हमारे विचार सही होंगे तभी हमारा आचरण भी सही होगा ---
Friday, 31 January 2025
हमारे विचार सही होंगे तभी हमारा आचरण भी सही होगा ---
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आज मैं चार अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करना चाहता हूँ। यह मेरा स्वयं के साथ स्वयं का एक सत्संग है। अन्य कोई पढ़े या न पढ़े, लेकिन मुझे तो इससे बहुत अधिक लाभ हो रहा है। मैं न तो आत्म-मुग्ध हूँ, न अहंकारी और न ही फेंकू हूँ, जैसा की कुछ लोग मुझ पर आरोप लगाते हैं। कौन मेरे बारे में क्या सोचता है, यह उसकी समस्या है; मेरी नहीं। मुझे स्पष्टीकरण देने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा ध्यान मेरे विचारों की पवित्रता, और परमात्मा को समर्पण पर है। जो चार विचार मेरे समक्ष हैं, उन पर चर्चा कर रहा हूँ।
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(१) विषयों का चिंतन महा पाप है --
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विषयों में लिप्त होने से अधिक पाप, विषयों के चिंतन से होता है। विषयों के भोग से इतना पाप नहीं लगता, जितना विषयों के चिंतन से लगता है। विषयों का चिंतन ही मुख्य पाप है, क्योंकि हम मन से जो कुछ ही सोचते हैं वह ही हमारा कर्म है, जिसका फल मिले बिना नहीं रहता।
गीता में भगवान कहते हैं --
"कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥३:६॥"
अर्थात् -- जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी कहा जाता है॥
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जो कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है, वह मिथ्याचारी है। शरीर से अनैतिक और अपराध पूर्ण कर्म करने की अपेक्षा मन से उनका चिन्तन करते रहना अधिक हानिकारक है। मन का स्वभाव है एक विचार को बारंबार दोहराना। इस प्रकार एक ही विचार के निरन्तर चिन्तन से मन में उसका दृढ़ संस्कार (वासना) बन जाता है। निरन्तर विषयचिन्तन से, वैषयिक संस्कार मन में गहराई से उत्कीर्ण हो जाते हैं, और उनसे प्रेरित मनुष्य विवश होकर उसी प्रकार के कर्म करता है।
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जो व्यक्ति बाह्य रूप से नैतिक और आदर्शवादी होने का प्रदर्शन करते हुये मन में निम्न स्तर की वृत्तियों के चिंतन में रहता है, वह मिथ्याचारी और महापाप का भागी है। भगवान तो यहाँ तक कहते हैं कि मन को परमात्मा में लगाकर अन्य किसी भी विषय का चिंतन न करें --
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥६:२४॥
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् -- संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके।
शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे।
यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥
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(२) समष्टि के कल्याण की भावना रखें --
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हम समष्टि के कल्याण की भावना रखेंगे तो समष्टि भी हमारा कल्याण करेगी। वे देवता जो हमारा कल्याण कर सकते हैं, उन्हें भी शक्ति हमारे कर्मों से ही मिलती है। हम देवताओं को जो अर्पित करते हैं, उसे ही देवता बापस हमें कई गुणा अधिक कर के लौटाते हैं।
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अपने कर्तव्य-कर्म में हम नित्य प्रतिष्ठित रहें। भगवान को अर्पित करना हमारा कर्तव्य-कर्म है जिसे किए बिना यदि हम कुछ भी ग्रहण करते हैं तो हम चोरी करते हैं। बिना भगवान को अर्पित किये कुछ भी पाना -- पाप का भक्षण है।
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(३) आत्माराम का कोई कर्तव्य नहीं है --
