देश जले, और मैं न बोलूँ ! मैं ऐसा गद्दार नहीं, -- बहुत हो चुका है, हे देशवासियो, अब तो जागो!! कहीं तन से सिर जुदा न हो जाये !!
Tuesday, 10 June 2025
देश जले, और मैं न बोलूँ ! मैं ऐसा गद्दार नहीं ---
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सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास बनाए रखना है। कहीं अरब और मुस्लिम देश नाराज न हो जाएँ! कहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ का मानवाधिकार आयोग नाराज न हो जाये! देश की अस्मिता चाहे नष्ट हो जाये, पर धर्मनिरपेक्षता, गंगा-जमनी तहजीब और भाई-चारा बना रहना चाहिए। भारत में सभी पर शरिया कानून लागू होते ही पूरे देश में सुख-शांति स्थापित हो जायेगी !!
"कब समय क्षमा कर पाता है ऐसे कुत्सित अपराधों को,
सब पुण्यभेंट हो जाते हैं ऐसे कुछ हिंसक व्याधों को।
यदि सिंहासन प्रति वचनबद्ध हो पाप निहारा जायेगा,
हे! भीष्म तुम्हारा पौरुष भी सदियों धिक्कारा जाएगा।"
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"क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥२:३॥" (गीता)
अर्थात् हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे ! परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ॥
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बहुत हो चुका है हे भारत वासियो, अब तो जागो !!
११ जून २०२२
अपने स्वधर्म पर अडिग रहें, धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है ---
अपने स्वधर्म पर अडिग रहें, धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है ---
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हमारा स्वधर्म है -- परमात्मा को पाने की अभीप्सा (अतृप्त आध्यात्मिक प्यास और तड़प), परमात्मा से परमप्रेम (भक्ति), और परमात्मा को पाने का पुरुषार्थ (आत्म-साक्षात्कार)। उनका निरंतर स्मरण करते रहें। हम अपनी रक्षा करने में समर्थ होंगे। हमारी रक्षा होगी।
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भगवान कहते हैं --
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् - इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
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"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् - सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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भगवान हमारे हृदय में आ जाएँ और हम भगवान के हृदय में स्थित हो जाएँ, इस से बड़ी कोई उपलब्धि नहीं है।
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥"
अर्थात् - जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके मानने में भी नहीं आता और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े भारी दु:ख से भी विचलित नहीं होता है॥
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भगवान को समर्पित हो कर, उन का स्मरण करते हुये सारे कार्य करें।
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।
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गीता में भगवान के उपदेशों का यह चरम श्लोक है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् - सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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हरिः प्रेरणा से यह सब लिखा गया। भगवान सदा हमारे हृदय में, और हम सदा उनके हृदय में रहें। हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
११ जून २०२२
फाँसी पर ले जाते समय बड़े जोर से कहा "वन्दे मातरम् ! भारतमाता की जय !"
फाँसी पर ले जाते समय बड़े जोर से कहा "वन्दे मातरम् ! भारतमाता की जय !"
-- और शान्ति से चलते हुए कहा --
"मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे, बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र और तेरी जुस्तजू रहे॥"
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"I wish the downfall of British Empire ! अर्थात मैं ब्रिटिश साम्राज्य का पतन चाहता हूँ !"
