Monday, 18 November 2024

मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- "कर्ताभाव से मुक्त होकर परमात्मा को एकमात्र कर्ता बनाना" --

मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- "कर्ताभाव से मुक्त होकर परमात्मा को एकमात्र कर्ता बनाना" ---

.
हम भगवान के एक उपकरण मात्र हैं। निज जीवन में हम परमात्मा को पूर्ण रूप से व्यक्त करें, उन्हें ही एकमात्र कर्ता बनाएँ और स्वयं एक निमित्त मात्र बन जाएँ। वे ही रण भूमि में हमें निमित्त बनाकर शत्रुओं का संहार कर रहे हैं, वे ही धर्म की पुनःस्थापना कर रहे हैं, वे ही सारे सद्गुण हैं, और वे ही स्वयं को इस विश्वरूप में और हमें व्यक्त कर रहे हैं। वे ही हमारे पैरों से चल रहे हैं, वे ही इन हाथों से सारे कार्य कर रहे हैं, इन नेत्रों से वे ही देख रहे है, इन कानों से वे ही सुन रहे हैं, इन नासिकाओं से वे ही सांस ले रहे हैं, और इस हृदय में वे ही धडक रहे हैं।
.
भगवान कहते हैं --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
" Then gird up thy loins and conquer. Subdue thy foes and enjoy the kingdom in prosperity. I have already doomed them. Be thou my instrument, Arjuna!
.
"योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४:४१॥"
अर्थात् -- "जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं॥
But the man who has renounced his action for meditation, who has cleft his doubt in twain by the sword of wisdom, who remains always enthroned in his Self, is not bound by his acts.
.
"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥५:३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि, हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है॥
He is a true ascetic who never desires or dislikes, who is uninfluenced by the opposites and is easily freed from bondage.
.
"ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥५:१०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर करता है, वह पुरुष कमल के पत्ते के सदृश पाप से लिप्त नहीं होता।।
He who dedicates his actions to the Spirit, without any personal attachment to them, he is no more tainted by sin than the water lily is wetted by water.
.
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते​॥१८:१७॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥
He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.
.
जो कर्म का कर्ता होता है वही फल का भोक्ता भी होता है। आत्मज्ञानी पुरुष का अहंकार अर्थात् जीवभाव ही समाप्त हो जाता है। तब उसकी बुद्धि किसी भी विषय में आसक्त नहीं हो सकती। वह पुरुष किसी को भी मार कर, न तो मारता है और न बँधता है। जब भगवान् श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष हत्या करके भी वास्तव में हत्या नहीं करता है, तब इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि सभी ज्ञानी पुरुष हत्या जैसे हीन कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। इस वाक्य का अभिप्राय केवल इतना ही है कि कर्तृत्वाभिमान के अभाव में मनुष्य को किसी भी कर्म का बन्धन नहीं हो सकता।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
१८ नवंबर २०२४

देवों और दानवों के मध्य देवासुर-संग्राम सृष्टि के अनादि काल से ही चल रहा है ----

 देवों और दानवों के मध्य देवासुर-संग्राम सृष्टि के अनादि काल से ही चल रहा है। जब तक यह सृष्टि है तब तक यह चलता रहेगा। अंततः विजय उसी पक्ष की होगी जिस पक्ष में स्वयं भगवान हैं।

