हैं| जो भेद दिखाई देता है वह हमारी अज्ञानता के कारण है|
.
जैसा मुझे समझ में आया है उसके अनुसार तंत्र शास्त्रों का सार है कि मनुष्य की सूक्ष्म देह में अज्ञान की तीन ग्रंथियाँ हैं ... ब्रह्मग्रंथि (मूलाधारचक्र में), विष्णुग्रंथि (अनाहतचक्र में) और रुद्रग्रन्थि (आज्ञाचक्र में)| जब तक इन ग्रंथियों का भेदन नहीं होता तब तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती| इन ग्रंथियों के भेदन और अपने परम लक्ष्य आत्मज्ञान को प्राप्त करने की विधि ही योगशास्त्र है| इस से अधिक लिखने की क्षमता मुझमें इस समय नहीं है|
.
अब किसी भी तरह के कोई उपदेश अच्छे नहीं लगते, उनमें रुचि अब और नहीं रही है| परमात्मा की परमकृपा से तत्व की बात जब समझ में आने लगती है तब और कुछ भी अच्छा नहीं लगता, सारे भेद भी समाप्त होने लगते हैं| भगवान का साकार या निराकार जो भी रूप है वह जब हृदय में प्रतिष्ठित हो जाता है तब वही सब कुछ बन जाता है|
आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२०

Friday, 11 June 2021

संक्षेप में ब्राह्मण धर्म ---

 संक्षेप में ब्राह्मण धर्म ---

=
हर ब्राह्मण को अपने ऋषिगौत्र, प्रवर, वेद, उपवेद व उसकी शाखा का, और गायत्री, प्राणायाम, संध्या आदि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए| यदि नहीं है तो अपने पारिवारिक आचार्य से शीघ्रातिशीघ्र सीख लें|
.
पूरे भारत में अधिकाँश ब्राह्मणों की शुक्ल-यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता की माध्यन्दिन शाखा है| इस का विधि भाग शतपथब्राह्मण है, जिसके रचयिता वाजसनेय याज्ञवल्क्य हैं| शतपथब्राह्मण में यज्ञ सम्बन्धी सभी अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन है| जो समझ सकते हैं उन ब्राह्मणों को अपने अपने वेद आदि का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए| आजकल के इतने भयंकर मायावी आकर्षणों और गलत औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के पश्चात भी शास्त्रोक्त कर्मों को नहीं भूलना चाहिए|
.
मनुस्मृति ने ब्राह्मण के तीन कर्म बताए हैं -- "वेदाभ्यासे शमे चैव आत्मज्ञाने च यत्नवान्|"
अर्थात वेदाभ्यास, शम और आत्मज्ञान के लिए निरंतर यत्न करना ब्राह्मण के कर्म हैं| इन्द्रियों के शमन को 'शम' कहते हैं| चित्त वृत्तियों का निरोध कर उसे आत्म-तत्व की ओर निरंतर लगाए रखना भी 'शम' है| धर्म पालन के मार्ग में आने वाले हर कष्ट को सहन करना 'तप' है| यह भी ब्राह्मण का एक कर्त्तव्य है| जब परमात्मा से प्रेम होता है और उन्हें पाने की एक अभीप्सा जागृत होती है तब गुरुलाभ होता है| धीरे धीरे मुमुक्षुत्व और आत्मज्ञान की तड़प पैदा होती है| उस आत्मज्ञान को प्राप्त करने की निरंतर चेष्टा करना ब्राह्मण का परम धर्म है|
.
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के नौ कर्म बताए हैं .....
"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||१८:४२||
अर्थात् शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान, और आस्तिक्य ये ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं||
और भी सरल शब्दों में -- मनका निग्रह करना, इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराध को क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
.
इनके अतिरिक्त ब्राह्मण के षटकर्म भी हैं, जो उसकी आजीविका के लिए हैं|
अन्य भी अनेक स्वनामधान्य आदरणीय आचार्यों ने बहुत कुछ लिखा है जिसे यहाँ इस संक्षिप्त लेख में लिखना संभव नहीं है|
.
ब्राह्मण के लिए एक दिन में १० आवृति (संख्या) गायत्री मंत्र की अनिवार्य हैं| जो दिन में गायत्री मंत्र की एक आवृति भी नहीं करता वह ब्राहमणत्व से च्युत हो जाता है, और उसे प्रायश्चित करना पड़ता है|
.
इस लघु लेख में इस से अधिक लिखना मेरे लिए संभव नहीं है| आप सब को नमन! इति|
ॐ तत्सत्|
कृपा शंकर बावलिया मुद्गल
१२ जून २०२०

कर्मफलों का त्याग ---

कर्मफलों का त्याग ---
.
कर्मफलों का त्याग -- भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में स्वयं का समर्पण है। जिसने कर्मफलों का त्याग कर दिया है, उसके लिए कोई "कर्मयोग" नहीं है। उसके लिए सिर्फ "ज्ञान" और "भक्ति" है, क्योंकि वह केवल एक निमित्त मात्र साक्षी है। कोई कर्मफल उस पर लागू नहीं होता, क्योंकि उसके कर्मों के कर्ता और भोक्ता तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं बन जाते हैं।
.
समस्त कामनाओं के नाश से अमृतत्व की प्राप्ति होती है। जो कूटस्थ अक्षर ब्रह्म की उपासना करने वाले अभेददर्शी हैं, उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है। भगवान कहते हैं --
"श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२:१२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से भी श्रेष्ठ कर्मफल त्याग है; त्याग से तत्काल ही शान्ति मिलती है॥
.
ऐसे भक्तों का उद्धार अति शीघ्र भगवान स्वयं कर देते हैं। भगवान कहते हैं --
"तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥१२:७॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- हे पार्थ ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर हुआ है ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ॥
.
ईश्वरभाव और सेवकभाव परस्पर विरुद्ध है। इस कारण प्रमाण द्वारा आत्मा को साक्षात् ईश्वररूप जान लेने के पश्चात् कोई किसी का सेवक नहीं है।
भगवान कहते हैं --
"अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१२:१३॥"
"सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१२:१४॥"
अर्थात् -- भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है॥
जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है॥
.
हम सदा संतुष्ट और समभाव में रहें। अपना संकल्प-विकल्पात्मक मन और निश्चयात्मिका बुद्धि -- भगवान को समर्पित कर दें। भगवान को कभी न भूलें। मन और बुद्धि -- जब भगवान को समर्पित है, समभाव में स्थिति है और पूर्ण संतुष्टि है, -- तब हम भगवान को उपलब्ध हैं। ॐ श्री गुरवे नमः !!
ॐ तत्सत् !!

११ जून २०२१ 

पुनश्च: --- 

शाश्वत संकल्प जो बड़ी दृढ़ता से हर समय रहे ---
.
मुझे इसी जीवन में, अभी, इसी समय, -- परमात्मा की प्राप्ति करनी है।
मुझे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है कि मैं अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम हूँ। भगवान हर समय मुझ में स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं। मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। स्वयं परमात्मा मुझमें व्यक्त हैं। शिवोहम् शिवोहम् अहम् ब्रह्मास्मि !! ॐ ॐ ॐ !!