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आत्माराम शब्द का प्रयोग देवर्षि नारद ने "भक्ति-सूत्रों" में उस व्यक्ति के लिए किया है जो निरंतर आत्मा में रमण करता है। आत्माराम का कोई कर्तव्य नहीं है। वह कृतकृत्य और जीवन-मुक्त है। उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है। वह परमात्मा का ही एक रूप है और इस धरा पर विचरण करता हुआ एक देवता है। यह धरा उसे पाकर धन्य और पवित्र हो जाती है। देवता भी उसे देखकर आनंदित होकर नृत्य करने लगते हैं। उसकी सात पीढ़ियाँ तुरंत मुक्त हो जाती हैं। उसे सामान्य नियमों में नहीं बांधा जा सकता। वह कुल धन्य हो जाता है जिसमें उसने जन्म लिया है।
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(४) कर्ताभाव से मुक्त होकर ही हम परमात्मा का अनुग्रह पा सकते हैं --
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अनासक्त कर्तव्य-कर्म हमें परमात्मा से जोड़ देते हैं। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष, "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मान लेता है। सम्पूर्ण कर्म और उनके फल भगवान को अर्पित कर दें। कर्मों और कर्मफलों से मुक्त होने की प्रक्रिया आध्यात्मिक उपासना है। हम निरंतर परमात्मा की चेतना में रहें, यही हमारा स्वधर्म है। हम अपने स्वधर्म का पालन करें।
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उपसंहार --- उपरोक्त चार विषयों पर सत्संग पाने की मेरी घनिष्ठ इच्छा थी। अब मैं स्वयं के साथ सत्संग कर के आने वाले लंबे समय तक के लिए तृप्त और संतुष्ट हूँ। सभी का कल्याण हो। हम वही हो जाते हैं, जैसा हम सदा सोचते हैं| निरंतर परमात्मा का चिंतन करने से परमात्मा के सारे गुण हमारे में आ जाते हैं| अतः ऐसे ही लोगों का संग करें जो सदा परमात्मा के बारे में सोचते हैं| उन लोगों का साथ विष की तरह छोड़ दें जो परमात्मा से विमुख हैं| उनसे मिलना तो क्या उनकी और आँख उठाकर देखना भी बड़ा दुःखदायी होता है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२५
आजकल अधिकांश विवाह विफल क्यों हैं? ---
(प्रश्न) : आजकल अधिकांश विवाह विफल क्यों हैं?
(उत्तर) : जो भी वैवाहिक सम्बन्ध -- त्वचा के रंग, चेहरे के कोण, धन-लालसा या अन्य किसी स्वार्थ से किये जाते हैं, उनका नारकीय होना निश्चित है। विवाह वो ही सफल हो सकता है, जहाँ पति-पत्नी का स्वभाव एक-दूसरे के प्रति अनुकूल और सम्मानजनक हो। पत्नी के लिए जहां पति परमेश्वर हो, वहीं पति के लिए पत्नी अन्नपूर्णा हो। ऐसे ही परिवारों में अच्छी आत्माएं जन्म लेती हैं।
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जब पुरुष का शुक्राणु और स्त्री का अंडाणु मिलते हैं, तब सूक्ष्म जगत में एक विस्फोट होता है, और जैसी उनकी भावस्थिति और सोच होती है, सूक्ष्म-जगत से वैसी ही आत्मा आकृष्ट होकर गर्भस्थ हो जाती है। प्राचीन भारत में लोगों को इस तथ्य का ज्ञान था, तभी भारत ने इतने महापुरुषों को जन्म दिया। गर्भाधान भी एक संस्कार है, जिसका ज्ञान लुप्तप्राय ही हो गया है। आजकल की अधिकांश मनुष्यता कामज-संतानों के कारण ही इतनी घटिया है।
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परमात्मा में भी श्रद्धा, विश्वास, और निष्ठा होना आवश्यक है। कोई सूर्योदय में विश्वास करता है या नहीं, सूर्योदय तो होगा ही। वैसे ही परमात्मा का अस्तित्व किसी के विश्वास/अविश्वास पर निर्भर नहीं हैं। परमात्मा अपरिभाष्य, एकमात्र सत्य और हमारा अस्तित्व हैं, जिनका बोध हुए बिना जीवन में हम अतृप्त रह जाते हैं। उन्हें जानने का प्रयास स्वयं को जानने का प्रयास है। हमारे निज जीवन में परमात्मा में आस्था का न होना भी वैवाहिक असफलताओं का एक कारण है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ जनवरी २०२५
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पुनश्च: --- अगर भूल से भी कोई वामपंथी या नारी-स्वतन्त्रतावादी लड़की घर में बहु बनकर आ गयी तो उस घर का विनाश निश्चित है।
"भूमा" का साक्षात्कार करने की जिज्ञासा है ---
