Saturday, 28 May 2022

हम जो कुछ भी हैं, वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मफलों के कारण हैं, न की ईश्वर की इच्छा या कृपा से ---

 हम जो कुछ भी हैं, वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मफलों के कारण हैं, न की ईश्वर की इच्छा या कृपा से ---

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हमारा सौभाग्य और दुर्भाग्य, व सफलता और विफलता -- हमारे अपने स्वयं के कर्मफलों का परिणाम है, भगवान की इसमें कोई दखल नहीं है। भगवान न तो किसी को दुःख देते हैं, और न सुख। पूर्व जन्मों में हमने जो बीज बोये थे, उन्हीं की फसल अब हम काट रहे हैं। भगवान की किसी से न तो शत्रुता है और न किसी से कोई लोभ। जो और जैसा भी हमने सोचा है वह ही हमारा कर्म है और उसी का फल हम भोगेंगे। सारा कार्य प्रकृति सम्पन्न कर रही है। .
हमारे विचार और संकल्प, पूरी सृष्टि पर निश्चित रूप से अपना प्रभाव डालते हैं| यह सारी सृष्टि हमारे ही सामूहिक विचारों का घनीभूत रूप है| हमारे विचार पूरी सृष्टि से प्रतिबिंबित होकर हमारे ही पास लौटते हैं और हमारे जीवन को संचालित करते हैं| ये ही हमारे "कर्म" हैं जिनका फल हमें निश्चित रूप से मिलता है|
अतः हमारे विचार सदा शुभ हों| जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं|
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सभी का कल्याण हो। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
२८ मई २०२२

Sunday, 22 May 2022

बचा हुआ समय सिर्फ आत्म-साक्षात्कार (भगवत्-प्राप्ति) के लिए है ---

समय बहुत कम है, जो भी समय बचा है, वह धर्म, राष्ट्र व ईश्वर के लिए है। वर्तमान समय बड़ा विकट है। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु देश को लाखों आध्यात्मिक साधक/उपासक चाहियें, जो उपासना द्वारा निज जीवन में ईश्वर को व्यक्त कर सकें। उनकी उपासना के प्रभाव से राष्ट्र में एक ब्रह्मशक्ति का प्राकट्य होगा, जो निश्चित रूप से धर्म की पुनर्स्थापना व वैश्वीकरण कर, चारों ओर छाये असत्य के अंधकार को नष्ट करेगी। यह एक ईश्वरीय कार्य है। अब आवश्यकता व्यावहारिक उपासना की है, बौद्धिक चर्चा की नहीं। अतः अधिकाधिक समय भगवान को दें, ताकि धर्म व राष्ट्र की रक्षा हो।
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स्वयं शिवभाव में स्थित होकर शिव का गहन से गहन ध्यान करते हुये, ध्यान में प्राप्त आनंद का वैसे ही सर्वत्र विस्तार करते रहें, जैसे भगवान शिव अपने सिर से ज्ञान रूपी गंगा का करते हैं। वह अनंत विस्तार और उससे परे की चेतना हम स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं।
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भगवान शिव परम-चैतन्य हैं। समस्त सृष्टि के उद्भव, स्थिति और संहार की क्रिया उनका नृत्य है। उनके माथे पर चन्द्रमा कूटस्थ-चैतन्य, गले में सर्प कुण्डलिनी-महाशक्ति, उनकी दिगंबरता सर्वव्यापकता, और देह पर भभूत वैराग्य के प्रतीक हैं। जैसे उनके सिर से ज्ञान की गंगा निरंतर प्रवाहित हो रही है, वैसे ही हमारे कूटस्थ से उनकी चेतना निरंतर दशों दिशाओं में विस्तृत होती रहे। वह अनंत विस्तार और उससे भी परे का अस्तित्व हम हैं, यह देह नहीं। उस शिवभाव का निरंतर विस्तार करते हुए उसका आनंद लें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ मई २०२२
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हम किसकी उपासना करें? ---

