Tuesday, 11 March 2025

सनातन धर्म ही भारत की राजनीति, और हम सब का जीवन भी होगा ---

 सनातन धर्म ही भारत की राजनीति, और हम सब का जीवन भी होगा ---

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कोई मेरी बात सुने या न सुने, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जिस दिन सनातन धर्म ही भारत की राजनीति होगा। सनातन धर्म ही भारत की राजनीति हो सकता है। धर्म-विहीन राजनीति विकृतियों को जन्म देने वाली होती है। सनातन धर्म ही हमारा स्वधर्म भी है।
हमारा स्वधर्म है -- निज जीवन में परमात्मा से परमप्रेम, परमात्मा को पाने की अभीप्सा और परमात्मा की यथासंभव पूर्ण अभिव्यक्ति।
पाप और पुण्य क्या है? --- जब हम परमात्मा की चेतना में होते हैं, तब हमारे माध्यम से परमात्मा जो भी कार्य करते हैं, वह पुण्य होता है। जब हम राग-द्वेष, लोभ और अहंकार के वशीभूत होकर कुछ भी कार्य करते हैं, वह पाप होता है।
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हमारे जीवन में परमात्मा से परमप्रेम पूर्ण रूप से व्यक्त हो। इससे अतिरिक्त अन्य कोई भाव सार्थक नहीं है। हमारा एकमात्र शाश्वत सम्बन्ध परमात्मा से है। जन्म से पूर्व भी उन्हीं से संबंध था और मृत्यु के पश्चात भी उन्हीं से रहेगा। यह भगवान का प्रेम ही था जो हमें माँ-बाप, भाई-बहिन, सगे-सम्बन्धियों और मित्रों के माध्यम से प्राप्त हुआ। यह एक मायावी भ्रम है कि कोई अपना-पराया है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी परमात्मा से ही सम्बन्ध है। गुरू भी एक निश्चित भावभूमि तक ले जा कर छोड़ देता है, आगे की यात्रा तो स्वयं को ही करनी पडती है। फिर न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य, एकमात्र परमात्मा ही सब कुछ है। सारे सम्बन्ध एक भ्रम मात्र हैं।
हे महापुरुष, मैं आपके चरणों की वंदना करता हूँ। मैं आपके साथ एक हूँ। आपकी जय हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ मार्च २०२३

भगवान के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, हम वही बन जाते हैं ---

 भगवान के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, हम वही बन जाते हैं ---

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निरंतर भगवान की चेतना में रहें। उन्हें एक क्षण के लिए भी न भूलें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही उनका स्मरण आरंभ कर दें।
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥८:६॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥" (गीता)
अर्थात् -- इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
अर्थात् -- सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ॥
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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गुरु तत्व, आत्म-तत्व, और परमात्मा एक हैं। इनमें कोई भेद नहीं है। हम स्वयं को भगवान से पृथक मानते हैं, तो पृथक हैं, एक मानते हैं तो एक हैं। वास्तव में स्वयं में, गुरु में और भगवान में कोई भेद नहीं होता। हम भगवान के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, हम वही बन जाते हैं।
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गीता के पंद्रहवें अध्याय का प्रथम श्लोक ही यदि समझ में या जाए तो सारी दुविधा दूर हो जाती है --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
अर्थात् -- श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है॥
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परमात्मा का ध्यान करते करते एक दिन मेरी सारी चेतना ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस शरीर से बाहर निकल गई, और एक ऐसे सूक्ष्म लोक में पहुँच गई जहाँ आलोक ही आलोक था। कहीं कोई अंधकार नहीं था। लेकिन पाया कि वह लोक तो बहुत नीचे है, उसके ऊपर भी अनंत ब्रह्मांड है। फिर यह एक नित्य की दिनचर्या ही बन गई कि ध्यान इस शरीर से बाहर अनंत ब्रह्मांड में ही होने लगा। चेतना इस देह से बाहर निकल जाती और अनंत ब्रह्मांड में विस्तृत हो जाती। उस अनंतता का ध्यान करते करते एक दिन एक ब्रह्मज्योति के दर्शन हुए जिससे सारे संशय दूर हो गए। वह अनंत ब्रह्मज्योति ही एक श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र में परिवर्तित हो गई। उस पञ्चकोणीय नक्षत्र को ही मैं "परमशिव" और "पञ्चमुखी महादेव" कहता हूँ, वही मेरा उपास्य है। यही वह ऊर्ध्वमूलस्थ ज्योतिषाम्ज्योति है, जिसके बारे में भगवान ने कहा है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।"
श्रुति भगवती भी कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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आचार्य शंकर के अनुसार संसार से विरक्त हुए व्यक्ति को ही भगवत् तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं। संसार रूपी वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सबका कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त माया-शक्ति युक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है। वही इसका मूल है। भगवान की कृपा से ही यह समझा जा सकता है।
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हारिये न हिम्मत, बिसारिए न हरिःनाम। जितना भी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार लगे रहो। चाहे संसार छूट जाए, लेकिन भगवान न छूटें। अभी से आरंभ कर अंत समय तक भगवान की चेतना में लगे रहो।
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कीटक नाम का एक साधारण सा कीड़ा भँवरे से डर कर कमल के फूल में छिप जाता है। भँवरे का ध्यान करते करते वह स्वयं भी भँवरा बन जाता है। वैसे ही हम भी निरंतर परमशिव का ध्यान करते करते स्वयं परमशिव बन सकते हैं। भगवान के लिये एक बेचैनी, तड़प और घनीभूत प्यास बनाए रखें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ मार्च २०२३