"भूमा" का साक्षात्कार करने की जिज्ञासा है। भगवान सनतकुमार ने जिस भूमाविद्या का ज्ञान अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को दिया, वह भूमा ही ब्रह्मविद्या/ब्रह्मज्ञान है। छांदोज्ञोपनिषद व अन्य कुछ ग्रन्थों में सूत्र रूप में इसका वर्णन है। उन्हें मैं बुद्धि के द्वारा समझने में असमर्थ हूँ, क्योंकि वेदांगों के ज्ञान के बिना श्रुतियों (वेदों) को समझना असंभव है।
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मुझे जो कुछ भी समझ में आता है वह गुरुकृपा व हरिःकृपा से ध्यान साधना के द्वारा ही समझ में आता है। परमात्मा एक महासागर है, और जीवात्मा एक जल की बूँद। परमात्मा को जानने के लिए जीवात्मा को बहुत गहरी डुबकी लगानी पड़ती है, तभी बोध होता है। यदि कहीं कोई कमी है तो वह कमी हमारी डुबकी में है, महासागर में नहीं। महासागर ऊर्ध्व में है, जिसका बोध गुरु/हरिःकृपा से ही होता है।
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इस समय आज इस विषय पर मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि विख्यात वैष्णवाचार्य आचार्य सियारामदास नैयायिक महाराज ने उपरोक्त विषय पर अपना एक प्रवचन विडियो के माध्यम से मुझे भेजा है, जिसका स्वाध्याय मैंने आज अभी कुछ समय पूर्व ही किया है। उनका इस विषय पर प्रवचन, उनके गहन ज्ञान और साधना को दर्शाता है। वह विडिओ उनका निजी/व्यक्तिगत है इसलिए साझा नहीं कर सकता।
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आज के समय में ज्ञान प्राप्ति के लिए ध्यान-साधना ही एकमात्र मार्ग है। अन्य कोई उपाय नहीं है। ध्यान साधना भी किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य के मार्गदर्शन में ही की जा सकती है। मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे वह मार्गदर्शन प्राप्त है। कमियाँ बहुत अधिक हैं, लेकिन वे मुझमें ही हैं, कहीं अन्यत्र नहीं।
गुरु व परमात्मा की कृपा बनी रहे। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२८ जनवरी २०२५
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पुनश्च: ---- आप के हृदय में परमात्मा को पाने की अभीप्सा गहनतम हो। आप वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ब्राह्मी स्थिति यानि कैवल्य पद को प्राप्त हों। यही आत्म-साक्षात्कार है। परमात्मा स्वयं ही यह सम्पूर्ण सृष्टि बन गये हैं। कहीं कोई भेद नहीं है।
हम अपने बच्चों को जो प्यार करते हैं, वह वास्तव में परमात्मा को प्यार करते हैं। हमारे बच्चे भी परमात्मा के रूप में उस प्यार को स्वीकार करते हैं।
हम अपने बच्चों को जो प्यार करते हैं, वह वास्तव में परमात्मा को प्यार करते हैं। हमारे बच्चे भी परमात्मा के रूप में उस प्यार को स्वीकार करते हैं।
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सभी माता-पिताओं से मेरा हाथ जोड़ कर अनुरोध है कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें, और घर में खूब प्यार दें, जिसके लिए वे घर से बाहर प्यार नहीं ढूंढें। मनोवैज्ञानिक रूप से --
* जिन बच्चों को (विशेष रूप से बालिकाओं को) घर में बाप का प्यार नहीं मिलता है, वे बड़े होकर जीवन में पर पुरुषों में प्यार ढूंढते हैं।
* जिन बच्चों को (विशेष रूप से बालकों को) माँ का प्यार नहीं मिलता है, वे बड़े होकर अपने जीवन में पर स्त्रियों में प्यार ढूंढते हैं।
अतः माँ और बाप दोनों का प्यार बच्चों के विकास के लिए अति आवश्यक है।
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मैंने जीवन में जो प्रत्यक्ष स्वयं देखा है वही कह रहा हूँ --
(१) मेरे साथ कुछ ऐसे सहकर्मी भी थे जो घर में सुन्दर पत्नी और समझदार वयस्क बच्चों के होते हुए भी बेशर्म होकर परस्त्रीगामी थे। गहराई से विचार करने पर मैनें पाया कि उनकी विकृति का कारण बचपन में उन को माँ से प्यार न मिलना था।
(२) ऐसे ही कुछ महिलाओं को भी मैंने देखा है जो घर में अच्छे पति और संतानों के होते हुए भी परपुरुषगामी थीं। वे भी अपने बाल्यकाल में पिता के प्रेम से वंचित थीं। कुसंगति दूसरा कारण था।