 हम किसकी उपासना करें? ---

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इस विषय को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के १२वें अध्याय 'भक्ति-योग' में जितनी अच्छी तरह से समझाया है, उतना स्पष्ट अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलेगा। सिर्फ समझने की आवश्यकता है। हम इसे इसलिये नहीं समझ नहीं पाते क्योंकि हमारे मन में भक्ति नहीं, व्यापार है। भगवान हमारे लिए एक साधन हैं; जिनके माध्यम से हम हमारे साध्य -- रुपया-पैसा, धन-संपत्ति, यश और इंद्रिय-सुखों को प्राप्त करना चाहते हैं। भगवान को हमने उपयोगिता का एक साधन बना लिया है, इसलिए भगवान का नाम हम दूसरों को ठगने के लिये लेते हैं। वास्तव में हम स्वयं को ही ठग रहे हैं। हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती इसका एकमात्र कारण "सत्यनिष्ठा का अभाव" है। अन्य कोई कारण नहीं है।
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हमारा लक्ष्य यानि साध्य तो भगवान स्वयं ही हों। भगवान कहते हैं ---
"मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥१२:२॥"
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥१२:३॥"
"संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥१२:४॥"
अर्थात् -- "मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं॥"
"परन्तु जो भक्त अक्षर ,अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वगत, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं॥"
"इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं॥"
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इस से पहिले भगवान ११वें अध्याय के ५५वें श्लोक में भगवान कह चुके हैं ---
"मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥११:५५॥"
अर्थात् -- "हे पाण्डव! जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है तथा संगरहित है, जो भूतमात्र के प्रति निर्वैर है, वह मुझे प्राप्त होता है॥"
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गुरु के उपदेश व आदेशानुसार योगमार्ग के साधक कूटस्थ में भगवान का ध्यान पूर्ण भक्ति से करते हैं। निराकार तो कुछ भी नहीं है। जिसकी भी सृष्टि हुई है, वह साकार है। उपासना साकार की ही हो सकती है। पूरी तरह समझकर अध्याय १२ (भक्तियोग) का खूब स्वाध्याय और ध्यान करें। मन में छाया असत्य का सारा अंधकार दूर होने लगेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२२ मई २०२१

जो भी आहार हम लेते हैं, वह वास्तव में परमात्मा को ही अर्पित करते हैं ---

 जो भी आहार हम लेते हैं, वह वास्तव में परमात्मा को ही अर्पित करते हैं ---

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हमें अपने खान-पान के बारे में बहुत अधिक सतर्क रहना चाहिए| भोजन (खाना-पीना) एक यज्ञ है जिसमें साक्षात परब्रह्म परमात्मा को ही आहार अर्पित किया जाता है जिस से पूरी सृष्टि का भरण-पोषण होता है| जो भी हम खाते-पीते हैं वह वास्तव में हम नहीं खाते-पीते हैं, स्वयं परमात्मा ही उसे वैश्वानर जठराग्नि के रूप में ग्रहण करते हैं| अतः परमात्मा को निवेदित कर के ही भोजन और जलपान करना चाहिए| बिना परमात्मा को निवेदित किये हुए किया गया आहार, पाप का भक्षण है| भोजन भी वही करना चाहिए जो भगवान को प्रिय है|
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"अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः| प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्||१५:१४||"
अर्थात् मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ||
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"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति| तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः||९:२६||"
अर्थात् जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ||
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जैसा अन्न हम खाते हैं वैसा ही हमारा मन हो जाता है, और वैसा ही हमारा वाक् और तेज हो जाता है| अन्न का अर्थ है जो भी हम खाते पीते हैं|
"अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति||" (छान्दोग्य उपनिषद्. ६.५.४)
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हमारा अन्तःकरण (मन,बुद्धि, चित्त और अहंकार) भी अन्न के अणुत्तम अंश से ही बनता है|
"अन्नमशितं त्रेधा विधियते । तस्य यः स्थविष्टो धातुस्तत्पुरीषं भवति , यो मध्यमस्तन्मांसं , यो अणिष्ठः तन्मनः ॥" (छान्दोग्य उपनिषद् ६.५.१)
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जो जल हम पीते हैं, उसका सूक्ष्मतम भाग प्राण रूप में परिणित हो जाता है|
"आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते | तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणाः ||"
(छान्दोग्य उपनिषद ६.५.२)
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भोजन से पूर्व मानसिक रूप से गीता का यह श्लोक बोलना चाहिए ....
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्| ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना||४:२४||"
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जो मनुष्य प्राणवायु की पाँच आहुतियाँ : "ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा" देकर मौनपूर्वक भोजन करता है, उसके पाँच पातक नष्ट हो जाते हैं| - पद्म पुराण.
(प्रथम ग्रास के साथ तो "ॐ प्राणाय स्वाहा" मानसिक रूप से बोलना ही चाहिए, अन्य मंत्र दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें ग्रास के साथ बोल सकते हैं)
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जल पीने से पहिले "ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा" (भावार्थ:-- हे जल! तुम अमृत स्वरूप हो, तुम अमृत स्वरूप आच्छादन हो) मानसिक रूप से बोल कर उसी भाव से जल पीना चाहिए जैसे अमृत पान कर रहे हैं|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मई २०१८

क्या जीवन में परमात्मा की कोई आवश्यकता है? ---

 क्या जीवन में परमात्मा की कोई आवश्यकता है?