.
इस समय इस पृथ्वी पर लगभग ८५% लोग तमोगुणी हैं, लगभग १०% लोग रजोगुणी हैं, और बड़ी कठिनाई से ५% लोग सतोगुणी होंगे। जहां तक अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति की बात है -- इस पृथ्वी पर दो लाख में से बड़ी कठिनाई से एक व्यक्ति होगा जिसमें भगवान से परमप्रेम यानि भक्ति हो। बाकी लोग तो भक्ति के नाम पर भगवान से व्यापार ही करते हैं। भक्ति और समर्पण एक-दूसरे के पूरक हैं। इस पृथ्वी पर भक्ति और समर्पण के नाम पर इस समय तो भगवान के साथ व्यापार ही चल रहा है। आप भगवान के साथ व्यापार न कर के भक्ति और समर्पण करें।
.
हमारी भक्ति अनन्य-अव्यभिचारिणी हो। प्रातः काल में सोकर हम नहीं उठते, भगवान स्वयं हमारे माध्यम से सोकर उठते हैं। सब शंकाओं से निवृत होकर ध्यान के आसन पर ध्यानमुद्रा में बैठ जाइए। सर्वप्रथम ओंकार रूप में भगवान श्रीगणेश का ध्यान उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र और सहस्त्रारचक्र के मध्य) में कीजिये। भगवान श्रीगणेश बड़ी कृपा कर के मूलाधारचक्र से उठकर उत्तरा-सुषुम्ना में ओंकार रूप में बिराजमान हमारे लिये हो जाते हैं। पञ्चप्राण उनके गण है जिनके वे ओंकार रूप में ईश हैं, इसलिए वे गणेश हैं। पंचप्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप -- दस-महाविद्याएँ हैं। ओंकार रूप में गणेश जी के ध्यान से सभी दसों महाविद्याओं का ध्यान हो जाता है।
.
यदि आपका उपनयन-संस्कार (जनेऊ) हो चुका है तो आप गायत्री या सावित्री मंत्र के अधिकारी हैं, अन्यथा नहीं। गायत्री मंत्र में तीन व्याहृतियाँ और सावित्री मंत्र में सात होती हैं। यदि आप गुरु द्वारा अधिकृत हैं तो सावित्री मंत्र का मानसिक जप सुषुम्ना के चक्रों में भी कर सकते हैं।
.
यदि आप ने श्रीविद्या (या किसी भी अन्य महाविद्या) में दीक्षा ले रखी है तो उसके मंत्रों का मानसिक जप यथासंभव अधिकाधिक शरणागत भाव से कीजिये।
अन्यथा भागवत मंत्र या राम नाम का मानसिक जप आज्ञाचक्र में शरणागत भाव से अधिकाधिक करें। ये निरापद हैं, इनका मानसिक जप सप्ताह में सातों दिन, और प्रत्येक दिन चौबीस घंटे भी आप कर सकते हैं। यदि आप गुरु द्वारा अधिकृत हैं तभी सुषुम्ना के षड़चक्रों में भागवत मंत्र का जप करें, अन्यथा नहीं।
.
गुरुकृपा से अंततः धीरे धीरे आप अपनी अपनी चेतना को सहस्त्रार के मार्ग से इस शरीर से बाहर परमात्मा की अनंतता में भी ले जा सकेंगे, और उससे परे परमशिव में भी स्थित हो सकेंगे। यदि आप की चेतना इस भौतिक शरीर से बाहर है तो बीच बीच में यह भाव कीजिये कि "मैं यह शरीर-महाराज नहीं, परमात्मा की अनंतता से भी परे परमशिव हूँ।" जब तक आपके प्रारब्ध में जीवन है तब तक भौतिक मृत्यु नहीं हो सकती। आप अपने आप ही इस देह में लौट आयेंगे। यह भौतिक शरीर तो इस लोकयात्रा के लिये भगवान द्वारा दिया हुआ एक वाहन है। जब यह रुग्ण हो जाएगा तो दूसरा मिल जायेगा। हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। आप हर समय भागवत चेतना में परमशिव भाव में रहिये।
.
ऊपर जो कुछ भी मैंने लिखा है, उसको लिखने में यदि कोई दोष या पाप लगा है तो वह मुझे स्वीकार्य है। उसके लिये कोई भी दण्ड पाने, या नर्क-कुंड में जाने को भी मैं इसी समय तैयार हूँ। इस क्षण तो मैं पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म की चेतना से परे शिवभाव यानि भागवत-चेतना में हूँ। कोई पाप या पुण्य मुझे छू भी नहीं सकता।
.
इस शरीर में इस समय तो मैं किनारे पर बैठा हूँ, अतः किसी के लिये मुझे समय नहीं है। भगवती से उधार मांगे हुए समय में यह जीवन जी रहा हूँ। इसका मूल्य भी मुझे भगवती को चुकाना पड़ेगा। सारा अवशिष्ट जीवन भगवती को समर्पित है।
ॐ तत्सत्। ॐ तत्सत्। ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ नवंबर २०२४