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बच्चों को अपने स्वयं के आचरण से, अपना स्वयं का उदाहरण देकर अच्छे से अच्छे संस्कार दें। अपने बच्चों को, विशेष रूप से अपनी लड़कियों को वामपंथी और सेकुलर प्रभाव से बचाएँ, अन्यथा परिणाम बड़े दुखद होंगे। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ जनवरी २०२५
अनात्म में बहुत अधिक भटक गया हूँ, परमात्म मूल में बापस लौट रहा हूँ ---
अनात्म में बहुत अधिक भटक गया हूँ। परमात्म मूल में बापस लौट रहा हूँ। स्थिर हो सदा वहीं रहूँगा। अब और भटकने का मन नहीं है। जीव भाव से मुक्त होकर हम ऊपर उठें, और शिव भाव में प्रतिष्ठित हों, तभी हम गूढ आध्यात्मिक रहस्यों को समझ पायेंगे। परमात्मा का स्मरण हर समय करना चाहिये। किसी परिस्थिति विशेष में हम यदि स्मरण न भी कर पायें तो परमात्मा स्वयं हमारा स्मरण कर हमें परम गति प्रदान करते हैं। मेरे लिये शब्द-रचना अब बड़ी कठिन और असंभव सी होती जा रही है, क्योंकि मेरी स्मृति लगातार क्षीण हो रही है। ईश्वर की चेतना सदा बनी रहे। सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म॥ ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२५
Thursday, 30 January 2025
कूटस्थ, उपास्य और उपासना :---
कूटस्थ, उपास्य और उपासना :---
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"ॐ गुरुभ्यो नमः॥" "ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥" "ॐ शांति शांति शांति॥" "हरिः ॐ॥"
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यह "कूटस्थ" शब्द मुझे इसलिए बहुत अधिक प्रिय लगता है क्योंकि इस शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक बार किया है। यह भगवान श्रीकृष्ण का ही शब्द है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कूटस्थ हैं, क्योंकि वे सर्वत्र होते हुए भी कहीं दिखाई नहीं देते।
जो साधक योग-साधना करते हैं, उनके लिए भी यह शब्द बहुत अधिक प्रिय है, क्योंकि वे कूटस्थ सूर्य-मण्डल में ही विस्तार-क्रम से परमात्मा का ध्यान करते हैं, और उन्हें जो भी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होती हैं, वे कूटस्थ में ही होती हैं। सारे ज्ञान की प्राप्ति भी कूटस्थ में ही होती है। कूटस्थ ही भगवान हैं, और भगवान ही कूटस्थ हैं, क्योंकि वे कूट रूप से सर्वत्र हैं, लेकिन कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते।
जो सर्वत्र हैं लेकिन कहीं भी दिखाई नहीं देते, वे कूटस्थ हैं।
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उन्हें जानने की विद्या गुरुमुखी है जो गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती है। श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध गुरु से उपदेश व आदेश लेकर बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए उसी में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान एक देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है; जिसमें स्थिति योगमार्ग की एक अति उच्च उपलब्धी है। गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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साहित्यिक दृष्टि से इस शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं, लेकिन भक्त/साधकों के लिए इसका एक ही अर्थ है --
भगवान के ज्योतिर्मय रूप के दर्शन और अनाहत नाद का श्रवण।
धन्य हैं वे सब साधक जिन्हें भगवान की कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं। भगवान के दर्शन कूटस्थ ज्योतिर्मयब्रह्म रूप में ही होते हैं। उस के साथ जो अक्षरब्रह्म सुनाई देता है, उस में दीर्घकाल तक स्थित होकर तैलधारा के समान उसका श्रवण निरंतर अधिकाधिक करना चाहिये। वह अक्षर अव्यक्त होने के कारण किसी प्रकार भी बतलाया नहीं जा सकता, और किसी भी प्रमाण से प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता। वह आकाश के समान सर्वव्यापक है और अव्यक्त होने से अचिन्त्य और कूटस्थ है।
