Thursday, 3 July 2025

वेदान्त के अनसार जब हम यह शरीर नहीं, प्रत्यगात्मा हैं, तब हमारा गुरु कौन है?

 वेदान्त के अनसार जब हम यह शरीर नहीं, प्रत्यगात्मा हैं, तब हमारा गुरु कौन है?

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प्रत्यगात्मा (प्रत्यक्+आत्मा) शब्द कृष्ण-यजुर्वेद के कठोपनिषद के द्वितीय अध्याय की प्रथम वल्ली के प्रथम मंत्र में आता है। आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में इसे समझाया भी है। यह विषय मेरी बौद्धिक क्षमता से परे का है, लेकिन अनुभूतियों से परे का नहीं है। इस विषय पर मैं शब्द-रचना नहीं कर सकता, लेकिन शब्दों से परे के अनुभव ले सकता हूँ। मेरे अनुभव कोई अन्य समझ भी नहीं सकता। लेकिन मुझे कोई संशय नहीं है। मेरे लिए एक ही विकल्प बचता है कि मैं मौन होकर साधना करूँ, और बाकी सब परमात्मा पर छोड़ दूँ। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३ जुलाई २०२५
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(पुनश्च: -- आध्यात्मिक अनुभूतियों पर मुझे कुछ भी नहीं कहना है। सर्वप्रथम हम वीतराग होकर स्थितप्रज्ञ बनें, फिर समर्पित होकर ब्रह्म में स्थित हों। इससे आगे की समस्या परमात्मा की है, हमारी नहीं। बिना वीतराग हुए आगे के द्वार नहीं खुलते। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही महात्मा है।)

हमारा सुहाग परमात्मा है ---

 पलटू सोइ सुहागनी, हीरा झलके माथ ---

सुहागन वो ही है जिसके माथे पर हीरा झलक रहा है| अब यह प्रश्न उठता है कि सुहागन कौन है और माथे का हीरा क्या है ?
वह हीरा है ब्रह्मज्योति का जो हमारे माथे पर कूटस्थ में देदीप्यमान है| सुहागन है वह जीवात्मा जो परमात्मा के प्रति पूर्णतः समर्पित है| हमें सुहागन भी बनना है और माथे पर हीरा भी धारण करना है| हमारा सुहाग परमात्मा है| ॐ तत्सत् |
३ जुलाई २०२१

हमारे पतन का मुख्य कारण -- "तमोगुण" की प्रधानता है ---

 किसी भी व्यक्ति, समाज, व देश के पतन का मुख्य कारण -- "तमोगुण" की प्रधानता है। "रजोगुण" की प्रधानता से सांसारिक उन्नति होती है, और सतोगुण की प्रधानता से आध्यात्मिक उन्नति।

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ज्ञानयोग व भक्तियोग को वे ही समझ सकते हैं, जिनमें सतोगुण प्रधान होता है। ऐसे ही कर्मयोग को वे ही समझ सकते जिनमें रजोगुण प्रधान होता है। जो इन सब गुणों से परे होता है वह जीवनमुक्त होता है। यह सब हमारी जन्म-जन्मांतरों की साधना पर निर्भर है कि हमारे में कौन सा गुण प्रधान रहेगा।
ॐ तत्सत्
३ जुलाई २०२२

"कबीर बिछड्या राम सूँ , ना सुख धूप न छाँह" ---

 "कबीर बिछड्या राम सूँ , ना सुख धूप न छाँह" ---

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विरही को कहीं सुख नहीं है। सुख सिर्फ राम में ही है, बाकी सब मृगतृष्णा है। सुख के स्वप्न और मधुर कल्पनायें -- हमें कर्मफलों के बंधनों में बांधती हैं। फिर क्या करें? संसार का सार क्या है?
स्वयं से बार-बार यही पूछते रहो, यही संसार का सार है। जीवन में सफलता का मापदंड "संतोष", "तृप्ति" और "आनंद" है, रुपया-पैसा नहीं। सांसारिक दृष्टि से अति सफल लोगों को मैनें आत्म-ह्त्या करके मरते हुए देखा है।
सभी व्थथाओं का संबंध इस देह से है, हम यह देह नहीं, परमात्मा के अमृतपुत्र हैं।
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भगवान से अलग हो चुकी आत्मा को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता है। दिन और रात, धूप और छाँह - कहीं भी सुख नहीं है। प्राण तो उनके विरह में ही तप कर समाप्त हो जाएँगे। लगता है यह आत्मा इस योग्य नहीं हुई है कि इस जन्म में हरिःदर्शन कर सके। इस पीड़ा को या तो मारने वाला जानता है, या फिर इसे भोगने वाला ही।
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भगवान भी निशाना लेकर बड़े यत्न से खींच-खींच कर साधते हुए अपने प्रेम का बाण चलाते हैं, जो चित्त के आर-पार हो जाता है। उनकी यह सधी हुई मार ही हमारी वेदना है। विरह की अग्नि असहनीय है।
नैनन की करि कोठरी पुतली पलंग विछाय।
पलकों की चिक डारिकै पिय को लिया रिझाय॥
पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात।
देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात॥
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रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलइहैं लोग सब, बांट न लइहैं कोय॥"
मेरी व्यथा साक्षात् परमात्मा की ही व्यथा है, जिसका समाधान भी वे ही हैं। उनकी व्यथा उन्हें ही समर्पित है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जुलाई २०२२