"सनातन धर्म" पर एक लघु चर्चा ---

 "सनातन धर्म" ---

.
सनातन धर्म पर अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि से एक चर्चा करना चाहता हूँ। आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे। जितना मुझे अल्प ज्ञान है उसे ही यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ।
.
सनातन धर्म को नष्ट करने का पूरा प्रयास अधर्मी असुरों ने किया है लेकिन सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण की प्रक्रिया आरंभ हो गयी है। यह कार्य भगवान ने स्वयं अपने हाथों में ले लिया है, और उनकी प्रकृति अब इसे सम्पन्न करेगी। जो धर्मद्रोही हैं वे अपने कर्मफलों से अपनी आप ही नष्ट हो जाएँगे। यह एक देवों और दानवों का देवासुर संग्राम है जो सृष्टि के आदिकाल से ही चलता आया है।
.
सनातन धर्म के नियमों से ही यह सृष्टि संचालित है। धर्म और अधर्म को समझने के लिए सम्पूर्ण महाभारत से अधिक अच्छा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। धर्म से विमुख करने के लिये हमें अधर्मी फिरंगी पादरियों ने यह सिखाया कि महाभारत को घर में रखने से घर में कलह होती है। यहाँ तक कि महाभारत के चित्रों को को भी घर पर रखने को बुरा बताया गया। जब कि हर घर में महाभारत अपने मूल रूप में होनी चाहिए। अंग्रेजों के वेतनभोगी पादरियों और मार्क्सवादी अधर्मियों द्वारा प्रक्षिप्त किए हुए अंशों को कैसे भी हटाना चाहिए, इस विषय पर कोई शोधकार्य हुआ भी है तो मुझे पता नहीं। महाभारत में धर्म और अधर्म को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थों के स्वाध्याय से धर्म और अधर्म की समझ बहुत गहरी और स्पष्ट हो जाती है।
.
जिस दिन मनुष्य की बुद्धि यह समझ लेगी कि वह एक शाश्वत आत्मा है, यह नश्वर देह नहीं; उसी दिन से उसे सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) क्या है, यह समझ में आने लगेगा। प्रत्यक्ष रूप से सनातन धर्म के चार मुख्य स्तम्भ हैं -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों का सिद्धान्त, पुनर्जन्म, और ईश्वर के अवतारों में आस्था।
.
हमारे विचार, भाव और आचरण -- हमारे कर्म है, जिसका फल भुगतने के लिए बार बार हमारा जन्म होता है। कर्म करने की स्वतन्त्रता सबको है लेकिन फल भुगतने की नहीं। हम जो भी हैं, वह हमारे पूर्वजन्मों का फल है, और हम जो भी होंगे, वह इस जन्म के कर्मों का फल होगा। कर्मफलों से मुक्ति भी भक्ति और समर्पण द्वारा ही मिल सकती है, लेकिन उसके लिए तप करना पड़ता है।
.
परमात्मा की प्राप्ति यानि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। इसका मार्ग सनातन धर्म ही बताता है। हम एक शाश्वत आत्मा हैं। आत्मा का स्वधर्म क्या है? इसका पता लगाकर अपने स्वधर्म का पालन कीजिये, यही हमारा सब से बड़ा कर्तव्य और सनातन धर्म का पालन है।
.
मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण दिये हैं। उनका धारण धर्म है, और उनका अभाव अधर्म है। वैशेषिक सूत्रों में दी हुई कणाद ऋषि की परिभाषा के अनुसार --- अभ्यूदय और निःश्रेयस की सिद्धि - धर्म है।
गीता के अनुसार समत्व में स्थिति ही वास्तविक ज्ञान है। समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है।
प्रत्येक मनुष्य को कभी न कभी, किसी न किसी जन्म में परमात्मा के मार्ग पर आना ही पड़ेगा। परमात्मा से हमारा निकास हुआ है, और परमात्मा में ही हमको बापस जाना पड़ेगा। यह परमात्मा का मार्ग ही सत्य-सनातन-धर्म है।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२४