किसी ने पूछा है कि मेरा क्या सिद्धांत/सत्संग/नियम व मत है?

 किसी ने पूछा है कि मेरा क्या सिद्धांत/सत्संग/नियम व मत है?

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निजात्मा में रमण, निजात्मा से परमप्रेम, और निजात्मा को समर्पण ही मेरा स्वधर्म है। इस से परे मुझे कुछ भी नहीं पता। मुझमें कोई रूप-गुण या सौंदर्य नहीं है। सारा सौंदर्य आत्मा का है।
इस से अतिरिक्त मेरा कोई सिद्धांत/नियम/मत नहीं है। मैं सभी में स्वयं को, व स्वयं में सभी को पाता हूँ। मेरे आराध्य ही यह समस्त विश्व बन गये हैं। मुझे निमित्त बना कर अपनी साधना वे स्वयं करते हैं।
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यह मेरा अंतिम उत्तर है। तमाशबीनों को अवरुद्ध (Block) कर दिया जाएगा। इस विषय पर और कुछ नहीं लिखूंगा।
ओम् तत्सत्!!
कृपा शंकर
11 मार्च 2024

Monday, 10 March 2025

हमें सिर्फ पराजय का ही इतिहास पढ़ाया गया है ---

 हमें सिर्फ पराजय का ही इतिहास पढ़ाया गया है ---

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भारत के गौरवमय इतिहास से सम्बंधित अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमें कभी पढाये ही नहीं गए| हमें सिर्फ पराजय का ही इतिहास पढ़ाया गया है जिस से हमारे में आत्म-हीनता का बोध सदा बना रहे| हमें वही इतिहास पढ़ाया गया है जो अँगरेज़ चाहते थे| सही इतिहास पर अनेक संस्थाओं व व्यक्तियों द्वारा शोध कार्य हो रहे हैं| अगले दस-बीस वर्षों में हमें सही इतिहास का भी ज्ञान होगा, पर मेरी आयु की पीढ़ी तब तक जीवित नहीं रहेगी|
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हमारी तो एक ही इच्छा थी कि हमारे जीवन काल में ही भारत माता द्विगुणित परम वैभव के साथ अखण्डता के सिंहासन पर बिराजमान हो और सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार सम्पूर्ण विश्व में हो| पर अब नहीं लगता कि इस जीवनकाल में यह देख सकेंगे| यदि सत्य का और ईश्वर का अस्तित्व है तो यह कार्य निश्चित रूप से होगा| इसके हम साक्षी भी होंगे|
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परमात्मा से निरंतर प्रेरणा मिल रही है आध्यात्म की गहनतम गहराइयों में ही जाने की| अब वही काम करेंगे जिस से परमात्मा को प्रसन्नता हो| परमात्मा हमारे से प्रसन्न हों बस यही चाहिए, और कुछ नहीं| सभी को नमन और शुभ कामनाएँ|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !
१० मार्च २०१८

मैं नमन करूँ तो किसको करूँ? कोई अन्य है ही नहीं ---

 