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उपास्य :--
प्रकृति तो माया है, और भगवान मायापति हैं। भगवान की माया अति दुस्तर है। उसी का नाम "कूट" है। उस "कूट" नामक माया में जो अधिष्ठाता के रूप में कुछ भी क्रिया न करते हुये स्थित हैं, उनका नाम कूटस्थ है। इस प्रकार कूटस्थ होने के कारण वे अचल, ध्रुव अर्थात् नित्य है। वे हमारे उपास्य हैं।
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उपासना :--
उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बना कर उसके समीप पहुँच कर तैलधारा के तुल्य समान वृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थित रहने को "उपासना" कहते हैं।
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जिन भक्तों को कूटस्थ ज्योतिर्मयब्रह्म के दर्शन होते हैं, वे भगवान की कृपा से उनकी माया के आवरण और विक्षेप से परे चले जाते हैं। उनकी स्थाई स्थिति कूटस्थ चैतन्य में हो जाती है। कूटस्थ में दिखाई देने वाला पञ्चकोणीय श्वेत नक्षत्र पञ्चमुखी महादेव का प्रतीक है। यह एक नीले और स्वर्णिम आवरण से घिरा हुआ दिखाई देता है, जिसके चैतन्य में स्थित होकर साधक की देह शिवदेह हो जाती है, और वह जीव से शिव भी हो सकता है। इस श्वेत नक्षत्र की विराटता - क्षीरसागर है, जिसका भेदन और जिसके परे की स्थिति योग मार्ग की उच्चतम साधना और उच्चतम उपलब्धि है। इसका ज्ञान भगवान की परम कृपा से किसी सिद्ध सद्गुरु के माध्यम से ही होता है।
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आज्ञाचक्र ही योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं। आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर जहाँ होता है, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है। आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष है जो खोपड़ी के ऊपर मध्य में पीछे की ओर है। यह जीवात्मा का निवास है।
गुरुकृपा से धीरे धीरे सहस्त्रार में स्थिति हो जाती है। सामान्यतः एक उन्नत साधक की चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य उत्तरा-सुषुम्ना में रहती है।
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चेतावनी :-- कुसंग का त्याग और यम-नियमों का पालन अनिवार्य है, अन्यथा तुरंत पतन हो जाता है। जब इस ज्योति पर साधक ध्यान करता है तब कई बार वह ज्योति लुप्त हो जाती है, यह 'आवरण' की मायावी शक्ति है जो एक बहुत बड़ी बाधा है। इस ज्योति पर ध्यान करते समय 'विक्षेप' की मायावी शक्ति ध्यान को छितरा देती है। इन दोनों मायावी शक्तियों पर विजय पाना साधक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, सतत साधना और गुरुकृपा से एक आतंरिक शक्ति उत्पन्न होती है जो आवरण और विक्षेप की शक्तियों को कमजोर बना कर साधक को इस भ्रामरी गुफा से पार करा देती है।
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आवरण और विक्षेप का प्रभाव समाप्त होते ही साधक को धर्मतत्व का ज्ञान होता है| यहाँ आकर कर्ताभाव समाप्त हो जाता है और साधक धीरे धीरे परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगता है। हम सब को परमात्मा की अनन्य पराभक्ति प्राप्त हो, और हम सब उन के प्रेम में निरंतर मग्न रहें इसी शुभ कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ।
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इस लेख को लिखने से पहिले मैंने संबंधित विषय का गीता के शंकर भाष्य से स्वाध्याय किया, और गुरु महाराज, व भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। उनकी कृपा से ही यह लेख लिख पाया, अन्यथा मुझ अकिंचन में कोई योग्यता नहीं है।
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ॐ नमः शिवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३१ जनवरी २०२३
भगवान ही भक्ति हैं, भगवान ही भक्त हैं, भगवान ही क्रिया और कर्ता हैं --- .