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अधिकांश लोग कहते हैं कि हमारे पास परमात्मा पर ध्यान के लिए, साधना के लिए, भजन के लिए समय नहीं है| कुछ लाभ होता है या घर में उससे चार पैसे आते हैं तो कुछ सोचें भी अन्यथा क्यों समय नष्ट करें| यह तो निठल्ले लोगों का काम है|
दूसरे कुछ लोग कहते हैं कि जब तक हाथ पैर चलते हैं तब तक खूब पैसे कमाओ, अपना और अपने परिवार व बच्चों का जीवन सुखी करो| जब खाट पकड़ लेंगे तब भगवान को याद करेंगे|
तीसरी तरह के लोग होते हैं कि अभी हमारा समय नहीं आया है| जब समय आयेगा तब देखेंगे|
चौथी प्रकार के लोग हैं जो कहते हैं कि अभी जिंदगी में कुछ मजा, मौज-मस्ती की ही नहीं है| मौज मस्ती से दिल भरने के बाद सोचेंगे|
पांचवीं तरह के लोग हैं जो कहते हैं कि जैसा हम विश्वास करते या सोचते हैं, वह ही सही है, बाकि सब गलत| हमारी बात ना मानो तो तुम जीने लायक ही नहीं हो|
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उपरोक्त सभी को सादर नमन|
दुनिया अपने हिसाब से अपने नियमों से चल रही है, और चलती रहेगी| कौन क्या सोचता है और क्या कहता है क्या इसका कोई प्रभाव पड़ता है?
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जीवन में एक ही पाठ निरंतर पढ़ाया जा रहा है, वह पाठ शाश्वत है| जो नहीं सीखते हैं, वे प्रकृति द्वारा सीखने को बाध्य कर दिए जाते हैं|
भगवान हो या ना हो, विश्वास करो या मत करो कोई अंतर नहीं पड़ता|
किसी से प्रभावित हुए बिना अपना कार्य करते रहो| प्रकृति सब कुछ सिखा देगी|
ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
२२ मई २०१५

पाकिस्तान का फिलिस्तीन से प्रेम का नाटक एक ढोंग है ---

 पाकिस्तान का फिलिस्तीन से प्रेम का नाटक एक ढोंग है ---

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पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया-उल-हक़ ने पकिस्तानी फौज के साथ १६ सितंबर १९७० को जब वे ब्रिगेडियर के रूप में जोर्डन में नियुक्त थे, जोर्डन के राजा किंग हुसैन के आदेश से दस-हजार से पच्चीस हजार के बीच फिलिस्तीनी मुसलमानों की हत्या की थी। इसके लिए किंग हुसैन ने उन्हें जोर्डन का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान भी दिया था।
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फिलिस्तीनी नेता यासर अराफ़ात अपने समय का सबसे बड़ा ढोंगी और दुष्ट था जिसने उस समय कसम खाई थी कि वह कभी पाकिस्तान नहीं जाएगा। लेकिन इस घटना के बाद तीन बार पाकिस्तान गया। तत्कालीन भारत सरकार से नेहरू शांति पुरस्कार, और करोड़ों रुपए, व मुफ्त में एक बोइंग हवाई जहाज ठग कर भी, कश्मीर के मामले में सदा पाकिस्तान का साथ दिया। भारत पर उस समय एक असत्य का अंधकार छाया हुआ था, जो ऐसे दुष्टों का साथ दिया। भारत ने फिलिस्तीन के विद्यार्थियों को भारत में निःशुल्क अध्ययन, निवास और भोजन की व्यवस्था भी कर रखी थी।
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वर्तमान में स्थिति यह है कि अरब देश फिलिस्तीनियों को कोई भाव नहीं देते। उनको अपने से दूर खड़ा कर के ही बात करते हैं। उन को सब तरह की आर्थिक सहायता भी बंद कर दी है। लगभग सारे अरब देश - ईरान के विरुद्ध और इज़राइल से समीप हैं।
२२ मई २०२१

Saturday, 21 May 2022

परमात्मा की एक झलक जब भी मिल जाये तब अन्य सब गौण है ---

 परमात्मा की एक झलक जब भी मिल जाये तब अन्य सब गौण है। वे ही एकमात्र सत्य हैं, वे ही लक्ष्य हैं, वे ही मार्ग हैं, वे ही सिद्धान्त हैं, और सब कुछ वे ही हैं। उनसे परे इधर-उधर देखना भटकाव है। वे धर्म-अधर्म और सब से परे हैं। उनके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है -- मैं भी नहीं।

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हे प्रभु, आप इस तरह मुझे छोड़कर कहीं जा नहीं सकते। जो स्थितप्रज्ञता, समत्व, और पूर्णता अभीप्सित थी, वह अभी तक मुझमें कहीं भी दिखाई नहीं दी है। एक बहुत पतले धुएँ का सा आवरण अभी भी मेरे समक्ष है। इस हृदय को पूरी तृप्ति अभी भी नहीं मिली है, और मन पूरी तरह नहीं भरा है। ऐसे में आपको यहीं रहना होगा। मैंने जो स्वप्न देखा था -- वैराग्य, वीतरागता, सत्यनिष्ठा, परमप्रेम, और स्थितप्रज्ञता का, उसे साकार किए बिना आपको कहीं जाने का अधिकार नहीं हैं। जब तक यह हृदय तृप्त नहीं होता, आप यहीं रहेंगे।
आप तो कालों के काल हैं -- "कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।" मेरे सारे राग-द्वेष, अहंकार, लोभ और पृथकता के बोध की असीम वेदना को काल-कवलित कर दीजिये। अब आप कहीं भी नहीं जाएँगे, आपका हृदय ही मेरा भी हृदय है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२१ मई २०२१