मैं जहां पर भी हूँ, भगवान वहीं हैं, भगवान सदा मेरे साथ हैं, और निरंतर मेरी चेतना में रहते हैं ---

 

मैं जहां पर भी हूँ, भगवान वहीं हैं, भगवान सदा मेरे साथ हैं, और निरंतर मेरी चेतना में रहते हैं ---
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किसी अन्य के किए हुए भोजन से हमारी भूख नहीं मिटती। भूख मिटाने के लिए भोजन तो हमें स्वयं को ही करना होगा। इसी तरह दूसरों के द्वारा की गई तपस्या से हमारा कल्याण नहीं हो सकता। हमारा कल्याण हो, हम कृतकृत्य हों, इसके लिए स्वयं को ही तपस्या करनी होगी।
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हम संतों की सेवा करते हैं क्योंकि हमारे शास्त्र हमें सत्संग और संत-सेवा का आदेश देते हैं। संत हमें प्रेरणा देते हैं, हमें प्रोत्साहित करते हैं, और आवश्यक होने पर हमारा मार्गदर्शन भी करते हैं, इसलिए वे पूज्य हैं। उनका अस्तित्व ही हमारे लिये कल्याणकारक है। साहित्य में संतों के चरण-रज की बड़ी महिमा है, लेकिन वह भाषा का एक अलंकार मात्र है। मानसिक रूप से आप गुरु-चरणों में प्रणाम निवेदित कीजिये, मानसिक रूप से उनके चरणों की धूल में स्नान कीजिये और उसे माथे पर लगाइये। इसका बड़ा महत्व है। लेकिन उनकी चरण-रज को लेने, और चरण-स्पर्श के लिये आप मारामारी और धक्का-मुक्की करते हैं, दूसरों को नीचे गिराते हैं, दूसरों के शरीर पर पैर रखकर आगे बढ़ते हैं, और अभद्र व्यवहार करते हैं, तो ऐसी भक्ति किस काम की? ऐसी भक्ति नहीं चाहिए।
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ऐसा मेरे साथ तीन बार हुआ है। एक बार तो मथुरा में और एक बार नाथद्वारा में सपत्नीक दर्शन करने गए तब देखा कि दर्शन के समय बड़ी भयंकर मारामारी थी। हम दूर खड़े रहे, और भगवान से प्रार्थना की कि बड़ी दूर से आये हैं, दर्शन दे दो, नहीं तो बड़ा क्षोभ होगा। भगवान की कृपा से वहाँ व्यवस्था में खड़ीं कुछ महिला पुलिस कर्मियों को हमारे पर बड़ी दया आई और उन्होने रास्ता बनाकर हमें दर्शन करवाये।
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एक बार झारखंड के देवघर में भगवान शिव के दर्शन करने गए तब वहाँ पागलों की सी भीड़ थी। पुलिस वाले नियंत्रित कर कर के भीड़ को निपटा रहे रहे थे। वहाँ जाकर भगवान से यही प्रार्थना की कि कैसे भी एक बार यहाँ से जीवित बापस चले जाएँ, फिर दुबारा कभी भी यहाँ नहीं आयेंगे। बड़ी मुश्किल से जान बची।
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दक्षिण भारत के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में बिना धोती पहिने आप अंदर नहीं जा सकते। मुझे यह व्यवस्था बड़ी अच्छी लगी। पुरुषों को तो ऊपर से बानियान भी उतारनी पड़ती है। महिलाओं के लिये साड़ी पहिनना अनिवार्य है। अभी चार महीनों पूर्व ही कर्नाटक में गोकर्ण नामक स्थान में चार सप्ताह के लिये गया था। वहाँ आसपास के कुछ गाँव बड़े अच्छे और सुंदर हैं। स्विट्जरलेंड में भी इतना सौंदर्य नहीं है। वहाँ एक मित्र ने एकांत में रहने की मेरी व्यवस्था कर दी थी। गोकर्ण में भगवान शिव का महाबलेश्वर नामक एक अति प्रसिद्ध मंदिर है, जिसमें जाने के लिये महिलाओं के लिये साड़ी और पुरुषों के लिये सिर्फ धोती पहिनना अनिवार्य है। मुझे यह बात बड़ी अच्छी लगी। तमिलनाडु में कन्याकुमारी और शचीन्द्रम के मंदिरों में भी यही नियम है।
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भारत के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन के लिये गया हूँ। अच्छे-बुरे अनेक अनुभव हुए है। लेकिन मेरी श्रद्धा में कभी कोई कमी नहीं आई है। सिर्फ दर्शन के उद्देश्य से अब कहीं भी नहीं जाता। मैं जहां पर भी हूँ, भगवान वहीं है। भगवान सदा मेरे साथ हैं, और निरंतर मेरी चेतना में रहते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जुलाई २०२४

