जिधर भी देखता हूँ, जहाँ तक भी मेरी कल्पना जाती है, वह सब मैं ही हूँ। इस मैं के पीछे परमात्मा छिपे हुए हैं। वे भी कब तक छिपेंगे? वे अब और नहीं छिप सकते।
Reveal Thyself unto me. Thou and I art one.
जिधर भी देखता हूँ, जहाँ तक भी मेरी कल्पना जाती है, वह सब मैं ही हूँ। इस मैं के पीछे परमात्मा छिपे हुए हैं। वे भी कब तक छिपेंगे? वे अब और नहीं छिप सकते।
Reveal Thyself unto me. Thou and I art one.
मैं परमात्मा की प्रेरणा से परमात्मा की साक्षी में सत्य बोल रहा हूँ, और परमात्मा का पूरा पता-ठिकाना यहाँ सभी को बता रहा हूँ। इसे समझने के लिए सर्वप्रथम हमें अपनी चेतना में ज्ञान और विवेक की अग्नि को प्रज्ज्वलित करना होगा। जब हम किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सद्गुरु-प्रदत्त विधि से भ्रूमध्य में परमात्मा का ध्यान करते हैं, तब हमारे मेरु-दंड में एक घर्षण होता है, जो ज्ञान और विवेक की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है। वह अग्नि हमारे प्रारब्ध और संचित कर्मफलों को शनैः शनैः भस्म करने लगती है। यदि हम सत्यनिष्ठा से लगे रहेंगे तो एक अवस्था ऐसी भी आयेगी जब हमारे निज जीवन में परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। तभी हम परमात्मा को पूरी तरह समझ सकेंगे।
कोई अन्य नहीं आयेगा, सब कुछ हमें स्वयं को ही करना होगा ---
भगवान का एकमात्र निवास हमारा हृदय है, हम भी सदा उनके हृदय में ही निवास करें ---
योगदा के सिर्फ चार ही गुरू हैं ---- महावतार बाबाजी, श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय, स्वामी श्री युक्तेश्वर जी और परमहंस योगानन्दजी|
वर्त्तमान में जैसा वातावरण है उसमें घर पर रहकर साधना करना असम्भव नहीं तो अत्यंत कष्टप्रद है ---