उसके पश्चात यह शेर कहा --
"अब न अह्ले-वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है |"
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फिर ईश्वर का ध्यान व प्रार्थना की और --
"ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानी परासुवः यद् भद्रं तन्न आ सुवः"
वेद मंत्र का पाठ कर अपने गले में अपने ही हाथों से फाँसी का फंदा डाल दिया।
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रस्सी खींची गयी। पं.रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गये, आज जिनका १२७वां जन्मदिवस है।
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"तेरा गौरव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें"
उन्हीं के इन शब्दों में भारत माँ के इन अमर सुपुत्र को श्रद्धांजलि।
जय जननी जय भारत । ॐ ॐ ॐ ॥
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हे पराशक्ति ! माँ भारती, भारतवर्ष अब भ्रष्ट, कामचोर, राष्ट्र-धर्मद्रोही, झूठे और रिश्वतखोर कर्मचारियों, अधिकारियों व राजनेताओं का देश हो गया है। इन सब का समूल विनाश कर ! तेरी जय हो॥ ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ जून २०२४
पञ्च मकार साधना :--- (Re-Edited & Re-Posted)
पञ्च मकार साधना :--- (Re-Edited & Re-Posted)
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यह राजयोग व तंत्र की सर्वोच्च साधना है। पञ्च मकार -- मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन -- इन पांचो पर टिकी है यह पञ्च मकार साधना। यहाँ इस लेख में मैं कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुए अधिकतम बात कहना चाहता हूँ। कुछ शब्द जिन्हें हम गलत समझते हैं, उनके सही अर्थ पर ही विचार करेंगे।
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(१) आगमसार के अनुसार पहिला मकार "मद्यपान" क्या है? :--
पीत्वानंदमयास्तां य: स एव मद्यसाधक:॥"
अर्थात् -- हे वरानने ! ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है, उसका पान करने से जो आनंदित होते हैं उन्हें ही मद्यसाधक कहते हैं।
जिन्हे खेचरी-मुद्रा सिद्ध है, वे इसे अच्छी तरह समझ सकते हैं। ब्रह्मा का कमण्डलु तालुरंध्र है और हरि: का चरण सहस्त्रार है। सहस्त्रार से जो अमृत की धारा तालुरन्ध्र में जिव्हाग्र पर (ऊर्ध्वजिव्हा) आकर गिरती है वही मद्यपान है।
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(२) आगमसार के अनुसार "मांस-भक्षण" क्या है?
"माँ शब्दाद्रसना ज्ञेया तदंशान रसना प्रियान।
सदा यो भक्षयेद्देवि स एव मांससाधक:॥"
अर्थात मा शब्द से रसना, और रसना का अंश है वाक्य, जो रसना को प्रिय है। जो व्यक्ति रसना का भक्षण करते हैं यानी वाक्य संयम करते हैं, उन्हें ही मांस साधक कहते हैं। जिह्वा के संयम से वाक्य का संयम स्वत: ही खेचरी मुद्रा में होता है। तालू के मूल में जीभ का प्रवेश कराने से बात नहीं हो सकती और इस खेचरीमुद्रा का अभ्यास करते करते अनावश्यक बात करने की इच्छा समाप्त हो जाती है। इसे ही मांस-भक्षण कहते हैं।
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(३) आगमसार के अनुसार "मत्स्य-भक्षण" क्या है?
"गंगायमुनयोर्मध्ये मत्स्यौ द्वौ चरत: सदा।
तौ मत्स्यौ भक्षयेद यस्तु स: भवेन मत्स्य साधक:॥"
अर्थान गंगा यानि इड़ा, और यमुना यानि पिंगला; इन दो नाड़ियों के बीच सुषुम्ना में जो श्वास-प्रश्वास गतिशील है वही मत्स्य है। जो योगी आतंरिक प्राणायाम (क्रियायोग) द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित कर लेते हैं वे ही मत्स्य साधक हैं|
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(४) आगमसार के अनुसार चौथा मकार "मुद्रा" क्या है? --
"सहस्त्रारे महापद्मे कर्णिका मुद्रिता चरेत।
आत्मा तत्रैव देवेशि केवलं पारदोपमं॥
सूर्यकोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलं।
अतीव कमनीयंच महाकुंडलिनियुतं॥
यस्य ज्ञानोदयस्तत्र मुद्रासाधक उच्यते॥"
सहस्त्रार के महापद्म में कर्णिका के भीतर पारद की तरह स्वच्छ निर्मल करोड़ों सूर्य-चंद्रों की आभा से भी अधिक प्रकाशमान ज्योतिर्मय सुशीतल अत्यंत कमनीय महाकुंडलिनी से संयुक्त जो आत्मा विराजमान है, उसे जिन्होंने जान लिया है वे मुद्रासाधक हैं।
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(५) आगमसार के अनुसार पाँचवाँ मकार "मैथुन" क्या है?