Wednesday, 2 July 2025

शब्दों की एक सीमा होती है ---

 शब्दों की एक सीमा होती है। कई बार अपने भावों को व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का हम प्रयोग करते हैं, वे शब्द गलत होते हैं, लेकिन उनका कोई विकल्प नहीं होता इसलिए उनका प्रयोग करना पड़ता है। उदाहरण के लिए मैं इन दो शब्दों को लेता हूँ -- "आत्म-साक्षात्कार" और "भगवत्-प्राप्ति"।

आत्मा तो सदा साक्षात् है, अतः आत्म-साक्षात्कार कैसा?
भगवान तो सदा प्राप्त हैं, अतः भगवत्-प्राप्ति कैसी?

अपना मन और बुद्धि -- दोनों ही परमात्मा को अर्पित किये बिना साधना में जरा सी भी प्रगति नहीं होती।

 अपना मन और बुद्धि -- दोनों ही परमात्मा को अर्पित किये बिना साधना में जरा सी भी प्रगति नहीं होती।

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श्रीमदभगवद्गीता के अक्षरब्रह्मयोग (अध्याय ८) में यह भगवान का स्पष्ट आदेश है, और मेरा निजी अनुभव भी। भगवान के इन वचनों का हम निरंतर स्मरण करें --
"अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥८:५॥"
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥८:६॥"
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
"हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।
अर्थात् - और जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं॥
हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है॥
इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
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यहाँ सातवें श्लोक में "च" शब्द बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इसका शाब्दिक अर्थ तो "और" है। जीवन भर भगवान का स्मरण करते हुये हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे तब जाकर हम अपने मन और बुद्धि का भगवान में समर्पण कर सकेंगे। यह इतना सरल नहीं हैं, जितना हम सोचते हैं। युद्ध का अर्थ सारे सांसारिक दायित्व भी हैं।
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व्यावहारिक रूप से खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा लगाकर मूर्धा में अक्षरब्रह्म परमात्मा का निरंतर मानसिक जप करें। खेचरी मुद्रा तो युवावस्था में ही सिद्ध हो सकती है, लेकिन अर्धखेचरी वृद्ध भी सिद्ध कर सकते हैं। अपनी जीभ को ऊपर की ओर मोड़ कर जितना पीछे ले जा सकते हैं उतनी पीछे ले जाकर तालु से सटाकर रखें, और मूर्धा में अक्षरब्रह्म परमात्मा का निरंतर मानसिक जप करते रहें। ऊपर के दांतों से ऊपर के खोपड़ी के भाग को मूर्धा कहते हैं। इस विषय पर और नहीं लिखूंगा अन्यथा इस विषय का अत्यधिक विस्तार हो जाएगा। किसी भी तरह की कोई कामना न करें। बुद्धि बहुत सारे सुझाव देगी, उन सब को श्रीकृष्ण समर्पण कर दें। श्रीकृष्ण में समर्पण का भाव ही मुख्य है, और कुछ भी नहीं। हमारे हृदय में (विचारों में) पवित्रता होगी तो भगवान स्वयं सारी बात समझा देंगे। भगवान वहीं आते हैं जहां विचारों में पवित्रता होती है। मन में जहां कुटिलता होती है, वहाँ भगवान नहीं आते। हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जुलाई २०२५