Saturday, 16 November 2024

"ब्रह्मज्योति" के दर्शन ध्यान में ही होते हैं ---

 "ब्रह्मज्योति" के दर्शन ध्यान में ही होते हैं ---

.
कोई आवश्यक नहीं है कि मेरा अनुभव ही सत्य हो, लेकिन मेरा अनुभव तो यही कहता है कि हमें भगवान की सर्वप्रथम अनुभूति ज्योति, नाद, और आनंद के रूप में होती है। नेत्रों के गोलकों को बिना किसी तनाव के भ्रूमध्य की ओर रखने और भ्रूमध्य पर ध्यान करते करते कुछ माह की नियमित अजपा-जप की साधना के पश्चात ध्यान में एक ब्रह्मज्योति प्रकट होती है जो आरंभ में एक कोहरे जैसी होती है, तत्पश्चात् प्रचंड सूर्य की आभा जैसी हो जाती है, जिसमें कोई उष्णता नहीं, बल्कि शीतलता होती है।
.
यह तभी होता है जब आपका मेरुदण्ड उन्नत हो, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, और आप स्वयं खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में हों। इसे ध्यान-मुद्रा भी कहते हैं। धीरे धीरे वह ज्योति सारे ब्रह्मांड में विस्तृत हो जाती है, लेकिन उस का केंद्र बदलता रहता है। धीरे धीरे उस ज्योति से प्रणव की ध्वनि भी सुनाई देने लगती है। आप उस सर्वव्यापी ज्योति के साक्षी रहते हुए, नाद का श्रवण व अजपा-जप करते रहें। उसी को अपना परमप्रेम और समर्पण करें। उस ज्योति और नाद को ही योग साधक "कूटस्थ" कहते हैं। कूटस्थ-चैतन्य में रहते रहते हमारी प्रज्ञा भी परमात्मा में स्थिर होने लगती है, और हमें स्थितप्रज्ञता और ब्राह्मीस्थिति की प्राप्ति होती है।
.
ध्यान में ब्रह्मज्योति के दर्शन, नाद का श्रवण, और आनंद की अनुभूति हमें परमात्मा का आभास कराती है। यह हमारी आध्यात्मिक प्रगति का सूचक है। संतुष्ट होकर मत बैठिये, परमात्मा के महासागर में अभी, और इसी समय से गहरी से गहरी डुबकी लगाना आरंभ कर दीजिये।
.
श्वेताश्वतरोपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, आदि अनेक ग्रन्थों में और संत-साहित्य में इसका बहुत अधिक वर्णन है, जिनका उल्लेख मैं इस लेख के विस्तार भय से नहीं कर रहा हूँ। किसी को कुछ सीखना है तो किसी ब्रह्मनिष्ठ आचार्य से सीखें। मैं समय नहीं दे सकूँगा। आप सब को नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२४

पंचमुखी महादेव --- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख)

 पंचमुखी महादेव --- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख)

.
हमारा ब्रह्मांड पाँच तत्वों से बना है -- जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश। भगवान शिव को पंचानन अर्थात पाँच मुख वाले कहा जाता है। शिवपुराण के अनुसार ये पाँच मुख हैं -- ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात।
.
भगवान शिव के ऊर्ध्वमुख का नाम 'ईशान' है जो आकाश तत्व है। पूर्वमुख का नाम 'तत्पुरुष' है, जो वायु तत्व है। दक्षिणी मुख का नाम 'अघोर' है जो अग्नितत्व है। उत्तरी मुख का नाम 'वामदेव' है, जो जल तत्व है। पश्चिमी मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है, जो पृथ्वी तत्व है। भगवान शिव की अनुभूति हमें किसी भी रूप में हो सकती है।
.
शिव, परमशिव, शंकर और शंभू का अर्थ --
हमें ध्यान में अनंत विस्तृत ज्योति, प्रणव की ध्वनि और एक श्वेत पंचमुखी नक्षत्र के दर्शन का अनुभव जब भी होता है, वह बड़े आनंद का विषय होता है।
विराट अनंतता और विस्तार की अनुभूति को ही मैं 'शिव' कहता हूँ, जिसका अर्थ है कल्याणकारी।
'परमशिव' का अर्थ है -- परम कल्याणकारी। यह एक अनुभूति है, जो सभी को नहीं, केवल उन्नत साधकों को होती है।
शंकर का अर्थ है -- शमनकारी और आनंददायक।
शंभू का अर्थ है -- मंगलदायक।
.
भूतनाथ और महाकाल का अर्थ --
भगवान शिव पंचभूतों (पंचतत्वों) के अधिपति हैं इसलिए ये 'भूतनाथ' कहलाते हैं।
भगवान शिव काल (समय) के प्रवर्तक और नियंत्रक होने के कारण 'महाकाल' कहलाते है।
काल की गणना 'पंचांग' के द्वारा होती है।
काल के पाँच अंग -- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं।
रुद्राक्ष सामान्यत: पंचमुखी ही होता है।
शिव-परिवार में भी पांच सदस्य है -- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदीश्वर। नन्दीश्वर साक्षात धर्म हैं।
शिवजी की उपासना पंचाक्षरी मंत्र .... 'नम: शिवाय' द्वारा की जाती है।
ब्रहृमा-विष्णु-महेश तात्विक दृष्टि से एक ही हैं। इनमें कोई भेद नहीं है।
.
योगियों को कूटस्थ में एक स्वर्णिम आभा के मध्य एक नीला प्रकाश दिखाई देता है जिसके मध्य में एक श्वेत पंचकोणीय नक्षत्र दिखाई देता है -- उसे ही 'पंचमुखी महादेव' कहते हैं। उन्नत योगी उसी का ध्यान करते हैं।
.
शिव-तत्व को जीवन में उतार लेना ही शिवत्व को प्राप्त करना है और यही शिव होना है। यही हमारा लक्ष्य है।
ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ तत्सत् !! ॐ नमःशिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२२