मैं नमन करूँ तो किसको करूँ? कोई अन्य है ही नहीं ---
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मैं इस समय ध्यानमुद्रा -- अर्धखेचरी युक्त शांभवीमुद्रा में बैठा हूँ। मेरी सारी चेतना सहस्त्रारचक्र में है। भगवान परमशिव एक विराट ज्योति:पुंज के रूप में मेरे समक्ष हैं। उनकी ज्योति में सारी सृष्टि समाहित है। मैं उन से पृथक नहीं रह सकता, अतः स्वयं की सारी चेतना, और सारा अस्तित्व उन्हें समर्पित कर रहा हूँ। मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। भगवान परमशिव अपनी साधना स्वयं कर रहे हैं।
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हम इस सृष्टि में कहीं पर भी हों --- सहस्त्रारचक्र उत्तर दिशा है, भ्रूमध्य पूर्व दिशा है, मेरुशीर्ष पश्चिम दिशा है, और मूलाधारचक्र दक्षिण दिशा है। जब हमारी चेतना सहस्त्रारचक्र में होती है उस समय हमारा मुँह स्वतः ही उत्तरदिशा में है। भगवान परमशिव जब हमें ज्ञान देते हैं, उस समय वे भगवान दक्षिणामूर्ति हैं। जब वे ध्यानस्थ है, उस समय वे पंचमुखी महादेव हैं। बाकी बातें उन्हीं से पूछिए, आपकी पात्रता होगी तो वे स्वयं ही आपको सब कुछ समझा देंगे। आवश्यकता हमें अपनी पात्रता विकसित करने की है।
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उनके भीतर से प्रणव का नाद स्वतः ही प्रस्फुटित हो रहा है। मैं उनकी दिव्य ज्योति और नाद के साथ एक हूँ। मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। वे ही गुरु हैं, और वे ही शिष्य हैं। संसार के सारे संबंध वे ही हैं।
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मेरा इस समय साधनाकाल प्रारंभ हो गया है, अतः मैं उपलब्ध नहीं हूँ। उत्थान-पतन, हानि-लाभ, जीवन-मरण, ज्ञान-अज्ञान आदि सब कुछ परमशिव हैं। मेरा एकमात्र संबंध और व्यवहार परमशिव से है। कोई प्रश्न, कोई उत्तर नहीं है। कोई शंका और समाधान भी नहीं है। सारा प्रारब्ध, सारे संचित कर्म, और उनके फल भी वे ही हैं। सारा ज्ञान भक्ति और वैराग्य भी वे ही हैं। इस सृष्टि में जो कुछ भी त्यागने और पाने योग्य है, वह सब कुछ वे परमशिव ही हैं। कोई संकल्प-विकल्प नहीं है, सारे संकल्प-विकल्प वे ही हैं। सारी रुग्णता और उपचार भी वे ही हैं। यह शरीर रहे या न रहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, जीवन-मृत्यु आदि सब कुछ वे परमशिव ही हैं। सारा अस्तित्व ही परमशिवमय है। सारी कामनाएँ, आकांक्षाएँ, त्याग, समर्पण, साधना, उपासना, और अभीप्सा आदि सब कुछ वे ही हैं।
ॐ ॐ ॐ !!
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ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर
१० मार्च २०२३

Sunday, 9 March 2025

एक ही विकल्प ---

एक ही विकल्प --- . वास्तव में हमारे समक्ष एक ही विकल्प है कि हम परमात्मा को प्रेम करें या न करें, अन्य कोई विकल्प है ही नहीं| अन्य सब तो मात्र बुद्धि विलास है| प्रभु से प्रेम होगा तो हमारे विचार और संकल्प भी अच्छे होंगे| ये ही हमारे अच्छे कर्म हैं| अन्यथा स्वतः हमारे कर्म भी बुरे होंगे|