इस की व्याख्या नौ श्लोकों में है। एक श्लोक मिल नहीं रहा है। टंकण में समय बहुत लगता है, अतः उपलब्ध आठ श्लोकों का केवल हिन्दी अनुवाद ही प्रस्तुत कर रहा हूँ ---
"मैथुन तत्व ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है। मैथुन द्वारा सिद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है" ॥१॥"
"नाभि (मणिपुर) चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजसतत्व 'र'कार है। उसके साथ एक अकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप 'म'कार का मिलन होता है॥२॥"|
"ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है। उस अवस्था में रमण करने का नाम ही "राम" है॥३॥"
"इसका वर्णन मुंह से नहीं किया जा सकता। जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए "राम" तारकमंत्र है॥४॥"
"हे देवि, मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं॥५॥"
"यह आत्मतत्व में स्थित होना ही मैथुन तत्व है। अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है। स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है॥६॥"
"केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है। खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है॥७॥"
"अजपा-जप ही रमण है। यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है, वह दक्षिणा है॥८॥"
"यह पञ्चमकार की साधना भगवान शिव द्वारा पार्वती जी को बताई गयी है॥"
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कुलार्णव तन्त्र के अनुसार --
"मद्यपानेन मनुजो यदि सिद्धिं लभेत वै|
मद्यपानरता: सर्वे सिद्धिं गच्छन्तु पामरा:||
मांसभक्षेणमात्रेण यदि पुण्या गतिर्भवेत|
लोके मांसाशिन: सर्वे पुन्यभाजौ भवन्तु ह||
स्त्री संभोगेन देवेशि यदि मोक्षं लभेत वै|
सर्वेsपि जन्तवो लोके मुक्ता:स्यु:स्त्रीनिषेवात||"
अर्थात् -- मद्यपान द्वारा यदि मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर ले तो फिर मद्यपायी पामर व्यक्ति भी सिद्धि प्राप्त कर ले। मांसभक्षण से ही यदि पुण्यगति हो तो सभी मांसाहारी ही पुण्य प्राप्त कर लें। हे देवेशि! स्त्री-सम्भोग द्वारा यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर सभी स्त्री-सेवा द्वारा मुक्त हो जाएँ।
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तंत्र के अनुसार सदा याद रखने योग्य बात यह है कि -- परमात्मा में यानि राम में सदैव रमण ही मैथुन है न कि शारीरिक सम्भोग। यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं।
ध्यान साधना के समय योगी सूक्ष्म रूप से नाक से या मुंह से सांस नहीं लेते। वे सांस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है। नाक या या मुंह से ली गई सांस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है। जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब सांस रुक जाती है, और मृत्यु हो जाती है। इसे ही प्राण निकलना कहते हैं। अतः अजपा-जप का अभ्यास नित्य करना चाहिए। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जून २०२५
भारत के अमृतकाल का आरंभ हो चुका है ---
भारत के अमृतकाल का आरंभ हो चुका है ---
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आज भगवान से प्रार्थना की है कि भारत एक सत्यधर्मनिष्ठ राष्ट्र के रूप में अपने द्विगुणित परम वैभव को प्राप्त हो। जब तक मैं इस शरीर में जीवित हूँ, और जब तक सांसें चल रही हैं, मेरी हर सांस परमात्मा को समर्पित है।
जब समय आयेगा तब सचेतन रूप से इस देह को त्याग कर, धर्ममय-अमृत का पान करता हुआ, कूटस्थ सूर्य की रश्मियों के सहारे भगवान पुरुषोत्तम के उस लोक में चला जाऊंगा जिस के बारे में वे स्वयं गीता में कहते हैं --
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
(अर्थात् - उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है॥)
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श्रुति भगवती भी जिस के बारे में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥"
(मुण्डक २/२/११) व (कठ २/२/१५)
(अर्थात् - वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, चन्द्र और तारे भी नहीं, विद्युत् भी नहीं चमकती, तब यह पार्थिव अग्नि भी कैसे जल पायेगी।
जो कुछ भी चमकता है, वह उसकी आभा से अनुभासित होता है, यह सम्पूर्ण विश्व उसी के प्रकाश से प्रकाशित एवं भासित हो रहा है।)
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भगवान से प्रार्थना है कि मेरा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) सदा शुद्ध रहे। किसी भी तरह के वासनात्मक विचारों का जन्म ही न हो। निरंतर भगवान की चेतना में मेरा अस्तित्व बना रहे। जो क्षर से अतीत, और अक्षर से भी उत्तम हैं, उन भगवान पुरुषोत्तम की मैं शरणागत हूँ। वे मेरा कल्याण करें। वे ही मुझे कृतकृत्य और कृतार्थ कर सकते हैं। उनकी शरणागति के सिवाय मुझे अन्य कुछ भी पता नहीं है। वे मेरा सम्पूर्ण समर्पण स्वीकार करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जून २०२४
भगवान कहाँ नहीं है? ---
भगवान कहाँ नहीं है?