Friday, 15 November 2024

इसी जीवन में हमें आत्म-तत्व को जानकर आत्मसाक्षात्कार (Self-Realization) कर के आवागमन और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाना चाहिए ---

 इसी जीवन में हमें आत्म-तत्व को जानकर आत्मसाक्षात्कार (Self-Realization) कर के आवागमन और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाना चाहिए।

.
हम यहाँ इस पृथ्वीलोक में मनुष्य देह को अपने कर्मफलों को भोगने के लिए ही पाते हैं। इस भौतिक मनुष्य देह के जीवित रहते रहते ही हमें इसी जीवन में परमात्मा को उपलब्ध हो जाना चाहिए। बाद में पता नहीं किस लोक में जन्म हो और कैसी देह मिले। इस मनुष्य देह में तो हम परमात्मा को उपलब्ध हो सकते हैं, लेकिन अन्य ज्ञात शरीरों में नहीं। आत्म तत्व का साक्षात्कार कर लिया तो ८४ लाख का चक्र तो छूटेगा ही, सब प्रकार का कल्याण भी हो जाएगा।
.
मैं कई वर्षों से लिख रहा हूँ और अनगिनत लेख लिखे हैं। अब थक गया हूँ, और लिखने की सामर्थ्य नहीं है। अब बचा हुआ सारा जीवन आप सब को अपनी चेतना में अपने साथ लेकर परमात्मा की ध्यान-साधना में ही बिताना चाहता हूँ।
भगवान स्वयं ही अपनी साधना करते हैं, मैं तो एक निमित्तमात्र हूँ। यह जीवन उनको समर्पित है।
.
भारत से असत्य का अंधकार दूर होगा। असत्य और अंधकार की आसुरी शक्तियाँ पराभूत होंगी। सत्य-सनातन-धर्म का वैश्वीकरण होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ नवंबर २०२३

अच्छा या बुरा, जैसा भी यह जीवन है, वह भगवान को समर्पित है ---

 अच्छा या बुरा, जैसा भी यह जीवन है, वह भगवान को समर्पित है ---

.
मुझे सारी प्रेरणाएँ भगवान से ही मिलती हैं। भगवान के सारे नाम-रूप एक हैं। मैं कभी तो बात परमशिव की करता हूँ, कभी विष्णु की, कभी भगवती श्रीविद्या, महाकाली या छिन्नमस्ता की, -- ये भगवान की सारी अभिव्यक्तियाँ हैं, जो ओंकार में एक हैं। कोई मुझे अच्छा कहे या बुरा, गाली दे या प्रशंसा करे, अब कोई फर्क नहीं पड़ता।
.
भगवान के प्रति हमारी अभीप्सा बनी रहे, व उनके प्रति हमारा समर्पण पूर्ण हो। हमारी भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी हो। हम सब तरह की आकांक्षाओं व कामनाओं से मुक्त हों। हमारे अंतःकरण में केवल परमात्मा का निवास हो, और चारों ओर छाया हुआ असत्य का अंधकार दूर हो। कूटस्थ सूर्यमंडल में जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं, और वे ही जगन्माता हैं। सारी पृथकताओं के बोध को उनमें विलीन कर रहा हूँ। ॐ ॐ ॐ !!
.
"ब्रह्मानंदम् परम सुखदम् केवलं ज्ञान मूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।।
एकं नित्यं विमलं चलम् सर्वधीसाक्षी भूतम्।
भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरुं तम् नमामि।।"
.
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।।"
.
सभी को अनंत मंगलमय शुभ कामनाएँ। मेरी सब तरह की भूल-चूक क्षमा करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ नवंबर २०२३