भगवान ही भक्ति हैं, भगवान ही भक्त हैं, भगवान ही क्रिया और कर्ता हैं ---
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भूल कर भी कभी साधक, उपासक, भक्त या कर्ता होने का मिथ्या भाव मन में नहीं आना चाहिए| मैं यह बात अपनी निज अनुभूतियों से लिख रहा हूँ, कोई मानसिक कल्पना नहीं है| एक बार ध्यान करते करते एक भाव-जगत में चला गया, जहाँ कोई अदृश्य शक्ति मुझसे पूछ रही थी कि तुम्हें क्या चाहिए| स्वभाविक रूप से मेरा उत्तर था कि आपके प्रेम के अतिरिक्त मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| मुझे उत्तर मिला कि -- "प्रेम का भी क्या करोगे? मैं स्वयं सदा तुम्हारे समक्ष हूँ, मेरे से अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है|" तत्क्षण मुझे मेरी अभीप्सा (तड़प, अतृप्त प्यास) का उत्तर मिल गया| एक असीम वेदना शांत हुई| अगले ही क्षण मैं फिर बापस सामान्य चेतना में लौट आया| वास्तव में हमें परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| वे हैं तो सब कुछ हैं, उनके बिना कुछ भी नहीं है|
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वे निरंतर हमारे हृदय में हैं| वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| वे सदा हमारे हृदय में हैं| भगवान कहते हैं ---
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति| भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया||१८:६||"
" उमा दारु जोषित की नाईं| सबहि नचावत रामु गोसाईं||" (श्रीरामचरितमानस)
हम सब कठपुतलियाँ हैं भगवान के हाथों में| कठपुतली में थोड़ा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार डाल दिया है, जो हमें दुःखी कर रहा है|
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निमित्त मात्र होने के लिए भगवान कह रहे हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||"
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अब और कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा है| अंत में थोड़ा अति-अति संक्षेप में प्राणतत्व और परमशिव का अपना अनुभव भी साझा कर लेता हूँ| परमात्मा का मातृ रूप जिसे हम अपनी श्रद्धानुसार कुछ भी नाम दें, वे भगवती आदिशक्ति -- प्राण-तत्व के रूप में हमारी सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में सभी चक्रों को भेदते हुए विचरण कर रही हैं| जब तक उनका स्पंदन है, तभी तक हमारा जीवन है| वे ही साधक हैं, और वे ही कर्ता हैं| जिनका वे ध्यान कर रही हैं, उनको मैं मेरी श्रद्धा से परमशिव कहता हूँ, आप कुछ भी कहें| परमशिव एक अनुभूति है जो गहरे ध्यान में इस भौतिक देह के बाहर की अनंतता से भी परे होती है| वह अवर्णणीय है|
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सारी साधना वे जगन्माता, भगवती, आदिशक्ति ही स्वयं कर के परमशिव को अर्पित कर रही हैं| हम तो साक्षीमात्र हैं उस यजमान की तरह जिस की उपस्थिति इस यज्ञ में आवश्यक है| और कुछ भी नहीं| वे ही गुरु रूप में प्रकट हुईं और मार्गदर्शन किया| वे ही इस जीवात्मा का विलय परमशिव में एक न एक दिन कर ही देंगी| और कुछ भी नहीं चाहिए| उन परमशिव और जगन्माता को नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२१
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