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ह्रदय में कई बार यह प्रश्न उठता था कि सब कुछ प्रारब्ध के आधीन है या पुरुषार्थ के| कुछ संत कहते हैं कि जैसी ईश्वर की इच्छा होती है वैसे ही होता है, मनुष्य की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती| अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या मनुष्य कर्म करने को स्वतंत्र है? यदि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है तो कर्मफल का सिद्धांत कितना सही है?
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अधिकाँश लोग शिकायत करते हैं कि हमने तो कोई बुरा कर्म ही नहीं किया फिर कष्ट क्यों पा रहे हैं| इन सब पर मंथन करने के पश्चात जो उत्तर निकलता है वह यह कि भौतिक रूप से किया हुआ कार्य ही कर्म नहीं है|
हमारे विचार और अपेक्षाएँ ही हमारे "कर्म" हैं| हमारी हर कामना, संकल्प और अपेक्षा हमारा 'कर्म' है जिस का फल मिले बिना नहीं रहता| हमारे विचार ही घनीभूत होकर भौतिक जगत की रचना करते हैं| सारे सुखों और दु:खों का कारण हमारे विचार ही हैं| हर कामना, हर संकल्प और हर विचार फलीभूत अवश्य होता है|
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कहते हैं कि जीव जब गर्भस्थ होता है तभी उसकी आयु, कर्म, विद्या, धन तथा मृत्यु, ये ५ बातें विधाता निर्धारित कर देते हैं| इसे ही प्रारब्ध कहा गया है और जिन साधनों से जीव सांसारिक पदार्थों अथवा उपलब्धियों को प्राप्त करने की चेष्टा करता है , उसे ही पुरुषार्थ समझा जाता है| समस्त सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति प्रारब्ध की अनुकूलता में पुरुषार्थ साध्य तो है, किन्तु भगवत् भक्ति एक मात्र भगवत् कृपा से ही साध्य है| जीव के पुरुषार्थ तथा प्रारब्ध दोनों ही भगवत् भक्ति की प्राप्ति में असमर्थ हैं|
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अनेक जन्मों के बहुत ही बहुत अति अच्छे कर्मों से भगवान को उपलब्ध होने यानि प्राप्त करने की इच्छा जागृत होती है, तभी भक्ति प्राप्त होती है जिसे मैं मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धी मानता हूँ| भक्ति एक अवस्था है जिसे प्राप्त हुआ जाता है, कुछ करना नहीं पड़ता, बनना पड़ता है| सत्संग और सद्विचार साधन हैं|
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कर्म कोई अंतिम बंधन नहीं हैं| मनुष्य कर्मों से तभी तक बँधा हुआ है जब तक उसमें अहंकार यानि प्रभु से पृथकता है| पूर्ण समर्पण द्वारा ही सभी कर्मों से मुक्त हुआ जा सकता है| परमात्मा में कोई सीमाएँ नहीं हैं| प्रभु तो अनंत हैं| सभी सीमाएँ और पंथ व मार्ग .... ज्ञानियों द्वारा निर्मित हैं, भगवान द्वारा नहीं| महत्व इस बात का नहीं है की हम किस मार्ग पर चल रहे हैं, महत्व सिर्फ और सिर्फ इसी बात का है कि हम कितने प्रेममय हैं|.
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
९ मार्च २०१७

सनातन धर्म हमें बलशाली होने की शिक्षा देता है .....

 सनातन धर्म हमें बलशाली होने की शिक्षा देता है .....

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नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ||
बलहीन को कभी परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती|
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अश्माभव:परशुर्भवःहिरण्यमस्तृतांभवः|
उस चट्टान की तरह बनो जो समुद्र की प्रचंड लहरों के आघात से भी विचलित नहीं होती|
उस परशु की तरह बनो जिस पर कोई गिरे वह भी नष्ट हो, और जिस पर भी गिरे वह भी नष्ट हो जाए|
तुम्हारे में हिरण्य यानि स्वर्ण की सी पवित्रता हो|
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सत्यं वद (सत्य बोलो) !
धर्मं चर (धर्म मेँ विचरण करो) !
स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यं |
वेदाध्ययन और उसके प्रवचन प्रसार मेँ प्रमाद मत करो !
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तद्विष्णोः परमं पदम् | सदा पश्यन्ति सूरयः ||
उस विष्णु के परम पद का दर्शन सदैव सूरवीर ही करते हैँ ||
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सत्य का आलोक, असत्य और अन्धकार के बादलोँ से ढका ही दिखता है , नष्ट नहीँ होता| भगवान भुवन भास्कर जब अपने पथ पर अग्रसर होते हैं तब मार्ग में कहीं भी तिमिर का अवशेष नहीं रहता| अब समय आ गया है| असत्य, अन्धकार और अज्ञान की शक्तियों का पराभव सुनिश्चित है| अपने अंतर में उस ज्योतिर्मय ब्रह्म को आलोकित करो| सत्य विचार अमर है| सनातन वैदिक धर्म अमर है||
९ मार्च २०१९