बिना श्रद्धा, विश्वास, भक्ति और अभीप्सा के तो कुछ भी नहीं मिलता। जब पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, भक्ति, और अभीप्सा हो तभी भगवान की अनुभूतियाँ हो सकती हैं, अन्यथा नहीं।
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दिन में किसी ऊँचे पर्वत पर या किसी ऐसे ऊँचे स्थान पर चले जाओ जहाँ से खूब दूर दूर तक देख सकते हो। जहाँ तक आपकी दृष्टि जाती है, और खुली आँखों से जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वे भगवान विष्णु हैं जो यह विश्व बन गए हैं। वह विस्तार आप स्वयं हैं। यह नश्वर देह नहीं। एक कंबल के आसन पर कमर सीधी रखते हुए उत्तर या पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाओ, और इस अनुभूति और दृश्य को अपने भ्रूमध्य में क़ैद कर लो, और उस का ध्यान करो।
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इसी तरह रात्रि में जब बादल या कोहरा न हो, और आकाश पूर्णतः साफ हो, खुली आँखों से ऊपर, नीचे और हर ओर देखिये। ये आकाश-गंगायें, उनके नक्षत्र, और उनके सारे ग्रह-उपग्रह, और यह सारा विस्तार -- भगवान विष्णु हैं, जो यह विश्व/सृष्टि बन गए हैं। आप भी उनके साथ एक हैं। भगवान का खूब ध्यान करो। कर्ता तो भगवान स्वयं हैं, आप तो निमित्त मात्र हैं।
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जब भी भक्तिभाव उमड़े, घर के एकांत में किसी ऐसे स्थान पर कमर सीधी रखते हुए ऊनी आसन पर बैठ जाओ, जहाँ आपको कोई परेशान न करे। नित्य कम से कम ढ़ाई-तीन घंटे भगवान का ध्यान करो। इस सृष्टि में निःशुल्क तो कुछ भी नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है। हमारी श्रद्धा, विश्वास, भक्ति (परमप्रेम) और अभीप्सा -- भगवान को पाने की कीमत है, जिनके बिना भगवान नहीं मिलते।
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जो भी कार्य आप करते हो, यह भाव रखो कि आपके माध्यम से भगवान स्वयं वह कार्य कर रहे हैं। वे ही इन पैरों से चल रहे हैं, वे ही इन आँखों से देख रहे हैं, इन कानों से वे ही सुन रहे हैं, और वे ही आपके अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) के स्वामी हैं। अपने अन्तःकरण को उन्हीं में समर्पित कर दीजिये और आत्मा के अतिरिक्त अनात्मा का चिंतन न करें। आप जो साधना/उपासना कर रहे हैं वह भी वे स्वयं ही कर रहे हैं। अपने पुण्य-पाप, गुण-अवगुण सब उन्हीं को समर्पित कर दें। पूरे दिन मानसिक रूप से भागवत मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) या राम नाम (रां) का, या अपनी गुरु-परंपरा के मंत्र का मानसिक जप करते रहें। जब भूल जाएँ तब याद आते ही फिर जपना आरंभ कर दें।
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और मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं है। किन्हीं के किसी भी प्रश्न का उत्तर मैं नहीं दे सकता। इससे अधिक कुछ जानना है तो किन्हीं श्रौत्रीय, ब्रहमनिष्ठ आचार्य से सविनय ससम्मान पूछिए। वे आपकी हर जिज्ञासा का उत्तर देंगे।
तत्व रूप से विष्णु और शिव में कोई अंतर नहीं है। दोनों एक ही हैं। भगवान की वे दो पृथक-पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं। यथार्थ में दोनों ही एक हैं।
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मंगलमय शुभ कामनाएँ॥ आप सब को नमन॥
ॐ तत्सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० जून २०२३
चित्त की वृत्तियाँ क्या होती हैं? इसे समझ कर ही साधना मार्ग पर आगे बढ़ें।
चित्त की वृत्तियाँ क्या होती हैं? इसे समझ कर ही साधना मार्ग पर आगे बढ़ें। हमारे चित्त में बारबार जो अधोगामी वासनात्मक विचार उठते हैं, वे ही चित्त की वृत्तियाँ हैं। वासनाएँ बहुत सूक्ष्म होती हैं, जो संकल्प शक्ति से नियंत्रित नहीं होतीं। उसके लिए किसी श्रौत्रीय ब्रहमनिष्ठ सद्गुरु के मार्गदर्शन में ईश्वर की उपासना करनी पड़ती है।
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